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श्री श्री चैतन्य चरितावली 168- मुझे संसार-दु:खों से मुक्त कीजिये। मेरा संसारी-बन्धन छिन्न-भिन्न करके मुझे संन्यासी बना दीजिये। यही मेरी आपके श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना है।’ भारती जी को पिछली बातें स्मरण हो आयीं। निमाई का नाम सुनकर उन्होंने उनका आलिंगन किया और मन-ही-मन सोचने लगे- ‘हाय! इन पण्डित का कैसा सुवर्ण के समान सुन्दर शरीर, कैसा अलौकिक रूप-लावण्य, प्रभु के प्रति कितना प्रगाढ़ प्रेम और कितनी भारी विद्वत्ता है, फिर भी ये मेरे पास संन्यास-दीक्षा लेने आये हैं! इन्हें मैं संन्यासी कैसे बना सकूँगा? घर में असहाया वृद्धा माता है, उसकी यही एकमात्र सन्तान है। परम रूपवती युवती स्त्री इनके घर में है, उसके कोई सन्तान भी नहीं, जिससे आगे के लिये वंश चल सके। ऐसी दशा में भी ये संन्यास लेने आये हैं; क्या इन्हें संन्यास की दीक्षा देकर मैं पाप का भागी न बनूंगा?’ यह सोचकर भारतीजी कहने लगे- ‘निमाई पण्डित! तुम स्वयं बुद्धिमान हो, शास्त्रों का मर्म तुमसे अविदित नहीं है। युवावस्था में विषय-भोगों से भलीभाँति उपरति नहीं होती, इसलिये इस अवस्था में संन्यास-धर्म ग्रहण करना निषेध है। पचास वर्ष की अवस...