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Showing posts from February, 2023

cc 168

श्री श्री चैतन्य चरितावली  168- मुझे संसार-दु:खों से मुक्त कीजिये। मेरा संसारी-बन्धन छिन्न-भिन्न करके मुझे संन्यासी बना दीजिये। यही मेरी आपके श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना है।’ भारती जी को पिछली बातें स्मरण हो आयीं। निमाई का नाम सुनकर उन्होंने उनका आलिंगन किया और मन-ही-मन सोचने लगे- ‘हाय! इन पण्डित का कैसा सुवर्ण के समान सुन्दर शरीर, कैसा अलौकिक रूप-लावण्‍य, प्रभु के प्रति कितना प्रगाढ़ प्रेम और कितनी भारी विद्वत्ता है, फिर भी ये मेरे पास संन्यास-दीक्षा लेने आये हैं! इन्हें मैं संन्यासी कैसे बना सकूँगा? घर में असहाया वृद्धा माता है, उसकी यही एकमात्र सन्तान है। परम रूपवती युवती स्त्री इनके घर में है, उसके कोई सन्तान भी नहीं, जिससे आगे के लिये वंश चल सके। ऐसी दशा में भी ये संन्यास लेने आये हैं; क्या इन्हें संन्यास की दीक्षा देकर मैं पाप का भागी न बनूंगा?’ यह सोचकर भारतीजी कहने लगे- ‘निमाई पण्डित! तुम स्वयं बुद्धिमान हो, शास्त्रों का मर्म तुमसे अविदित नहीं है। युवावस्था में विषय-भोगों से भलीभाँति उपरति नहीं होती, इसलिये इस अवस्था में संन्यास-धर्म ग्रहण करना निषेध है। पचास वर्ष की अवस...

cc 167

श्री श्री चैतन्य चरितावली  167- वे सास की बातों को न सूनती हुई जोरों से रुदन करने लगीं। दु:खिनी माता उठी और लड़खड़ाती हुई प्रभु के शयन-भवन में पहुँची। वहाँ उसने प्रभु के पलंग को सूना देखा। विष्‍णुप्रिया नीचे पड़ी हुई रुदन कर रही थीं। माता की अधीरता का ठिकाना नहीं रहा। वे जोरों से रुदन करने लगीं- ‘बेटा निमाई! तू कहाँ चला गया? अरे, अपनी इस बूढ़ी माता को इस तरह धोखा मत दे। बेटा! तू कहाँ छिप गया है, मुझे अपनी सूरत तो दिखा जा। बेटा! तू रोज प्रात:काल मुझे उठकर प्रणाम किया करता था। आज मैं कितनी देर से खड़ी हूँ, उठकर प्रणाम क्यों नहीं करता!’ इतना कहकर माता दीपक को उठाकर घर के चारों ओर देखने लगी। मानो मेरा निमाई यहीं कहीं छिपा बैठा होगा। माता पलंग के नीचे देख रही थीं। बिछौना को बार-बार टटोलतीं, मानो निमाई इसी में छिप गया। वृद्धा माता के दु:ख के कारण काँपते हुए हाँथों से दीपक नीचे गिर पड़ा और वे भी विष्‍णुप्रिया के पास ही बेहोश होकर गिर पड़ीं और फिर उठकर चलने को तैयार हुईं और कहती जाती थीं- ‘मैं तो वहीं जाऊंगी जहाँ मेरा निमाई होगा। मैं तो अपने निमाई को ढुंढ़ूगी, वह यदि मिल गया तो उसके साथ रह...

cc 166

श्री श्री चैतन्य चरितावली  166- भावी बड़ी प्रबल है, जो होनहार होता है, वैसे ही उसके लिये साधन भी जुट जाते हैं, रात्रि भर की जागी हुई विष्‍णुप्रिया को नींद आ गयी। वह प्रभु की शय्यापर ही उनके चरणों में पड़कर सो गयीं। रात्रि भर की जागी हुई थीं, इसलिये पड़ते ही गाढ़ निद्रा ने आकर उनके ऊपर अपना अधिकार जमा लिया। प्रभु ने इसे ही बड़ा अच्छा सुअवसर समझा। बहुत ही धीरे से प्रभु ने अपने चरणों को विष्‍णुप्रिया जी की गोद में से उठाया। पैर के उठाते ही विष्‍णुप्रिया जी कुछ हिलीं। उसी समय प्रभु ने दूसरे पैर को ज्यों-का-त्यों ही उनकी छाती पर रखा रहने दियां थोड़ी देर में फिर धीरे-धीरे दूसरे भी पैर को उठाया। अब के विष्‍णुप्रिया जी को कुछ भी पता नहीं चला। प्रभु बहुत ही धीरे से शय्या पर से नीचे उतरे। पास में खूंटी पर टंगे हुए अपने वस्त्र पहने और एक बार फिर अपनी प्राणप्यारी की ओर दृष्टिपात किया। सामने एक क्षीण ज्योति का दीपक टिमटिमा रहा था। मानो वह भी प्रभु के वियोगजन्य दु:ख के कारण दु:खी होकर रो रहा है। दीपक मन्द-मन्द प्रकाश विष्‍णुप्रिया जी के मुख पर पड़ रहा था, इससे उनके मुख की कान्ति और भी अधिक शोभाय...

cc 165

श्री श्री चैतन्य चरितावली  165- प्रेम ही उनका आराध्‍यदेव था। प्राणियों की श‍कल-सूरत से उनका अनुराग नहीं था, वे तो प्रेम के पुजारी थे! पुजारी क्या थे, प्रेम-स्वरूप ही थे। उन्होंने एकदम संन्यास लेने का निश्‍चय कर लिया। सभी को अपनी-अपनी भूल का अनुभव होने लगा। उस पर हमारे ही समान सभी प्राणियों का समानभाव से अधिकार है, सभी उसके द्वारा प्रेमपीपूष पाकर प्रसन्न हो सकते हैं। महाप्रभु के संन्यास लेने का समाचार सम्पूर्ण नवद्वीप नगर में फैल गया। बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। महाप्रभु अब भक्तों के सहित संकीर्तन में सम्मिलित नहीं होते थे। भक्तगण स्वयं ही मिलकर संकीर्तन करते और प्रात:-सायं प्रभु के दर्शनों के लिये उनके घर पर आया करते थे।जिस दिन महामहिम श्रीस्वामी केशव भारती प्रभु के घर आये थे, उसी दिन प्रभु ने संन्यास लेने की तिथि निश्चित कर ली थी। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। दक्षिणायन-सूर्य में शुभ संस्कार और इस प्रकार के वैदिक कृत्य और अनुष्‍ठान नहीं किये जाते, इसलिये प्रभु उत्तरायण-सूर्य होने की प्रतीक्षा करने लगे। समय बीतते कुछ देर नहीं लगती। धीरे-धीरे भक्तों को तथा प्रभु के सम...

cc 164

श्री श्री चैतन्य चरितावली  164- जिस बात में मैं प्रसन्‍न रह सकूँ, तुम सदा ऐसा ही आचरण करती रही हो।अब तुम मुझे दु:खी बनाना क्‍यों चाहती हो? यदि तुम मुझे जबरदस्‍ती यहाँ रहने का आग्रह करोगी तो मुझे सुख न मिल सकेगा। रही माता की बात, सो उनसे तो मैं अनुमति ले भी चुका और उन्‍होंने मुझे संन्‍यास के निमित्त आज्ञा दे भी दी। अब तुमसे ही अनुमति लेनी और शेष रही है। मुझे पूर्ण आशा है, तुम भी मेरे इस शुभ काम में बाधा उपस्थित न करके प्रसन्‍नतापूर्वक अनुमति दे दोगी।’   कठोर हृदय करके और अपने दु:ख के आवेग को बलपूर्वक रोकते हुए विष्‍णुप्रिया ने कहा- ‘यदि माता ने आपको संन्‍यास की आज्ञा दे दी है, तो मैं आपके काम में रोड़ा न अटकाऊंगी। आपकी प्रसन्‍नता में ही मेरी प्रसन्‍नता है। आप जिस दशा में भी रहकर प्रसन्‍न हों वही मुझे स्‍वीकार है, किंतु प्राणेश्‍वर! मुझे हृदय से न भुलाइयेगा। आपके श्रीचरणों का निरंतर ध्‍यान बना रहे ऐसा आशीर्वाद मुझे और देते जाइयेगा। प्रसन्‍नतापूर्वक तो कैसे कहूं, किंतु आपकी प्रसन्‍नता के सम्‍मुख मुझे सब कुछ स्‍वीकार है। आप समर्थ है, मेरे स्‍वामी हैं, स्‍वतंत्र हैं और पतितों ...

cc 163

श्री श्री चैतन्य चरितावली  163- अर्धनिद्रित समय के प्रभु के श्रीमुख की शोभा को देखकर विष्‍णुप्रिया ठिठक गयीं। थोड़ी देर खड़ी होकर वे उस अनिर्वचनीय अनुपम आनन की अद्भुत आभा को निहारती रहीं। उनकी अधीरता अधिकाधिक बढ़ती ही जाती थी। धीरे से वे प्रभु के पैरों के समीप बैठ गयीं और अपने कोमल करों से शनै:-शनै: प्रभु के पाद-पद्मों के तलवों को सुहारने लगीं। उन चरणों की कोमलता, अरुणता और सुकुमारता को देखकर विष्‍णुप्रिया का हृदय फटने लगा। वे सोचने लगीं- ‘हाय! प्राणप्यारे इन सुकोमल चरणों से कण्‍टकाकीर्ण पृथ्‍वी पर नंगे पैरों कैसे भ्रमण कर सकेंगे? तपाये हुए सुवर्ण के रंग के समान यह राजकुमार का –सा सुकुमार शरीर संन्यास के कठोर नियमों का पालन कैसे कर सकेगा? इन विचारों के आते ही विष्‍णुप्रिया जी के नेत्रों से मोतियों के समान अश्रुबिन्दु झड़ने लगे। चरणों में गर्म बिन्दुओं के स्पर्श होने से प्रभु चौंक उठे और तकिये से थोड़ा सिर उठाकर उन्होंने अपने पैरों की ओर निहारा। सामने विष्णुप्रिया को देखकर प्रभु थोडे़ उठ-से पड़े। आधे लेटे-ही-लेटे प्रभु ने कहा- ‘तुम रो क्यों रही हो? इतनी अधीर क्यों बनी हुई हो? तुम्हे...

cc 162

श्री श्री चैतन्य चरितावली  162- भगवान श्रीरामचन्द्रजी की माता ने पुत्र वधू सहित अपने इकलौते पुत्र को वन जाने की अनुमति दे दी थी। सुमित्रा ने दृढ़तापूर्वक घर में पुत्रवधू रहते हुए भी लक्ष्‍मण को आग्रहपूर्वक श्रीरामचन्द्र जी के साथ वन में भेज दिया था। मदालसा ने अपने सभी पुत्रों को संन्यास धर्म की दीक्षा दी थी। तुम क्या उन माताओं से कुछ कम हो? जननि! तुम्हारें चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। तुम मेरे काम में पुत्रस्नेह के कारण बाधा मत पहुँचाओ! मुझे प्रसन्नतापूर्वक संन्यास ग्रहण करने की अनुमति दो और ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने इस व्रत को भलीभाँति निभा सकूँ।’ माता ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा- ‘बेटा! मैंने आज तक तेरे किसी भी काम में हस्तक्षेप नहीं किया। तू जिस काम में प्रसन्न रहा, उसी में मैं यदा प्रसन्न बनी रही। मैं चाहे भूखी बैठी रही, किंतु तुझे हजार जगह से लाकर तेरी रुचि के अनुसार सुन्दर भोजन कराया। मैं तेरी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकती। किंतु घर में रहकर क्या भगवद्भजन नहीं हो सकता? यहीं पर श्रीवास, गदाधर, मुकुन्द, अद्वैताचार्य- इन सभी भक्तों को लेकर दिन-रात्रि भजन-कीर्तन ...

cc 161

श्री श्री चैतन्य चरितावली  161- इस प्रकार सभी भक्त प्रभु के भावी वियोगजन्‍य दु:ख का स्‍मरण करते हुए भाँति-भाँति से प्रलाप करने लगे। शचीमाता और गौरहरि…….. भक्तों के मुख से निमाई के संन्‍यास की बात सुनकर माता के शोक का पारावार नहीं रहा। वह भूली-सी, भटकी-सी, किंकर्तव्‍यविमूढा-सी होकर चारों ओर देखने लगी। कभी आगे देखती, कभी पीछे को निहारती, कभी आकाश की ही ओर देखने लगती। मानो माता दिशा-विदिशाओं से सहायता की भिक्षा माँग रही है। लोगों के मुख से इस बात को सुनकर दु:खिनी माता का धैर्य एकदम जाता रहा। वह विलखती हुई, रोती हुई, पुत्र-वियोगरूपी दावानल से झुलसी हुई-सी महाप्रभु के पास पहुँची और बड़ी ही कातरता के साथ कलेजे की कसक को अपनी मर्माहत वाणी से प्रकट करती हुई कहने लगी- ‘बेटा निमाई! मैं जो कुछ सुन रही हूँ वह सब कहाँ तक ठीक है?’   पुत्र-वियोग को अशुभ समझने वाली माता के मुख से वह दारुण बात स्‍वयं ही न निकली। उसने गोलमाल तरह से ही उस बात को पूछा। कुछ अन्‍यमनस्‍क भाव से प्रभु ने पूछा- ‘कौन-सी बात?’ हाय! उस समय माता का हृदय स्‍थान-स्‍थान से फटने लगा। वह अपने मुख से वह हृदय को हिला देने व...

cc 160

श्री श्री चैतन्य चरितावली  160- प्रभु कहने लगे- ‘गदाधर! तुम इतने अधीर होगे तो भला मैं अपने धर्म को कैसे निभा सकूँगा? मैं सब कुछ देख सकता हूँ, कितु तुम्‍हें इस प्रकार विलखता हुआ नहीं देख सकता। मैंने केवल महान प्रेम की उपलब्धि करने के ही निमित्त ऐसा निश्‍चय किया है। यदि तुम मेरे इस शुभ संकल्‍प में इस प्रकार विघ्‍न उपस्थित करोगे तो मैं भी कभी उस काम को न करूँगा। तुम्‍हें दु:खी छोड़कर मैं शाश्‍वत सुख को भी नहीं चाहता। क्‍या कहते हो? बोलते क्‍यों नहीं। रुँधे हुए कण्‍ठ बड़े कष्‍ट के साथ लड़खड़ाती हुई वाणी में गदाधर ने कहा- ‘प्रभों! मैं कह ही क्‍या सकता हूँ? आपकी इच्‍छा के विरुद्ध कहने की किस की सामर्थ्‍य है? आप स्‍वतंत्र ईश्‍वर हैं।’ प्रभु ने कहा-‘मैं तुमसे आज्ञा चाहता हूँ।’ गदाधर अब अपने वेग को और अधिकन रोक सके। वे ढाह मार-मारकर जारों से रुदन करने लगे। प्रभु भी अधीर हो उठे। उस समय का दृश्‍य बड़ा ही करुणापूर्ण था। प्रभु की प्रेममय गोद में पड़े हुए गदाधर अबोध बालक की भाँति फूट-फूटकर रुदन कर रहे थे। प्रभु उनके सिर पर हाथ फेरते हुए उन्‍हें ढाढ़स बंधा रहे थे। प्रभु अपने अश्रुओं को वस्‍त्र के...

cc 159

श्री श्री चैतन्य चरितावली  159- भक्तों द्वारा आंवले के जल से धोये हुए और सुगन्धित तैलों से तर हुए ये बाल ही ही भूले-भट के अज्ञानी पुरुषों के हृदय में विद्वेष की अग्नि भभकाते हैं। मैं इन घुंघराले बालों को नष्‍ट कर दूंगा। शिखासूत्र का त्‍याग करके मै। वीतराग संन्‍यासी बनूँगा। मेरा हृदय अब संन्‍यासी होने के लिये पड़प रहा है। मुझे वर्तमान दशा में शांति नहीं, सच्‍चा सुख नहीं। मैं अब पूर्ण शांति और सच्‍चे सुख की खोज में संन्‍यासी बनकर द्वार-द्वार पर भटकूंगा। मैं अपरिग्रही संन्‍यासी बनकर सभी प्रकार के परिग्रहों का त्‍याग करूँगा। श्रीपाद! तुम स्वयं त्यागी हो, मेरे पूज्य हो, बड़े हो, मेरे इस काम में रोडे़ मत अटकाना।’ प्रभु की ऐसी बात सुनते ही नित्यानन्द जी अधीर हो गये। उन्हें शरीर का भी होश नहीं रहा। प्रेम के कारण उनके नेत्रों में से अश्रु बहने लगे। उनका गला भर आया। रुँधे हुए कण्‍ठ से उन्होंने रोते-रोते कहा- प्रभो! आप सर्वसमर्थ हैं, सब कुछ कर सकते हैं। मेरी क्या शक्ति है, जो आपके काम में रोडे़ अटका सकूं? किंतु प्रभो! ये भक्त आपके बिना कैसे जीवित रह सकेंगे? हाय! विष्‍णुप्रिया की क्या दशा होगी...

cc 158

श्री श्री चैतन्य चरितावली  158- समय के प्रभाव से आज कल तो सभी प्राचीन व्यवस्था नष्‍ट हो गयी; किंतु हम जब की बात कह रहे हैं उस समय ऐसी परिपाटी थी कि दण्‍डी संन्यासी किसी भी गृहस्थ के द्वार पर पहुँच जाय, वही गृहस्थ उठकर उनका सत्कार करता और उनसे श्रद्धा-भक्ति के सहित भिक्षा कर लेने के लिये प्रार्थना करता। दसनामी संन्यासियों में तीर्थ, सरस्वती और आश्रम- इन तीनों को दण्‍ड धारण करने का अधिकारी है। भारतीयों को भी दण्‍ड का अधिकार है, किंतु दण्‍डी सम्प्रदाय में उनका आधा दण्‍ड समझा जाता है। शेष गिरी, पुरी, वन, अरण्‍य तथा पर्वत आदि छ: प्रकार के संन्यासियों को दण्‍ड का अधिकार नहीं है।दण्‍ड ब्राह्मण ही ले सकता है। इसलिये दण्‍डी संन्यासी ब्राह्मण ही होते हैं। केशव भारती दण्‍डी ही संन्यासी थे। पीछे इनकी शिष्‍य-परम्परा में इनके उत्तराधिकारी गृहस्थी बन गये जो कटवा के समीप अब भी विद्यमान हैं। भारती को देखते ही प्रभु ने उठकर उनके चरणों में प्रणाम किया। भारती इनके शरीर में ऐसे अपूर्व प्रेम के लक्षणों को देखकर एकदम भौंचक्के-से रह गये। इनकी नम्रता, शालीनता और सुशीलता से प्रसन्न होकर भारती प्रेम में विभो...

cc 157

श्री श्री चैतन्य चरितावली  157- मन से त्याग करने का बहाना बनाकर जो विषयों के सेवन में लगे रहने पर भी अपने को पूर्ण भगवद्भक्त कहने का दावा करते हैं, उनसे हमें कुछ कहना नहीं है। हम तो उन लोगों से निवेदन करना चा‍हते हैं जो यथार्थ में भक्ति-पथ का अनुसरण करने के इच्छुक हैं। उनसे हम दृढ़ता के साथ कहते हैं, अपने पूर्वजन्म के प्रारब्धानुसार आप सर्वस्व त्यागकर संन्यासी न हो सकें, यह आपकी कमज़ोरी है। जैसी भी दशा में रहें, भक्ति तक पहुँचने के लिये प्रयत्न तो प्र‍त्येक दशा में कर सकते हैं, किंतु पूर्ण भक्त बनने के लिये मन से नहीं स्वरूप से भी त्याग करना ही होगा।सर्व-कर्म-फल-त्याग के साथ सर्व सांसारिक भोगों का त्याग भी अनिवार्य ही है। किंतु इसके विपरीत कुछ ऐसे भी भगवद्भक्त देखे गये हैं जो प्रवृत्ति मार्ग में रहते हुए भी पूर्ण भक्त हुए हैं। उन्हें अपवाद ही समझना चाहिये। सिद्धान्त तो यही है कि भगवद्भक्ति के लिये रूप, सनातन और रघुनाथदास की तरह अकिंचन बनकर घर-घर के टुकड़ों पर ही निर्वाह करके अहर्निश कृष्‍ण-कीर्तन करते रहना चाहिये। इसीलिये लोकमान्य तिलक ने भक्ति-मार्ग और ज्ञान-मार्ग दोनों को ही त्या...

cc 156

श्री श्री चैतन्य चरितावली  156- यदि उनका सचमुच में ऐसा ही व्यवहार रहा और अब से आगे किसी अन्य छात्र पर इस प्रकार प्रहार किया तब तुम लोगों को प्रहार का उत्तर प्रहार से देना चाहिये। अभी इतनी शीघ्रता नहीं करनी चाहिये।’ इस प्रकार उस समय तो छात्र शान्त हो गये। किंतु उनके प्रभु के प्रति विद्वेष के भाव बढ़ते ही गये। कुछ दुष्‍टबुद्धि के मायापुर-निवासी ब्राह्मण भी छात्रों के साथ मिल गये। इस प्रकार प्रभु के विरुद्ध एक प्रकार का बड़ा भारी दल ही बन गया। भावावेश के अनन्तर प्रभु को सभी बातें मालूम हुईं। इससे उन्हें अपार दु:ख हुआ। वे घर-बार तथा इष्‍ट-मित्र और अपने साथी भक्तो से पहले से ही उदासीन थे। इस घटना से उनकी उदासी और भी अधिक बढ़ गयी। अब उन्हें संकीर्तन के कारण फैली हुई अपनी देशव्यापी कीर्ति काटने के लिये दौड़ती हुई-सी दिखायी देने लगी। उन्हें घर-बार, कुटुम्ब-परिवार तथा धर्मपत्नी और माता से एकदम विराग हो गया। उनका मन-मधुप अब घिरी हुई सुगन्धित वाटिका को छोड़कर खुली वायु में स्वच्छन्दता के साथ जंगलों की कंटीली झाड़ियों के ऊपर विचरण करने के लिये उत्सुकता प्र‍कट करने लगा। वे जीवों के कल्याण के नि...

cc155

श्री श्री चैतन्य चरितावली  155- एक दिन महाप्रभु भावावेश में जोरों से ‘गोपी-गोपी’ कहकर रुदन कर रहे थे। वे गोपी-भाव में ऐसे विभोर हुए कि उनके मुख से ‘गोपी-गापी’ इस शब्द के अतिरिक्‍त कोई दूसरा शब्द निकलता ही नहीं था। उसी समय एक प्रतिष्ठित छात्र इनके समीप इनके दर्शन के लिये आये। वे महाप्रभु के साथ कुछ काल तक पड़े भी थे। वैसे तो शास्त्रीय विद्या में पूर्ण पारंगत पण्डित समझे जाते थे, किंतु भक्ति-भाव में कोरे थे। प्रेम-मार्ग का उन्हें पता नहीं था। प्रभु तो उस समय बाह्य-ज्ञान-शून्य थे, उन्हें भावावेश में पता ही नहीं था कि कौन हमारे पास आया और हमारे पास से उठ गया। उन विद्याभिमानी छात्र ने महाप्रभु की ऐसी अवस्था देखकर कुछ गर्वित भाव से कहा- ‘पण्डित होकर आप यह क्या अशास्त्रीय व्यवहार कर रहे हैं?’ ‘गोपी-गोपी’ कहने से क्या लाभ? कृष्‍ण-कृष्‍ण कहो, जिससे उद्धार हो और शास्त्र की मर्यादा भी भंग न हो।’ महाप्रभु को उस समय कुछ भी पता नहीं था कि यह कौन है। भावावेश में उन्होंने यही समझा कि यह भी कोई उद्धव के समान श्‍याम सुन्दर का सखा है और हमें धोखे में डालने के लिये आया है। इससे प्रभु को उसके ऊपर क्रोध...

cc 154

श्री श्री चैतन्य चरितावली  154- नवानुराग और गोपी-भाव…. महाप्रभु जब से गया से लौटकर आये थे, तभी से सदा प्रेम में छके-से, बाह्य-ज्ञानशून्य-से तथा बेसुध-से बने रहते थे! किंतु भक्तों के साथ संकीर्तन करने में उन्हें अ‍त्यधिक आनन्द आता। कीर्तन में वे सब कुछ भूल जाते। जहाँ उनके कानों में संकीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि सुनायी पड़ी कि उनका मन उन्मत्त होकर नृत्य करने लगता। संकीर्तन के वाद्यों को सुनते ही उनके रोम-रोम खिल जाते और वे भावावेश में आकर रात्रिभर अखण्‍ड नृत्य करते रहते। न शरीर की सुधि और न बाहरी जगत का बोध; बस, उनका शरीर यन्त्र की तरह घूमता रहता। इससे भ‍क्तों के भी आनन्द का पारावार नहीं रहता। वे भी प्रभु के सुखकारी मधुर नृत्य के साथ नाचने लगते। इस प्रकार बारह-तेरह महीने तक प्रभु बराबर भक्तों को लेकर कथा-कीर्तन में कालयापन करते रहे। काजी के उद्धार के अनन्तर प्रभु की प्रकृति में एकदम परिवर्तन दिखायी देने लगा। अब उनका चित्त संकीर्तन में नहीं लगता था। भक्त ही मिलकर कीर्तन किया करते थे। प्रभु संकीर्तन में सम्मिलित भी नहीं होते थे। कभी-कभी वैसे ही संकीर्तन के बीच में चले आते और कभी-कभी भक्तों...

cc 153

श्री श्री चैतन्य चरितावली  153- वे प्रेम की सजीव-साकार मूर्ति ही थे।शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी प्रभु के अनन्य भक्तों में से थे। वे कभी-कभी ऐसा अनुभव करते थे कि प्रभु की हमारे ऊपर जैसी होनी चाहिये वैसी कृपा नहीं है। उनके मनोगत भाव को समझकर प्रभु ने एक दिन उनसे कहा- ‘ब्रह्मचारी जी! कल हम तुम्हारें ही यहाँ भोजन करेंगे, हमारे लिये और श्रीपाद नित्यानन्द के लिये तुम ही कल भोजन बना रखना।’ ब्रह्मचारी जी को इस बात से हर्ष भी अत्यधिक हुआ और साथ ही दु:ख भी। हर्ष तो इसलिये हुआ कि प्रभु ने हमें भी अपनी सेवा का योग्य समझा और दु:ख इसलिये हुआ कि प्रभु कुलीन ब्राह्मण हैं, वे हमारे भिक्षुक के हाथ का भात कैसे खायेंगे? इसीलिये उन्होंने दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! हम तो भिक्षुक हैं, आपको भोजन कराने के योग्य नहीं हैं। नाथ! हम इतनी कृपा के सर्वथा अयोग्य हैं।’ प्रभु ने आग्रह के साथ कहा- ‘तुम चाहे मानो, चाहे मत मानो, हम तो कल तुम्हारे ही यहाँ खायेंगें। वैसे न दोगे, तो तुम्हारी थाली में से छीनकर खायेंगे।’ यह सुनकर ब्रह्मचारी जी बड़े असमंजस में पड़े। उन्होंने और भी दो-चार अन्तरंग भक्तों से इस सम्बन्ध में पूछा। भक्तों...

cc152

श्री श्री चैतन्य चरितावली  152- एक से दूसरे के कान में पहुँचती, जो भी सुनता, वही कीर्तन बंद करके चुप हो जाता। इस प्रकार धीरे-धीरे सभी भक्त चुप हो गये। ढोल-करताल आदि सभी वाद्य भी आप-से-आप ही बंद हो गये। प्रभु ने भी नृत्य बंद कर दिया। इस प्रकार कीर्तन को आप-से-आप ही बंद होते देखकर प्रभु श्रीवास की ओर देखते हुए कुछ कहने लगे- ‘पण्डित जी! आपके घर में कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी है? न जाने क्यों हमारा मन संकीर्तन में नहीं लग रहा है। हृदय में एक प्रकार की खलबली-सी हो रही है।’ अत्यन्त ही दीनभाव से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! जहाँ आप संकीर्तन कर रहे हों, वहाँ कोई दुर्घटना हो ही कैसे सकती है? सम्पूर्ण दुर्घटनाओं के निवारणकर्ता तो आप ही हैं। आप के सम्मुख भला दुर्घटना आ ही कैसे सकती है? आप तो मंगलस्वरूप है। आप की उपस्थिति में तो परम मंगल-ही-मंगल होने चाहिये।’ प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- ‘नहीं, ठीक बताइये। मेरा मन व्याकुल हो रहा है। हृदय आप-से-आप ही निकल पड़ना चाहता है। अवश्‍य की कोई दुर्घटना घटित हो गयी है।’ प्रभु के इस प्रकार दृढ़ता के साथ पूछने पर श्रीवास चुप हो गये, उन्होंने कुछ भी उत्तर...

cc 151

श्री श्री चैतन्य चरितावली  151- एक दिन संकीर्तन के समय मेघ आने लगे। आकाश में बड़े-बड़े़ बादल आकर चारों ओर घिर गये। असमय में आकाश को मेघाच्छन्न देखकर भक्त कुछ भयभीत-से हुए। उन्होंने समझा सम्भव है, मेघ हमारे इस संकीर्तन के आनन्द में विघ्‍न उपस्थित करें। प्रभु ने भक्तों को समझकर उसी समय एक हुंकार मारी। प्रभु के हुंकार सुनते ही मेघ इधर-उधर हट गये और आ‍काश बिलकुल साफ हो गया। अब एक घटना ऐसी है, जिसे सुनकर सभी संसारी प्राणी क्या अच्छे-अच्छे परमार्थ-मार्ग के पथिक भी आश्चर्य चकित हो जायँगे। इस घटना से पाठकों को पता चल जाएगा कि भगवद्भक्ति में कितना माधुर्य है। जिसे भगवत्कृपा का अनुभव होने लगा है, ऐसे अनन्य भक्त के लिये माता-पिता, दारा-पुत्र तथा अन्यान्य सभी बन्धु-बान्धवों के प्रति तनिक भी मोह नहीं रह जाता। वह अपने इष्‍टदेव को ही सर्वस्व समझता है! इष्‍टदेव की प्रसन्नता में ही उसे प्रसन्नता है, वह अपने आराध्‍यदेव की प्रसन्नता के निमित्त सबका त्याग कर स‍कता है। दुष्‍कर-से-दुष्‍कर समझे जाने वाले कार्य को प्रसन्नतापूर्वक कर सकता है। एक दिन सभी भक्त मिलकर श्रीवास के आंगन में प्रेम के सहित संकीर्तन...

cc150

श्री श्री चैतन्य चरितावली  150- इस प्रकार संकीर्तन करते हुए प्रभु केला खोल वाले श्रीधर भक्त के घर के सामने पहुँचे। भक्त-वत्सल प्रभु उस अकिंचन दीन-हीन भक्त के घर में घुस गये। गरीब भक्त एक ओर बैठा हुआ भगवान के सुमधुर नामों का उच्च स्वर से गायन कर रहा था। प्रभु को देखते ही वह मारे प्रेम के पुलकित हो उठा और जल्दी से प्रभु के पाद-पद्मों में गिर पड़ा।श्रीधर को अपने पैरों के पास पड़ा देखकर प्रभु उससे प्रेमपूर्वक कहने लगे- ‘श्रीधर! हम तुम्हारे घर आये हैं, कुछ खिलाओगे नहीं?’ बेचारा गरीब-कंगाल सोचने लगा ‘हाय! प्रभु तो ऐसे असमय में पधारे है कि इस दीन-हीन कंगाल के घर में दो मुट्ठी चबेना भी नहीं। अब प्रभु को क्या खिलाऊं।’ भक्त यह सोच ही रहा था कि उसके पास के ही फूटे लोहे के पात्र में रखे हुए पानी को उठाकर प्रभु कहने लगे- ‘श्रीधर! तुम सोच क्या रहे हो। देखते नहीं हो, अमृत भरकर तो तुमने इस पात्र में ही रख रखा है।’ यह कहते-कहते प्रभु उस समस्त जल को पान कर गये। श्रीधर रो-रोकर कह रहा था- ‘प्रभो! यह जल आपके योग्य नहीं है, नाथ! इस फूटे पात्र का जल अशुद्ध है।’ किंतु प्रभु कब सुनने वाले थे। उनके लिये भक्...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  149- कहना कि आपको उन्होंने बुलाया है, आपके साथ कोई भी अभद्र व्यवहार नहीं कर सकता, आप थोड़ी देर को बाहर चलें।’ प्रभु की बात सुनकर क़ाज़ी के सेवक घर में घिपे हुए क़ाज़ी के पास गये और प्रभु ने जो-जो बातें कही थीं, वे सभी जाकर क़ाज़ी से कह दीं। प्रभु के ऐसे आश्‍वासन को सुनकर और इतनी अपार भीड़ को चुपचाप शान्त देखकर क़ाज़ी बाहर निकला। प्रभु पे भक्तों के सहित क़ाज़ी का अभ्‍यर्थना की और प्रेमपुर्वक उसे अपने पास बिठाया। प्रभु ने कुछ हंसते हुए प्रेम के स्वर में कहा- ‘क्यों जी, यह कहाँ की रीति है कि हम तो आपके द्वार पर अतिथि होकर आये हैं और आप हमें देखकर घर में जा छिपे!’ काजी ने कुछ लज्जित होकर विनीत भाव से प्रेम के स्वर में कहा- ‘मेरा सौभाग्य, जो आप मेरे घर पर पधारे! मैंने समझा था, आप क्रोधित होकर मेरे यहाँ आ रहे हैं, इसीलिये क्रोधित अवस्था में आपके सम्मुख होना ठीक नहीं समझा।’ प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘क्रोध करने की क्या बात थी? आप तो यहाँ के शासक हैं, मैं आपके ऊपर क्रोध क्यों करने लगा?’ यह बात हम पहले ही बता चुके हैं कि शचीदेवी के पूज्‍य पिता तथा महाप्रभु के नाना न...