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Showing posts from March, 2023

cc 199

श्री श्री चैतन्य चरितावली  199- इधर काशी सूनी हो गयी।वहाँ एक राजा ने अपनी राजधानी बना ली और वह बड़े ही भक्तिभाव से भगवान भूतनाथ की पूजा करने लगा। राजा ने हजारों वर्ष तक शिव जी की घोर अराधना की। उसके उग्र तप से आशुतोष भगवान प्रसन्‍न हुए और उसके सामने प्रकट होकर उसने वरदान मांगने को कहा। राजा ने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए विनीतभाव से करुण स्‍वर में कहा- ‘प्रभो ! मैं अब आपसे क्‍या मागूं ? आपके अनुग्रह से मेरे धन्‍य-धान्‍य, राज-पाट, पुत्र-परिवार आदि सभी संसार की उत्तम समझी जाने वाली वस्‍तुएँ मौजूद हैं। मेरी एक बड़ी उत्‍कट इच्‍छा है, उसे सम्‍भवतया आप पूरी न कर सकेंगे।’ शिव जी ने प्रसन्‍नता के वेग में कहा- ‘राजन ! मेरे लिये प्रसन्‍न होने पर त्रिलोकी में कोई भी वस्‍तु अदेय नहीं है। तुम्‍हारी जो इच्‍छा हो, उसे ही निसंकोच-भाव से मांग लो।’ राजा ने अत्‍यन्‍त ही दीनता प्रकट करते हुए सरलता से कहा- ‘हे वरद ! यदि आप प्रसन्‍न होकर मुझे वर ही देना चाहते हैं, तो मुझे यही वरदान दीजिये कि युद्ध में मैं श्रीकृष्‍णचन्‍द्र जी को परास्‍त कर सकूँ।’ सदा आक-धतूरे के नशेमें मस्‍त रहने वाले औघड़दानी सदाशिव...

cc 198

श्री श्री चैतन्य चरितावली  198- इस पर विद्यानगर के राजा ने अपनी कन्या महाराज पुरुषोतमदेव को नहीं दी और अस्‍वीकार करते हुए कहा- ‘मैं अपनी कन्‍या को मन्दिर के झाडूदार के लिये नहीं दूंगा।’ इस पर क्रुद्ध होकर महाराज पुरुषोतम देव ने विद्या नगर चढ़ाई की और भगवान जगन्‍नाथ जी की कृपा से विद्यानगर को जीतकर उसे अपने राज्‍य में मिला लिया और राज कन्‍या का विवाह अपने साथ कर लिया। तभी महाराज ने साक्षी गोपाल से पुरी पधारने के लिये प्रार्थना की। महाराज के भक्तिभाव से प्रसन्‍न होकर साक्षी गोपाल-भगवान पुरी पधारे और कुछ कालतक जगन्‍नाथ जी के मन्दिर में ही माणिक्‍य-सिंहासन पर विराजे। जगन्‍नाथ जी पुराने थे, ये बेचारे नये ही आये थे, इसलिये दोनों में कुछ प्रेम-कलह उत्‍पन्‍न हो गया। महाराज पुरुषोतमदेव ने दोनों को एक स्‍थान पर रखना उचित न समझकर अन्‍त में पुरी से तीन कोस की दूरी पर ‘सत्‍यवादी’ नामक ग्राम के समीप साक्षीगोपाल भगवान का मन्दिर बनवा दिया। तब से यहीं विराजमान हैं। इनकी महिमा बड़ी अपार है, एक बार उड़ीसा-देश की महारानी इनके दर्शन के लिये पधारीं। इनकी मनमोहिनी बाँकी-झाँकी करके महारानी मुग्‍ध हो गयीं।...

cc 197

श्री श्री चैतन्य चरितावली  197- इसने मेरे पिता से धन अपहरण करने के लिये उन्‍हें धतूरा खिला दिया और सब धन ले लिया। अब ऐसी बातें बनाता है। भला, मेरे पिता ऐसे अकुलीन, घरबारहीन, कंगाल को अपनी पुत्री देने का वचन कभी दे सकते हैं?’ पंचों ने उस युवक से कहा- ‘क्यों भाई! यह क्या कह रहा है? वृद्ध ने जब तुम्हें पुत्री देने का वचन दिया, उस समय वहाँ कोई और भी पुरुष था, तुम किसी की साक्षी दे सकते हो?’ युवक ने गम्भीरता के साथ कहा- 'गोपाल जी के ही सामने इन्‍होंने कहा था और गोपाल जी को छोड़कर और मेरा कोई दूसरा साक्षी नहीं है।’ एक युवक ने पंच ने इस बात को सुनकर हंसी के स्‍वर में कहा- ‘तो क्‍या तुम गोपाल को यहाँ साक्षी देने के लिये ला सकते हो? आवेश में आकर जोर से उस युवक ने कहा- ‘हाँ, ला सकता हूँ।’ इस बात को सुनते ही सभी अवाक रह गये और आश्‍चर्य प्रकट करते हुए एक स्‍वर में सब के-सब कहने लगे- हाँ,हाँ, यदि तुम साक्षी के लिये गोपाल जी को ले आओ और सब पंचों के सामने गोपाल जी तुम्‍हारी साक्षी दे दें तो हम जबरदस्‍ती लड़की का विवाह तुम्‍हारे साथ करवा सकते है।’ इस बात से प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए वृद्ध ब्राह्मण...

cc 196

श्री श्री चैतन्य चरितावली  196- मैं इस कृतज्ञता के बोझ से दबा-सा जा रहा हूँ, मैं सोच रहा हूँ, इसके बदले में मैं तुम्‍हारा क्‍या उपकार करूँ?’ ’ब्राह्मणकुमार ने कहा- ‘आप तो मेरे वैसे ही पूज्‍य हैं, फिर वृद्ध हैं, भगवद्भक्‍त हैं, पड़ोसी हैं, मेरे पिता के तुल्‍य हैं और आजकल तीर्थयात्री हैं। आपकी सेवा करना तो मेरा हर प्रकार से धर्म है। इसमें मैंने प्रशंसा के योग्‍य कौन-सा काम किया है। यह तो मैंने अपने मनुष्‍योचित कर्तव्‍य का ही पालन किया है। मैंने किसी इच्‍छा से आपकी सेवा नहीं की, इसलिये इसका बदला चुकाने की क्‍या जरुरत है?’ वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘तुम तो बदला नहीं चाहते, किन्‍तु मेरा भी तो कुछ कर्तव्‍य है, जब तक मैं तुम्‍हारे इस महान उपकार का कुछ थोड़ा-बहुत प्रत्‍युपकार न कर सकूँगा, तब तक मुझे शान्ति न होगी। मेरी इच्‍छा है कि मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्‍हारे साथ कर दूँ?’ आश्‍चर्य प्रकट करते हुए उस युवक ने कहा- ‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं, कहाँ आप इतने भारी कुलीन, धनी-मानी, बड़े परिवार वाले गृहस्‍थ, कहाँ मैं माता-पिताहीन, अकुलीन,अनाथ ब्राह्मणकुमार ! मेरा आपका सम्‍बन्‍ध कैसा- सम्‍बन्‍ध...

cc 195

श्री श्री चैतन्य चरितावली 195- अन्‍य उपस्थित भक्त भी प्रभु को रुदन करते देखकर जोरों से क्रन्‍दन करने लगे। उसी समय भगवान का भोग लगाकर शयन-आरती हुई। प्रभु ने सभी भक्‍तों के सहित शयन-आरती के दर्शन किये और फिर वहीं मन्दिर के समीप ही एक स्‍थान में रात्रि बिताने का निश्‍चय किया। पुजारियो ने लाकर भगवान के क्षीर-भोग के बारह पुत्र प्रभु के सामने रख दिये। प्रभु भगवान के उस महाप्रसाद के दर्शनमात्र से ही परम प्रसन्‍न हो उठे। प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा- आज हमारा जन्‍म सफल हआ, जो हम गोपीनाथ भगवान के क्षीर के अधिकारी समझे गये। भगवान के प्रसाद के सम्‍बन्‍ध में लोभवृति करना ठीक नहीं है। हम पाँच ही आदमी हैं, अत: आप हमें पांच पात्र देकर सात पात्रों को उठा ले जाइये। भगवान के प्रसाद के अधिकारी सभी हैं। उसे अकेले-ही-अकेले पा लेना ठीक नहीं है। यह कहकर प्रभु ने पाँच पात्रों को ग्रहण करके शेष सात पात्रों को लौटा दिया। भगवान के उस अदभुत महाप्रसाद ने प्रभु ने अपने भक्तों के साथ श्रद्धासहित पाया और वह रात्रि वहीं भगवान के चरणों के समीप बितायी। श्रीसाक्षीगोपाल….. प्रात:काल उठकर प्रभु नित्‍यकर्म से निव...

cc 194

श्री श्री चैतन्य चरितावली  194- हम तो आपको साक्षात् भगवान ने भी क्षीर की चोरी की, वे भी चोर बने, वे महाभागवत तो भगवान से भी बढ़कर हैं। यह लीजिये भगवान ने यह क्षीर आपके लिये चुराकर रख छोड़ी थी। उन्‍हीं की आज्ञा से मैं इसे आपके पास लाया हूँ।’ पुजारी के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर पुरी महाराज कुछ लज्जित हुए। वे भगवान की कृपालुता, भक्त वत्‍सलता और अपने भक्तों के प्रति अपार ममता के भावों को स्‍मरण करके प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे। रोते-रोते उन्‍होंने भगवान का दिया हुआ वह महाप्रसाद दोनों हाथ फैलाकर अत्‍यन्‍त ही दीन-भाव से भिखारी की भाँति ग्रहण किया। एकान्‍त में प्रेम में पागल हुए उस महाप्रसाद को वे पाने लगे। उस समय के उनके अनिर्वचनीय आनन्‍द का अनुमान लगा ही कौन सकता है? एक तो भगवान का महाप्रसाद और दूसरे साक्षात भगवान ने अपने हाथ चोरी करके दिया। पुरी रोते जाते थे और उस प्रसाद को पाते जाते थे। चारों ओर से पात्र को खूब चाट-चाटकर पुरी ने प्रसाद पाया। फिर जल डालकर उसे धोकर पी गये और उस मिटटी के पात्र के टूकड़े कर करके उन्‍हें अपने वस्‍त्र में बाँध लिया। भला, भगवान के दिये हुए पात्र को वे...

cc 193

श्री श्री चैतन्य चरितावली  193- पुरी महाराज ने भगवान श्रीगोपाल को प्रकट किया है, यह समाचार दूर-दूर तक फैल गया था। हजारों स्‍त्री-पुरुष भगवान के दर्शन के लिये आने लगे। उस दिन भगवान के दर्शन को जो भी आता, उसे ही पेट भरकर प्रसाद मिलता। रात्रिपर्यन्‍त हजारों आदमी आते-जाते रहे, किंतु अन्‍त तक सभी को यथेष्‍ट प्रसाद मिला, कोई भी प्रसाद से विमुख होकर नहीं गया। इस प्रकार उस दिन का अन्‍नकूट उत्‍सव बड़ा ही अदभुत रहा। इसके पश्‍चात अन्‍य ग्रामों के भी पुरुष बारी-बारी से श्रीगोपाल भगवान का अन्‍नकूट करने लगे। इस प्रकार रोज ही पुरी महाराज की कुटिया में अन्‍नकूट की धूम रहने लगी। यह समाचार दूर-दूर फैल गया। मथुरा के बड़े-बड़े सेठ श्रीगोपाल भगवान के दर्शन को आने लगे और वे सोना, चांदी, हीरा, जवाहिरात तथा भाँति-भाँति के वस्‍त्राभूषण भगवान की भेंट करने लगे। किसी पुण्‍यवान पुरुष ने श्रीगोपाल भगवान का बड़ा भारी विशाल मन्दिर बनवा दिया। सभी व्रजवासियों ने एक-एक, दो-दो गाय मन्दिर के लिये भेंट दी। इससे हजारों गौएं मन्दिर की हो गयीं। पुरी महाराज बड़े ही भक्तिभाव से भगवान की सेवा-पूजा करने लगे। उनका शरीर कुछ क्ष...

cc 191

श्री श्री चैतन्य चरितावली  191- प्रभु की प्रेममयी अवस्‍था देखकर उसने समझा, ये भी कोई हमारी तरह संसारी नशीली चीजों का सेवन करके पागल बनने वाले साधु होंगे। उसे पता नहीं था कि इन्‍होंने ऐसे प्‍याले का पी लिया, जिसे पीकर फिर दूसरे अम्‍ल की जरुरत ही नही पड़ती। उसी के नशे में सदा झूमते रहते हैं। कबीरदास जी ने इसी प्‍याले को तो लक्ष्‍य करके कहा हैं- कबीर प्‍याला प्रेम का अन्‍तर लिया लगाय।  रोम-रोम में रमि रहा, और अमल का खाय। धन्‍य है, ऐसे अ‍मलियों को। ऐसे नशेखोरों के सामने ये संसारी सभी नशे तुच्‍छ और हेय हैं। इस प्रकार अपने सभी साथियों को आनन्दित और सुखी बनाते हुए प्रभु पुरी के पथ को तै करने लगे। श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर…….. भक्तों के सहित आनन्‍द-विहार करते-करते जलेश्‍वर, ब्रह्मकुण्‍ड, मन्‍दार आदि तीर्थो में दर्शन-स्‍नान करते हुए महाप्रभु रेमुणाय नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ जाकर क्षीरचोर गोपीनाथ भगवान के मन्दिर में जाकर प्रभु ने भगवान के दर्शन किये। प्रभु आनन्‍द में विभोर होकर गोपीनाथ भगवान की बड़े ही करुण-स्‍वर में स्‍तुति करने लगे। स्‍तुति करते-करते वे प्रेम में बेसुध हो गये। अन्‍त में...

cc 192

श्री श्री चैतन्य चरितावली  192- पुरी महाशय ने उस दूध को पीया। इतना स्‍वादिष्‍ट दूध उन्‍होंने अपने जीवन में कभी नहीं पीया था, वे मन में अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हाते हुए उस दूध को पीने लगे। उनके हृदय में उस साँवले ग्‍वाले के लड़के की सूरत गड़-सी गयी थी, वे बार-बार उसका चिन्‍तन करने लगे। दूध पीकर पात्र को पृथ्‍वी पर रख दिया और उस ग्‍वाल-कुमार की प्रतीक्षा में बैठे रहे। आधी रात्रि बैठे-ही-बैठे बीत गयी, किन्‍तु वह ग्‍वाल-कुमार नहीं लौटा। अब तो पुरी महाराज की उत्‍सुकता उस लड़के को देखने की अधिकाधिक बढ़ने लगी। उसी स्थिति में उन्‍हें कुछ तन्‍द्रा-सी आ गयी। उसी समय सामने वही बालक खड़ा हुआ दिखायी देने लगा। उसने हंसते-हंसते कहा- पुरी ! मैं बहुत दिन से तुम्‍हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। तुम आ गये, यह अच्‍छा ही हुआ। ग्‍वाले के लड़के के वेष में ही तुम्‍हें दुग्‍ध दे गया था। अब तुम मेरी फिर से यहाँ प्रतीक्षा करो। मैं यहाँ इस पास की झाड़ी के नीचे दबा हुआ हूँ। पहले मेरा यहाँ मन्दिर था, मेरा पुजारी म्‍लेच्‍छों के भय से मुझे इस झाड़ी के नीचे गाड़कर भाग गया था। तब से मैं इस झाड़खण्‍ड में ही दबा हुआ प...

cc 190

श्री श्री चैतन्य चरितावली  190- यदि मुझे इस बात का पता होता, तो कभी उन्‍हें देकर नहीं जाता।’ इतने में ही नित्‍यानन्‍दन जी भी मुकुन्‍द आदि सहित वहाँ आ पहुँचे। तब प्रभु ने प्रेम का रोष प्रकट करते हुए नित्‍यानन्‍द जी से कहा- ‘श्रीपाद ! आपके सभी काम बड़े ही चपलतापूर्ण होतो हैं, भला दण्‍ड-भंग करके आपको क्‍या मिल गया ? आप तो मुझे अपने धर्म से भ्रष्‍ट करना चाहते हैं। सन्‍यासी के पास एक दण्‍ड ही तो परमधन है, उसे आपने अपने उद्धत स्‍वभाव से भंग कर दिया। अब बताइये, कैसे मैं आपके साथ रहकर अपने धर्म का पालन कर सकूंगा? नित्‍यानन्‍द जी ने बात को टालते हुए कुछ हंसी के भाव में कहा- ‘वह तो बाँस का ही दण्‍ड था, उसके बदले में आप मुझे अपना दण्‍डमात्र बना लीजिये और जो भी उचित दण्‍ड समझें दे लीजिये।’ महाप्रभु ने कहा- ‘वह बाँस का दण्‍ड कैसे था, उसमें सभी देवताओं का अधिष्‍ठान था। आप तो मुझे न जाने क्‍या समझते हैं, अपनी दशा का पता मुझे ही लग सकता है। आपके हाथ में रहने का मुझे यही फल मिला। एक दण्‍ड था, वह भी आपने नष्‍ट कर दिया, अब न जाने क्‍या करेंगे। इसलिये मैं अब आप लोगों के साथ न जाऊँगा। या तो आप लोग जायँ...

cc 189

श्री श्री चैतन्य चरितावली  189- प्रभु और उनके साथियों ने प्रयागघाट पर स्‍नान किया और फिर आगे बढ़ें। अब उन्‍होंने गौड़-देश को छोड़कर उड़ीसा-देश की सीमा में प्रवेश किया। आज प्रभु ने अपने साथियों से कहा- ‘तुम लोग सब यहीं बैठो, आज मैं अकेला ही भिक्षा करने जाऊँगा।’ प्रभु जी की बात को टाल ही कौन सकता था ? सबने इस बात को स्‍वीकार किया। प्रभु अपने रंगे वस्‍त्र को झोली बनाकर भिक्षा मांगने के लिये चले। उड़ीसा तथा बंगाल में बने-बनाये अन्‍न की भिक्षा देने की परिपाटी नहीं है। भट्टाचार्य ब्राह्मण संन्‍यासी को बने-बनाये सिद्ध अन्‍न की भिक्षा देने लगे हैं। पहले तो लोग सुखा ही अन्‍न भिक्षा में देते थे। ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष प्रभु की झोली में चावल दाल और चिउरा आदि डालने लगे। प्रभु जिसके भी द्वार पर जाकर ‘नारायण-हरि’ कहकर आवाज लगाते वही बहुत-सा अन्‍न लेकर उन्‍हें देने के लिये दौड़ा आता। उनके अद्भुत रुप-लावण्‍य को देखकर सभी स्‍त्री-पुरुष चकित रह जाते और एकटक भाव से प्रभु को ही निहारते रहते। उनके चेहरे में इतना अधिक आकर्षण था कि जो भी एक बार उनके दर्शन कर लेता वहीं अपना सर्वस्‍व प्रभु के उन पर निछावर...

cc 188

श्री श्री चैतन्य चरितावली  188- रामचन्‍द्र खां प्रभु के तेज और प्रभाव से प्रभावान्वित हो गये और उन्‍होंने दूर से ही प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। किन्‍तु प्रभु तो बाह्यज्ञान शून्‍य हो रहे थे। वे तो चक्षुओं को आवृत करके प्रेमामृत का पान कर रहे थे। उन्‍हें किसी के नमस्‍कार-प्रणाम का क्‍या पता। प्रभु के साथियों ने प्रभु को सचेत करते हुए राजा रामचन्‍द्र खाँ का परिचय दिया। प्रभु ने उनका परिचय पाकर प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ओह ! आपका ही नाम राजा रामचन्‍द्र खाँ है, आपके अकस्‍मात खूब दर्शन हुए !’ दोनों हाथो को अंजलि बांधे हुए रामचन्‍द्र खाँ ने कहा- प्रभो ! इस विषयी कामी पुरुष को ही रामचन्‍द्र खाँ के नाम से पुकारते हैं। आज मैं अपने सौभाग्‍य की सराहना नहीं कर सकता, जो मुझ-जैसे संसारी गर्त में सने हुए विषयी पामर को आपके दर्शन हुए। आपके दर्शन से मेरे सब पाप क्षय हो गये। अब आप मेरे योग्‍य जो भी आज्ञा हो, उसे बताइये।’ प्रभु ने कहा- ‘रामचन्‍द्र ! हम अपने प्राणवल्‍लभ से मिलने के लिये व्‍याकुल हो रहे हैं। पुरी में जाकर हम अपने हृदयमण के दर्शन करके जीवन को सफल बना सकें, तुम वैसा ही उद्योग...

cc 187

श्री श्री चैतन्य चरितावली  187- प्रभु के ऐसे प्रश्‍न को सुनकर सभी ने दीनभाव से कहा- प्रभों ! हम भला, आपकी आज्ञा के बिना कोई वस्‍तु साथ कैसे ले सकते थे और किसी के द्रव्‍य को आपके बिना पूछे कैसे स्‍वीकार कर सकते थे? आप हमारे सम्‍पूर्ण शरीर को देख लें, हमारे पास कुछ भी नहीं है और न हमसें से किसी ने द्रव्‍य ही साथ में बाँधा।' महाप्रभु उनके ऐसे निष्‍कपट, सरल और नि:स्‍पृहतापूर्ण उतर को सुनकर बड़े ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- मैं तुम लोगों से अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हूँ। तुमने साथ में द्रव्‍य न बांधकर अपनी नि:स्‍पृहता का परिचय दिया है। नि:स्‍पृहता ही तो त्‍याग का भूषण है। जो किसी से धन की इच्‍छा करके संग्रह करता है, वह कभी त्‍यागी हो ही नहीं सकता। त्‍यागी के लिये तो भोजन की चिन्‍ता करनी ही न चाहिये। उसे तो प्रारब्‍ध के उपर छोड़ देना चाहिये। जो प्रारब्‍ध में होगा वह अवश्‍य मिलेगा, फिर चाहे तुम मरुभुमि के घोर बालुकामय प्रदेश में ही जाकर क्‍यों न बैठ जाओ। और भाग्‍य में नहीं हैं, तो भोगों के बीच में रहते हुए भी उन्‍हें उन से वंचित रहना पड़ेगा। चाहे जितना धनी क्‍यों ...

cc 186

श्री श्री चैतन्य चरितावली  186- आचार्य देव के आग्रह से प्रभु ने भी इन्हें साथ चलने की अनुमति प्रदान कर दी। पुरी के पथ में….. सचमुच अपने प्रियजन के बिछोह के समय तो सहृदय पुरुषों को मरण-समान ही दु:ख होता है। जिसके साथ इतने दिनों तक हास-परिहास, भोजन-पान आदि किया, जो निरन्‍तर अपने साहचर्य सुख का आनन्‍द पहुँचाता रहा, वही अपना प्‍यारा प्रियतम आज सहसा हमसे न जाने कब तक के लिये पृथक हो रहा है, इस बात के स्‍मरण मात्र से सहृदय सज्‍जनों के हृदय में भारी क्षोभ उत्‍पन्‍न होने लगता है। किन्‍तु उस दु:ख में भी मीठा-मीठा मजा हैं, उसका आस्‍वादन भावुक प्रेमी पुरुष ही कर सकते हैं। संसारी स्‍वार्थपूर्ण पुरुषों के भाग्‍य में वह सुख नही बदा है। दस दिनों तक भक्‍तों के चित को आनन्दित कराते रहने के अनन्‍तर आज प्रभु शान्तिपुर को परित्‍याग करके पुरी के पथिक बन जायँगें, इस बात के स्‍मरण मात्र से सभी परिजन और पुरजनों के हृदय में प्रभु के वियोगजन्‍य दुख की पीड़ा-सी होने लगी। सभी के चेहरों पर विषण्णता छायी हुई थी। प्रभु ने कुछ अन्‍यमनस्‍क भाव से अपने ओढ़ने का रँगा वस्‍त्र उठाया, लंगोटी को कमर से बांध लिया और छोटी...

cc185

श्री श्री चैतन्य चरितावली  185- यह सदा स्थिर-भाव से श्रीकृष्‍ण–चरणों की सुखमय शीतल छाया में बैठकर विश्राम ही नहीं करता।सदा इधर-उधर भटकता ही रहता है। इसी को ताड़न करने के निमित्त मैंने यह दण्‍ड धारण किया है।’ प्रभु की ऐसी गूढ़ रहस्यपूर्ण बात सुनकर अद्वैताचार्य को मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके अनन्तर अन्य बहुत-से भक्त प्रभु के संन्यास के सम्बन्ध में भाँति-भाँति की बातें करने लगे। कोई कहता- ‘प्रभु! आपने संन्यास लेकर भक्तों के साथ बड़ा भारी अन्याय किया हैं। पहले तो आपने अपने हाथों से प्रेमतरु की स्थापना की, उसे संकीर्तन के सुन्दर सलिल से सींचा और बढा़या। जब उस पर फल लगे और उनके पकने का समय आया, तभी आपने उसे जड़ से काट दिया। लोग अपने हाथ से लगाये हुए विषवृक्ष का भी उच्छेद नहीं करते। आपके बिना भक्त कैसे जीवेंगे? कौन उनकी करूण कहानियों को सुनेगा? विपत्ति पड़ने पर भक्त किसकी शरण में जायँगे? संकीर्तन में अपने अद्भुत और अलौकिक नृत्य से अब उन्हें कौन आह्लादित करेगा? कौन अब भक्तों के सहित गंगातट पर जलविहार करावेगा? कौन हमें निरन्तर कृष्‍ण-कथा सुनाकर सुखी और प्रमुदित बनावेगा? प्रभो! भक्त आप...

cc 184

श्री श्री चैतन्य चरितावली  184- प्रभु ‘हरि,‍ हरि’ बोलकर इतने जोरों से नृत्य करते थे कि देखने वालों की यही प्रतीत होता था कि प्रभु आकाश में स्थित होकर नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण आनन्द में विह्वल होकर प्रभु के चरणों के नीचे की धूलि को उठाकर अपने सम्पूर्ण शरीर में मल लेते और अपने जीवन को सफल हुआ समझते। इस प्रकार दस दिनों तक प्रभु ने अद्वैताचार्य के घर पर निवास किया।नवद्वीप तथा शान्तिपुर के सभी भक्तों की यह इच्छा होती कि प्रभु को एक-एक दिन हम भी भिक्षा करावें, किन्तु माता उन सबसे दीनतापूर्वक कहती- ‘तुम सब मुझ अभागिनी के ऊपर कृपा करो। तुम सब तो जहाँ भी निमाई रहेगा वहीं जाकर इसे भिक्षा करा आओगे। मुझ दु:खिनी को अब न जाने कब ऐसा सौभाग्य प्राप्त होगा। मेरे लिये तो यही समय है। मैं तुम सभी से इस बात की भीख मांगती हूँ कि जब तक निमाई शान्तिपुर रहे तब तक वह मेरे ही हाथ का बना हुआ भोजन पावे। अब उसके ऊपर मेरे ही समान तुम सब लोगो का अधिकार है; किंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है?’ माता की ऐसी बात सुनकर सभी चुप हो जाते और फिर प्रभु के निमन्त्रण के लिये आग्रह न करते। इस प्रकार अपनी जननी के हाथ की भिक्षा को पाते...

cc 183

श्री श्री चैतन्य चरितावली  183- मैं तुम्हारे ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकता। माता! मैंने जल्दी में बिना सोचे-समझे ही संन्यास ग्रहण कर लिया है, फिर भी मैं तुमसे पृथक नहीं होऊँगा, जहाँ तुम्हारी आज्ञा होगी, वहीं रहूँगा।’ प्रभु के ऐसे सान्त्वनापूर्ण प्रेम-वचनों को सुनकर माता को कुछ संतोष हुआ, उन्होंने अपने अंचल से प्रभु के अश्रुओं को पोंछा और उन्हें छोटे बच्चे की भाँति पुचकारने लगीं। अद्वैताचार्य ने प्रभु से घर पर चलने की प्रार्थना की। प्रभु खडे़ हो गये और कहार पालकी उठाकर आचार्य के घर की ओर चलने लगे। महाप्रभु पालकी के पीछे-पीछे चलने लगे। उनके पीछे बहुत-से भक्त जोरों से संकीर्तन करते हुए चल रहे थे। द्वार पर पहुँचकर आचार्यदेव की धर्मपत्नी सीता देवी ने आगे बढ़कर शचीमाता को पालकी से नीचे उतारा और अपने साथ उन्हें भीतर घर में ले गयीं। भक्तवृन्द बाहर खडे़ होकर संकीर्तन करने लगे। शचीमाता का संन्यासी पुत्र के प्रति मातृ-स्नेह……. पुत्र ही माता की आत्मा है, पुत्र माता के शरीर का एक प्रधान भाग है। पुत्र की सन्तुष्टि में माता को सन्तोष होता है। पुत्र की प्रसन्नता से माता को प्रसन्नता होती और पुत्र ...

cc 182

श्री श्री चैतन्य चरितावली  182- इस प्रकार आचार्य और नित्यानन्द जी में परस्पर विनोद की बातें होती जाती थीं। प्रभु दोनों के प्रेम-कलह को देखकर खूब हंसते जाते थे। इस प्रकार आचार्यदेव की इच्छा के अनुसार प्रभु ने खूब पेटभर भोजन किया। नित्यानन्द जी ने भी अन्य दिनों की अपेक्षा दुगुना-तिगुना भोजन किया। और अन्त में एक मुट्ठी चावल अपनी थाली में से लेकर आचार्य के ऊपर फेंकते हुए कहने लगे- ‘लो, अब आपके ऊपर दया करके उठ पड़ता हूँ, वैसे पेट तो मेरा अभी भरा नहीं है।’ आचार्य ने कुछ बनावटी क्रोध प्रकट करते हुए कहा- ‘‍श्रीविष्‍णु! श्रीविष्‍णु!! यह आपने क्या किया? मेरा सभी धर्म-कर्म नष्‍ट कर दिया। भला जिसके जाति-कुल का कुछ भी पता न हो, ऐसे घर-घर से मांगकर खाने वाले अवधूत के उच्छिष्‍ट अन्न का शरीर से स्पर्श हो गया, अब इसका क्या प्रायश्चित किया जाय?’ नित्यानन्द जी ने कहा- ‘उच्छिष्‍ट-स्पर्श से पाप नहीं हुआ है, विष्‍णु भगवान के प्रसाद में उच्छिष्‍ट-भावना रखने का पाप हुआ है। सो इसका यही प्रायश्चित है कि पचास संन्यासी महात्माओं को भोजन कराइये और उनमें मैं अवश्‍य रहूँ।’  आचार्य बनावटी आश्‍चर्य प्रकट करते...

cc 181

श्री श्री चैतन्य चरितावली  181- शिष्‍टाचार की रक्षा के निमित्त चाहे वह अपने प्राणनाथ के इस स्थूल शरीर के दर्शन न कर सके, किन्तु उसके आराध्‍यदेव तो सदा उसके हृदय-मन्दिर में निवास कर रहे थे। वहीं पर वह उनकी पूजा करती और अपनी श्रद्धांजलि चढा़कर भक्तिभाव से सदा उन्हें प्रणाम करती रहती। उसने वीरपत्नी की भाँति अपनी सास से कहा- ‘माता जी! आप जायं और उन्हें देख आवें। मेरे भाग्य में उनके दर्शन नहीं बदे हैं तो नहीं! मेरा इससे बढ़कर और क्या सौभाग्य होगा कि जो सदा हमारे रहे हैं और आगे भी जो सर्वदा हमारे ही रहेंगे, उनके दर्शन के लिये आज शत्रु-मित्र सभी जा रहे हैं। मैं तो उन्हीं की हूँ और उन्हीं की रहूँगी, चाहे वे संन्यासीवेश में रहें या गृहस्थवेश में! मेरे हृदय में इन बाह्य चिह्नों से भेदभाव नहीं हो सकता। मेरे तो वे एक ही हैं, चाहे जिस अवस्था में रहें। अपनी पुत्रवधु की ऐसी बात सुनकर माता मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करती हुई पालकी पर चढ़कर भक्तों से घिरी हुई शान्तिपुर की ओर चली। इधर महाप्रभु के घर पहुँचते ही अद्वैताचार्य की धर्मपत्नी सीतादेवी ने बात-की-बात में ही भाँति-भाँति के व्यंजन बनाकर तैयार कर लि...