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Showing posts from May, 2023

255

श्री श्री चैतन्य चरितावली  255 ब्रह्मातक पहुँचे हुए निर्मलचेता ऋषि-महर्षियोंने वेदमें स्पष्ट रूपसे अपने अनुयायी शिष्योंसे कहा है- यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपासितव्यानि नो इतराणि। हमारे जो अच्छे काम हों तुम्हें उन्हीं का आचरण करना चाहिये। अन्य जो हमारे जीवन में निषिद्ध आचरण दीखें उनका अनुकरण कभी भी न करना चाहिये। परन्तु ईश्वर और महापुरुषोंके कार्योंकी निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। महर्षियों ने महापुरुषों के कार्यों की आलोचना और निन्दा करने को पाप बताया है। जो महापुरुषों के कार्यों की निन्दा किया करते हैं वे अबोध बन्धु भूल करते हैं। साथ ही वे भी भूल करते हैं जो निन्दकों को सदा कोसा करते हैं। निन्दकों का स्वभाव तो निन्दा करने का है ही। उनकी निन्दा करके तुम अपने सिर पर दूसरा पाप क्यों लेते हो ? निन्दक तो सचमुच उपकारी है। संसार में यदि बूरे कामों की निन्दा होनी बंद हो जाय, तो यह जगत सचमुच रौरव नरक बन जाय। महापुरुष और निन्दा से डरते नहीं, उनका तो लोकनिन्दा कुछ बिगाड़ नहीं सकती। नीच प्रकृति के लोग लोकनिन्दा के भय से बुरे कामों को छिपाकर करते हैं और सर्वधारण लोग लोकनिन्दा के ही भयसे पा...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  254 वे अपने साथियों के सहित गंगा जी के किनारे-किनारे गाँवों में जाते और वहाँ सभी से श्रीकृष्ण-कीर्तन करने के लिए लिए कहते। ये विशेष पुस्तकी विद्या तो पढ़े नही थे, सीधी-सादी भाषा में सरलतापूर्वक ग्रामीण लोगों को समझाते, इनके समझाने का लोगों पर बड़ा ही अधिक असर होता और वे उसी दिन से कीर्तन करने लग जाते। इसी बीच में आप अम्बिकानगरमें भी संकीर्तन का प्रचार करने गये थे, वहाँ सूर्यदास पण्डित ने खूब आदर-सत्कार किया। ये भक्तों के सहित उनके घर पर रहे। सूर्यदास का समस्त परिवार नित्यानन्द जी के चरणों में बड़ी भारी श्रद्धा रखने लगा। इस प्रकार पानीहाटी में भगवन्नाम और भगवद्भक्ति की आनन्दमय और प्रेममय धारा बहाकर नित्यानन्द जी अपने परिकर के सहित एड़दह में गदाधरदास के घर ठहरे। इसी गांव में एक मुसलमान क़ाज़ी संकीर्तन का बड़ा भारी विरोधी था। नित्यानन्द जी के प्रभाव से वह भी स्वयं संकीर्तन में आकर नाचने लगा। इससे इनका प्रभाव और भी अधिक बढ़ गया। लोग इनके श्रीचरण में अनन्य श्रद्धा रखने लगे।चारों ओर 'श्रीकृष्ण-चैतन्य की जय,' 'नित्यानन्द की जय,' 'गौरनिताई की जय...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  253 इतना सुनते ही अमोघ सोते हुए मनुष्यकी भाँति जल्दीसे उठकर खड़ा हो गया और 'श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे! हे नाथ नारायण वासुदेव!!' आदि भगवान् के नामोंका जोरोंसे उच्चारण करता हुआ नृत्य करने लगा। उसकी इस अद्भुत परिवर्तित दशाको देखकर सभी आश्चर्यचकित होकर प्रभुके श्रीमुखकी ओर निहारने लगे और इसे महाप्रभुका ही परम प्रसाद समझने लगे। अमोघने भी प्रभुके पैरोंमें पड़कर उनसे अपने पूर्वकृत अपराधके लिये क्षमा-याचना की। महाप्रभुने उसे गले लगाकर सान्त्वना प्रदान की। अमोघको अपने कुकृत्यपर बड़ा ही पश्चात्ताप होने लगा। वह अपने अपराधको स्मरण करके दोनों हाथोंसे अपने ही गालोंपर तमाचे मारने लगा। इससे उसके दोनों गाल सूज गये। तब आचार्य गोपीनाथने उसे इस कामसे निवारण किया। महाप्रभुने उसे कृष्ण-कीर्तनका उपदेश दिया। उसी दिनसे अमोघ परम भागवत वैष्णव बन गया और उसकी गणना प्रभुके अन्तरंग भक्तोंमें होने लगी। तब महाप्रभुने गोपीनाथाचार्यको आज्ञा दी कि तुम स्वयं जाकर भट्टाचार्य और उनकी पत्नीको भोजन कराओ। प्रभुकी आज्ञा पाकर आचार्य सार्वभौमको साथ लेकर घर गये और उन्हें भोजन कराया। प्रभुके कह...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  252 संन्यासी के लिये तो घर-घर से मधुकारी मांगकर उदरपूर्ति करने का विधान है।' भट्टाचार्य ने कहा- 'प्रभो! इन सब बातों को रहने दीजिये। आप इस प्रार्थना को स्वीकार करके हमारी तथा हमारे सब परिवार की इच्छापूर्ति कीजिये।' प्रभु ने आश्चर्य-सा प्रकट करते हुए कहा- 'आचार्य! आप भी जब ऐसे धर्मविरुद्ध काम के लिये मुझे विवश करेंगे, तो फिर मूर्ख भक्तों की तो बात ही अलग रही। एक-दो दिन कहें तो भिक्षा कर भी लूँ।' अन्त में पांच दिन की भिक्षा बहुत वाद-विवाद के पश्चात् निश्चित हुई। भट्टाचार्य प्रभु को एकान्त में ही भोजन कराना चाहते थे। इसलिये प्रभु के साथी अन्य साधु-महात्माओं को दूसरे-दूसरे दिनों के लिये निमन्त्रित किया।नियत समय पर महाप्रभु भट्टाचार्य के घर भिक्षा करने के लिए पहुँचे। भट्टाचार्य के चंदनेश्वर नाम का एक लड़का और षाठी नाम की लड़की थी। षाठी के पति अमोघ भट्टाचार्य सार्वभौम के ही पास रहते थे। वे महाशय बड़े ही अश्रद्धालु और नास्तिक प्रकृति के पुरुष थे। इसलिए सार्वभौम ही भिक्षा के समय उन्हें किसी काम से बहार भेज दिया था। महाप्रभु को एकांत में बिठाकर सार्...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  251 इसी बात को सोचकर हंसते हुए प्रभु ने उनसे जिज्ञासा कि- ‘भाई ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम लोगों में कौन पिता है और कौन पुत्र है?’ प्रभु के ऐसे प्रश्‍न को सुनकर गम्‍भीर वाणी में अमानी मुकुन्‍ददत्त कहने लगे- ‘प्रभो ! यथार्थ में पिता तो रघुनन्‍दन ही हैं। इस शरीर के सम्‍बन्‍ध से मैं इनका पिता भले ही होऊँ, किन्‍तु मुझे श्रीकृष्‍ण- भक्ति तो इन्‍हीं से प्राप्‍त हुई है। इन्‍हीं के अनुग्रह से मेरा पुनर्जन्‍म हुआ है, इसलिये सच्‍चे तो पिता ये ही है।’ महाप्रभु श्रीमुकुन्‍ददत्त के ऐसे उत्तर को सुनकर अत्‍यन्‍त ही सन्‍तुष्‍ट हुए और कहने लगे- ‘मुकुन्‍द ! आपने यह उत्तर अपने शील स्‍वभाव के अनुरूप ही दिया है। भगवद्भक्‍त को भक्ति प्रदान करने वाले महापुरुष में ऐसी ही भावना रखनी चाहिये। फिर चाहे वह अवस्‍था में, सम्‍बन्‍ध में, कुल में, जाति में, विद्या अथवा मान में अपने से छोटा ही क्‍यों न हो’ इतना कहकर महाप्रभु सभी भक्‍तों को सुनाकर मुकुन्‍ददत्त की भक्ति के सम्‍बन्‍ध में एक कथा कहने लगे- ‘मुकुन्‍द की प्रशंसा करने के अनन्‍तर प्रभु ने कहा- ‘इनकी कृष्‍णभक्ति बड़ी ही अपूर्व ह...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  250 उन सबका चित्त श्रीजगन्‍नाथ जी में तथा महाप्रभु के चरणों में लगा रहता था। अब महाप्रभु ने भक्‍तों को अपने अपने घर लौट आने की आज्ञा दी। इस बात को सुनते ही मानो छोटे छोटे कोमल वृक्षों पर तुषार गिर पड़ा हो, उसी प्रकार का दु:ख उन सब भक्‍तों को हुआ। भक्‍तों की विदाई… भक्‍तों की विदाई का समय समीप आ गया। महाप्रभु अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह से, बड़े ही ममत्‍व से सभी भक्‍तों से पृथक पृथक एकान्‍त में मिलने लगे। उनसे उनके मन की बात पूछते, आप अपने मन की बात बताते, उनका आलिंगन करते, उनके हाथ से थोड़ा प्रसाद पा लेते, स्‍वयं उन्‍हें अपने हाथ से प्रसाद देते, इस प्रकार भाँति-भाँति से प्रेम प्रदर्शित करके वे सभी भक्‍तों को सन्‍तुष्‍ट करने लगे। सभी भक्‍तों को यह अनुभव होने लगा कि महाप्रभु जितना अधिक स्‍नेह हमसे करते हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे से करते हों। सभी को इस बात का गर्व सा था कि प्रभु का सर्वापेक्षा हमारे ही ऊपर अत्‍यधिक अनुराग है। यही तो उनकी महत्ता थी। जिस समय सभी प्राणियों में आत्‍मभावना हो जाती है, जब सभी अपने प्‍यारे के स्‍वरूप दीखने लगते हैं, तब सबको ही हृदय से चि...

249

श्री श्री चैतन्य चरितावली  249 लक्ष्मी जी की दासियों ने जगन्नाथजी के सेवको को बाँधकर उन्‍हें लक्ष्‍मी जी के सम्‍मुख उपस्थित किया। दासियाँ उन सेवकों को मारती भी जाती थीं। महाप्रभु ने स्‍वरूपदामोदर से पूछा- ‘स्‍वरूप ! यह क्‍या बात है, लक्ष्‍मी जी इतनी कुपित क्‍यों हैं?’ स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! क्रोध की बात है। अपने प्राणप्‍यारे से पृथक होने पर किसे अपार दु:ख न होगा।’ महाप्रभु ने पूछा-‘मैं यह जानना चाहता हूँ कि भगवान अकेले ही चुपके से चोर की भाँति वृन्‍दावन क्‍यों चले गये, लक्ष्‍मी जी को वे साथ क्‍यों नहीं ले गये?’ स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! रासलीला में व्रज की गोपिकाओं का ही अधिकार है, लक्ष्‍मी जी के भाग्‍य में यह सौभाग्‍य सुख नहीं है।’ पुरी में भक्‍तों के साथ आनन्‍द विहार… इस प्रकार महाप्रभु जी इसी सम्बंध में श्रीवास पण्डित तथा स्वरूपदामोदर से बहुत देर तक बातें करते रहे। श्रीवास पण्डित लक्ष्‍मीजी का पक्ष लेकर स्‍वरूपदामोदर की बातों का चातुरीपूर्वक खण्‍डन करते थे। इस प्रकार यह प्रेमयुक्‍त विवाद कुछ देर और चलता रहा। इतने में ही सेवकों के यह वचन देने पर कि हम आपके स्‍वामी को...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  248 प्रभु के पहले प्रसाद को पा ही कौन सकता था, इसलिये प्रभु अपने मुख्‍य-मुख्‍य भक्‍तों को साथ लेकर प्रसाद पाने बैठ गये। सभी ने खूब डटकर प्रसाद पाया। महाप्रभु आग्रहपूर्वक उन सबको खिला रहे थे। भक्‍तों से जो प्रसाद बचा वह अभ्‍यागतों को बाँट दिया गया। प्रसाद पा पाने लेने का अनन्‍तर सभी भक्‍त विश्राम करने लगे। इतने में ही रथ के चलने का समय आ पहुँचा। महाराज ने रथ को चलाने की आज्ञा दी। लाखों आदमी एक साथ मिलकर रथ को खींचने लगे, किन्‍तु रथ टस से मस नहीं हुआ, तब तो महाराज बड़े ही चिन्तित हुए। इतनें में ही महाप्रभु अपने भक्‍तों के साथ रथ के सीमप पहुँच गये। महाप्रभु ने ‘हरि, हरि’ शब्‍द करते हुए जोरों के साथ रथ में धक्‍का दिया और रथ उसी समय घर घर शब्‍द करता हुआ जोरों से चलने लगा। सभी को बड़ी भारी प्रसन्‍नता हुई। गौड़ीय भक्‍त ‘जगन्‍नाथ जी की जय’, ‘गौरचन्‍द्र की जय’, ‘श्रीकृष्‍णचैतन्‍य की जय’ आदि जय जयकारों से आकाश गुँजाने लगे। इस प्रकार बात-की-बात में रथ गुण्टिचा भवन के समीप पहुँच गया। वहाँ जाकर भगवान को मन्दिर में पधराया गया। भगवान के पुजारियों ने जगन्‍नाथ जी की आरती ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  247 उस समय थकान के कारण अपनी कोमल भुजा पर सिर रखकर लेटे हुए महाप्रभु बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। वाटिका के प्रत्‍येक वृक्ष के नीचे एक एक, दो दो भक्‍त पड़े हुए संकीर्तन की थकान को मिटा रहे थे। महाराज प्रतापरुद्र को प्रेमदान…. सचमुच जहाँ पर्दा है वहाँ मिलन कैसा? जहाँ बीच में दीवार खड़ी है वहाँ दर्शन सुख कहाँ? जहाँ अन्‍तराय है वहाँ सच्‍चा सुख हो ही नहीं सकता। जब तक पद प्रतिष्‍ठा, पैसा-परिवार, पाण्डित्‍य और पुरुषार्थ का अभिमान है तब तक प्‍यारे के पास पहुँचना अत्‍यन्‍त ही कठिन है। जब तक अहंकृति की गहरी खाईं बीच में खुदी हुई है, तब तक प्‍यारे के महल तक पहुँचना टेढ़ी खीर हैं। जब तक सभी अभिमानों को त्‍यागकर निष्किंचन बनकर प्‍यारे के पादपह्रों के समीप नहीं जाता, तब तक उसके प्रसाद को प्राप्‍त करने में कोई भी समर्थ नहीं हो सकता। इसीलिये महात्‍मा कबीरदास जी ने कहा है- चाखा चाहे प्रेम रस, राखा चाहे मान। एक म्‍यान में दो खडग, देखी सुनी न कान। महाराज प्रतापरुद्र जी जब तक राज्‍य सम्‍मान के अभिमान में बने रहे और दूसरे दूसरे आदमियों से संदेश भिजवाते रहे, तब तक वे महाप्रभु ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  246 दर्शनार्थी प्रभु के चरणों के नीचे की धूलि उठा-उठाकर सिर पर चढ़ाते। भक्‍त वृन्‍द उस चरणरेणु को अपने अपने शरीर में मलते। इस प्रकार बड़ी देर तक महाप्रभु नृत्‍य करते रहे। नृत्‍य करते करते प्रभु थककर बैठ गये और स्‍वरूप को आज्ञा दी कि किसी पद का गायन करो। गायनाचार्य दूसरे गौरचन्‍द्र श्रीस्‍वरूपदामोदर गोस्‍वामी गाने लगे- सेई त परान नाथ पाईनू। याहा लागि मदन दहन झूरि गेनू।। पद के साथ ही साथ वाद्य बजने लगे। हरि, हरि करके भक्‍त नाचने लगे। जगन्‍नाथ जी का रथ आगे बढ़ा और महाप्रभु भी नृत्‍य करते-करते उसके आगे चले। अब प्रभु राधाभाव से भावान्वित हो गये। उन्‍हें भान होने लगा मानो श्रीश्‍यामसुन्‍दर बहुत दिनों के बिछोह के बाद मिलने के लिये आये हैं। इसी भाव से वे जगन्‍नाथ जी की ओर भाँति-भाँति के प्रेम भावों को हाथों द्वारा प्रदर्शित करते हुए नृत्‍य करने लगे। अब उन्‍हें प्रतीत होने लगा मानो श्रीकृष्‍ण आकर मिल गये हैं, किन्‍तु इस मिलन में सुख नहीं है, जो वृन्‍दावन के पुलिन कुंजों में आता था। इसी भाव में विभोर होकर वे इस श्‍लोक को पढ़ने लगे- य कौमारहर: स एव हि वरस्‍ता एव चैत...

cc245

श्री श्री चैतन्य चरितावली  245 मनुष्‍यों की तो बात ही क्‍या, साक्षात जगन्‍नाथ जी भी प्रभु के नृत्‍य को देखकर चकित हो गये और वे रथ को खड़ा करके प्रभु की नृत्‍यकारी छबि को निहारने लगे। मानो वे प्रभु के नृत्‍य से आश्‍चर्यचकित होकर चलना भूल ही गये हों।महाराज प्रतापरुद्र भी अपने परिकर के साथ महाप्रभु के इस अदभुत नृत्‍य को देखकर मन-ही-मन प्रसन्‍न हो रहे थे। महाप्रभु का ऐसा नृत्‍य किसी ने आज तक कभी देखा नहीं था। जो लोग अब तक महाप्रभु की प्रशंसा ही सुनते थे, वे नृत्‍यकारी गौरांग को देखकर उनके ऊपर मुग्‍ध हो गये और जोरों से ‘हरि बोल, हरि बोल’, कहकर चिल्‍लाने लगे। इस प्रकार जगन्‍नाथ जी का रथ धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा और गौर भक्‍त प्रेम में उन्‍मत होकर उसने पीछे पीछे कीर्तन करते हुए चले। फिर महाप्रभु ने अपना एक स्‍वतन्‍त्र ही सम्‍प्रदाय बना लिया। उन सातों सम्‍प्रदायों को एकत्रित कर लिया। श्रीवास पण्डित, रमाई पण्डित, रघुनाथ, मुकुन्‍द, हरिदास, गोविन्‍दानन्‍द माधव और गोविन्‍द ये प्रधान गायक हुए और नृत्‍यकारी स्‍वयं महाप्रभु हुए। चौदह ढोलों की गगनभेदी ध्‍वनि साथ ही भक्‍तों के हृदय-सागर को उद्वेलित क...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  244 चारों ओर गगनभेदी जय ध्‍वनि ही सुनायी देती थी।भगवान के रथ पर विराजमान होने के अनन्‍तर महाराज प्रतापरुद्र जी ने सुवर्ण की बुहारी से पथ को परिष्‍कृत किया और अपने हाथ से चन्‍दन मिश्रित जल छिड़का। असंख्‍यों इन्‍द्र, मनु, प्रजापति तथा ब्रह्मा जिनकी सेवा में सदा उपस्थित रहते हैं, उनकी यदि नीच सेवा को करके महाराज अपने यश और प्रताप को बढ़ाते हैं, तो इसमें कौन सी आश्‍चर्य की बात है? उनके सामने राजा महाराजाओं की तो बात ही क्‍या है, ब्रह्मा जी भी एक साधारण जीव हैं। मान सम्‍मान के सहित उनकी सेवा कोई कर ही क्‍या सकता है, क्‍योंकि संसार भर की सभी प्रतिष्‍ठा उनके सामने तुच्‍छ से भी तुच्‍छ है। मान, प्रतिष्‍ठा, कीर्ति और यश के वे ही उदगम स्‍थान हैं। ऐश्‍वर्य से, पदार्थों से तथा अन्य प्रकार की वस्तुओं से कोई उनकी पूजा कर ही कैसे सकता है? वे तो केवल भाव के भूखे हैं।महाराज के पूजा-अर्चा तथा पथ-परिष्‍कार कर लेने पर गौड़देशीय भक्‍तों ने तथा भारतवर्ष के विभिन्‍न प्रान्‍तों से आये हुए नर नारियों ने भगवान के रथ की रज्‍जु पकड़ी। सभी ने मिलकर जोरों से ‘जगन्‍नाथ जी की जय’ बोली। ज...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  243 घंटों सरोवर में सभी भक्‍त जलक्रीडा करते रहे। महाप्रभु भक्‍तों के ऊपर जल उलीचते थे और सभी भक्‍त साथ ही मिलकर प्रभु के ऊपर जल की वर्षा करते। इस प्रकार स्‍नान कर लेने के अनन्‍तर सभी ने आकर नृसिंह भगवान को प्रणाम किया और मन्दिर के जगमोहन मे बैठ गये। उसी समय महाराज ने चार-पाँच आदमियों के लिये जगन्‍नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। महाप्रभु सभी भक्‍तों के सहित प्रसाद पाने लगे। महाप्रसाद में छूतछात का तो विचार ही नहीं था, सभी एक पंक्ति में बैठकर साथ ही साथ प्रसाद पाने लगे। सार्वभौम भट्टाचार्य भी अपने आचार-विचार और पण्डितप ने के अभिमान को भुलाकर भक्‍तों के साथ बैठकर प्रसाद पा रहे थे। इस पर उनके बहनोई गोपीनाथर्चा ने कहा- ‘कहो, भट्टाचार्य महाशय ! आपका आचार-विचार और चौका-चूल्‍हा कहाँ गया?’ भट्टाचार्य ने प्रसन्‍नता के स्‍वर में कहा- ‘आचार्य महाशय! आपकी कृपा से मेरे चौके-चूल्‍हे पर चौका फिर गया। आपने मेरे सभी पापों को धुला दिया।’ इतने में ही महाप्रभु कहने लगे- ‘भट्टाचार्य के ऊपर अब भगवान की कृपा हो गयी है और इनकी संगति से हम लोगों के हृदय में भी कुछ कुछ भक्ति का संचार ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  242 हमारी ऐसी इच्‍छा है, आप जल्‍दी से इसका प्रबन्‍ध करें।’ महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके काशी मिश्र ने उद्यान के मार्जन के निमित्त झाडू, टोकरी तथा और भी आवश्‍यकीय वस्‍तुएँ का प्रबन्‍ध कर दिया। अब महाप्रभु अपने सभी भक्‍तों के सहित गुण्टिचा मार्जन के लिये चले। सार्वभौम भट्टाचार्य, राय रामानन्‍द तथा वाणीनाथ जैसे प्रमुख-प्रमुख गण्‍यमान्‍य पुरुष भी प्रभु के साथ हाथ में झाडू तथा खुरापियों को लेकर चले। सबसे पहले तो महाप्रभु ने वहाँ इधर उधर जमी हुई घास को छिलवाया। फिर आपने सभी भक्‍तों से कहा- ‘सभी एक-एक झाड़ू ले लीजिये और झाड़कर अपना अपना कूड़ा अलग एकत्रित करते जाइये। कूड़े को देखकर ही सबको पुरस्‍कार अथवा तिरस्‍कार मिलेगा।’ बस, इतना सुनते ही सभी भक्‍त उद्यान साफ करने में जुट गये। सभी एक दूसरे से प्रतिस्‍पर्धा कर रहे थे, सभी चाहते थे कि मेरा ही नम्‍बर सर्वश्रेष्‍ठ रहे। सभी भक्‍तों के शरीरों से पसीना बह रहा था। महाप्रभु तो यन्‍त्र की भाँति काम में लगे हुए थे। उनके गौरवर्ण के अरुण कपोल गर्मी और परिश्रम के कारण और भी अधिक अरुण हो गये थे। उनमें से स्‍वेद-बिन्‍दु नि...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली 239- मिश्र को देखते ही प्रभु ने कहा- ‘मिश्र जी ! इस घर के समीप जो पुष्‍पोद्यान है उसमें एक एकान्‍त कुटिया आप हमें दे सकते हैं?’ हाथ जोड़े हुए काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभो ! यह आप कैसी बात कह रहे हैं। सब आपका ही तो है, देना कैसा? आप जिसे जहाँ चाहें ठहरा सकते हैं। जिसे निकालने की आज्ञा दें वह उसी समय निकल सकता है। हम तो आपके दोस्‍त हैं, जैसी आज्ञा हमें आप देंगे उसी का पालन हम करेंगे।’ ऐसा कह काशी मिश्र ने पुष्‍पोद्यान में एक सुन्‍दर सी कुटिया हमें आप देंगे उसी का पालन हम करेंगे।’ सभी भक्‍तों के निवास स्‍थान की व्‍यवस्‍था करने लगे। वाणीनाथ, काशी मिश्र तथा अन्‍यान्‍य मन्दिर के कर्मचारी भक्‍तों के लिये भाँति-भाँति का बहुत सा प्रसाद लदवाकर लाने लगे। महाप्रभु जल्‍दी से उठकर हरिदास जी के समीप आये। हरिदास जी जमीन पर पड़े हुए भगवन्‍नामों का उच्‍चारण कर रहे थे। दूर से ही प्रभु को अपनी ओर आते देखकर हरिदास ने भूमि पर लेटकर प्रभु के लिये साष्‍टांग प्रणाम किया। महाप्रभु ने जल्‍दी से हरिदास जी को अपने हाथों से उठाकर गले से लगा लिया। हरिदास जी बड़ी ही कातर वाणी में विनय करने लगे-...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  238- जब वे सिद्धि प्राप्‍त करने लगे तो उन्‍होंने इन्‍हें प्रभु की सेवा में रहने की आज्ञा दी थी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके ये प्रभु के समीप आ गये और सदा उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। इनका नाम गोविन्‍द है। बड़े ही विनयी, सुशील और सरल है।’ गोविन्‍द परिचय पाकर आचार्य ने उनका आलिंगन किया और सभी को साथ लेकर वे सिंहद्वार की ओर चलने लगे। महाराज प्रतापरुद्र जी ने आचार्य गोपीनाथ जी से भक्‍तों का परिचय कराने के लिये कहा। आचार्य सभी भक्‍तों का परिचय कराने लगे। वे अंगुली के संकेत से बताने लगे- ‘जिन्‍होंने इन तेजस्‍वी वृद्ध भक्त को माला पहनायी है, ये महाप्रभु के दूसरे स्‍वरूप श्रीस्‍वरूपदामोदर गोस्‍वामी हैं, इनके साथ यह महाप्रभु के सेवक गोविन्‍द हैं। ये आगे आगे जो उत्‍साह के साथ नृत्‍य कर रहे हैं, ये परम भागवत अद्वैताचार्य हैं। इनके पीछे जो ये चार गौरवर्ण के सुन्‍दर से पण्डित हैं, वे श्रीवास, वक्रेश्‍वर, विद्यानिधि और गदाधर हैं। ये चन्‍द्रशेखर आचार्य हैं। महाप्रभु के पूर्वाश्रम के ये मौसा होते हैं। महाप्रभु के चरणों में इनका दृढ़ अनुराग है। ये शिवानन्‍द, वासुदेवदत्त, ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  237- सभी अपने अपने घरों का चार महीने का प्रबन्‍ध करके पुरी जाने के लिये तैयार हो गये।श्रीवास आदि सभी भक्‍तों ने शचीमाता से प्रभु के समीप जाने के लिये विदा मांगी। वात्‍सल्‍यमयी जननी ने अपने संन्‍यासी पुत्र के लिये भाँति-भाँति की वस्‍तुएँ भेजीं। भक्तों ने उन सभी वस्‍तुओं को सावधानीपूर्वक अपने साथ रख लिया और वे माता की चरण-वन्‍दना करके पुरी के लिये चल दिये। लगभग 200 भक्‍त गौरगुण गाते हुए और ढोल करताल के साथ संकीर्तन करते हुए पैदल ही चले। आगे आगे वृद्ध अद्वैताचार्य युवा पुरुष की भाँति प्रभु के दर्शन की उत्‍सुकता के कारण जल्‍दी जल्‍दी चल रहे थे, उनके पीछे सभी भक्‍त नवीन उत्‍साह के साथ- हरिहरये नम: कृष्‍णयादवाय नम:। गोपाल गोविन्‍द राम श्रीमधुसूदन। -इस पद का संकीर्तन करते हुए चल रहे थे। इस प्रकार चलते चलते 20 दिन में वे पुरी के निकट पहुँच गये।इधर भगवान की स्‍नान-यात्रा का समय समीप आ पहुँचा। महाप्रभु बड़ी ही उत्‍सुकता से स्‍नान यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। स्‍नान यात्रा के दिन महाप्रभु अपने भक्‍तों सहित मन्दिर में दर्शन करने के लिये गये। उस दिन के उनके आनन्‍द का...

cc235

श्री श्री चैतन्य चरितावली  235- प्रभु ने उसी समय उनके चरणों में प्रणाम किया। वे लज्जितभाव से कहने लगे- ‘आप हमें प्रणाम न करें। आप तो साक्षात ईश्‍वर हैं।’ प्रभु ने कहा- ‘आप हमारे गुरु हैं, आपको भी प्रणाम न करेंगे तो और किसे करेंगे। हमारे तो साकार भगवान आप ही हैं।’ भारती जी ने कहा- ‘विधि-निषेध तो साधारण लोगों के लिये हैं। आपका गुरु हो ही कौन सकता है? आप स्‍वयं ही जगत के गुरु हैं।’ इस प्रकार परस्‍पर एक दूसरे की स्तुति करने लगे। भारती जी वहीं महाप्रभु के समीप ही रहने लगे। प्रभु ने उनकी भिक्षा आदि की सभी व्‍यवस्‍था कर दी। इसके थोड़े ही दिनों बाद श्रीईश्‍वरपुरी जी के शिष्‍य काशीश्‍वर गोस्‍वामी भी तीर्थ यात्रा करके महाप्रभु के समीप आ गये। वे शरीर से हृष्‍ट पुष्‍ट तथा बलवान थे। प्रभु के प्रति उनका अत्‍यधिक स्‍नेह था। उनको भी प्रभु ने अपने समीप ही रखा। इस प्रकार चारों ओर से भक्त आ आकर प्रभु की सेवा में उपस्थित होने लगे। श्रीजगन्‍नाथ जी के मन्दिर में नित्‍यप्रति हजारों आदमियों की भीड़ लगी रहती है। पर्व के दिनों में तो लोगों को दर्शन मिलने दुर्लभ हो जाते हैं। महाप्रभु जब दर्शनों के लिये जाते ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  234- प्रभु जब तक इनके पदों को नही सुन लेते थे। तब तक उनकी तृप्ति नहीं होती थी। इनके गुण अनंत हैं। महाप्रभु उन्हें ही जान सकते थे। उन्‍हें महाप्रभु ही जान सकते थे। इसीलिये महाप्रभु को इनके आगमन से सबसे अधिक प्रसन्‍नता हुई। प्रभु कहने लगे- ‘तुम आ गये, इससे मुझे कितनी प्रसन्‍नता हूई, उसे व्‍यक्‍त करने में मैं असमर्थ हूँ, सचमुच तुम्‍हारे बिना मैं अन्‍धा था। तुमने आकर ही मुझे आलोक प्रदान किया है। मैं सदा तुम्‍हारे विषय में स्‍वप्‍न में देखा था कि तुम आ गये हो और खड़े खड़े मुसकरा रहे हो, सो सचमुच ही आज तुम आ गये। तुमने यह बड़ा ही उत्तम कार्य किया जो यहाँ चले आये। अब मुझे छोड़कर मत चले जाना।’ प्रेमपूर्ण स्‍वर से धीरे धीरे स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! मैं स्‍वयं आपके चरणों में आ ही कैसे सकता हूँ। जब मेरे पाप उदय हुए तभी तो आपके चरणों से पृथक होकर मैं अन्‍यत्र चला गया। अब जब आपने अनुग्रह करके बुलाया है, तो बरबस आपके प्रेमपाश में बँधा हुआ चला आया हूँ और जब तक चरणों में रखेंगे, तब तक मैं कहीं अन्‍यत्र जा ही कैसे सकता हूँ?’ यह कहकर स्‍वरूप प्रभु के चरणों में गिर पड...