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Showing posts from September, 2022

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  17- इस प्रकार निमाई की अधिक चंचलता देखकर माता उनकी अधिक चिन्ता रखने लगी। माता जितनी ही अधिक होशियारी रखती, ये उतना ही अधिक उसे धोखा भी देते।एक दिन ये घर से निकलकर बाहर रास्ते में एकान्त में खेल रहे थे। शरीर पर बहुत-से आभूषण थे, उनमें कई सोने के भी थे। इतने में ही चोर उधर आ निकला। निमाई को आभूषण पहने एकान्त में खेलते देखकर उसके मन में बुरा भाव उत्पन्न हुआ और वह इन्हें पीठ पर चढ़ाकर एकान्त स्थान की ओर जाने लगा। इनके स्पर्शमात्र से ही उसकी विचित्र दशा हो गयी, उसे अपने कुकृत्यों पर रह-रहकर पश्चात्ताप होने लगा। निमाई का एक पैर उसके कन्धे के नीचे लटक रहा था। उस कमल की भाँति कोमल पैर को देखकर उसका हृदय भर आया। उसने एक बार निमाई के कमल की तरह खिले हुए मुँह की ओर ध्यानपूर्वक देखा। पीठ पर चढे़ हुए निमाई हँस रहे थे। चोर का हृदय पानी-पानी हो गया। जगदुद्धारक निमाई का वही पापी सर्वप्रथम कृपापात्र बना। इधर निमाई को घर में न देखकर माता-पिता को बड़ी चिन्ता हुई। मिश्र जी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गंगा जी तक पहुँचे, किन्तु निमाई का कुछ भी पता नहीं चला। इधर शची देवी पगली की तरह आस-पास...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  16- महापुरुषों के अंग में वह प्रेम की आकर्षक बिजली जन्म से ही होती है, कि पापी-से-पापी पुरुष की तो बात ही क्या है, पशु-पक्षी, कीट-पतंग तक उनके आकर्षण से खिंचकर उनके चेरे हो जाते हैं। शची देवी के छोटे से आँगन में जो दिन-रात्रि ‘हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।’ की ध्वनि गूँजती रहती है, इसका कारण निमाई की अपूर्व रूपमाधुरी ही नहीं है, किन्तु उनकी विश्वमोहिनी मन्द-मुसकान ने ही पास-पड़ोसियों की स्त्रियों को चेरी बना लिया है, उन्हें निमाई की मन्द-मुसकान के देखे बिना कल ही नहीं पड़ती। माताओं का यह सनातन स्वभाव है कि उनकी सन्तान पर जो कोई प्रेम करता है तो उनके हृदय में एक प्रकार की मीठी-मीठी गुदगुदी होती है, उनका जी चाहता है इस प्यार करने वाले पुरुष को मैं क्या दे दूँ? स्त्रियाँ निमाई को जितना ही प्यार करतीं, शची माता निमाई को उतना ही और अधिक सजातीं। मातृ-हृदय को भी ब्रह्मा जी ने एक अपूर्व पहेली बनाया है। निमाई अभी छोटा है, बहुत-से स्थानों से बालक के लिये छोटे-छोटे सिले वस्त्र और गहने आये हैं। माता ने अब निमाई को उन्हें पहनाना आरम्भ कर दिया है...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  15- बालक ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता था, त्यों-ही-त्यों उसकी चंचलता भी बढ़ती जाती थी। विश्वरूप जितने अधिक शान्त थे, गौरंग उतने ही अधिक चंचल थे। एक महीने के ही थे कि अपने-आप ही आँगन में घुटनों के सहारे रेंगने लगते थे। चलते-चलते जोर से किलकारियाँ मारने लगते, कभी-कभी अपने-आप ही हँसने लगते। माता इन्हें पकड़ती, किन्तु इन्हें पकड़ना सहज काम नहीं था।माँ का दूध पीते-ही-पीते कभी इतने जोर से दौड़ते कि फिर इन्हें रोक रखना असम्भव ही हो जाता था। पहले-पहले ये बहुत रोते थे, माता भाँति-भाँति से इन्हें चुप करने की चेष्टा करती किन्तु ये चुप ही नहीं होते थे। एक दिन ये छोटे खटोलने पर पड़े-पड़े बहुत जोरों से रो रहे थे। माता ने बहुत चेष्टा की किन्तु ये चुप नहीं हुए। तब तो माता इन्हें ‘हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द निमाई बोल।।’ यह पद गा-गाकर धीरे-धीरे हिलाने लगीं। बस, इसका श्रवण करना था कि ये चुप हो गये। माता को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें चुप करने का एक सहज ही उपाय मिल गया। जब कभी ये रोते तभी माता अपने कोमल कण्ठ से गाने लगती- हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव ग...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  14- फिर भी अपनी शक्ति के अनुसार उन्होंने अन्न-वस्त्र का दान अभ्यागत तथा ब्राह्मणों के लिये दिया। इस प्रकार वह रात्रि आनन्द तथा उत्साह में ही व्यतीत हुई। दूसरे दिन धूलेड़ी थी। उस दिन सभी परस्पर में मिलकर धूलि-कीच तथा अबीर-गुलाल और रंग से होली खेलते हैं। बस, उसी दिन कट्टर-से-कट्टर पण्डित भी स्पर्शास्पर्श का भेद नहीं मानते। सभी परस्पर में मिलते हैं। उस दिन भक्तों में महान आनन्द रहा। एक-दूसरे पर उत्साह के साथ रंग-गुलाल तथा दधि-हल्दी डाल रहे थे। मानो आज नन्दोत्सव मनाया जा रहा हो। भक्तों ने अनुभव किया कि आकाश में देवता उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मिलाकर जयघोष कर रहे हैं और भक्तों को अभयदान देते हुए आदेश कर रहे हैं कि अब भय की कोई बात नहीं, तुम्हारे दुर्दिन अब चले गये। नवद्वीप में ही नहीं सम्पूर्ण देश में भक्ति-भागीरथी की एक ऐसी मनोरम बाढ़ आवेगी कि जिसके द्वारा सभी जीव पावन बन जायँगे और चारों ओर ‘हरि बोल, हरि बोल’ यही सुमधुर ध्वनि सुनायी पड़ेगी। निमाई...... पं. जगन्नाथ मिश्र और श्रीशची देवी की मानसिक प्रसन्नता का वही अनुभव कर सकता है जिसकी अवस्था महाराज दश...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  13- ज्ञान, कर्म तथा भक्ति के ही एकमात्र प्रवर्तक हैं। जब कर्म की शिथिलता देखते हैं तब आप नरपति-विशेष के रूप में उत्पन्न होकर कर्म का प्रचार करते हैं, जब ज्ञान का लोप देखते हैं तब मुनि-विशेष के रूप में प्रकट होकर ज्ञान का प्रसार करते हैं और जब भक्ति को नष्ट होते देखते हैं तब भक्त-विशेष का रूप धारण करके भक्ति की महिमा बढ़ाते हैं। उन्हें स्वयं कुछ भी कर्तव्य नहीं होता, क्योंकि स्वयं परिपूर्ण स्वरूप हैं। लोककल्याण के निमित्त वे स्वयं आचरण करके लोगों को शिक्षा देते हैं। भगवान के लिये कोई बात ‘सहसा’ या ‘अकस्मात’ नहीं। जिस प्रकार नाटक का एक अभिनय देखने के अनन्तर हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, कि देखें अब क्या हो। इतने में ही रंग-मंच पर सहसा दूसरे नये पात्रों को देखकर हम चकित हो जाते हैं, किन्तु नाटक के व्यवस्थापक के लिये इसमें सहसा या अकस्मात कुछ भी नहीं। उसे आदि से अन्त तक सम्पूर्ण नाटक का पता है कि इसके बाद कौन-सा पात्र क्या अभिनय करेगा। इसी प्रकार इस जगत के रंग-मंच पर भगवान जो नाटक खेला रहे हैं, उसका उन्हें रत्ती-रत्ती भर पता है। उनके लिये भविष्य के गर्भ में कोई...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  12- पण्डित जगन्नाथ मिश्र अपने पिता की अनुमति से संस्कृत विद्या पढ़ने के लिये सिलहट से नवद्वीप में आये और पण्डित गंगादास जी की पाठशाला में अध्ययन करने लगे। इनकी बुद्धि कुशाग्र थी, पढ़ने-लिखने में ये तेज थे इसलिये अल्पकाल में ही, इन्होंने काव्यशास्त्रों का विधिवत अध्ययन करके पाठशाला से ‘पुरन्तर’ की पदवी प्राप्त कर ली।इनके रूप-लावण्य तथा विद्या-बुद्धि से प्रसन्न होकर नवद्वीप के प्रसिद्ध पण्डित श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती ने अपनी ज्येष्ठा कन्या शची देवी का इनके साथ विवाह कर दिया। पण्डित नीलाम्बर चक्रवर्ती भी नवद्वीप निवासी नहीं थे। इनका आदिस्थान फरीदपुर के जिले में मग्डोवा नामक एक छोटे-से ग्राम में था। ये भी विद्याध्ययन के निमित्त नवद्वीप आये थे और पढ़-लिखकर फिर यहीं रह गये। इनका घर ‘बेलपुकुरिया’ में काजीपाड़ा के समीप था। इनके यज्ञेश्वर और हिरण्य दो पुत्र और दो कन्याएँ थीं। छोटी कन्या का विवाह श्री चन्द्रशेखर आचार्यरत्न के साथ हुआ था और बड़ी कन्या जगन्माता शची देवी का पण्डित जगन्नाथ मिश्र के साथ। रूपवती और कुलवती पत्नी को पाकर पुरन्दर महाशय परम सन्तुष्ट हुए और फिर...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  10- भारतवर्ष भर में बंगाल-प्रान्त में ही खूब धूमधाम से नवरात्र मनाया जाता है, जिनमें लाखों बकरे कालीमाई के ऊपर चढ़ाये जाते हें। बंगालियों में निरामिषभोजी भी बहुत ही कम मिलेंगे। यदि बहुत-से मांस न भी खाते होंगे, तो मछली के बिना तो वे रह ही नहीं सकते। मछली के मांस की वे मांस में गणना नहीं करते। यहाँ तक कि बहुत-से वैष्णव भी मांस न खाते हुए भी मछली का सेवन करते हैं। केवल विधवा स्त्रियों को एकादशी के दिन मछली खाना मना है या कोई-कोई वैष्णव या ऊँची श्रेणी के भट्टाचार्य बचे हुए हैं, नहीं तो मछली के बिना बंगाली रह ही नहीं सकते। जिस बंगाली को स्नान के पूर्व शरीर में मलने को तेल नहीं मिला और भोजन के समय मछली नहीं मिली उसका जीवन व्यर्थ ही समझा जाता है, वह अपने समाज में या तो अत्यन्त ही दीन-हीन होगा या कोई परम योगी। सर्वसाधारण लोगों के लिये ये दोनों वस्तुएँ अत्यन्त ही आवश्यक समझी जाती हैं। जिस समय की हम बातें कह रहे हैं, उस समय बंगाल की बड़ी ही बुरी दशा थी।देशभर में मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था, मनुष्य धर्म-कर्म से हीन होकर नाना प्रकार के पाखण्ड-धर्मों का आश्रय किये ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  11- सब कुछ सुनकर प्रभु ने आज्ञा दी- ‘अनिच्छापूर्वक प्राणों के त्याग से कोई लाभ नहीं। वृन्दावनवास करके अहर्निश कृष्ण-स्मरण करो और भक्त-महात्माओं की सेवा-पूजा करो। भगवन्नाम से ही करोड़ों जन्मों के पाप क्षय हो जाते हैं, एक जन्म की तो बात ही क्या? प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे वृन्दावन में जाकर रहने लगे। कहते हैं- वे जंगलों में जाकर सूखी लकडि़याँ ले आते। वे तीन या चार पैसे जितने में भी बिक जातीं उन्हें बेचकर एक पैसे के चने खाकर तो स्वयं निर्वाह करते थे, शेष पैसों को एक दूकानदार के यहाँ जमा कर देते थे। उन बचे हुए पैसों का तेल खरीदकर बंगाली गरीब यात्रियों तथा भक्तों को स्नान के पूर्व लगाने के लिये देते थे। धन्य है, भक्ति हो तो ऐसी हो। इस प्रकार महात्मा सुबुद्धि राय जी ने अपने पानी पीने के पाप का ही प्रायश्चित्त नहीं किया, जन्म-जन्मान्तरों के पापों का प्रायश्चित्त कर डाला। हुसेन खाँ ने राजगद्दी पर बैठते ही अपना शासन जमाने के लिये स्थान-स्थान पर अपने काजियों को नियुक्त किया। बहुत-से लोगों को इलाकों का ठेका दिया। वे एक प्रकार से पट्टेदार जमींदार ही समझे जाते थे...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  8- उस समय दिल्ली के सिंहासन पर लोदी-वंश का अधिकार था किन्तु उस वंश के बादशाहों में अब वीरता-पराक्रम बिलकुल नहीं रहा था, लोदी-वंश अपनी अन्तिम साँसों को जैसे-तैसे कष्ट के साथ पूर्ण कर रहा था, अफ़ग़ान-सरदार लोदी-वंश का अन्त करने पर तुले हुए थे, इसलिये उन्होंने काबुल के बादशाह बाबर को दिल्ली के सिंहासन के लिये निमन्त्रित किया। बाबर-जैसा राज्यलोलुप बादशाह ऐसे स्वर्ण समय को हाथ से कब खोने वाला था। पंजाब का शासन दौलत खाँ उसका पृष्ठ-पोषक था, ईसवी सन् 1526 में बाबर ने भारत वर्ष पर चढ़ाई की और पानीपत के इतिहास-प्रसिद्ध रणक्षेत्र में इब्राहिम लोदी को परास्त करके वह स्वयं दिल्ली का बादशाह बन बैठा और उसके पश्चात् उसका पुत्र हुमायूँ दिल्ली के तख्त पर बैठा। इधर राजपूताने में राणा सांगा ने हिन्दूधर्म की दुहाई देकर बाबर के विरुद्ध बलवा आरम्भ किया। दोनों में घोर युद्ध हुआ, किन्तु मैदान बाबर के ही हाथ रहा, राणा सांगा परास्त होकर भाग गये। पंजाब में भी छोटी-मोटी पचासों रियासतें बन गयीं। उनमें के पहाड़ी राजा तो प्रायः सभी अपने को स्वतन्त्र ही समझते थे। पहाड़ों में छोटी-छोटी बी...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  9- इनके बड़े पुत्र श्री चन्द जी भी एक बड़े त्यागी, तेजस्वी और प्रभावशाली महापुरुष थे, उन्होंने विरक्तों को ही उपदेश दिया। इसलिये उनके अनुयायी अपने को ‘उदासी’ कहने लगे। उदासी एक प्रकार के संन्यासी ही होते हैं, असल में तो यह भी वैष्णव-धर्म का ही रूपान्तर है, केवल ये लोग शिखा-सूत्र नहीं रखते। वैसे उदासी-सम्प्रदाय में भगवत -भक्ति ही मुख्य समझी जाती थी। अब तो उदासी-सम्प्रदाय भी विचित्र ही बन गया है। इधर दक्षिण में महात्मा समर्थ गुरु रामदास जी ने भी राम-भक्ति का प्रचार किया। उनके प्रधान शिष्य छत्रपति महाराज शिवाजी केवल राज्यलोलुप लड़ाकू शूरवीर ही नहीं थे, वे परम भागवत वैष्णव थे, उनके युद्ध का प्रधान उद्देश्य होता था। हिन्दू-धर्म-रक्षण और गौ-ब्राह्मणों का प्रतिपालन। इनके द्वारा महाराष्ट्र में भजन-कीर्तन और भगवत-भक्ति का खूब प्रचार हुआ। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त श्रीतुकाराम जी महाराज भी इसी समय उत्पन्न हुए और उन्होंने अपनी अद्भुत भगवत-भक्ति के द्वारा सम्पूर्ण महाराष्ट्र देश को पावन कर दिया। ये विट्ठलनाथ जी के प्रेम में विभोर होकर स्वयं पद गा-गाकर नृत्य करते और ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  6- राजधर्म नीतिधर्म, वृत्तिधर्म, वर्णाश्रमधर्म, मोक्षधर्म, सृष्टि, स्थिति, प्रलय, शौच, सदाचार, गति, अगति, कर्तव्य, अकर्तव्य सभी विषयों का वर्णन भगवान व्यासदेव ने किया है। संसार में कोई भी ऐसी बात जिसका कोई कभी भी अनुभव कर सकता है, उसका सूत्ररूप से वर्णन भगवान व्यासदेव पहले ही कर चुके हैं। भगवान व्यासदेव ने बताया है कि काल की गति अव्याहत और एकरस है। जो पैदा हुआ है, उसका कभी-न-कभी अन्त अवश्य ही होगा। दिन-रात्रि सबके लिये समानरूप से आते-जाते हैं। बुद्धिमान अपने समय का उपयोग काव्यशास्त्रों के अध्ययन और मनन में करते हैं, जो मूर्ख हैं वे सोने में, खाने-पीने या दूसरों की निन्दा-स्तुति में अपने समय का दुरुपयोग करते हैं इसलिये व्यासदेव जी उपदेश करते हैं कि मूर्खों की भाँति समय बिताना ठीक नहीं है। अपने समय का दुरुपयोग कभी भी मत करो, उसका सदा सदुपयोग ही करते रहो। सदुपयोग कैसे हो? इसके लिये वे उपदेश करते हैं।मनुष्यों को इतिहास, पुराण, दूसरी सुन्दर कहानियाँ और महात्माओं के जीवन-चरित्र इनका नित्यप्रति श्रवण करना चाहिये। अब आइये, इस बात पर थोड़ा विचार करें कि इन उपर्युक...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  7- इस प्रकार वे संसारी लोगों की निन्दा-स्तुति के बीच में रहते हुए भी अपने जीवन को आदर्श जीवन बनाकर लोगों के उत्साह को बढ़ाते हैं, ऐसे महापुरुष सदा से उत्पन्न होते आये हैं, अब भी हैं और आगे भी होंगे।किसी के जीवन का प्रभाव व्यापक होता है, उनके आचरणों के द्वारा अधिक लोगों का कल्याण होता है और किसी के जीवन का प्रभाव अल्प होता है, उनके थोड़े ही पुरुष लाभ उठा सकते हैं। इस प्रकार सब जातियों में, सब काल में किसी-न-किसी रूप में महात्मा उत्पन्न होते ही रहते हैं। बहुत-से ऐसे महापुरुष होते हैं जिनकी टक्कर का शताब्दियों तक कोई महापुरुष व्यक्तरूप से प्रकट नहीं होता है। किंतु इसका निर्णय होता है अपने-अपने भावों के अनुसार भिन्न-भिन्न रीति से। इस बात को आज तक न तो किसी ने पूर्णरूप से निर्णय किया है और न आगे भी कोई कर सकेगा कि अमुक महापुरुष किस कोटि के हैं और इनके बाद इनकी कोटिका कोई महापुरुष उत्पन्न हुआ या नहीं। इसलिये शालग्राम की बटिया के समान हमारे लिए तो तभी महात्मा पूजनीय तथा वंदनीय हैं। संसार में असंख्य सम्प्रदाय विद्यमान हैं और उन सबका सम्बन्ध किसी-न-किसी महापुरुष स...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  5- जिन्होंने लुप्त हुए विष्णु सम्प्रदाय का उद्धार करके पुष्टिमार्ग की स्थापना की, जो गृहस्थ में रहते हुए भी महान विरक्त और आसक्तिरहित बने रहे, जिन्होंने वात्सल्योपासना की मधुरता को दिखाकर अपने को स्वयं गोपवंश का प्रकट किया, जिन्होंने बालक श्रीकृष्ण की अर्चा-पूजा को ही प्रधानता देते हुए सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण को ही अन्तिम ध्येय बताया, उन शुद्धाद्वैत के प्रचारक बालकृष्णोपासक भगवान वल्लभाचार्य के चरणों में मेरी प्रीति हो। जिन्होंने श्रीराधा कृष्ण की उपासना को ही सर्वस्व सिद्ध किया, जिन्होंने नीम के पेड़ में अर्क (सूर्य) दिखाकर भूखे वैष्णव को भोजन कराया, उन द्वैताद्वैतमत प्रवर्तक, मधुर भाव के उपासक भगवान निम्बार्काचार्य के चरणों में मेरा प्रणाम है। जिन्होंने वृन्दावनविहारी की प्रीति को ही एकमात्र साध्य माना है, जिन्होंने अत्यन्त परिश्रम करके स्वयं हिमालय पर जाकर वेदव्यास जी से ज्ञात प्राप्त किया और वेदान्तसूत्रों पर भाष्य रचा, उन द्वैतमत के प्रवर्तक भगवान मध्वाचार्य आनन्दतीर्थ के पादपद्मों में मेरा बार-बार प्रणाम है। जिन्होंने छूताछूत और जाति-पाँति का कुछ भी ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  4- हे घोर संसाररूपी समुद्र के एकमात्र कर्णधार! इस शुष्कजीवन में सरसता लाने वाले गुरुदेव! हम प्रणतों की ओर दृष्टिपात कीजिये। तुम्हारी जगन्मोहन मूर्ति का ध्यान करते-करते दिन व्यतीत हो जाता है, रात्रि आ जाती है, फिर भी मैं तुम्हारी कृपा से वंचित ही बना रहता हूँ। तुम्हारे निकट रहते हुए भी ‘तुम्हारा’ नहीं बन पाता। तुम्हारी चरण-छाया के सन्निकट बना रहने पर भी शीतलता से वंचित रहता हूँ। किसे दोष दूँ, मेरा दुर्दैव ही मुझे तुम तक नहीं पहुँचने देता। बस, इस जीवन में एक ही आशा है, उसी का ध्यान करता रहता हूँ। भक्त-वन्दना..... प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक- व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्। रूक्मांगदोद्धवविभीषणफाल्गुनादीन् पुण्यानिमान्परमभागवतान्नतोऽस्मि।। जिन्होंने दैत्यकुल में जन्म लेकर भी अच्युत की अनन्य भाव से अर्चा-पूजा की है, जिनके सदुपदेश से दैत्य बालक भी परम भागवत बन गये, जिन्होंने अपने प्रतापी पिता के प्रभाव की परवा न करके अपनी प्रतिज्ञा में परिवर्तन नहीं किया, जिन्हें हलाहल विष पान कराया गया, पर्वत के शिखर से गिराया गया, जल में डुबाया गया, अग्नि में जलाया गया तो ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  3- विषयों के चिन्तन से यह ऐसा विषयमय बन गया है, कि तुम्हारी ओर आते ही काँपने लगता है और आगे बढ़ना तो अलग रहा, चार कदम और पीछे हट जाता है। कैसे करूँ नाथ! अनेक उपाय किये, अपने करने योग्य साधन जहाँ तक कर सका सब किये, किन्तु इस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हो भी तो कैसे? इसकी डोरी तो तुम्हारे हाथ में है। तुमने तो इसकी डोरी ढीली छोड़ दी है, यदि तुम्हारा जरा भी इशारा हो जाता तो फिर इसकी क्या मजाल जो इधर-से-उधर तनिक भी जा सकता। मेरे साधनों से यह वश में हो सकेगा, ऐसी मुझे आशा नहीं। तुम्हीं जब बरजो तब काम चले।प्यारे प्रभु! जरा बरज दो। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रेमसागर में डूब जाय तो यह जीवन सार्थक हो जाय। यह कलेवर निहाल हो जाय। जीभ नाना प्रकार के रसों में इतनी आसक्त है, कि इसे तुम्हारे नाम में मजा ही नहीं आता। निरन्तर स्वादु-स्वादु पदार्थों की ही वान्छा करती रहती है। हठात इसे लगाता हूँ, किन्तु बेमन का काम भी कभी ठीक होता है? नाथ! अब तो बस तुम्हारा ही आश्रय है। तुम्हारे प्रति अनुराग नहीं, विषयों से वैराग्य नहीं, जीवन में यथार्थ त्याग नहीं। जीवन क्या है, पूरा जंजाल बना हु...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  2- जब निमाई गौरहरि हो गये और पाठशाला की इतिश्री हो गयी तब मानो निमाई पण्डित प्रेम पण्डित बन गये। अब वे लौकिक पाठ न पढ़ाकर प्रेम-पाठ पढ़ाने वाले अध्यापक बन गये। सर्वप्रथम उनके कृपापात्र होने का सौभाग्य परम-भाग्यशाली स्वनामधन्य श्रीरत्नगर्भाचार्य को प्राप्त हुआ।गौरांग महाप्रभु जीवों को त्याग का पाठ पढ़ाना चाहते थे। वे दिखा देना चाहते थे कि प्रभुप्राप्ति के लिये प्यारी-से-प्यारी वस्तु का भी परित्याग करना आवश्यक है। नहीं तो उन्हें स्वयं संन्यास का क्या प्रयोजन था। अद्वैताचार्य के पूछने पर आपने स्पष्ट ही कह दिया था- विना सर्वत्यागं भवति भजनं नह्यसुपते- रिति त्यागोअस्माभिः कृत इह किमद्वैतकथया।। अयं दण्डो भूयान् प्रबलतरसो मानसपशो- रितीवाहं दण्डग्रहणमविशेषादकरवम्।। आचार्य ने पूछा था-‘आपने यह अद्वैत-वेदान्तियों की भाँति संन्यास लेकर दण्ड-धरण क्यों किया है?’ इस पर महाप्रभु कहते हैं- ‘आचार्य! संन्यास धारण करने में द्वैत-अद्वैत की कौन-सी बात है। मुख्य बात तो है अपने प्यारे के पादपद्मों तक पहुँचना, सो यह बिना सर्वस्व त्याग किये होने का नहीं। यही सोचकर मैं संन्यास-धर्म...

श्री चैतन्य चरितावली 1

श्री श्री चैतन्य चरितावली 1- पुण्यवती नवद्वीप नगरी में मिश्रवंशावतंस पुरन्तर-उपाधिविशिष्ट पण्डतप्रवर श्रीजगन्नाथ मिश्र के यहाँ भाग्यवती शचीदेवी के गर्भ में तेरह मास रहकर महाप्रभु गौरांगदेव सं. 1407 शकाब्द (वि. 1542) की फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन इस धराधाम पर अवतीर्ण हुए। बाल्यकाल से ही इन्होंने अपने अद्भुत-अद्भुत ऐश्वर्य प्रदर्शित किये। अपनी अलौकिक बाल-लीलाओं से अपने माता-पिता, भाई-बन्धु तथा पुरजन-परिजनों को आनन्दित करते हुए जब इनकी अवस्था सात-आठ वर्ष की हुई तब इनके अग्रज विश्वरूपजी अपने पिता- माता को बिलखते छोड़कर संसारत्यागी विरागी बन गये। तब इन्होंने पुत्र-शोक से दुखी हुए माता-पिता को अल्पावस्था में ही अपने अनुपम-सान्त्वनामय वाक्यों से शान्ति प्रदान की और माता-पिता की विचित्र भाँति से अनुमति प्राप्त करके विद्याध्ययन में ही अपना सम्पूर्ण समय बिताने लगे। कालान्तर में इनके पूज्य पिता परलोकवासी हुए, तब सम्पूर्ण घर-गृहस्थी का भार इन्हीं के ऊपर आ पड़ा। इसीलिये सोलह वर्ष की अल्पायु में ही ये अध्यापकी के अत्युच्च आसन पर आसीन हुए और कुछ काल के अनन्तर द्रव्योपार्जन तथा मनोरंजन और लोक-शिक्षण क...