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Showing posts from October, 2022

cc 48

श्री श्री चैतन्य चरितावली  48- निमाई कुछ कहने ही को थे कि उनके समीप बैठे हुए एक योग्य छात्र ने कहा- ‘ये यहाँ के विख्यात अध्यापक निमाई पण्डित हैं।’ प्रसन्नता प्रकट करते हुए दिग्विजयी ने निःसंकोचभाव से उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘ओहो! निमाई पण्डित आपका ही नाम है? आपकी तो हमने बड़ी भारी प्रशंसा सुनी है। आप तो यहाँ के वैयाकरणों में सिरमौर समझे जाते हैं। हाँ, आप ही कोई व्याकरण की पंक्ति सुनाइये।’ हाथ जोड़े हुए नम्रतापूर्वक निमाई पण्डित ने कहा- ‘यह तो आप-जैसे गुरुजनों की कृपा है, मैं तो किसी योग्य भी नहीं। भला, आपके सामने मैं सुना ही क्या सकता हूँ, मैं तो आपके शिष्यों के शिष्य होने के योग्य भी नहीं। आपने संसार को अपनी विद्या-बुद्धि से दिग्विजय किया है। आपके कवित्व की बड़ी भारी प्रशंसा सुनी है। यह छात्र-मण्डली आपके कवित्व के श्रवण करने के लिये बड़ी उत्सुक हो रही है। कृपा करके आप ही अपनी कोई कविता सुनाने की कृपा कीजिये।’ यह सुनकर दिग्विजयी पण्डित हँसने लगे। पास के दो-चार विद्यार्थियों ने कहा- ‘हाँ, महाराज! हम लोगों की इच्छा को जरूर पूर्ण कीजिये। हम सभी लोग बहुत उत्सुक हैं आपकी कविता सु...

cc47

श्री श्री चैतन्य चरितावली  47- वे भरी सभा में उस मानी और वयोवृद्ध पण्डित की हँसी करना ठीक नहीं समझते थे। प्रायः देखा गया है, भरी सभा में लोगों के सामने अपने सम्मान की रक्षा के निमित्त शास्त्रार्थ करने वाले झूठी बात पर भी अड़ जाते हैं और उसे येन-केन प्रकारेण सत्य ही सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। सत्य को झूठ और झूठ को सत्य करने के कौशल का ही नाम तो आजकल असल में शास्त्रार्थ करना है। निमाई उससे शास्त्रार्थ करना नहीं चाहते थे, किन्तु उसे यह बताना चाहते थे कि संसार में परमात्मा के अतिरिक्त अद्वितीय वस्तु कोई नहीं है। कोई कितना भी अभिमान क्यों न कर ले, संसार में उससे बढ़कर कोई-न-कोई मिल ही जायगा। ब्रह्मा जी की बनायी हुई इस सृष्टि में यही तो विचित्रता है, कहावत है- ‘मल्लन कूँ मल्ल घनेरे, घर नाहिं तो बाहिर बहुतेरे’ अर्थात ‘बलवानों को बहुत-से बलवान मिल जाते हैं, उने समीप उनके समान न भी हों तो बाहर बहुत-से मिल जायँगे।’ इसी बात को जताने के निमित्त निमाई पण्डित एकान्त में दिग्विजयी से बातें करना चाहते थे। सन्ध्या का समय है, कलकलनादिनी भगवती भागीरथी अपनी द्रुत गति से सदा की भाँति सागर की ओर दौड...

cc 46

श्री श्री चैतन्य चरितावली  46- राज्यसभाओं में बड़े-बड़े पण्डित रखे जाते थे, उन्हें समय-समय पर यथेष्ठ धन पारितोषिक के रूप में दिया जाता था। दूर-दूर से विद्वान सभाओं में शास्त्रार्थ करने आते थे और राजसभाओं की ओर से उनका सम्मान किया जाता था।पण्डितों का शास्त्रार्थ सुनना उन दिनों राजा या धनिकों का एक आवश्यक मनोरंजन समझा जाता था। जो बोलने-चालने में अत्यन्त ही पटु होते थे, जिन्हें अपनी वक्तृत्व-शक्ति के साथ शास्त्रीय ज्ञान का भी पूर्ण अभिमान होता था, वे सम्पूर्ण देश में दिग्विजय के निमित्त निकलते थे। प्रायः ऐसे पण्डितों को किसी राजा या धनी का आश्रय होता था, उनके साथ बहुत-से और पण्डित, घोडे़, हाथी तथा और भी बहुत-से राजसी ठाट होते थे। वे विद्या के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध केन्द्र-स्थानों में जाते और वहाँ जाकर डंके की चोट के साथ मुनादी कराते कि ‘जिसे अपने पाण्डित्य का अभिमान हो वह हमसे आकर शास्त्रार्थ करे। यदि वह हमें शास्त्रार्थ में परास्त कर देगा तो हम अपना सब धन छोड़कर लौट जायँगे और वे हमें परास्त न कर सके तो हम समझेंगे हमने यहाँ के सभी विद्वानों पर विजय प्राप्त कर ली। यदि किसी की हमसे शास्त्रा...

cc45

श्री श्री चैतन्य चरितावली  45- वे मानो अपने अत्यन्त क्षीण शरीर को अन्तिम बार पति-दर्शनों की लालसा से ही टिकाये हुए हैं, किन्तु उनकी यह अभिलाषा पूरी न हो सकी। निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में अनुमान से अधिक दिन लग गये। अन्त में बड़े कष्ट के साथ वियोग-व्यथा को न सह सकने के कारण अपने पतिदेव के चरण-चिह्नों को हृदय में धारण करके उन्होंने इस पांचभौतिक शरीर का त्याग कर दिया। वे इस मर्त्यलोक की भूमि को त्यागकर सतियों के रहने योग्य अपने-पुण्य-लोक में पति-मिलन की आकांक्षा से चली गयीं। घरवालों ने रोते-रोते उनके सभी संस्कार किये। इधर निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में भ्रमण करते हुए कई मास बीच गये। अब इन्हें घर की चिन्ता होने लगी। इन्हें भान होने लगा कि हमारे घर पर जरूर कुछ अनिष्ट हुआ है, हृदय के भाव तो असंख्यों कोसों पर से हृदय में आ जाते हैं। लक्ष्मी देवी की अन्तिम वेदना इनके हृदय को पीड़ा पहुँचाने लगी। इन्हें अब कहीं आगे जाना अच्छा नहीं लगता था, इसलिये इन्होंने साथियों को नवद्वीप लौट चलने की आज्ञा दी। आज्ञापाकर सभी नवद्वीप लौट चलने की तैयारियाँ करने लगे। बहुत-से नवीन छात्र भी विद्योपार्जन के नि...

cc 44

श्री श्री चैतन्य चरितावली  44- समयानुसार कोई सरल, सुन्दर और सर्वश्रेष्ठ साधन बताइये ओर किसको साध्य मानकर उस साधन को करें।’ प्रभु थोड़ी देर चुप रहे, फिर बड़े ही प्रेम के साथ मिश्र से बोले- ‘विप्रवर! प्रभु-प्राप्ति ही मनुष्य का मुख्य साध्य है। उसकी प्राप्ति के लिये प्रत्येक युग में अलग-अलग साधन होते हैं। सत्ययुग में ध्यान ही मुख्य साधन समझा जाता था, त्रेता में बड़े-बड़े़ यज्ञों के द्वारा उस यज्ञ पुरुष भगवान की अर्चना की जाती थी, द्वापर में पूजा-अर्चा के द्वारा प्रभु-प्रसन्नता समझी जाती थी, किन्तु इस कलियुग में तो केवल केशव-कीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ साधन बताया जाता है। जो फल अन्य युगों में उन-उन साधनों से हाते थे वही फल कलियुग में भगवन्नाम-स्मरण से होता है। यथा- कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।। बस, सब साधनों को छोड़कर हरि-नाम का ही आश्रय पकड़ना चाहिये। भगवान व्यासदेव तीन बार प्रतिज्ञा करके कहते हैं- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा। अर्थात कलियुग में केवल हरि का ही नाम सार है। मैं प्रतिज्...

cc 43

श्री श्री चैतन्य चरितावली  43- बंगाल में भगवती भागीरथी की दो धाराएँ हो जाती हैं। गंगा जी की मूल शाखा पूर्व की ओर जाकर जो बंगाल के उपसागर में मिली है, उसका नाम तो पद्मावती है। दूसरी जो नवद्वीप होकर गंगा सागर में जाकर समुद्र से मिली है उसे भागीरथी गंगा कहते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के ओर दक्षिण-तट से लेकर पद्मा नदी पर्यन्त के देश को राढ़-देश कहते हैं। पहले ‘बंगाल’ इसे ही कहते थे।उत्तर-तट को गौड़ देश कहते थे और दक्षिण-तट को बंगाल या राढ़ के नाम से पुकारते थे। आज जिसे पूर्व बंगाल कहते हैं, यथा- रत्नाकरं समारभ्य ब्रह्मपुत्रान्तगं शिवे। बंगदेशो मया प्रोक्तः सर्वसिद्धिप्रदर्शकः।। गौड़-देश वालों से बंग-देश वालों का आचार-विचार भी कुछ-कुछ भिन्न था और अब भी है। निमाई पण्डित ने पद्मा के किनारे-किनारे पूर्व बंगाल के बहुत-से स्थानों में भ्रमण किया। जो भी लोग इनका आगमन सुनते वे ही यथाशक्ति भेंट लेकर इनके पास आते। वहाँ के विद्यार्थी कहते- ‘हम बहुत दिनों से आपकी प्रशंसा सुन रहे थे। आपकी लिखी हुई व्याकरण की टिप्पणी बड़ी ही सुन्दर है। हमें अपने पाठ में उससे बहुत सहायता मिलती है।’ कोई कहते- ‘आपकी पद-धूलि ...

cc42

श्री श्री चैतन्य चरितावली  42- उनसे यह बात छिपी नहीं रहती कि ‘विष्णाय’ कहने से भी उसका भाव मुझे नमस्कार करने का ही था।’ निमाई पण्डित का ऐसा उत्तर सुनकर पुरी महाशय अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘यह उत्तर तो आपकी महत्ता का द्योतक है। इस कथन से आपने श्रीकृष्ण-लीला की महिमा का ही वर्णन किया है। आप धुरन्धर वैयाकरण हैं, इसलिये पद-पदान्त और क्रिया की शुद्धि-अशुद्धि पर आप ध्यान जरूर देते जायँ।’ यह कहकर वे अपने ग्रन्थ को इन्हें सुनाने लगे। ये बड़े मनोयाग के साथ नित्यप्रति आकर उस ग्रन्थ को सुनते और सुनकर प्रसन्नता प्रकट करते। एक दिन ग्रन्थ सुनते-सुनते एक धातु के सम्बन्ध में इन्होंने कहा- ‘यह धातु ‘आत्मनेपदी’ नहीं है ‘परस्मैपदी’ है।’ पुरी उसे आत्मनेपदी ही समझे बैठे थे। इनकी बात से उन्हें शंका हो गयी। इनके चले जाने के पश्चात् पुरी रात भर उस धातु के ही सम्बन्ध में सोचते रहे। दूसरे दिन जब ये फिर पुस्तक सुनने आये तो इनसे पुरी ने कहा- ‘आप जिसे परस्मैपदी धातु बताते थे, वह तो आत्मनेपदी ही है।’ यह कहकर उन्होंने उस धातु को सिद्ध करके इन्हें बताया। सुनकर ये प्रसन्न हुए और ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  41- लक्ष्मीदेवी का स्वभाव बड़ा ही कोमल है, वे दिनभर घर का काम करती हैं ओर तनिक भी दुःखी नहीं होतीं।निमाई तो रसिकशिरोमणि हैं ही, वे दो-एक के साथ बिना भोजन करते ही नहीं, लक्ष्मी देवी सबके लिये आलस्यरहित होकर रन्धन करती हैं और अपने पति के साथ उनके प्रेमियों को भी उसी श्रद्धा के साथ भोजन कराती हैं। कभी-कभी घर में दस-दस, पाँच-पाँच अतिथि आ जाते हैं। वृद्धा माता को उनके भोजन की चिन्ता होती है, निमाई इधर-उधर से क्षणभर में सामान ले आते हैं और उसके द्वारा अतिथि-सेवा की जाती है। नगर में कोई भी नया साधु-वैष्णव आवे यदि उसके साथ निमाई का साक्षत्कार हुआ तो वे उसे भोजन के लिये नवद्वीप में ईश्वरपुरी जरूर निमन्त्रित करेंगे और अपने घर ले जाकर भिक्षा करावेंगे। ये सब कार्य ही तो उनकी महानता के द्योतक हैं। पाठक श्री मन्माधवेन्द्रपुरी जी के नाम से तो परिचित ही होंगे और यह भी स्मरण होगा कि उनके अन्तरंग और सर्वप्रिय शिष्य श्रीईश्वरपुरीजी थे। भक्तशिरोमणि श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस असार संसार को त्याग कर अपने नित्यधाम को चले गये- अन्तिम समय में उनके रूँधे हुए कण्ठ से यह श्लोक निकला था- ...

cc 39

श्री श्री चैतन्य चरितावली  39 नियत तिथि के दिन अपने स्नेही बन्धु-बान्धव तथा विद्यार्थियों के साथ बरात लेकर निमाई बल्लभाचार्य जी के घर गये। आचार्य ने सभी का यथोचित सम्मान किया। गोधूलि की शुभ लग्न में निमाई पण्डित ने लक्ष्मी देवी का पाणिग्रहण किया। लक्ष्मी देवी ने काँपते हुए हाथों से इनके चरणों में माला अर्पण की और भक्तिभाव के साथ प्रणाम किया। इन्होंने उन्हें वामांग किया। हवन, प्रदक्षिणा, कन्यादान आदि सभी वैदिक कृत्य होने पर विवाह का कार्य सकुशल समाप्त हुआ। दूसरे दिन आचार्य से विदा होकर लक्ष्मी देवी के साथ पालकी में चढ़कर निमाई घर आये। माता ने सती स्त्रियों के साथ पुत्र और पुत्रवधू का स्वागत किया। ब्राह्मणों को तथा अन्य आश्रित जनों को यथायोग्य द्रव्य-दान किया गया। लक्ष्मी देवी का रंग-रूप निमाई के अनुरूप ही था। इस जुगल जोड़ी को देखकर पास-पड़ोस की स्त्रियाँ परम प्रसन्न हुईं। कोई तो इन्हें रति-कामदेव की उपमा देने लगी, कोइई-कोई शची-पुरन्दर कहकर परिहास करने लगी, कोई-कोई गौर-लक्ष्मी कहकर निमाई की ओर हँसने लगी। सुन्दरी पुत्रवधू के साथ पुत्र को देखकर माता को जो आनन्द प्राप्त हुआ उसका वर्णन क...

cc38

श्री श्री चैतन्य चरितावली  38- बंगाल में प्रायः सभी धार्मिक पुरुषों के यहाँ एक ‘चण्डी-मण्डप’ नाम से अलग स्थान होता है, उसे ‘देवी-गृह’ या ‘ठाकुर-दालान’ भी कहते हैं। नवदुर्गाओं में उक्त स्थान पर ही चण्डीपाठ और पूजा तथा उत्सव हुआ करते हैं। यह स्थान ऐसे ही शुभ कार्यों के लिये सुरक्षित होते हैं। योग्य और विद्वान अतिथि के आने पर इसी स्थान में उनका आतिथ्यादि भी किया जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार धनिकों का चण्डी-मण्डप विस्तृत, सुन्दर और अधिक कीमती होता है। संजय महाशय का चण्डीमण्डप खूब बड़ा था। निमाई पण्डित ने उसी मण्डप में अपनी पाठशाला स्थापित की। इधर-उधर से बहुत-से छात्र इनका नाम सुनकर पढ़ने आने लगे। पुत्र के साथ संजय भी निमाई से विद्याध्ययन करने लगे। इनकी पढ़ाने की शैली बड़ी ही सरस तथा चित्ताकर्षक थी, इसलिये थोड़े ही समय में इनकी पाठशाला चल निकली और सैकड़ों छात्र इनके पास पढ़ने आने लगे। ये विद्यार्थियों के साथ गुरु-शिष्य का व्यवहारन करके एक प्रेमी मित्र का-सा व्यवहार करते। उनसे खूब हँसी-दिल्लगी करते, घर का हाल-चाल पूछते ओर अपनी सब बातें बताते। इससे विद्यार्थी इनके ऊपर अत्यधिक अनुराग रखने...

cc36

श्री श्री चैतन्य चरितावली  36- पण्डित रघुनाथ को स्वयं भी अपनी तर्कशक्ति और विलक्षण बुद्धि का भरोसा था। उनकी उस समय से ही यह प्रबल वासना थी कि मैं भारतवर्ष में एक प्रसिद्ध नैयायिक बनूँ। सम्पूर्ण देश में मेरी विलक्षण बुद्धि की ख्याति हो जाय। जो जैसे होनहार होते हैं, उनकी पहले से ही वैसी भावना होती है। रघुनाथ की भी सर्वमान्य बनने की पहले से ही वासना थी। रघुनाथ के साथ निमाई का परिचय पहले से ही हो चुका था। उनके साथ इनकी गाढ़ी मैत्री भी हो चुकी थी। निमाई कभी-कभी रघुनाथ के निवासस्थान पर भी जाया करते और उनसे न्याय सम्बन्धी बातें किया भी करते थे। इनकी बातचीत से ही रघुनाथ समझ गये कि यह भी कोई होनहार नैयायिक हैं। वे समझते थे कि मुझसे न्याय में स्पर्धा रखने वाला नवद्वीप में दूसरा कोई छात्र नहीं है। निमाई से बातचीत करते-करते कभी उन्हें खटकने लगता कि यदि यह इसी प्रकार परिश्रम करता रहा, तो सम्भवतया मुझसे बढ़ सकता है। किन्तु उन्हें अपनी बुद्धि पर पूरा भरोसा था, इसलिये इस विचार को वे अपने हृदय में जमने नहीं देते थे। एक दिन रघुनाथ को गुरु ने कोई ‘पंक्ति’ लगाने को दी। वह ‘पंक्ति’ रघुनाथ की समझ में ही...

cc37

श्री श्री चैतन्य चरितावली  37- निमाई अपनी धुन में सुनाते ही जा रहे थे, उन्हें पता भी नहीं था कि रघुनाथ की ग्रन्थ के सुनने से क्या दशा हो रही है। सुनाते-सुनतो एक बार इन्होंने दृष्टि उठाकर रघुनाथ की ओर देखा। इनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। आश्चर्य प्रकट करते हुए निमाई ने पूछा- ‘भैया! तुम रो क्यों रहे हो?’ आँसू पोंछते हुए रुद्धकण्ठ से उन्होंने कहा- ‘निमाई! तुमसे मैं अपने मनोगत भावों को छिपाकर एक नया दूसरा पाप न करूँगा। सत्य बात तो यह है कि मैं इस अभिलाषा से एक ग्रन्थ लिख रहा था कि वह सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ होगा। किन्तु तुम्हारे इस ग्रन्थ को देखकर मेरी चिराभिलषित आशा पर पानी फिर गया। भला, तुम्हारे इस ग्रन्थ के सामने मेरे ग्रन्थ को कौन पूछेगा?’ इसी मनोवेदना के कारण मैं अपने आँसुओं को रोकने में असमर्थ हो गया हूँ।’ यह सुनकर निमाई बड़े जोरों से हँसे और उन्हें स्पर्श करते हुए बोले- ‘बस, इस छोटी-सी बात के ही लिये आप इतना अनुताप कर रहे हैं। भला, यह भी कोई बात है, यह तो साधारण-सी पोथी है, मैं आपकी प्रसन्नता के निमित्त जलती अग्नि में भी कूदकर इन प्राणों को स्वाहा कर सकता हूँ, फिर यह तो बात ही क्या है...

cc35

श्री श्री चैतन्य चरितावली  35- जब मुरारी को इनकी विलक्षण बुद्धि का परिचय प्राप्त हुआ, तब तो वे इनके साथ खूब बातें करने लगे। ये कहते- ‘मुरारी! अमुक प्रयोग को सिद्ध करो।’ मुरारी उसे ठीक-ठीक सिद्ध करते। ये उसमें बीसों दोष निकालते, उसका कई प्रकार से खण्डन करते।मुरारी इनकी तर्कशैली को सुनकर आश्चर्य प्रकट करने लगते, तब आप एक-एक शंका का समाधान करते हुए मुरारी के ही मत को स्थापित करते। फिर हँसकर कहते- ‘गुप्त महाशय! यह तो पण्डितों का काम है, आप ठहरे वैद्यराज! जड़ी-बूटी घोंट-पीसकर गोली बनाना सीख ली! नाड़ी देख ली, फिर चाहे रोगी मरे या जीये, तुम्हें अपने टके से काम। ‘वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर। यमस्तु हरते प्राणान् त्वं तु प्राणान् धनानि च।।’ तुम तो यमराज के सहोदर हो। तुम्हें नमस्कार है।’ मुरारी इनकी ये बातें सुनते और मन-ही-मन लज्जित होते, ऊपर से इनके साथ हँसने लगते, इस प्रकार ये मुरारी के साथ सदा ही विनोद करते रहते। कभी-कभी मुरारी अत्यन्त चिढ़ाने से खिन्न भी हो जाते, तब ये अपना कोमल कर कमल उनकी देहर पर फेरने लगते। इनके स्पर्शमात्र से ही वे सब बातें भूल जाते और इनके प्रति अत्यन्त स्नेह प्र...

cc33

श्री श्री चैतन्य चरितावली  33- धीरे-धीरे इनकी मूर्च्छा भंग हुई और ये कुछ काल में सचेत हो गये। सभी को इनकी इस अवस्था से महान आश्चर्य हुआ। सचेत होने पर इन्होंने पिता जी से कहा- ‘पिता जी! अब मुझे क्या करना चाहिये?’ ब्रह्मचर्य-व्रत लेने पर छात्र को गुरु-गृह में रहकर भिक्षा पर ही निर्वाह करना होता था, यज्ञोपवीत के समय आज भी एक दिन के लिये भिक्षा का अभिनय कराया जाता है। इसीलिये अब निमाई को भिक्षा माँगने के लिये झोली दी गयी। निमाई के हृदय पर उस संस्कार का बड़ा ही गहरा प्रभाव पड़ा था। इन कृत्यों के कारण इनकी कायापलट-सी हो गयी। मुख पर एक अपूर्व ज्योति दृष्टिगोचर होने लगी। मुँड़ा हुआ माथा सूर्य के प्रकाश में दमकने लगा। एक हाथ में दण्ड लिये और दूसरे में झोली लटकाये ब्रह्मचारी के वेश में निमाई बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। मानो वामन भगवान अपने भक्त बलि से भिक्षा माँगने जा रहे हों। ये पहले अपनी माता के पास भिक्षा माँगने गये, फिर बारी-बारी से सभी के पास भिक्षा माँगने लगे।आचार्य ने इन्हें भिक्षा माँगने का प्रकार बता दिया था। उसी प्रकार ये सबके सामने जाते और- ‘भवति भिक्षां देहि’ कहकर झोली सामने कर द...

cc34

श्री श्री चैतन्य चरितावली  34- मिश्र जी अपने प्यारे पुत्र का विवाहोत्सव इस शरीर से न देख सके। निमाई अब ग्यारह वर्ष के हो गये। नियमित समय पर पढ़ने जाते और रोज आकर पिता जी के चरणों में प्रणाम करते। एक दिन उन्होंने देखा, पिता जी ज्वर के कारण अचेत पड़े हैं। उन्होंने घबड़ाकर माता से पूछा- ‘अम्मा! पिता जी को क्या हो गया है?’ उदास होकर माता ने कहा- ‘बेटा! तेरे पिता को ज्वर आ गया है।’ निमाई पिता की खाट के पास जा बैठे और धीरे-धीरे उनके माथे पर हाथ फेरने लगे। निमाई के सुकोमल शीतल कर-स्पर्श से पिता की तन्द्रा दूर हुई। उन्होंने क्षीण स्वर में कहा- ‘निमाई! बेटा! मुझे थोड़ा जल पिता दे।’ निमाई ने पास के बर्तन में से जल पिलाया, अपने वस्त्र से उनका मुँह पोंछा और प्रेम के साथ पूछने लगे- ‘पिता जी! अब आपकी तबीयत कैसी है?’ करवट बदलते हुए मिश्र जी ने कहा- ‘अब मैं अच्छा हूँ, चिन्ता की कोई बात नहीं, तू पढ़ने नहीं गया?’ निमाई ने अन्यमनस्क-भाव से कहा- ‘अब जब तक आपकी तबीयत अच्छी तरह से ठीक नहीं होती, तब तक मैं पढ़ने न जाऊँगा।’ मिश्र जी चुप हो गये, निमाई उदास-भाव से उनके पास बैठे रहे। कई दिन हो गये, ज्वर कम ह...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  32- पास में खड़ी हुई स्त्रियाँ शचीमाता को उलाहना देते हुए कहतीं- ‘बालक कह तो ठीक रहा है। तुम इसे पढ़ने क्यों नहीं देती? यह तो बड़े भाग्य की बात है कि बच्चा पढ़ने के लिये इतना आग्रह कर रहा है। हमारे बच्चे तो मारने-पीटने पर भी पढ़ने नहीं जाते। इसे पढ़ने के लिये जरूर भेजा करो।’ पास में खडे़ हुए और भी लोग बच्चे की बात का समर्थन करने लगे। सबके समझाने से माता का भी भाव परिवर्तित हो गया। उन्होंने प्यार के साथ कहा- ‘अच्छा, कल से पढ़ा करना, मैं तेरे पिता से कह दूँगी। अब आकर जल्दी से स्नान कर ले।’ अतना सुनते ही ये जल्दी से उठकर चले आये और माता के कथनानुसार शीघ्र ही गंगास्नान करके घर लौट आये। शची देवी ने पण्डित जी से बहुत आग्रह किया कि बच्चे को पढ़ने देना चाहिये। सभी पढ़े-लिखे संन्यासी थोड़े ही हो जाते हैं। नवद्वीप में हजारों पण्डित हैं, इतने विद्यार्थी हैं, इनमें से कोई भी संन्यासी नहीं हुआ। यह तो भाग्य की बात है। यदि इसके भाग्य में संन्यास ही होगा तो हम उसे रोक थोडे़ ही सकते हैं। ब्राह्मण का बालक मूर्ख ठीक नहीं होता। और भी बहुत-से लोगों ने पण्डित जी से आग्रह किया।...

cc 31

श्री श्री चैतन्य चरितावली  31- यदि इसे भी अध्ययन के लिये विश्वरूप की भाँति स्वतन्त्रता दे दी जाय तो यह भी हमारे हाथ से जाता रहेगा। यह सोचकर उन्होंने एक दिन निमाई को बुलाया और बड़े प्यार से कहने लगे- ‘बेटा! मैं तुमसे एक बात कहता हूँ, तुम्हें मेरी वह बात चाहे उचित हो या अनुचित माननी ही पड़ेगी।’ निमाई ने नम्रतापूर्वक कहा- ‘पिताजी! आप आज्ञा कीजिये। भला, मैं कभी आपकी आज्ञा को टाल सकता हूँ! आपके कहने से मैं सब कुछ कर सकता हूँ।’ मिश्र जी ने कहा- ‘हम तुम्हें अपनी शपथ दिलाकर कहते हैं, तुम आज से पढ़ना बंद कर दो। हमारी यही इच्छा है कि तुम पढ़ने-लिखने में विशेष प्रयत्न न करो।’ जिस दिन से विश्वरूप गृह त्यागकर चले गये थे, उस दिन से निमाई माता-पिता की आज्ञा को कभी नहीं टालते थे। पिता की बात सुनकर इन्होंने नीचे सिर झुकाये हुए ही धीरे से कहा- ‘जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा।’ इतना कहकर ये भीतर माता के पास चले गये और पिता की आज्ञा माता को सुना दी। दूसरे दिन से इन्होंने पढ़ना-लिखना बिलकुल बंद कर दिया। अब इन्होंने अपनी वही पुरानी चंचलता फिर आरम्भ कर दी। लड़कों के साथ गंगा जी के घाटों पर जाते, घण्टों ज...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  29- हमेशा गृहस्थी की चिन्ता करते रहने से उनका स्वभाव ही चिन्तामय बन गया था, सोते समय भी मानो वे किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए हैं। निर्धन वृद्ध के चेहरे की ओर देखकर एक बार तो विश्वरूप अपने निश्चय से विचलित हुए। विश्वरूप का गृह-त्याग.... उनके मन में भाव आया- ‘पिता वृद्ध हैं, आजीविका का कोई निश्चित प्रबन्ध नहीं, निमाई अभी निरा बालक ही है, घर का काम कैसे चलेगा?’ किन्तु थोड़े ही देर बाद वे सोचने लगे- ‘अरे, मैं यह क्या सोच रहा हूँ? जिसने इस चराचर विश्व की रचना की है, जो सभी के भरण-पोषण का पहले से ही प्रबन्ध कर देता है, उसको कर्ता न मानकर मैं अपने में कर्तापने का आरोप क्यों कर रहा हूँ? वृत्ति तो सबकी वही चलता है। मनुष्य तो निमित्तमात्र है। विश्वम्भर ही सबका पालन करते हैं, मुझे अपने सत्संकल्प से विचलित न होना चाहिये’ यह सोचकर उन्होंने सोती हुई माता को मन-ही-मन प्रणाम किया। छोटे भाई को एक बार प्रेमपूर्वक देखा और धीरे से घर से निकल पड़े। संकेत के अनुसार लोकनाथ उन्हें गंगा तट पर तैयार बैठे मिले। दोनों एक-दूसरे को देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए, अब उन्हें यह चिन्ता हु...

cc 30

श्री श्री चैतन्य चरितावली  30- लोग परस्पर में क्या बातें कर रहे हैं इसका उन्हें कुछ भी पता नहीं था। उनके साथी-सम्बन्धी उन्हें भाँति-भाँति से समझाते, किन्तु वे किसी की भी बात का प्रत्युत्तर नहीं देते थे। इधर शचीदेवी के करूण-रूदन को सुनकर पत्थर भी पसीजने लगे। माता जोर-जोर से दहाड़ मारकर रुदन कर रही थीं।विश्वरूप के गुणों का बखान करते-करते माता जिस प्रकार गौ अपने बच्चे के लिये आतुरता से रम्हाती है उसी प्रकार शचीदेवी उच्च स्वर से विलाप कर रही थीं। वे बार-बार कहतीं- ‘बेटा, इस बूढ़ी को अधजली ही छोड़कर चला गया। यदि मेरा और अपने बूढे़ बाप का कुछ खयाल न किया तो न सही, इस अपने छोटे भाई की ओर भी तूने नहीं देखा। यह तो तेरे बिना क्षणभर भी नहीं रह सकेगा। विश्वरूप! मैं नहीं जानती थी, कि तू इतना निर्दयी भी कभी बन सकेगा।’ माता के विलाप को सुनकर निमाई भी जोर-जोर से रोने लगे और रोते-रोते वे एकदम बेहोश हो गये। भ्रातृ-वियोग का स्मरण करके तथा माता-पिता के दुःख को देखकर निमाई मूर्च्छित हो गये। उनका सम्पूर्ण शरीर संज्ञा शून्य हो गया। आस-पास की स्त्रियों ने जल्दी से निमाई को उठाया, उनके मुख में जल डाला और उ...

cc 28

श्री श्री चैतन्य चरितावली  28- उनकी बात सुनकर इन्होंने उन्हें टालते हुए कहा- ‘नहीं, कुछ नहीं, वैसे ही शास्त्रविषयक बातें सोचता रहता हूँ, कोई विशेष बात तो नहीं है।’ उन्होंने फिर कहा- ‘आप चाहे बतावें या न बतावें मैं सब जानता हूँ। फूफा जी आपके विवाह की सोच रहे हैं। आपके भावों को खूब जानता हूँ, कि आप विवाह के बन्धन में कभी न फँसेंगे। आप इसके लिये सबका त्याग कर सकते हैं, किन्तु मैं आपके चरणों में यही विनीत भाव से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अपने चरणों से पृथक न करें- यही मेरी अन्तिम प्रार्थना है।’ विश्वरूप ने उन्हें गाढ़ आलिंगन करते हुए कहा- ‘भैया! तुम कैसी बात कर रहे हो। यदि ऐसा कुछ होगा भी तो मैं तुम्हारी सम्मति के बिना कुछ थोड़े ही कर सकता हूँ। तुम तो मेरे प्राण हो, भला तुम्हें छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ। दोनों भाई यथासमय भोजन करने के निमित्त अपने-अपने घर चले गये। विश्वरूप घर में बहुत ही कम रहते थे, केवल दोपहर को और शाम को भोजन करने के निमित्त घर जाते, नहीं तो सदा अद्वैताचार्य जी की पाठशाला में ही शास्त्रालोचना तथा गम्भीर विचार करते रहते। इसीलिये माता-पिता को इनके मनोभावों के सम्बन्ध...