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श्री श्री चैतन्य चरितावली 199- इधर काशी सूनी हो गयी।वहाँ एक राजा ने अपनी राजधानी बना ली और वह बड़े ही भक्तिभाव से भगवान भूतनाथ की पूजा करने लगा। राजा ने हजारों वर्ष तक शिव जी की घोर अराधना की। उसके उग्र तप से आशुतोष भगवान प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट होकर उसने वरदान मांगने को कहा। राजा ने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए विनीतभाव से करुण स्वर में कहा- ‘प्रभो ! मैं अब आपसे क्या मागूं ? आपके अनुग्रह से मेरे धन्य-धान्य, राज-पाट, पुत्र-परिवार आदि सभी संसार की उत्तम समझी जाने वाली वस्तुएँ मौजूद हैं। मेरी एक बड़ी उत्कट इच्छा है, उसे सम्भवतया आप पूरी न कर सकेंगे।’ शिव जी ने प्रसन्नता के वेग में कहा- ‘राजन ! मेरे लिये प्रसन्न होने पर त्रिलोकी में कोई भी वस्तु अदेय नहीं है। तुम्हारी जो इच्छा हो, उसे ही निसंकोच-भाव से मांग लो।’ राजा ने अत्यन्त ही दीनता प्रकट करते हुए सरलता से कहा- ‘हे वरद ! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर ही देना चाहते हैं, तो मुझे यही वरदान दीजिये कि युद्ध में मैं श्रीकृष्णचन्द्र जी को परास्त कर सकूँ।’ सदा आक-धतूरे के नशेमें मस्त रहने वाले औघड़दानी सदाशिव...