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श्री श्री चैतन्य चरितावली 78- कभी-कभी क्षुद्र तालाब के संसर्ग से उसमें दुर्गन्धि-सी भी प्रतीत होने लगेगी, किंतु चौमासे की महाबाढ़ में वह सब दुर्गन्धि साफ हो जायगी और वह भारी वेग के साथ अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जायगा। मनन करने वाले प्राणियों का मन एक-सा ही होता है। सर्वत्र उसकी गति एक ही भाँति से संचालन करती है। सम्पूर्ण शरीर में चित्त की वृत्तियाँ किसी एक निर्धारित नियम के ही साथ कार्य करती हैं। जीव का मुख्य लक्ष्य है अपने प्रियतम के साथ जाकर योग करना। उसे प्यारे के पास पहुँचे बिना शान्ति नहीं, फिर वहाँ जाकर उसका बनकर रहना या उसी के स्वरूप में अपने को मिला देना, यह तो अपने-अपने भावों के ऊपर निर्भर है। कुछ भी क्यों न हो, पास तो पहुँचना ही होगा। योग तो करना ही पड़ेगा। बिना योग के शान्ति नहीं, योग तभी हो सकता है, जब चित्तवृत्तियों का निरोध हो।चित्त बड़ा ही चंचल है, एकान्त में यह अधिकाधिक उपद्रव करने लगता है, इसलिये इसके निरोध का एक सरल-सा उपाय यही है कि जिन्होंने पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों से साधन करके या भगवत्कृपा प्राप्त करके अपनी चित्तवृत्तियों का थोड़ा-बहुत या सम्पूर्ण निर...