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श्री श्री चैतन्य चरितावली 255 ब्रह्मातक पहुँचे हुए निर्मलचेता ऋषि-महर्षियोंने वेदमें स्पष्ट रूपसे अपने अनुयायी शिष्योंसे कहा है- यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपासितव्यानि नो इतराणि। हमारे जो अच्छे काम हों तुम्हें उन्हीं का आचरण करना चाहिये। अन्य जो हमारे जीवन में निषिद्ध आचरण दीखें उनका अनुकरण कभी भी न करना चाहिये। परन्तु ईश्वर और महापुरुषोंके कार्योंकी निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। महर्षियों ने महापुरुषों के कार्यों की आलोचना और निन्दा करने को पाप बताया है। जो महापुरुषों के कार्यों की निन्दा किया करते हैं वे अबोध बन्धु भूल करते हैं। साथ ही वे भी भूल करते हैं जो निन्दकों को सदा कोसा करते हैं। निन्दकों का स्वभाव तो निन्दा करने का है ही। उनकी निन्दा करके तुम अपने सिर पर दूसरा पाप क्यों लेते हो ? निन्दक तो सचमुच उपकारी है। संसार में यदि बूरे कामों की निन्दा होनी बंद हो जाय, तो यह जगत सचमुच रौरव नरक बन जाय। महापुरुष और निन्दा से डरते नहीं, उनका तो लोकनिन्दा कुछ बिगाड़ नहीं सकती। नीच प्रकृति के लोग लोकनिन्दा के भय से बुरे कामों को छिपाकर करते हैं और सर्वधारण लोग लोकनिन्दा के ही भयसे पा...