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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस कठोरता की कथा को सुनकर तो कठोरता का भी हृदय फटने लगेगा। बड़ी ही करुण कहानी है।महाप्रभु संन्यास लेकर गृहत्यागी वैरागी बन गये, उससे उस पतिप्राणा प्रिया जी को कितना अधिक क्लेश हुआ होगा, यह विषय अवर्णनीय है। मनुष्य की शक्ति के बाहर की बात है। एक बार वृन्दावन जाते समय केवल विष्णुप्रिया जी की ही तीव्र विरहवेदना को शान्त करने के निमित्त क्षणभर के लिये प्रभु अपने पुराने घर पर पधारे थे।उस समय विष्णुप्रिया जी ने अपने संन्यासी पति के पादपद्मों में प्रणत होकर उनसे जीवनालम्बन के लिये किसी चिह्न की याचना की थी। दयामय प्रभु ने अपने पादपद्मों की पुनीत पादुकाएं उसी समय प्रिया जी को प्रदान की थीं और उन्हीं के द्वारा जीवन धारण करते रहने का उपदेश किया था। पति की पादुकाओं को पाकर पतिपरायणा प्रिया जी को परम प्रसन्नता हुई और उन्हीं को अपने जीवन का सहारा बनाकर वे इस पाँचभौतिक शरीर को टिकाये रहीं। उनका मन सदा नीलाचल के एक निभृत के स्थान में किन्हीं अरुण रंग वाले दो चरणों के बीच में भ्रमण करता रहता। शरीर यहाँ नवद्वीप में रहता, उसके द्वारा वे अपनी वृद्धा सास की सदा सेवा करती रहतीं। शचीमाता के जीवन का एकमात्र अवलम्बन अपनी प्यारी पुत्र वधू का कमल के समान म्लान मुख ही था।माता उस म्लान मुख को विकसित और प्रफुल्लित करने के लिये भाँति-भाँति की चेष्टाएँ करतीं। पुत्र वधू के सुवर्ण के समान शरीर को सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से सजातीं। प्रभु के भेजे हुए जगन्नाथ जी के बहुत ही मूल्यवान पट्टवस्त्र को वे उन्हें पहनातीं तथा और विविध प्रकार से उन्हें प्रसन्न रखने की चेष्टा करतीं किन्तु विष्णुप्रिया जी की प्रसन्नता तो पुरी के गम्भीरा मन्दिर के किसी कोने में थिरक रही है, वह नवद्वीप में कैसे आ जाये। शरीर तो उसके एक ही है इसीलिये इन वस्त्राभूषणों से विष्णुप्रिया जी को अणुमात्र भी प्रसन्नता न होती। वे अपनी वृद्धा सास की आज्ञा को उल्लंघन नहीं करना चाहती थीं। प्रभु के प्रेषित प्रसादी पट्टवस्त्र का अपमान न हो, इस भय से वे उस मूल्यवान वस्त्र को भी धारण कर लेतीं और आभूषणों को भी पहन लेतीं किन्तु उन्हें पहनकर वे बाहर नहीं जाती थीं।प्रभु का पुराना भृत्य ईशान अभी तक प्रभु के घर पर ही था। शचीमाता उसे पुत्र की भाँति प्यार करतीं। वही प्रिया जी तथा माता जी की सभी प्रकार की सेवा करता था। ईशान बहुत वृद्ध हो गया था, इसीलिये प्रभु ने वंशीवदन नामक एक ब्राह्मण को माता की सेवा के निमित्त और भेज दिया था। ये दोनों ही तन-मन से माता तथा प्रिया जी की सभी सेवा करते थे। प्रिया जी के पास कांचना नाम की एक उनकी सेविका सखी थी, वह सदा प्रिया जी के साथ रहती और उनकी हर प्रकार की सेवा करती। दामोदर पण्ड़ित भी नवद्वीप में ही रहकर माता की देख-रेख करते रहते और बीच-बीच में पुरी जाकर माता जी तथा प्रिया जी का सभी संवाद सुना आते। विष्णुप्रिया जी उन दिनों घोर त्यागमय जीवन बिताती थीं। दामोदर पण्ड़ित के द्वारा प्रभु जब इनके घोर वैराग्य और कठिन तप का समाचार सुनते तब वे मन ही मन अत्यधिक प्रसन्न होते।विष्णुप्रिया जी का एकमात्र अवलम्बन वे प्रभु की पुनीत पादुकाएं ही थीं। अपने पूजागृह में वे एक उच्चासन पर पादुकाओं को पधराये हुए थीं और नित्यप्रति धूप, दीप, नैवेद्य आदि से उनकी पूजा किया करती थीं। वे निरन्तर–
हरे राम हरे राम राम राम हरे रहे।
हेर कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
-इसी मंत्र को जपती रहतीं। उन्होंने अपना आहार बहुत ही कम कर दिया था, किन्तु शची माता के आग्रह से वे कभी-कभी कुछ अधिक भोजन कर लेती थीं। पुत्रशोक से जर्जरित हुई वृद्धा माता का हृदय फट गया था। पुत्र की दिव्योन्मादकारी अवस्था सुनकर तो उसके घायल हृदय में मानों किसी ने विष से बुझे हुए बाण वेध दिये हों।
एक दिन माता ने अधीर होकर भक्तों से कहा– ‘निमाई के विरह दु:ख की ज्वाला अब मेरे अन्त:करण को तीव्रता के साथ जला रही है, अब मेरा यह पार्थिव शरीर टिक न सकेगा, इसलिये तुम मुझे भगवती भागीरथी के तट पर ले चलो।’ भक्तों ने जगन्माता की आज्ञा का पालन किया और वे स्वयं अपने कंधों पर पालकी रखकर माता को गंगा किनारे ले गये। पीछे से पालकी पर चढ़कर विष्णुप्रिया जी भी वहाँ पहुँच गयीं। पुत्रशोक से तड़फड़ाती हुई माता ने अपनी प्यारी पुत्र वधू को अपने पास बुलाया। उसके हाथ को अपने हाथ से धीरे-धीरे पकड़कर माता ने कष्ट के साथ पुत्र वधू का माथा चूमा और उसे कुछ उपदेश करके इस नश्वर शरीर को त्याग दिया।
शची माता के वैकुण्ठ गमन से सभी भक्तों को अपार दु:ख हुआ। सास की क्रिया कराकर प्रिया जी घर लौटीं। अब वे नितान्त अकेली रह गयी थीं। ईशान माता से पहले ही परलोकवासी बन चुका था, उसे अपनी स्नेहमयी माता का हृदयविदारक दृश्य अपनी आँखों से नहीं देखना पड़ा। घर में वंशीवदन था, और दामोदर पण्डित भी गृह के कार्यों की देख-रेख करते थे। विष्णुप्रिया जी का वैराग्य और भी अधिक बढ़ गया, अब वे दिन-रात्रि अपने प्राणनाथ के विरह में तड़पती रहती थीं। अभी तक माता के वियोग का दु:ख कम नहीं हुआ था कि प्रिया जी को यह हृदयविदारक समाचार मिला कि श्री गौर अपनी लीला को संवरण करके अपने नित्यधाम को चले गये। इस दुस्सह समाचार को सुनकर तपस्विनी विष्णुप्रिया जी, कटे हुए केले के वृक्ष के समान भूमि पर गिर पड़ीं। उन्होंने अन्न जल का एकदम परित्याग कर दिया। स्वामिनी भक्त वंशीवदन ऐसी दशा में केसे अन्न ग्रहण करता।वह प्रिया जी का मन्त्र शिष्य भी था, इसलिये उसने भी अपने मुँह में अन्न का दाना नहीं दिया। भक्तों ने आकर भाँति-भाँति की विनती की, किन्तु प्रिया जी ने अन्न-जल ग्रहण करना स्वीकार ही नहीं किया। जब स्वप्न में आकर प्रत्यक्ष श्री गौरांग देव ने उनसे अभी कुछ दिन और शरीर धारण करने की आज्ञा दी, तब उन्होंने थोड़ा अन्न ग्रहण किया।एक दिन प्रिया जी भीतर शयन कर रही थीं, वंशीवदन बाहर बरामदे में सो रहा था।
क्रमशः
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