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श्री श्रीचैतन्य चरितावली 349 महाप्रभु का दिव्योन्माद… सिंचन् सिंचन् नयनपयसा पाण्डुगण्डस्थलान्तं मुंचन मुंचन प्रतिमुहुरहो दीर्घनि:श्वासजातम उच्चै: क्रन्दन् करुणकरुणोद्गीर्णहाहेतिरावो गौर: कोअपि व्रजविरहिणीभावमगन्श्चकास्ति। श्रीगौरसुन्दर अपने निरन्तर के नयनजल से दोनों गण्डस्थलों को पाण्डुरंग के बनाते हुए, प्रतिक्षण दीर्घनि:श्वास छोडते हुए और करुणस्वर से हा ! हा ! शब्द करके जोरों से रुदन करते हुए किसी व्रजविरहिणी के भाव में सदा निमग्न रहने लगे। श्रीचैतन्यदेव के शरीर में प्रेम के सभी भाव क्रमश: धीरे-धीरे ही प्रस्फुटित हुए। यदि सचमुच प्रेम के ये उच्च भाव एक साथ ही उनके शरीर में उदित हो जाते तो उनका हृदय फट जाता।उनका क्या किसी भी प्राणी का शरीर इन भावों के वेग को एक साथ सहन नहीं कर सकता। गया में आपको छोटे से मुरली बजाते हुए श्याम दीखे, उन्हीं के फिर दर्शन पाने की लालसा से वे रुदन करने लगे।तभी से धीरे-धीरे उनके भावों में वृद्धि होने लगी। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर इन भावों में मधुर ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। पुरी में प्रभु इसी भाव में विभोर रहते थे...