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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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शिष्य गुरु को ही साक्षात परब्रह्म का साकार स्वरूप मानकर उसकी वन्दना करे, इन सभी का फल अन्त में एक ही होगा, सभी अपने अन्तिम अभीष्ट तक पहुँच सकेंगे। सभी को अपनी-अपनी भावना के अनुसार प्रभु-पद-प्राप्ति अथवा मुक्ति मिलेगी। सभी के दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जायगा। यह तो सचेतन साकार वस्तु के प्रति प्रेम करने की पद्धति है, हिंदू-धर्म में तो यहाँ तक माना गया है कि पत्थर, मिट्टी, धातु अथवा किसी भी प्रकार की मूर्ति बनाकर उसी में ईश्वर-बुद्धि से पूजन करोगे तो तुम्हें शुद्ध-विशुद्ध प्रेम की ही प्राप्ति होगी। किंतु इसमें दम्भ या बनावट न होनी चाहिये। अपने हृदय को टटोल लो कि इसके प्रति हमारा पूर्ण अनुराग है या नहीं, यदि किसी के भी प्रति तुम्हारा पूर्ण प्रेम हो चुका तो बस, तुम्हारा कल्याण ही है, तुम्हारा सर्वस्व तो वही है।

नित्यानन्द प्रभु बारह-तेरह वर्ष की अल्पवयस में ही घर छोड़कर चले आये थे। लगभग बीस वर्षों तक ये तीर्थों में भ्रमण करते रहे, इनके साथी संन्यासीजी इन्हें छोड़कर कहाँ चले गये, इसका कुछ भी पता नहीं चलता, किंतु इतना अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि उन महात्मा के लिये इनके हृदय में कोई विशेष स्थान न बन सका। उनमें इनका गुरुभाव नहीं हुआ। बीस वर्षों तक इधर-उधर घूमते रहे, किंतु जिस प्रेमी के लिये इनका हृदय छटपटा रहा था, वह प्रेमी इन्हें कहीं नहीं मिला।महाप्रभु गौरांग का नाम सुनते ही इनके हृदय-सागर में हिलोरें-सी उठने लगीं। गौर के दर्शनों के लिये मन व्याकुल हो उठा। इसीलिये ये नवद्वीप की ओर चल पड़े। आज नन्दनाचार्य के घर गौर ने स्वयं आकर इन्हें दर्शन दिये। इनके दर्शनमात्र से ही इनकी चिरकाल की मनःकामना पूर्ण हो गयी। जिसके लिये ये व्याकुल होकर देश-विदेशों में मारे-मारे फिर रहे थे, वह वस्तु आज स्वयं ही इन्हें प्राप्त हो गयी। ये स्वयं संन्यासी थे, गौरांग अभी तक गृहस्थी में ही थे। गौरांग से ये अवस्था में भी दस-ग्यारह वर्ष बड़े थे, किंतु प्रेम में तो छोटे-बड़े या उच्च-नीच का विचार होता ही नहीं, इन्होंने सर्वतोभावेन गौरांग को आत्मसमर्पण कर दिया। गौरांग ने भी इन्हें अपना बड़ा भाई समझकर स्वीकार किया।
नन्दनाचार्य के घर से नित्यानन्द जी को साथ लेकर गौरांग भक्तों सहित श्रीवास पण्डित के घर पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही संकीर्तन आरम्भ हो गया। सभी भक्त नित्यानन्द जी के आगमन के उल्लास में नूतन उत्साह के साथ भावावेश में आकर जोरों से कीर्तन करने लगे। भक्त प्रेम में विह्वल होकर कभी तो नाचते, कभी गाते और कभी जोरों से ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की तुमुल ध्वनि करते। आज के कीर्तन में बड़ा ही आनन्द आने लगा, मानो सभी भक्त प्रेम में बेसुध होकर अपने-आपे को बिलकुल भूल गये हों। अब तक गौरांग शान्त थे, अब उनसे भी न रहा गया। वे भी भक्तों के साथ मिलकर शरीर की सुधि भुलाकर जोरों से हरि-ध्वनि करने लगे। महाप्रभु नित्यानन्द जी के दोनों हाथों को पकड़कर आनन्द से नृत्य कर रहे थे।

नित्यानन्दजी भी काठ की पुतली की भाँति महाप्रभु के इशारे के साथ नाच रहे थे। अहा! उस समय की छबि का वर्णन कौन कर सकता है? भक्तवृन्द मन्त्रमुग्ध की भाँति इन दोनों महापुरुषों का नृत्य देख रहे थे। पखावजवाला पखावज न बजा सका। जो भक्त मजीरे बजा रहे थे, उनके हाथों से स्वतः ही मजीरे गिर पड़े। सभी वाद्यों का बजना बंद हो गया। भक्त जड-मूर्ति की भाँति चुपचाप खड़े निमाई और निताई के नृत्य के माधुर्य का निरन्तर भाव से पान कर रहे थे। नृत्य करते-करते निमाई ने निताई का आलिंगन किया। आलिंगन पाते ही निताई बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, साथ ही निमाई भी चेतना शून्य-से बन गये।
क्षणभर के पश्चात् महाप्रभु जोरों के साथ उठकर खड़े हो गये और जल्दी से भगवान के आसन पर जा बैठे। अब उनके शरीर में बलराम जी का-सा आवेश प्रतीत होने लगा। उसी भावावेश में वे ‘वारुणी’, ‘वारुणी’ कहकर जोरों से चिल्लाने लगे। हाथ जोड़े हुए श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! जिस ‘वारुणी’ की आप जिज्ञासा कर रहे हैं, वह तो आपके ही पास है। आप जिसके ऊपर कृपा करेंगे, वही उस वारुणी का पान करके पागल बन सकेगा।’

व्यासपूजा...

प्रभु के भावावेश को कम करने के निमित्त एक भक्त ने शीशी में गंगाजल भरकर प्रभु को दिया। गंगाजल पान करके प्रभु कुछ-कुछ प्रकृतिस्थ हुए और फिर नित्यानन्द जी को भी अपने हाथों से उठाया।

इस प्रकार सभी भक्तों ने उस दिन संकीर्तन में बड़े ही आनन्द का अनुभव किया। इन दोनों भाइयों के नृत्य का सुख सभी भक्तों ने खूब ही लूटा। श्रीवास पण्डित के घर ही नित्यानन्दप्रभु का निवास-स्थान स्थिर किया गया। प्रभु अपने साथ ही निताई को अपने घर लिवा ले गये ओर शचीमाता से जाकर कहा- ‘अम्मा! देख, यह तेरा विश्वरूप लौट आया। तू उनके लिये बहुत रोया करती थी।’ माता ने उस दिन सचमुच ही नित्यानन्दप्रभु में विश्वरूप के ही रूप का अनुभव किया और उन्हें अन्त तक उसी भाव से प्यार करती रहीं। वे निताई और निमाई दोनों को ही समान रूप से पुत्र की भाँति प्यार करती थीं।

एक दिन महाप्रभु ने नित्यानन्द जी का प्रेम से हाथ पकड़े हुए पूछा- ‘श्रीपाद! कल गुरुपूर्णिमा है, व्यासपूजन के निमित्त कौन-सा स्थान उपयुक्त होगा?’

नित्यानन्दप्रभु ने श्रीवास पण्डित के पूजा-गृह की ओर संकेत करते हुए कहा- ‘क्या इस स्थान में व्यासपूजन नहीं हो सकता?’

हँसते हुए गौरांग ने कहा- ‘हाँ, ठीक तो है, आचार्य तो श्रीवास पण्डित ही हैं, इन्हीं का तो पूजन करना है। बस ठीक रहा, अब पण्डित जी ही सब सामग्री जुटावेंगे। इन्हीं पर पूजा के उत्सव का सम्पूर्ण भार रहा।’ प्रसन्नता प्रकट करते हुए पण्डित श्रीवास जी ने कहा- ‘भार की क्या बात है, पूजन की सामग्री घर में उपस्थित है। केला, आम्र, पल्लव, पुष्प, फल और समिधादि आवश्यकीय वस्तुएँ आज ही मँगवा ली जायँगी। इनके अतिरिक्त और जिन वस्तुओं की आवश्यकता हो उन्हें आप बता दें।

प्रभु ने कहा- ‘अब हम क्या बतावें, आप स्वयं आचार्य हैं, सब समझ-बूझकर जुटा लीजियेगा। चलिये, बहुत समय व्यतीत हो गया, अब गंगास्नान कर आवें।’
क्रमशः

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