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Showing posts from July, 2023

314

श्री श्री चैतन्य चरितावली  314- रघुनाथ जी बड़े ही संकोची थे, वे प्रभु के सामने कभी भी अपने मुँह से कोई बात नहीं निकालते थे। उनकी ओर कभी आँखें उठाकर देखते नहीं थे, जो कुछ कहलाना होता, उसे या तो स्‍वरूप गोस्‍वामी द्वारा कहलाते या गोविन्‍द के द्वारा। स्‍वयं वे सम्‍मुख होकर कोई बात नहीं पूछते थे। एक दिन महाप्रभु स्‍वरूप गोस्‍वामी के साथ कथा-वार्ता कर रहे थे, उसी समय रघुनाथदास जी ने आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और फिर स्‍वरूप गोस्‍वामी की वन्‍दना करके चुपचाप पीछे को एक ओर बैठ गये। प्रभु ने हंसते हुए कहा- 'तुम्‍हारा यह रघु तो बड़ा ही संकोची है, हमसे बोलता ही नहीं। हमें पता भी नहीं क्‍या करता रहता है। तुमसे तो सब बातें कहता होगा, तुम्‍हीं इसकी बातें बताओ।’ एक घुटने को खड़ा करके उससे अपने दायें कपोल को सटाकर नीची दृष्टि किये हुए रघुनाथ जी चुपचाप बैठे थे। अपने ही सम्‍बन्‍ध का प्रसंग छिड़ने पर वे और भी अधिक संकुचित से बन गये।संकोच के कारण वे अपने अंगों में समा जाना चाहते थे। स्‍वरूप गोस्‍वामी ने धीरे-धीरे कहा- 'रघु बड़ा पुरुषार्थ करता है। आपसे बातें कहने में इसे संकोच होता है। कल म...

313

श्री श्री चैतन्य चरितावली  313- इसी सम्‍बन्‍ध से ये दोनों भी हमें अपना देवता करके ही मानते हैं। घोर संसारी हैं।वैसे साधु-वैष्‍णवों की श्रद्धा के साथ सेवा भी करते हैं, किन्‍तु उनके लिये धन-सम्‍पत्ति ही सर्वश्रेष्‍ठ वस्‍तु है। वे परमार्थ से बहुत दूर हैं। रघुनाथ के ऊपर भगवान ने परम कृपा की, जो इसे उस अन्‍धकूप से निकालकर यहाँ ले आये। रघुनाथदास जी ने धीरे-धीरे कहा-'मैं तो इसे श्रीचरणों की ही कृपा समझता हूँ, मेरे लिये तो ये ही युगलचरण सर्वस्‍व हैं।'  महाप्रभु ने स्‍नेह के स्‍वर में स्‍वरूप गोस्‍वामी से कहा-'रघुनाथ को आज से मैं तुम्‍हें ही सौंपता हूँ। तुम्‍हीं आज से इनके पिता, माता, भाई, गुरु और सखा सब कुछ हो। आज से मैं इस 'स्‍वरूप का रघु' कहा करूंगा।'  यह कहकर प्रभु ने रघुनाथदास जी का हाथ पकड़कर स्‍वरूप के हाथ में दे दिया। रघुनाथदास जी ने फिर से स्‍वरूप दामोदर जी के चरणों में प्रणाम किया और स्‍वरूप गोस्‍वामी ने भी उन्‍हें आलिंगन किया। उसी समय गोविन्‍द ने धीरे से रघुनाथ को बुलाकर कहा-'रास्‍ते में न जाने कहाँ पर कब खाने को मिला होगा, थोड़ा प्रसाद पा लो।'  रघुनाथ...

309

श्री श्री चैतन्य चरितावली  309- प्रभु ने फिर उसी स्‍वर में कहा- 'इसे मेरे शरीर की इतनी चिन्‍ता क्‍यों? यह शरीर ही सब कुछ समझता है। इसे वैष्‍णवों के माहात्‍म्‍य का पता नहीं। सनातन जी के शरीर को यह अन्‍य साधारण लोगों के शरीर के समान समझता है। इसे पता नहीं, सनातन जी का शरीर चिन्‍मय है। उसे खुजली और कुष्‍ठ कहाँ? यह तो उन्‍होंने मेरे प्रेम की परीक्षा के निमित्त अपने शरीर में उत्‍पन्‍न कर ली है कि मैं घृणा करके इनके शरीर को स्‍पर्श न करूँ। कोई भाग्‍यवान पुरुष सनातन जी के शरीर को सूँघे तो सही, उसमें से दिव्‍य सुगन्‍ध निकलती रहती है। मैं कुछ सनातन जी के ऊपर कृपा करने के निमित्त उनका आलिंगन थोड़े ही करता हूँ, मैं तो उनके शरीर-स्‍पर्श से अपने देह को पावन बनाता हूँ।' प्रभु के मुख से अपनी इतनी भारी प्रशंसा सुनकर सनातन जी रोते-रोते कहने लगे- 'प्रभो! मैंने ऐसा कौन-सा घोर अपराध किया है, मेरे किन जन्‍मों के अनन्‍त पाप आज आकर उदय हुए हैं, जो आप मुझे यह प्रशंसारूपी हलाहल विष पिला रहे हैं। जगदानन्‍द जी का आज भाग्‍य उदय हुआ।आज त्रिलोकी में इनसे बढ़कर भाग्‍यवान कौन होगा, जिनकी वात्‍सल्‍य स्‍नेह...

308

श्री श्री चैतन्य चरितावली  308- दूसरे समुद्र के किनारे-किनारे भी यमेश्वर जा सकते हैं। ज्‍येष्‍ठ की प्रखर धूप के कारण समुद्र-किनारे की बालू जल रही थी। यदि उसमें कच्‍चा चना डाल दिया जाय तो क्षणभर में भुनकर खिल जाये। उस बालू में मनुष्‍य की तो बात ही क्‍या, बारह बजे पशु भी जाने में हिचकता हैं, किन्‍तु जब सनातन जी ने सुना कि प्रभु ने मुझे बुलाया है, तब तो ये अपने भाग्‍य की सराहना करते हुए उसी बालुकामय पथ से नंगे पैरों ही प्रभु के समीप पहुँचे।शरीर को सर्दी-गर्मी का सुख-दु:ख व्‍यपता ही है। सनातन जी के पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गये। प्रभु ने उन्‍हें देखते ही पूछा- 'अरे! तुम इतनी धूप में किधर होकर आये हो?' सरलता के साथ सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! समुद्र तट के रास्‍ते से ही आया हूँ।' प्रभु ने उनके पैरों के छालों को देखते हुए कहा- 'देखे, नंगे पैरों तप्‍त बालू में आने से तुम्‍हारे पैरों में छाले पड़ गये। तुम सिंहद्वार के रास्‍ते होकर क्‍यों नहीं आये?' सनातन जी ने दीनता के साथ कहा- प्रभो! सिंहद्वार होकर श्री जगन्‍नाथ जी के सेवक तथा दर्शनार्थी आते-जाते रहते है, उनसे कहीं भूल ...

307

श्री श्री चैतन्य चरितावली  307- तिस पर भी मेरे सम्‍पूर्ण शरीर में खाज हो रही है।आप मेरा स्‍पर्श न करें।'  किन्‍तु प्रभु कब सुनने वाले थे। जल्‍दी से दौड़कर उन्‍होंने बलपूर्वक सनातन जी को पकड़ लिया और उनका गाढ़ालिंगन करते हुए वे कहने लगे- 'आज हम कृतार्थ हो गये। सनातन के शरीर की सुन्‍दर सुगन्ध को सूंघकर हमारे लोक-परलोक दोनों ही सुधर गये।' सचमुच प्रभु ने सनातन जी के दिव्‍य शरीर में की खाज मे से एक प्रकार की दिव्‍य सुगन्धित का अनुभव किया। सनातन जी संकोच के कारण किंकर्तव्‍यविमूढ़ हो ये। महाप्रभु की अपार अनुकम्‍पा के भार से दबे हुए वे विवश होकर पृथ्‍वी की ओर दखने लगे। महाप्रभु की अहैतु की कृपा के स्‍मरण से उनका हृदय पिघल रहा था और वह पानी बन-बनकर आँखों के द्वारा निकल कर प्रभु के काषाय रंग वाले वस्‍त्रों को भिगो रहा था।थोड़ी देर के अनन्‍तर प्रभु वहीं एक आसन पर बैठ गये। नीचे सिर किये हुए भूमि पर सनातन जी और हरिदास जी बैठ गये। प्रभु ने धीरे-धीरे रूप के आने का और उनके मिलने आदि का सभी वृत्तान्‍त सुना दिया।इसी प्रसंग में प्रभु ने श्री अनूप के परलोकगमन का समाचार भी सुना दिया। भाई के वैक...

312

श्री श्री चैतन्य चरितावली  312- रघुनाथजी ने नित्यानंद जी से कह दिया कि हम चले जायँ, तब प्रभु के समक्ष यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पाँच, बीस या पचास रुपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवंदना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रुपये और दो तौला सोना दे गये। इस प्रकार यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये। श्री रघुनाथदास जी का गृह त्‍याग….. श्री रघुनाथदास जी शरीर से तो लौट आये, किंतु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सुझता ही नही था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किंतु वे सबके साथ प्रकटरूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे?  इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। समय आने पर प्रारब्ध सभी सुरोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनंदन जी उनके पास आये।उन्‍हें देखते ...

311

श्री श्री चैतन्य चरितावली  311- वे चैतन्‍य प्रेम में पागल बने अपने सैकड़ों भक्‍तों को साथ लिये इधर-उधर घूम रहे थे। उनके उद्दण्‍ड नृत्‍य को देखकर लोग आश्‍चर्यचकित हो जाते, चारों ओर उनके यश और कीर्ति की धूम मच गयी। हजारों, लाखों मनुष्‍य नित्‍यानन्‍द प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे।उन दिनों गौड़ देश में 'निताई' के नाम की धूम थी। अच्‍छे-अच्‍छे सेठ-साहूकार और भूम्‍यधिपति इनके चरणों में आकर लोटते और ये उनके मस्‍तकों पर निर्भय होकर अपना चरण रखते, वे कृतकृत्‍य होकर लौट जाते। लाखों रूपये भेंट में आने लगे।नित्‍यानन्‍द जी खूब उदारतापूर्वक उन्‍हें भक्‍तों में बांटने लगे और सत्‍कर्मों में द्रव्‍य को व्‍यय करने लगे। पानीहाटी संकीर्तन का प्रधान केन्‍द्र बना हुआ था। वहाँ के राघव पण्डित महाप्रभु तथा नित्‍यानन्‍द जी के अनन्‍य भक्‍त थे। नित्‍यानन्‍द जी उन्‍हीं के यहाँ अधिक ठहरते थे। रघुनाथ जी जब नित्‍यानन्‍द जी का समाचार सुना तो वे पिता की अनुमति लेकर बीसों सेवकों के साथ पानीहाटी में उनके दर्शनों के लिये चल पड़े। उन्‍होंने दूर से ही गंगा जी के किनारे बहुत-से भक्‍तों से घिरे हुए देवराज इन्‍द्र के...

310

श्री श्री चैतन्य चरितावली  310- रघुनाथजी को अपने पिता और भाई का क्‍या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे।इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्‍हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्‍टा करता, बुद्धिमान और प्रत्‍युत्‍पन्‍नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- 'ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी न किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।' ऐसा निश्‍चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्‍हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्‍होंने स्‍वाभाविक स्‍नेह दर्शाते हुए अत्‍यन्‍त ही कोमल स्‍वर से कहा- 'चौधरी जी! आप मुझे क्‍यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप तीनों भाई-भाई हैं।मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ। आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्‍यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।' गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्‍नेह और सरलता के ऐसे शब्‍द सु...

306

श्री श्री चैतन्य चरितावली  306- ऐसे स्‍वाभाविक गुणपूर्ण श्‍लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।'  इतना कहर राय ने 'विदग्‍धमाधव'- के अन्‍य भी बहुत-से स्‍थलों को सुना और सुनकर उनके काव्‍य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'विदग्‍धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्‍द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्‍तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्‍लोक पढ़ने लगे-  ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‎ ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‎ ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌...

305

श्री श्री चैतन्य चरितावली  305- श्री सत्यभामा जी ने कहा कि तुम हमारी लीलाओं का पृथक ही वर्णन करो। व्रज की लीलाओं के साथ हमारा वर्णन मत करो। श्री सत्‍यभामा जी का आदेश पाकर आपने उसी समय द्वारा की लीलाओं का पृथक वर्णन करने का निश्‍चय किया और उसका वर्णन उन्‍होंने 'ललितमाधव' नामक नाटक में किया। उसी समय 'विदग्‍धमाधव' और ललितमाधव' इन दोनों नामों की उत्‍पत्ति हुई। नीलाचल में पहुँचकर ये (श्रीरूप जी) प्रभु के समीप नहीं गये। ये दोनों ही भाई नम्रता की तो सजीव मूर्ति ही थे, यवनों के संसर्ग में रहने के कारण ये अपने को अत्‍यन्‍त ही नीच समझते थे और यहाँ तक कि मन्दिर में घुसकर दर्शन भी नहीं करते थे, दूर से ही जगन्‍नाथ जी की ध्‍वजा को प्रणाम कर लेते थे।इसलिये रूप जी महात्‍मा हरिदास जी  के स्‍थान पर जाकर ठहरे। हरिदास जी तो जाति के यवन थे, किन्‍तु गौर भक्‍त उनका चतुर्वेदी ब्राह्मणों से भी अधिक सम्‍मान करते थे, वे भी जगन्‍नाथ जी के मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे, यहाँ तक कि जिस रास्‍ते से मन्दिर के पुजारी और सेवक जाते थे, उस रास्‍ते से भी कभी नही निकलते थे। प्रभु नित्‍य प्रति समुद्रस्‍न...

304

श्री श्री चैतन्य चरितावली  304- प्रभु का आलिंगन पाते ही वह प्रेम में उन्‍मत्त होकर 'हरि हरि' कहकर नृत्‍य करने लगा उस समय उसकी दशा बड़ी ही विचित्र हो गयी थी।उसके शरीर में सात्त्विक भाव उदय होने लगे। इस प्रकार प्रभु उस बालक को प्रेमदान देकर आगे बढ़े। कई दिनों के पश्‍चात प्रभु पुरी के समीप पहुँच गये। दूर से ही उन्‍हें श्री जगन्‍नाथ जी की पताका दिखायी दी। श्री मन्दिर की पताका दर्शन होती ही प्रभु ने भूमि में लोटकर जगन्‍नाथ जी की फहराती हुई विशाल पताका को प्रणाम किया और वे अठारह नाला पर पहुँचे, अठारह नाला पर पहुँचकर आपने भक्‍तो को खबर देने के निमित्त बलभद्र भट्टाचार्य को भेजा और आप वहीं थोड़ी देर तक बैठकर रास्‍त की थकान मिटाने लगे। प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन…. शिवानन्‍द सेन के साथ उनका कुत्ता भी सब जगह उनके साथ चलता। उन्‍होंने उसे बहुत रोका, किन्‍तु वह किसी प्रकार भी न रुका, तब सेन महाशय उसे भोजन कराते हुए भी साथ ही साथ ले चलते। रास्‍ते में घाट वाले कुत्‍ते को पार उतारने में कई जगह आपत्ति भी करते, किन्‍तु सेन महाशय प्रचुर द्रव्‍य देकर उसे जिस किसी भाँति उसे पार करा ही ले ज...

303

श्री श्री चैतन्य चरितावली  303- बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आने-जाने लगे। बहुत-से वेदान्‍ती पण्डित प्रभु को शास्‍त्रार्थ के लिये ललकारते। प्रभु नम्रता पूर्वक कह देते- 'मैं शास्‍त्रार्थ क्‍या जानूँ? जिन्‍हें, शास्‍त्रों के वाक्‍यों के ही बाल की खाल निकालनी हो वे निकालते रहें, मैंने तो सभी शास्‍त्रों का सार यही समझा है कि सब समय, सर्वत्र, सदा भगवान नारायण का ही ध्‍यान करना चाहिये। जो आस्तिक पुरुष मेरी इस बात का खण्‍डन करें, वह मेरे सामने आवें। प्रभु के इस उत्‍तर को सुनकर सभी चुप हो जाते और अपना सा मुख लेकर लौट जाते। बहुत भीड़-भाड़ और लोगों के गमनागमन से प्रभु का चित्त ऊब सा गया। प्रभु को बहुत बातें करना प्रिय नहीं था। वे श्रीकृष्‍ण कथा के अतिरिक्त एक शब्‍द सुनना भी नहीं चाहते थे।संसारी लोगों के सम्‍पर्क से सांसारिक बातें छिड़ ही जाती हैं, यह बात प्रभु को पसंद नहीं थी। इसीलिये उन्‍होंने ही पुरी जाने का निश्‍चत कर लिया। प्रभु के निश्‍चय को समझकर दीन भाव से हाथ जोड़े हुए श्री सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! मेरे लिये क्‍या आज्ञा होती है?' प्रभु ने कहा- 'तुम भी अपने भाई के...

302

श्री श्री चैतन्य चरितावली  302- सम्‍बन्‍ध पाँच ही प्रकार से हो सकता है- अशं-अंशी-सम्‍बन्‍ध, स्‍वामी-सेवक-सम्‍बन्‍ध, सख्‍त-सम्‍बन्‍ध, पिता-पुत्र का सम्‍बन्‍ध और पति-पत्‍नी का सम्‍बन्‍ध।इन्‍हें ही क्रम से शान्‍त, दास्‍य, सख्‍य, वात्‍सल्‍य और कान्‍ताभाव कहते हैं। इनमें से भगवान के साथ कोई भी सम्‍बन्‍ध स्‍थापित हो जाने पर फिर वे दूसरे नहीं रहते। अपने ही हो जाते हैं, द्वैत न रहकर अद्वैत बन जाते हैं।  शान्‍तभाव में ऐश्‍वर्य की भावना रहने से कुछ अद्वैत का अंश शेष रह जाता है। दास्यभाव में निरन्तर सेवक की भावना रखने से शांत की अपेक्षा कुछ द्वैतभाव कम हो जाता है, शख्य दास की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है, किन्‍तु कुछ द्वैत तो सख्‍य में भी बना ही रहता है। सखा अपने सखा से यह इच्‍छा तो रखता ही है कि यह भी हमसे स्‍नहे करें।सख्‍य की अपेक्षा वात्‍सल्‍य भाव में द्वैत बहुत ही कम हो जाता है क्‍योंकि असली पिता अपने में और पुत्र में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं समझता। पुत्र पिता का आत्‍मा ही है किन्‍तु फिर भी द्वैधी भाव समूल नष्‍ट नहीं होता।लालन-पालन जन्‍य कुछ सूक्ष्‍म द्वैतांश शेष रह ही जाता है। हाँ, क...

301

श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली  301- जो ज्ञान अभिमान में अच्‍युत का आश्रय त्‍याग देते हैं उनका अवश्‍य ही अध: पतन हो जाता है। आपने तो अपने जीवन से भक्ति का माहात्‍म्‍य प्रकट किया है। भगवन! आपके चरणों में मेरा कोटि-कोट प्रणाम है। मैं तो आपको बहुत ही श्रेष्‍ठ समझता हूँ।' इस प्रकार बहुत देर तक बातें होती रहीं। महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन स्‍वामी जी से विदा लेकर अपने घर चले गये। दूसरे दिन इस सुखद संवाद को सुनाने के लिये प्रभु के पास आ रहे थे कि उन्‍हें रास्‍तें में ही गंगा स्‍नान करके लौटते हुए प्रभु मिल गये। जल्‍दी में उन्‍होंने प्रणाम करके कहा- 'प्रभो! 'प्रभो! महान आश्‍चर्य की बात! आपकी माया अपार है।प्रभो! ओहो! जो आपकी इतनी भारी निन्‍दा किया करते थे; वे वेदान्‍त-शिरोमणि श्री मत्‍प्रकाशानन्‍द अब बालकों की भाँति रो रहे हैं। अब उन्‍हें वेदान्‍त चिन्‍तन, शास्‍त्रों का पठन-पाठन कुछ भी नहीं भाता है, अब वे निरन्‍तर श्री चैतन्‍यचरणों का ही चिन्‍तन करते हैं।' इस संवाद को सुनते ही प्रभु उछलने लगे और परम प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहने लगे- 'भगवान बड़े दयालु हैं, उन्‍होंने पूज्‍यपाद प्रक...

299

श्री श्री चैतन्य चरितावली  299- प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'सूत्रों के अर्थ का अनर्थ करने में कौन-सा लोककल्‍याण है?'  प्रभु ने धीरे से कहा- 'भगवन! अर्थ कैसा और अनर्थ कैसा? ये तो सब बुद्धि के विकार हैं। असली पदार्थ कहीं शब्‍दों द्वारा व्‍यक्‍त किया जा सकता है या उसकी सिद्धि तर्क के द्वारा की जा सकती है? असली पदार्थ तो अनुभवगम्‍य हैं। किसी पद का कुछ अर्थ लगा लें, सभी ठीक हैं।अर्थ लगाने में बुद्धिचातुर्य के सिवा और है ही क्‍या? अर्थ, लगाना, व्‍याख्‍यान करना, भाष्‍य और पुस्‍तकों की रचना करना यह सब लौकिकी बुद्धि का काम है, इससे मुक्ति थोड़े ही मिल सकती है? केवल लोगों का मनोरंजन करना है।' प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'हां, यह बताओ कि भगवन शंकर ने क्‍या सोचकर जगत को एकदम उड़ा दिया और निर्विशेष ब्रह्म को ही परमसाध्‍य तत्त्व माना?’ प्रभु ने धीरे-धीरे मधुर स्‍वर में कहा- 'भगवन! शंका या तर्क का होना अज्ञान या पूर्व जन्‍म कृत पापों का फल है। वे महाभाग पुरुष धन्‍य हैं जिन्‍हें ईश्वर के अस्तित्त्व में किसी प्रकार की शंका ही नहीं उठती। वे ईश्‍वर को सर्वशक्मिान और सर्वान्‍तर्यामी और चर...

300

श्री श्री चैतन्य चरितावली  300- हे प्रभो! संसार तापों से सन्‍तप्‍त हुआ मैं आपकी शरण आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें। यह सच्‍चे हृदय की आावाज है।' प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'यथार्थ में तो यह जगत असत्‍य ही है ओर जीव ही ब्रह्म है किन्‍तु जो लोग इसे नहीं समझते और असत्‍य जगत को ही सत्‍य समझते हैं, उनके लिये जैसे भगवान शंकर ने संसार की व्‍यावहारिक सत्‍ता मानी है, उसी प्रकार यह व्‍यावहारिक प्रार्थना है।वैसे तो मुक्ति ही जीव का चरम लक्ष्‍य है और भ्रम दूर होते ही इस अज्ञान का नाश हो जाता है और अज्ञान के नाश होते ही जीव ब्रह्मस्‍वरूप हो जाता है। हो क्‍या जाता है उसे अपने असली स्‍वरूप का बोध हो जाता है।' प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही नम्रता के साथ कहा- 'भगवन! आप ज्ञानी हैं, पण्डित हैं, शास्‍त्रज्ञ हैं, हम सबके गुरु हैं। आपके सामने मैं कह ही क्‍या सकता हूँ? किन्‍तु मैं फिर कहूँगा, यह हृदय की बात नहीं है। विचारों का परिष्‍कृत स्‍वरूप है, भगवन! प्रेम ही ब्रह्म का सच्‍चा स्‍वरूप है। प्रेम की उपलब्धि ही जीव का चरम लक्ष्‍य है। वह करने की चीज नहीं।उसका गान वाणी से नहीं, हृदय से होता है, वह कहा नहीं जा...

298

श्री श्री चैतन्य चरितावली  298- प्रकाशानन्‍द जी ने कुछ रुक-रूककर कहा –‘एक बात पूछना चाहता हूँ, तुम बुरा न मानो तो पूछूं। प्रभु ने दीनता के स्वर में कहा – ‘आप कैसी बात कर रहे हैं, आप तो मेरे हितकी ही बात पूछेंगे। आप तो गुरुजन हैं, सदा कल्‍याण ही चाहेंगे।’ प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- ‘हाँ, मैं यह पूछना चाहता हूँ कि संन्‍यासी का मुख्‍य धर्म है कि वह भिक्षा पर निर्वाह करता हुआ सदा वेदान्‍तचिन्‍तन करता रहे। युक्ति से, शास्‍त्र प्रमाण से, आप्‍त पुरुषों के वाक्‍यों द्वारा इस सत्‍य से प्रतीत होने वाले जगत की सदा निस्‍सारता ही को सोचता रहे। तुम वेदान्‍ता का चिन्‍तन छोड़कर यह हरि नामस्‍मरण क्‍यों कर रहे हो? प्रभु ने नम्रता के साथ कहा- ‘भगवन! मेरे गुरुदेव ने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया है। उन्‍होंने मुझे वेदान्‍त शास्‍त्र का अनधिकारी समझकर इसी मन्‍त्र का उपदेश दिया और आज्ञा की कि इसी का जप किया करो। उन्‍होंने कहा था- कलियुग में और कोई सुगम साधन ही नहीं- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।  कलौ नास्‍त्‍येव नास्‍त्‍येव गतिरन्‍यथा। इसीलिये मैं दिन-रात्रि इसी का जप करने लगा। निरन्‍तर के जप से या इसी...

296

श्री श्री चैतन्य चरितावली  296- इस कारण अपने को प्रसिद्ध पण्डित और प्रतिष्ठित समझने वाले दण्‍डी संन्‍यासी प्रकाशानन्‍द जी प्रभु के निवास स्‍थान से प्रकाशानन्‍द जी का मठ कोई बहुत दूर नहीं था। उनका मठ भी बिन्‍दुमाधव के समीप ही था और प्रभु भी उधर ही तपन मिश्र के यहाँ ठहरे हुए थे।प्रभु ने स्‍वयं उनके पास जाने की आवश्‍यकता नहीं समझी, क्‍योंकि महाप्रभु बड़े ही संकोची थे। बड़ों के सामने बोलने में उन्‍हें बहुत संकोच होता था। इसलिये उन्‍होंने सोचा उनके पास जायंगे तो कुछ-न-कुछ वाद-विवाद छिड़ ही जायगा। इसलिये वे भी उनके पास नहीं गये और दस-बारह दिन ठहरकर श्री वृन्‍दावन को चले गये। वृन्‍दावन से लौटकर प्रभु दो महीनों तक काशी में रहे। इस प्रवास में प्रभु बहुत ही साधारण संन्‍यासी की तरह रहते थे। वे न तो कहीं बाहर भिक्षा के लिये जाते थे और न संन्‍यासियों के दर्शनों को जाते। केवल चन्‍द्रशेखर के घर से गंगा स्‍नान को और विश्‍वनाथ जी के दर्शनों को जाते और तपन मिश्र के घर भिक्षा करके वहीं भगवन्‍नाम-संकीर्तन ओर जप करते रहते।इसलिये उनके दो-चार अन्‍तरंग भक्‍तों को छोड़कर प्रभु की महिमा किसी पर प्रकट नहीं ह...