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Showing posts from November, 2022

cc 78

श्री श्री चैतन्य चरितावली  78- कभी-कभी क्षुद्र तालाब के संसर्ग से उसमें दुर्गन्धि-सी भी प्रतीत होने लगेगी, किंतु चौमासे की महाबाढ़ में वह सब दुर्गन्धि साफ हो जायगी और वह भारी वेग के साथ अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जायगा। मनन करने वाले प्राणियों का मन एक-सा ही होता है। सर्वत्र उसकी गति एक ही भाँति से संचालन करती है। सम्पूर्ण शरीर में चित्त की वृत्तियाँ किसी एक निर्धारित नियम के ही साथ कार्य करती हैं। जीव का मुख्य लक्ष्य है अपने प्रियतम के साथ जाकर योग करना। उसे प्यारे के पास पहुँचे बिना शान्ति नहीं, फिर वहाँ जाकर उसका बनकर रहना या उसी के स्वरूप में अपने को मिला देना, यह तो अपने-अपने भावों के ऊपर निर्भर है। कुछ भी क्यों न हो, पास तो पहुँचना ही होगा। योग तो करना ही पड़ेगा। बिना योग के शान्ति नहीं, योग तभी हो सकता है, जब चित्तवृत्तियों का निरोध हो।चित्त बड़ा ही चंचल है, एकान्त में यह अधिकाधिक उपद्रव करने लगता है, इसलिये इसके निरोध का एक सरल-सा उपाय यही है कि जिन्होंने पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों से साधन करके या भगवत्कृपा प्राप्त करके अपनी चित्तवृत्तियों का थोड़ा-बहुत या सम्पूर्ण निर...

cc 76

श्री श्री चैतन्य चरितावली  76- मुझे प्रतीत हो रहा है कि सम्भवतया प्रभु इसी शरीर द्वारा उस शुभ कार्य को करावें।’ प्रभु ने अधीरता के साथ कहा- ‘मैं तो आपके पुत्र के समान हूँ। वैष्णवों के चरणों में मेरी अनुरक्ति हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिये। श्रीकृष्ण-कीर्तन के अतिरिक्त कोई भी कार्य मुझे अच्छा ही न लगे, यही मेरी अभिलाषा है, सदा प्रभु-प्रेम में विकल होकर मैं रोया ही करूँ, यही मेरी हार्दिक इच्छा है।’ श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘आप ही ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे इस प्रकार का थोड़ा-बहुत पागलपन हमें भी प्राप्त हो सके। हम भी आपकी भाँति प्रेम में पागल हुए लोक-बाह्य बनकर उन्मत्तों की भाँति नृत्य करने लगें।’ इस प्रकार बहुत देर तक इन दोनों ही महापुरुषों में विशुद्ध अन्तःकरण की बातें होती रहीं। अन्त में प्रभु की अनुमति लेकर श्रीवास पण्डित अपने घर को चले आये। भगवान तो प्राणिमात्र के हृदय में विराजमान हैं। समानरूप से संसार के अणु-परमाणु में व्याप्त हैं, किंतु पात्रभेद के कारण उनकी उपलब्धि भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। भगवान निशानाथ की किरणें समानरूप से सभी वस्तुओं पर एक-सी ही पड़ती हैं। पत्थर, मिट्टी घड़ा, वस्...

cc 77

श्री श्री चैतन्य चरितावली  77- वे और कोई नहीं थे, शचीनन्दन विश्वम्भर ही ये बातें मुझसे कह रहे थे। जब इनके अग्रज विश्वरूप मेरी पाठशाला में पढ़ा करते थे, तब ये उन्हें बुलाने के निमित्त मेरे यहाँ कभी-कभी आया करते थे, इन्हें देखते ही मेरा मन हठात इनकी ओर आकर्षित होता था, तभी मैं समझता था कि मेरी मनःकामना इन्हीं के द्वारा पूर्ण होगी। आज स्वप्न में उन्हें देखकर तो यह बात स्पष्ट ही हो गयी। इतना कहते-कहते वृद्ध आचार्य का गला भर आया। वे फूट-फूटकर बालकों की भाँति रुदन करने लगे। भगवान की भक्तवत्सलता का स्मरण करके वे हिचकियाँ भर-भरकर रो रहे थे। इनकी ऐसी दशा देखकर अन्य वैष्णवों की आँखों में से भी आँसू निकलने लगे। सभी का हृदय प्रेम से भर आया। सभी वैष्णवों के इस भावी उत्कर्ष का स्मरण करके आनन्दसागर में गोता लगाने लगे। इस प्रकार बहुत-सी बातों होने के अनन्तर सभी वैष्णव अपने-अपने घरों को चले गये। इधर महाप्रभु की दशा अब और भी अधिक विचित्र होने लगी। उन्हें अब श्रीकृष्ण-कथा और वैष्णवों के सत्संग के अतिरिक्त दूसरा विषय रुचिकर ही प्रतीत नहीं होता था, वे सदा गदाधर या अन्य किसी भक्त के साथ भगवच्चर्चा ही कर...

cc 75

श्री श्री चैतन्य चरितावली  75- समय पाकर उभर आया है। किसी अच्छे वैद्य से इसका इलाज कराइये।’ कोई कहती- ‘वायुरोग बड़ा भयंकर होता है, तुम निमाई के दोनों पैरों को बाँधकर उसे कोठरी में बंद करके रखा करो, खाने के लिये हरे नारियल का जल दिया करो। इससे धीरे-धीरे वायुरोग दूर हो जायगा।’ कोई-कोई सलाह देतीं- ‘शिवातैल का सिर में मर्दन कराओ, सब ठीक हो जायगा। भगवान सब भला ही करेंगे।वे ही हम सब लोगों की एकमात्र शरण हैं।’ बेचारी शचीमाता सबकी बातें सुनतीं और सुनकर उदासभाव से चुप हो जातीं। इकलौते पुत्र के पैर बाँधकर उसे कोठरी में बंद कर देने की उसकी हिम्मत न पड़ती। बेचारी एक तो पुत्र के दुःख से दुःखी थी, दूसरा उसे विष्णुप्रिया का दुःख था। पति की ऐसी दशा देखकर विष्णुप्रिया सदा चिन्ति ही बनी रहतीं। उन्हें अन्न-जल कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उदासीन भाव से सदा पति के ही सम्बन्ध में सोचती रहतीं। शचीमाता के बहुत अधिक आग्रह करने पर पति के उच्छिष्ट अन्न में से दो-चार ग्रास खा लेतीं, नहीं तो सदा वैसे ही बैठी रहतीं। इससे शचीमाता का दुःख दुगुना हो गया था। उनकी अवस्था सड़सठ वर्ष की थी।वृद्धावस्था के कारण इतना दुःख उनके...

cc 74

श्री श्री चैतन्य चरितावली  74- भक्तगण दास्य, सख्य, वात्सल्य, शान्त और मधुर- इन पाँचों भावों के द्वारा अपने प्रियतम की उपासना करते हैं। उपासना में ये ही पाँच भाव मुख्य समझे गये हैं, किंतु इन पाँचों में भी दास्यभाव ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रधान है। या यों कह लीजिये कि दास्यभाव ही इन पाँचों भावों का मुख्य प्राण है। दास्यभाव के बिना न तो सख्य ही हो सकता है और न वात्सल्य, शान्त तथा मधुर ही। कोई भी भाव क्यों न हो, दास्यभाव इसमें अव्यक्त रूप से जरूर छिपा रहेगा। दास्य के बिना प्रेम हो ही नहीं सकता। जो स्वयं दास बनना नहीं जानता, वह स्वामी कभी बन ही नहीं सकेगा, जिसने स्वयं किसी की उपासना तथा वन्दना नहीं की है, वह उपास्य तथा वन्दनीय हो ही नहीं सकता। तभी तो अखिलब्राह्मण्ड कोटिनायक श्रीहरि स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं- ‘क्रीतोऽहं तेन चार्जुन’ हे अर्जुन! भक्तों ने मुझे खरीद लिया है, मैं उनका क्रीतदास हूँ। क्योंकि वे स्वयं चराचर प्राणियों के स्वामी हैं। इसलिये स्वामीपने के भाव को प्रदर्शित करने के निमित्त वे भक्त तथा ब्राह्मणों के स्वयं दास होना स्वीकार करते हैं और उनके पदरज को अपने मस्तक पर चढ़...

cc72

श्री श्री चैतन्य चरितावली  72- जब भगवान ने कई बार जोर देकर कहा तब तो उदास मन से गोप ब्राह्मण-पत्नियों के पास पहुँचे और उसी प्रकार दीनता के साथ उन्होंने कहा- ‘हे ब्राह्मण-पत्नियो! यहाँ से थोड़ी ही दूर पर बलदेव जी और श्री कृष्णचन्द्र जी बैठे हैं, वे दोनों ही बहुत भूखे हैं। यदि तुम्हारे पास कुछ खाने की वस्तु हो तो उन्हें जाकर दे आओ।’ ब्राह्मण-पत्नियों का इतना सुनना था कि वे प्रेम के कारण अधीर हो उठीं। यह सुनकर कि श्रीराम-कृष्ण भूखे बैठे हैं, उनकी अधीरता का ठिकाना नहीं रहा। जिनके दर्शनों की चिरकला से इच्छा थी, जिनकी मनोहर मूर्ति के दर्शन के लिये नेत्र छटपटा-से रहे थे, वे ही श्रीकृष्ण-बलराम भूखे हैं और भोजन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, इस बात से उन्हें सुख-मिश्रित दुःख सा हुआ। वे जल्दी से भाँति-भाँति के पकवानों को थालों में सजाकर श्रीकृष्ण के समीप जाने के लिये तैयार हो गयीं। उनके पतियों ने बहुत मना किया, किंतु उन्होंने एक भी न सुनी और प्रेम में मतवाली हुई जल्दी से श्रीकृष्ण के समीप पहुँचने का प्रयत्न करने लगीं। उस समय भगवान खूब सज-धजकर ठाट के साथ खड़े-खड़े उसी ओर देख रहे थे कि कोई आती है या...

cc 73

श्री श्री चैतन्य चरितावली  73- इसलिये स्वामीपने के भाव को प्रदर्शित करने के निमित्त वे भक्त तथा ब्राह्मणों के स्वयं दास होना स्वीकार करते हैं और उनके पदरज को अपने मस्तक पर चढ़ाने के निमित्त सदा उनके पीछे-पीछे घूमा करते हैं। महाप्रभु अब भावावेश में आकर भक्तों के भावों को प्रकट करने लगे। भक्तों को सम्पूर्ण लोगों के प्रति और भगवत-भक्तों के प्रति किस प्रकार के आचरण करने चाहिये, उनमें भागवत पुरुषों के प्रति कितनी दीनता, कैसी नम्रता होनी चाहिये, इसकी शिक्षा देने के निमित्त वे स्वयं आचरण करके लोगों को दिखाने लगे। क्योंकि वे तो भक्ति-भाव के प्रदर्शक भक्तशिरोमणि ही ठहरे। उनके सभी कार्य लोकमर्यादा-स्थापन के निमित्त होते थे। उन्होंने मर्यादा का उल्लंघन कहीं भी नहीं किया। यही तो प्रभु के जीवन में एक भारी विशेषता है। अध्यापकी का अन्त हो गया, ब्राह्यशास्त्र पढ़ना तथा पढ़ाना दोनों ही छूट गये, अब न वह पला-सा चांचल्य है और न शास्त्रार्थ तथा वाद-विवाद की उन्मादकारी धुन। अब तो इन पर दूसरी ही धुन सवार हुई है, जिस धुन में ये सभी संसारी कामों को ही नहीं भूल गये हैं, किंतु अपने-आपको भी विस्मृत कर बैठे है...

cc 71

श्री श्री चैतन्य चरितावली  71- प्रभु को रास्ते में जाते देखकर इन्होंने प्रभु को बड़े ही आदर के साथ बुलाकर अपने यहाँ बिठाया। रत्नगर्भ महाशय बड़े ही कोमल प्रकृति के पुरुष थे। इनके हृदय में काफी भावुकता थी, सरलता की तो ये मानो मूर्ति ही थे। शास्त्रों के अध्ययन में इनका अनुपम अनुराग था। प्रभु के बैठते ही परस्पर शास्त्र-चर्चा छिड़ गयी। रत्नगर्भ महाशय ने प्रसंगवश श्रीमद्भागवत का एक श्लोक कहा। श्लोक उस समय का था, जब यमुना किनारे यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ भगवान के लिये भोज्यपदार्थ लेकर उनके समीप उपस्थित हुई थीं। श्लोक में भगवान के उसी स्वरूप का वर्णन था। बात यों थी कि एक दिन सभी गोपों के साथ बलराम जी के सहित भगवान वन में गौएँ चराने के लिये गये। उस दिन गोपों ने गँवारपन कर डाला, रोज जिधर गौओं को ले जाते थे, उधर न ले जाकर दूसरी ही ओर ले गये। उधर बड़ी मनोहर हरी-हरी घास थी। गौओं ने घास खूब प्रेम के साथ खायी और श्रीयमुना जी का निर्मल स्वच्छ जल पान किया। गौओं का तो पेट भर गया, किंतु ग्वाल-बाल व्रज की ही ओर टकटकी लगाये देख रहे थे कि आज हमारी छाक (भोजन) नहीं आयी। छाक कैसे आये, गोपियाँ त...

cc 70

श्री श्री चैतन्य चरितावली  70- अब तो ऐसा ही आशीर्वाद दीजिये कि आपके श्रीमुख से जो भी कुछ पढ़ा है, वही स्थायी बना रहे और हमें किसी दूसरे के समीप जाने की जिज्ञासा ही उत्पन्न न हो। अब तो हमें अपने चरणों की शरण ही प्रदान कीजिये! आपके चरणों की सदा स्मृति बनी रहे यही अन्तिम वरदान प्रदान कीजिये!’ यह कहकर सभी विद्यार्थियों ने प्रभु को एक साथ ही साष्टांग प्रणाम किया और प्रभु ने भी सबको पृथक-पृथक गले से लगाया। वे सभी बड़भागी विद्यार्थी प्रभु के प्रेमपूर्ण आलिंगन से कृतकृत्य हो गये और जारों से ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर हरिनाम की तुमुल-ध्वनि करने लगे। प्रभु ने उन विद्यार्थियों से कहा- ‘भैया, हम लोग, इतने दिनों तक साथ-साथ रहे हैं। हमारा तुम लोगों से बहुत ही अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, तुम ही हमारे परम आत्मीय तथा सुहृद हो। एक बार तुम सभी एक स्वर से श्रीकृष्णरूपी शीतल सलिल से हमारे हृदय की जलती हुई विरह-ज्वाला को शान्त कर दो। तुम सभी श्रीकृष्ण-रसायन पिलाकर हमें नीरोग बना दो।एक बार तुम सभी लोग मिलकर श्रीकृष्ण के मंगलमय नामों का उच्च स्वर से संकीर्तन करो!’ विद्यार्थियों ने अपनी असमर्थता प्रकट करते ह...

cc 69

श्री श्री चैतन्य चरितावली  69- इस पर विद्यार्थियों ने कुछ प्रेम के साथ अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहा- ‘आप तो हमें ऐसी विचित्र-विचित्र बातें बताते हैं, हम अब याद क्या करें? हमारा काम कैसे चलेगा, इस प्रकार हमारी विद्या कब समाप्त होगी और इस तरह से हम किस प्रकार विद्या प्राप्त कर सकते हैं?’ आप प्रेम के आवेश में आकर कहने लगे- ‘सदा याद करते रहने की तो एक ही वस्तु है। सदा, सर्वदा, सर्वत्र श्रीकृष्ण के सुन्दर नामों के ही स्मरणमात्र से प्राणिमात्र का कल्याण हो सकता है। सदा उसी का स्मरण करते रहना चाहिये। अहा, जिन्होंने पूतना- जैसी बालघ्नी को, जो अपने स्तनों में जहर पलेटकर बालकों के प्राण हर लेती थी, उस क्रूर कर्म करने वाली राक्षसी को भी सद्गति दी, उन श्रीकृष्ण की लीलाओं का चिन्तन करना ही मनुष्यों के लिये परम कल्याण का साधन हो सकता है। जो दुष्टबुद्धि से भी श्रीकृष्ण का स्मरण करते थे, जो उन्हें शत्रुरूप से विद्वेष के कारण मारने की इच्छा से उनके पास आये थे, वे अघासुर, बकासुर, शकटासुर आदि पापी भी उनके जगत-पालन दर्शनों के कारण इस संसार-सागर से बात-की-बात में पार हो गये, जिससे योगी लोग करोड़ों वर...

cc 68

श्री श्री चैतन्य चरितावली  68- तुम जैसे योग्य विद्यार्थियों को विद्या पढ़ाकर मेरा इतना दिनों का परिश्रम से पढ़ाना सफल हो गया। तुमने अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य द्वारा मेरे मुख को उज्ज्वल कर दिया। मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हूँ।’ आचार्य के मुख से अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर प्रभु लज्जितभाव से नीचे की ओर देखते हुए चुपचाप बैठे रहे, उन्हेांने इन बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। आचार्य गंगादास जी फिर कहने लगे- ‘योग्य बनने के अनन्तर तुम अध्यापक हुए और तुमने अध्यापन-कार्य में भी यथेष्ठ ख्याति प्राप्त की। तुम्हारे सभी विद्यार्थी सदा तुम्हारे शील-स्वभाव की तथा पढ़ाने की सरल सुन्दर प्रणाली की प्रशंसा करते रहते हैं, वे लोग तुम्हारे सिवा दूसरे किसी के पास पढ़ना पसंद ही नहीं करते। किन्तु कल उन्होंने आकर मुझसे तुम्हारी शिकायत की है। तुम उन्हें अब मनोयोग के साथ ठीक-ठीक नहीं पढ़ाते हो। और लोगों ने भी मुझसे आकर कहा है कि तुम अनपढ़ मूर्खभक्तों की भाँति रोते-गाते तथा हँसते-कूदते हो, एक इतने भारी अध्यापक को ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं! तुम विद्वान हो, समझदार हो, मेधावी हो।शास्त्रज्ञ होकर मूर्खों के कामों की नकल ...

cc 67

श्री श्री चैतन्य चरितावली  67- वे आनन्द के धाम हैं, सुखस्वरूप हैं। उनके गुणों का आर्त होकर गान करते रहना मनुष्यों का परम पुरुषार्थ है।’ इतना कहते-कहते प्रभु उच्च स्वर से कृष्ण-कीर्तन करने लगे। इन बातों को श्रवण करके कुछ विद्यार्थी तो आनन्द-सागर में मग्न हो गये। वे तो बाह्यज्ञान-शून्य होकर परमानन्द का अनुभव करने लगे। कुछ ऐसे भी थे, जो पुस्तक की विद्या को ही सर्वस्व समझते थे। भट्टाचार्य और शास्त्री बनना ही जिनके जीवन का एकमात्र चरम लक्ष्य था, वे कहने लगे- ‘गुरु जी! आप कैसी बातें कर रहे हैं? हमें इन बातों से क्या प्रयोजन? इन बातों का विचार तो वैष्णव भक्त करें। हमें तो हमारी पाठ्य पुस्तक का पाठ पढ़ाइये। हम यहाँ पाठशाला में भक्ति-तत्त्व की शिक्षा लेने के लिये नहीं आये हैं, हमें तो व्याकरण, अलंकार तथा न्याय आदि पुस्तकों के पाठों को पढ़ाइये।’ उन विद्यार्थियों की ऐसी बातें सुनकर प्रभु ने कहा- ‘भाई! आज हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। आज आप लोग अपना-अपना पाठ बंद रखिये, पुस्तकों को बाँधकर रख दीजिये। चलो, अब गंगा-स्नान करने चलें। कल पाठ की बात देखी जायगी।’ इतना सुनते ही सभी विद्यार्थियों ने अपनी...

cc66

श्री श्री चैतन्य चरितावली  66- यह सौभाग्य की बात है कि निमाई-जैसे पण्डित परम भागवत वैष्णव बन गये।’ इस प्रकार सभी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भाँति-भाँति की बातें कहने लगीं। सबसे मिल-जुलकर निमाई घर लौट आये। वही प्रेमोन्माद..... जिसके हृदय में भगवत्प्रेम उत्पन्न हो गया, उसे फिर अन्य संसारी बातें भली ही किस प्रकार लग सकती हैं? जिसकी जिह्वा ने मिश्री का रसास्वाद कर लिया फिर वह गुड़ के मैल को आनन्द और उल्लास के साथ स्वेच्छा से कब पसन्द कर सकती है? स्थायी प्रेम प्राप्त होने पर तो मनुष्य सचमुच पागल बन जाता है, फिर उसे इस बाह्य-संसार का होश ही नहीं रहता। जिन्हें किन्हीं महापुरुष की कृपा से या किसी पुण्य-स्थान के प्रभाव के क्षणभर के लिये प्रेमावेश हो जाता है, वह तो वास्तव में प्रेम की झलक है। जैसे पर्वत के शिखर के ऊपर के बने हुए मन्दिर की किंचिन्मात्र धुँधली-सी चोटी देखकर सैकड़ों कोस दूर से ही कोई पथिक आनन्द में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे कि हम तो अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँच गये। यही दशा उस क्षणिक प्रेमी की है। वास्तव में अभी वह सच्चे प्रेम से बहुत दूर है। प्रेममार्ग में यथार्थ रीति से प्रव...

cc 65

श्री श्री चैतन्य चरितावली  65- सभी भौचक्के से एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तीन महीने पहले उन्होंने जिस निमाई को देखा था, आज उसे इस प्रकार प्रेम में विह्वल देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। निमाई लम्बी-लम्बी साँसें ले रहे थे। उनकी आँखों में से निरन्तर अश्रु निकल रहे थे, शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। थोड़ी देर में वे ‘हा कृष्ण! हा प्राणनाथ! प्यारे! ओ मेरे प्यारे! मुझे छोड़कर कहाँ चले गये?’ यह कहते-कहते बहुत जोरों के साथ रुदन करने लगे। सभी ने शान्त करने की चेष्टा की, किन्तु परिणाम कुछ भी नहीं हुआ। इन्होंने रूँधे हुए कण्ठ से कहा- ‘आज हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। कल हम स्वयं शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के निवासस्थान पर आकर अपनी यात्रा का समाचार सुनायँगे।’ इतना सुनकर इनके सभी साथी अपने-अपने स्थानों के लिये चले गये। अब तो इनके इस अद्भुत नूतन भाव की नवद्वीप में स्थान-स्थान पर चर्चा होने लगी। हँसते-हँसते श्रीमान पण्डित ने श्रीवास आदि भक्तों से कहा- ‘आज हम आप लोगों को बड़ी ही प्रसन्नता की बात सुनाना चाहते हैं, आप लोग सभी सुनकर परम आश्चर्य करेंगे। गया में जाकर निमाई पण्डित की तो काया पलट ही हो ग...

cc64

श्री श्री चैतन्य चरितावली  64- इनके सभी साथी इनकी ऐसी अलौकिक दशा देखकर चकित रह गये और इनका भाँति-भाँति से प्रबोध करने लगे, किन्तु ये किसी की मानते ही नहीं थे। इस प्रकार रुदन तथा प्रलाप में रात्रि हो गयी। सभी साथी तथा शिष्यगण सुख की नींद में सो गये, किन्तु इन्हें नींद कहाँ? सुखी संसार सुखरूपी मोह-निशा में शयन कर सकता है, किन्तु जिनके हृदय में विरह-वेदना की तीव्र ज्वाला उठ रही है, उनके नयनों में नींद कहाँ? सबके सो जाने पर ये जल्दी से उठ खड़े हुए और रात्रि में ही रुदन करते हुए व्रज की ओर दौड़े। इनके प्राण श्रीकृष्ण से मिलन के लिये छटपटा रहे थे। इन्होंने साथी तथा शिष्यों की कुछ भी परवा न की और घोर अन्धकार में अकेले ही अलक्षित स्थान की ओर चल पड़े। ये थोड़ी दूर ही चले होंगे कि इन्हें मानो अपने हृदय में एक दिव्य वाणी सुन पड़ी। इन्हें भास हुआ मानो कोई अलक्षित भाव से कह रहा है- ‘तुम्हारा व्रज में जाने का अभी समय नहीं आया है, अभी कुछ काल और धैर्य धारण करो। अभी अपने सत्संग से नवद्वीप के भक्तों को आनन्दित करके प्रेमदान करो। योग्य समय आने पर ही तुम व्रज में जाना।’ आकाशवाणी का आदेश पाकर ये लौटकर...

cc61

श्री श्री चैतन्य चरितावली  61- यह सुनकर एक सरल- से विद्यार्थी ने प्रश्न किया- ‘गुरुजी! जो ब्राह्मण नहीं हैं केवल ब्रह्मबन्धु हैं, उनका तो इतना सत्कार नहीं करना चाहिये। वे तो केवल काष्ठ की हस्ती के समान नाममात्र के ही ब्राह्मण हैं, जैसे काष्ठ के हाथी से हाथीपने का कोई भी काम नहीं चलने का, उसी प्रकार जो अपने धर्म-कर्म से हीन है, जिसने विद्या प्राप्त नहीं की, उस नाममात्र के ब्राह्मण का हम आदर क्यों करें?’ निमाई पण्डित ने थोड़ी देर सोचने के अनन्तर कहा- ‘तुम्हारा कथन एक प्रकार से ठीक ही है, जो अपने धर्म-कर्म से रहित है, वह तो दूध न देने वाली वन्ध्या गौ के समान है, उससे संसारी स्वार्थ कोई सध नहीं सकता। फिर भी जो सभी कामों को सकाम भाव से नहीं करते हैं, जो श्रद्धा के साथ शास्त्रों की आज्ञानुसार अपने को ही सुधारने का सदा प्रयत्न करते रहते हैं, वे दूसरों के दोषों के प्रति उदासीन रहते हैं। हम दोषदृष्टि से देखना आरम्भ करेंगे तब तो संसार में एक भी मनुष्य दोष से रहित दृष्टिगोचर नहीं होगा। संसार ही दोष-गुण के सम्मिश्रण से बना है! इसलिये अपनी बुद्धि को संकुचित बनाकर गौ की सेवा करने में यह बुद्धि र...

cc 60

श्री श्री चैतन्य चरितावली  60- महाप्रभु चैतन्यदेव का जीवन तो भक्तिमार्ग का एक प्रधान स्तम्भ है। उनके जीवन में शुद्ध भक्ति का परम पवित्र स्वरूप है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं, दूसरे मार्ग के प्रति विद्वेष नहीं। किसी भी कर्म की उपेक्षा नहीं। संकुचित भावों की गन्ध नहीं। वहाँ तो शुद्ध प्रेम है! ज्यों-ज्यों आगे बढ़ना चाहो त्यों-ही-त्यों अधिकाधिक प्रेम करो, यही शिक्षा उसमें ओत-प्रोतरूप से भरी पड़ी है। उनका नाम लेकर आज जो बातें कही जाती हैं, वे चैतन्यदेव की कभी हो ही नहीं सकतीं। इसका साक्षी उनका प्रेममय जीवन ही है। ये साम्प्रदायिक विचार तो पीछे के संकुचित बुद्धि वाले लोगों के मस्तिष्क से निकले हैं। अपनी चीज का नाम कोई जो चाहे रख ले। कोई रोकने वाला थोड़े ही है। चैतन्य का जीवन तो परम प्रेममय, सभी को आश्रय देने वाला परम महान है, उसमें भला साम्प्रदायिक संकुचित भावों का क्या काम? इनके हृदय में प्राणिमात्र के भावों का आदर था। निमाई पण्डित का अब दूसरा विवाह हो गया है। विष्णुप्रिया उनके सब प्रकार से अनुकूल आचरण करती हैं। उनका स्वभाव हँसमुख है, वे सुशीला हैं, गृहकार्यों में चतुर हैं और अत्यन्त ही प...

cc 63

श्री श्री चैतन्य चरितावली  63- दाल-साग बनकर तैयार हो चुके थे। चूल्हे में से थोड़ी अग्नि निकालकर दाल को उस पर रख दिया था। साग दूसरी ओर चौके में ही रखा था। चूल्हे पर भात बन रहा था। निमाई उसे बार-बार देखते। चावल तैयार तो हो चुके थे, किन्तु उनमें थोड़ा-सा जल और शेष था, उसे जलाने के लिये और भात केा शुष्क बनाने के लिये हमारे पण्डित ने उसे ढक दिया था। थोड़ी देर बाद वे कटोरी को भात पर से उतार ही रहे थे कि इतने में ही उन्हें दूर से पुरी महाशय अपनी ओर आते हुए दिखायी दिये। कटोरी को ज्यों-की-त्यों ही पृथ्वी पर पटककर ये उनकी चरण-वन्दना करने के लिये दौड़े। पुरी ने प्रेमपूर्वक इनका आलिंगन किया और वे हँसते हुए बोले- ‘अपने स्थान से किसी शुभ मुहूर्त में ही चले थे, जो ठीक तैयारी के समय पर आ पहुँचे।’ नम्रता के साथ निमाई पण्डित ने उत्तर दिया- ‘जिस समय भाग्योदय होता है और पुण्य-कर्मों के संस्कार जागृत होते हैं, उस समय आप-जैसे महानुभावों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। भोजन बिलकुल तैयार है, हाथ-पैर धोइये ओर भिक्षा प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ाकरने की कृपा कीजिये।’ हँसते हुए पुरी महाशय बोले- ‘यह खूब कही, अ...

cc 62

श्री श्री चैतन्य चरितावली  62- अपनी आँखों से अश्रुविमोचन करते हुए संन्यासी ने इन्हें उठाकर गले से लगा लिया। इनके स्पर्शमात्र से संन्यासी महाशय बेहोश हो गये। दोनों ही आत्मविस्मृत थे। दोनों को ही शरीर का होश नहीं था, दोनों ही प्रेम में विभोर होकर अश्रुविमोचन कर रहे थे। यात्री इन दोनों के ऐसे अलौकिक प्रेम को देखकर आनन्द-सागर में गोते खाने लगे। बहुत-से लोग रास्ता चलते-चलते खड़े हो गये। चारों ओर से लोगों की भीड़ लग गयी। कुछ काल में संन्यासी को कुछ-कुछ चेतना हुई। उन्होंने बड़े ही प्रेम से इनका हाथ पकड़कर एक ओर बिठाया और अत्यन्त प्रेमपूर्ण वाणी से वे कहने लगे- ‘निमाई पण्डित! आज मेरा भाग्योदय हुआ जो सहसा मुझे तुम्हारे दर्शन हो गये।नवद्वीप में ही मेरा हृदय तुम्हारी ओर स्वाभाविक ही खिंचा-सा जाता था। मुझसे लोग कहते- ‘निमाई पण्डित कोरे पोथी के ही पण्डित हैं, बड़े चंचल हैं, देवता तथा वैष्णवों की खिल्लियाँ उड़ाते हैं। आप उनहें अपना ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ सुनाकर क्या लाभ उठावेंगे?’ कोई-कोई तो यहाँ तक कहता- ‘अजी, ये तो पूरे नास्तिक हैं। वैष्णवों को छेड़ने में ही इन्हें मजा आता है।’ मैं उन सबकी बातें स...