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श्री श्री चैतन्य चरितावली 314- रघुनाथ जी बड़े ही संकोची थे, वे प्रभु के सामने कभी भी अपने मुँह से कोई बात नहीं निकालते थे। उनकी ओर कभी आँखें उठाकर देखते नहीं थे, जो कुछ कहलाना होता, उसे या तो स्वरूप गोस्वामी द्वारा कहलाते या गोविन्द के द्वारा। स्वयं वे सम्मुख होकर कोई बात नहीं पूछते थे। एक दिन महाप्रभु स्वरूप गोस्वामी के साथ कथा-वार्ता कर रहे थे, उसी समय रघुनाथदास जी ने आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और फिर स्वरूप गोस्वामी की वन्दना करके चुपचाप पीछे को एक ओर बैठ गये। प्रभु ने हंसते हुए कहा- 'तुम्हारा यह रघु तो बड़ा ही संकोची है, हमसे बोलता ही नहीं। हमें पता भी नहीं क्या करता रहता है। तुमसे तो सब बातें कहता होगा, तुम्हीं इसकी बातें बताओ।’ एक घुटने को खड़ा करके उससे अपने दायें कपोल को सटाकर नीची दृष्टि किये हुए रघुनाथ जी चुपचाप बैठे थे। अपने ही सम्बन्ध का प्रसंग छिड़ने पर वे और भी अधिक संकुचित से बन गये।संकोच के कारण वे अपने अंगों में समा जाना चाहते थे। स्वरूप गोस्वामी ने धीरे-धीरे कहा- 'रघु बड़ा पुरुषार्थ करता है। आपसे बातें कहने में इसे संकोच होता है। कल म...