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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इसलिये इनके इस समय का यह सुदीप्‍त सात्त्विक भाव एकदम अलौकिक है। प्रणय के उद्रेक में जो अवस्‍था श्रीराधिका जी की हो जाती थी और शास्‍त्रों में जो ‘अधिरूढ़ महाभाव’ के नाम से वर्णित की गयी हैं, ठीक वही दशा इस समय इन संन्‍यासी युवक की है।

भगवान के प्रति इतने प्रगाढ़ प्रणय के भाव तो मैंने आज तक शास्‍त्रों में केवल पढ़ा ही था, अभी तक उनका किसी पुरुष के शरीर में उदय होते हुए नहीं देखा था। आज प्रत्‍यक्ष उस महाभाव के दर्शन कर लिये। अवश्‍य ही ये सन्‍यासी-वेषधारी युवक कोई अलौकिक दिव्‍य महापुरुष हैं। देखने से तो ये गौड़देशीय ही मालूम पड़ते हैं।सार्वभौम महाशय खड़े-खड़े इस प्रकार सोच ही रहे थे कि मध्‍याह्न के भोग का समीप आ पहुँचा। प्रभु की मूर्च्‍छा अभी तक भंग नहीं हुई थी, इसलिये भट्टाचार्य महाशय मन्दिर के सेवकों की सहायता से प्रभु को उसी बेहोशी की दशा में अपने घर के लिये उठवा ले गये और उन्‍हें एक स्‍वच्‍छ सुन्‍दर लिपे-पुते स्‍थान में ले आकर लिटा दिया। सार्वभौम महाशय घर श्रीजगन्‍नाथ जी के मन्दिर के दक्षिण बालुखण्‍ड में मार्कण्‍डेय सर के समीप था। आज कल जो ‘गंगामाता का मठ’ के नाम से प्रसिद्ध है, उसी अपने सुन्‍दर घर में प्रभु को रखकर वे उनके शरीर की देख-रेख करने लगे। उन्‍होंने अपना हाथ प्रभु की नासिका के आगे रखा। बहुत ही धीरे-धीरे प्राणों की गति चलती हुई प्रतीत हुई। इससे भट्टाचार्य महाशय को प्रसन्‍नता हुई और ये अपने परिवार सहित प्रभु की सेवा-शुश्रूषा करने लगे।

इधर प्रभु के साथी चारों भक्‍त पीछे-पीछे आ रहे थे। मन्दिर के दरवाजे पर ही उन्‍होंने पहरेदारों से पूछा- ‘क्‍यों भाई ! तुम्‍हें पता है एक गोरे से गौड़देशीय युवक संन्‍यासी अभी थोड़ी ही देर पहले यहाँ दर्शन करने आये थे?’

पहरेवालों ने जल्‍दी से कहा- ‘हाँ, हाँ, उन संन्‍यासी महाराज के तो हमने दर्शन किये थे। बड़े ही सुन्‍दर हैं, न जाने उन्हें क्‍या हो गया, वे भगवान के दर्शन करते ही एकदम बेहोश होकर जगमोहन में गिर पड़े। अभी थोड़ी ही देर पहले आचार्य सार्वभौम उन्‍हें अपने घर ले गये हैं। क्‍या आप लोग उन्‍हीं के साथी हैं?’

नित्‍यानन्‍द जी ने कहा- ‘हाँ, हम सब उन्‍हीं के सेवक हैं। तुम लोग हमें भट्टाचार्य सार्वभौम पण्डित के घर का रास्‍ता बता सकते हो?’

पहरेवालों ने कहा- ‘अभी हाल ही तो गये हैं, जल्‍दी से जाओगे तो सम्‍भव है, तुम्‍हें वे रास्‍ते में ही मिल जायँ। इधर सामने जाकर दक्षिण की ओर चले जाना। वहीं मार्कण्‍डेय सर के समीप सार्वभौम पण्डित का ऊँचा-सा बड़ा मकान है। जिससे भी पूछोगे, वही बता देगा। बहुत सम्‍भव है, वे तुम्‍हें रास्‍ते में ही मिल जायँ।’

पहरेवालों के मुख से ऐसी बात सुनकर सभी लोग उसी ओर चलने लगे। उसी समय रास्‍ते में भट्टाचार्य सार्वभौम के बहनोई गोपीनाथचार्य इन लोगों को मन्दिर से निकलते हुए मिल गये। आचार्य गोपीनाथ नवद्वीप निवासी ही थे, मुकुन्‍ददत्त से उनका पुराना परिचय था और वे महाप्रभु के प्रति भी श्रद्धाभाव रखते थे। मुकुन्‍ददत्त ने देखते ही आचार्य को झुककर प्रणाम किया। आचार्य ने मुकुन्‍ददत्त का बड़े जोरों से आलिंगन करते हुए प्रसन्‍नता के साथ कहा- ‘अहा ! गायनाचार्य महाशय यहाँ कहाँ? आप यहाँ कब आये? महाप्रभु का समाचार सुनाइये। महाप्रभु तथा उनके सभी भक्त कुशलपुर्वक तो हैं?’
मुकुन्‍ददत्त ने कहा- ‘हम बस, इसी समय चले आ रहे हैं। महाप्रभु ने गृहस्‍थाश्रम का परित्‍याग करके संन्‍यास ग्रहण कर लिया है और हम उन्‍हीं के साथ-ही-साथ यहाँ आये हैं। अठारहनाला से वे हमसे पृथक होकर एकाकी ही भगवान के दर्शनों के लिये दौड़े आये थे। यहाँ आकर पता चला कि सार्वभौम महाशय उन्‍हें अपने घर ले गये हैं। हम सार्वभौम महाशय के ही घर ही ओर जा रहे थे, सौभाग्‍य से आपके ही दर्शन हो गये। हमारी यात्रा सफल हो गयी।’

आचार्य गोपीनाथ ने कहा- ‘ठीक है, मैं आप सबको सार्वभौम के घर ले चलूँगा। चलिये पहले भगवान के दर्शन तो कर आइये।’ मुकुन्‍ददत्त ने कहा-‘पहले हम महाप्रभु का पूर्णरीत्‍या समाचार जान लें, तब स्‍वस्‍थ होकर निश्चिन्‍ततापूर्वक दर्शन करेंगे। पहले आप हमें सार्वभौम महाशय के ही यहाँ ले चलिये।’

मुकुन्‍ददत्त के मुख से ऐसी बात सुनकर आचार्य गोपीनाथ जी बड़े प्रसन्‍न हुए और उनके साथ सार्वभौम के घर की ओर चलने लगे। नित्यानन्द जी का परिचय पाकर आचार्य ने अवधूत समझकर उनके चरणों में प्रणाम किया और प्रभु के सम्‍बन्‍ध की ही बातें करते हुए वे पाँचों ही सार्वभौम के घर पहुँचे।
इन सब लोगों ने जाकर प्रभु को चेतनाशून्‍य अवस्‍था में ही पाया। भक्तों ने चारों ओर से प्रभु को घेरकर संकीर्तन आरम्‍भ कर दिया।संकीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि कानों में पड़ते ही प्रभु हुंकार मारकर बैठे गये। भक्तिभाव से पुत्र और स्‍त्री के सहित समीप में बैठकर शुश्रूषा करने वाले सार्वभौम तथा अन्‍य सभी उपस्थित पुरुषों को प्रभु के उठने से बड़ी भारी प्रसन्‍नता हुई। सभी के मुरझाये हुए चेहरों पर हलकी-सी प्रसन्‍नता की लालिमा दिखायी देने लगी। संकीर्तन की ध्‍वनि से सार्वभौम का वह भव्‍य गूंजने लगा। प्रभु के कुछ-कुछ प्रकृतिस्‍थ होने पर सार्वभौम की सम्‍मति से उनके पुत्र चन्‍दनेश्‍वर के साथ नित्‍यानन्‍द प्रभृति सभी भक्त श्रीजगन्‍नाथ जी के दर्शनों को चले गये। वहाँ जाकर उन्‍होंने भक्तिभाव सहित श्री सुभद्रा तथा बलदेव जी के सहित जगन्‍नाथ भगवान के दर्शन किये। पुजारी ने प्रसादी, चन्‍दन तथा माला इन सभी भक्‍तों के लिये दिया। उसे ग्रहण करके वे लोग अपने सौभाग्‍य की सराहना करने लगे।सार्वभौम महाशय अपने समय के उस प्रान्‍त में अद्वितीय विद्वान तथा नैयायिक समझे जाते थे। उनके शास्‍त्रज्ञान की चारों ओर ख्‍याति थी। इतना सब होने पर भी प्रभु के समागम के पूर्व उनका जीवन भक्ति-विहीन ही था। उनकी अंदर छिपी हुई महान भावुकता तब तक प्रस्‍फुटित नहीं हुई थी, वह चन्‍द्रकान्‍त मणि में छिपे हुए जल की भाँति अव्‍यक्‍तभाव से ही स्थित थे। गौरचन्‍द्र की सुखद शीतल किरणों का संसर्ग पाते ही वह सहसा द्रवित होकर बाहर टपकने लगी और उसी के कारण भट्टाचार्य सार्वभौम का नीरस जीवन सरस बन गया और वे महानन्‍द सागर में सदा किलो लें करते हुए अलौकिक रस का सुखास्‍वादन करते हुए अपने जीवन को बिताने लगे।शास्त्रों में बुद्धि दो प्रकार की बतायी गयी हैं।
क्रमशः

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