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Showing posts from August, 2023

349

श्री श्रीचैतन्य चरितावली 349 महाप्रभु का दिव्‍योन्‍माद… सिंचन् सिंचन् नयनपयसा पाण्डुगण्डस्थलान्तं मुंचन मुंचन प्रतिमुहुरहो दीर्घनि:श्वासजातम उच्‍चै: क्रन्‍दन् करुणकरुणोद्गीर्णहाहेतिरावो  गौर: कोअपि व्रजविरहिणीभावमगन्‍श्‍चकास्ति। श्रीगौरसुन्‍दर अपने निरन्‍तर के नयनजल से दोनों गण्‍डस्‍थलों को पाण्‍डुरंग के बनाते हुए, प्रतिक्षण दीर्घनि:श्‍वास छोडते हुए और करुणस्‍वर से हा ! हा ! शब्‍द करके जोरों से रुदन करते हुए किसी व्रजविरहिणी के भाव में सदा निमग्‍न रहने लगे। श्रीचैतन्‍यदेव के शरीर में प्रेम के सभी भाव क्रमश: धीरे-धीरे ही प्रस्‍फुटित हुए। यदि सच‍मुच प्रेम के ये उच्‍च भाव एक साथ ही उनके शरीर में उदित हो जाते तो उनका हृदय फट जाता।उनका क्‍या किसी भी प्राणी का शरीर इन भावों के वेग को एक साथ सहन नहीं कर सकता। गया में आपको छोटे से मुरली बजाते हुए श्‍याम दीखे, उन्‍हीं के फिर दर्शन पाने की लालसा से वे रुदन करने लगे।तभी से धीरे-धीरे उनके भावों में वृद्धि होने लगी। शान्‍त, दास्‍य, सख्‍य, वात्‍सल्‍य और मधुर इन भावों में मधुर ही सर्वश्रेष्‍ठ बताया गया है। पुरी में प्रभु इसी भाव में विभोर रहते थे...

348

श्री श्री चैतन्य चरितावली  348- यह दिव्‍योन्‍माद श्री राधिका जी के ही शरीर में प्रकट हुआ था। दिव्‍योन्‍मादावस्‍था में कैसी दशा होती है, इस बात का अनुमान श्रीमद्भागवत के उक्त श्‍लोक से कुछ कुछ लगाया जा सकता है– एंवव्रत: स्‍वप्रियनामकीर्त्‍या  जातानुरागो द्रुतचित्‍त उच्‍चै:। हसत्‍यथो रोदिति रौति गाय त्‍युन्‍मादवन्‍नृत्‍यति लोकबाह्य:। श्रीकृष्‍ण के श्रवण-कीर्तन का ही जिसने व्रत ले रखा है ऐसा पुरुष अपने प्‍यारे श्रीकृष्‍ण के नाम-संकीर्तन से उनमें अनुरक्‍त एवं विह्वलचित्‍त होकर संसारी लोगों की कुछ भी परवा न करता हुआ कभी तो जोर-जोर से हँसता है, कभी रोता है, कभी चिल्‍लाता है, कभी गाता है और कभी पागल के समान नाचने लगता है। श्रीमद्भा. 11।2।40]_ इस श्‍लोक में ‘रौति’ और ‘रोदिति’ ये दो क्रियाएं साथ दी हैं। इससे खूब जोरों से ठहाका मारकर रोना ही अभिव्‍यंजित होता है। ‘रु’ धातु शब्‍द करने के अर्थ में व्‍यवहृत होती है। जोरों से रोने के अनन्‍तर जो एक करुणाजनक ‘हा’ शब्‍द अपने-आप ही निकल पड़ता है वही यहाँ ‘रौति’ क्रिया का अर्थ होगा। इसमें उन्‍माद की अवस्‍था का वर्णन नहीं है। यह तो ‘उन्‍माद की-सी ...

347

श्री श्री चैतन्य चरितावली  347 तीव्र:प्रौढविसूचिकानिचयतोऽप्‍युच्‍चैर्ममायं बली। मर्माण्‍यद्य भिनत्ति गोकुलपतेर्विश्‍लेषजन्‍मा ज्‍वर:।[ललितमाधवनाटक] हे सखि ! गोकुलपति उस गोपाल का विच्‍छेद ज्‍वर मुझे बड़ा ही पीडा दे रहा है। यह पात्र में तपाये सुवर्ण से भी अधिक उत्तापदायी है। पृथ्वी पर जितने जहर है उन सबसे अधिक क्षोभ पहुँचाने वाला है, वज्र से भी दु:सह, हृदय में छिदे हुए शल्‍य से भी अधिक कष्‍टदायी है तथा तीव्र विसूचिकादि रोगों से भी बढ़कर यन्‍त्रनाएँ पहुँचा रहा है। प्‍यारी सखी ! यह ज्‍वर मेरे मर्मस्‍थानों को भेदन कर रहा है।’ इसी का नाम ‘विरहव्‍याधि’ है। उन्‍माद– साधारण चेष्‍टाएं जब बदल जाती हैं और विरह के आवेश में जब विरहिणी अटपटी और विचित्र चेष्‍टाएँ करने लगती हैं तो उसे ही ‘विरहोन्‍माद’ कहते हैं। उदाहरण लीजिये। उद्धव जी मथुरा पहुँचकर श्री राधिका जी की चेष्‍टाओं का वर्णन कर रहे हैं– भ्रमति भवनगर्भं निर्निमित्तं हसन्‍ती  प्रथयति तव वार्ता चेतनाचेतनेषु। लुठति च भुवि राधा कम्पितांगी मुरारे विषमविषयखेदोद्गारविभ्रान्‍तचित्ता। अर्थात-  हे कृष्‍ण ! राधिका जी  की दशा क्‍या पूछत...

346

श्री श्री चैतन्य चरितावली  346- पूरी होगी भी या नहीं, इसका भी कोई निश्‍चय नहीं। बस, प्‍यारे एक ही बार, दूर से ही थोडी ही देर के लिये क्‍यों न हो, दर्शन हो जायँ। बस, इसी एक लालसा से वियोगिनी अपने शरीर को धारण किये रहती है। उस समय उसकी दशा विचित्र होती है। सारधारणतया उस विरह की दस दशाएं बतायी गयी हैं। वे ये हैं– चिन्‍ता, जागरण, उद्वेग, कृशता, मलिनता, प्रलाप, उन्‍माद, व्‍याधि, मोह और मृत्‍यु- ये ही विरह की दश दशाएँ हैं। चिन्‍ता– अपने प्‍यारे के ही विषय में सोते जागते, उठते बैठते हर समय सोचते रहने का नाम चिन्‍ता है। मन में दूसरे विचारों के लिये स्‍थान ही न रहे। व्रजभाषा गगन के परम प्रकाशमान ‘सूर’ ने चिन्‍ता का कैसा सजीव वर्णन किया है– नाहिन रह्यो मन में ठौर।  नंद-नंदन अछत कैसे आनिये उर और। चलत चितवत दिवस जागत, सुपन सोवत रात। हृदयतें वह स्‍याम मूरति छिन न इत उत जात।। स्‍याम गात सरोज आनन ललित-गति मृदु-हास। ‘सूर’ ऐसे रूप कारन मरत लोचन-प्‍यास। प्‍यासे फिर नींद कहां? नींद तो आँखों में ही आती है आँखें ही रूप की प्‍यासी हैं, ऐसी अवस्‍था में नींद वहाँ आ ही नहीं सकती। इसलिये विरह की दूसरी ...

345

श्री श्री चैतन्य चरितावली  345 एक प्रकार की विचित्र उत्‍कण्‍ठा सी प्रतीत होती है। गला अपने आप रुद्ध सा हो रहा है, अश्रु स्‍वत: ही निकल पडते हैं, एक प्रकार की जड़ता का अनुभव कर रहा हूँ।जाने क्‍यों दिल में घबड़ाहट सी हो रही है। जब वनवासी वीतराग मुझ मुनि की ही ऐसी दशा है, तो गृहस्‍थाश्रम के मोह में फँसे हुए गृहस्थियों की तो पुत्री-वियोग के समय न जाने क्‍या दशा होती होगी?’ इन वाक्‍यों में भगवान कण्‍व की छिपी हुई भावी वेदना है। वे अपने भारी ज्ञान के प्रभाव से उसे छिपाना चाहते हैं, किन्‍तु श्रीकृष्‍ण के मथुरा गमन का समाचार सुनकर गोपिकाओं को जो भावी विरह-वेदना हुई वह तो कुछ बात ही दूसरी है। वैसे तो सभी का विरह उत्‍कृष्‍ट है, किन्‍तु राधिका जी के विरह को ही सर्वोत्‍कृष्‍ट माना गया है।एक सखी इस हृदय को हिला देने वाले समाचार को लेकर श्रीमती जी के समीप जाती है। उसे सुनते ही राधिका जी  किंकर्तव्‍यविमूढ़ सी होकर प्रलाप करने लगती हैं। उनके प्रलाप को मिथिला के अमर कवि श्री विद्यापति ठाकुर के शब्‍दों में सुनिये। अहा ! कितना बढ़िया वर्णन है। राधिका जी कह रही हैं– कि करिब, कोथा याब, सोयाय ना हय...

231

श्री श्री चैतन्य चरितावली  231- प्रभु का समाचार पाते ही नित्‍यानन्‍दादि सभी भक्‍त प्रभु से मिलने के लिये दौड़े आये। रास्‍ते में दूर से ही आते हुए उन्‍होंने प्रभु को देखा। प्रभु को देखते ही सभी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया। प्रभु ने उन सबको प्रभु क्रमश: अपने हाथों से उठा उठाकर प्रेमालिंगन दान दिया। आज दो वर्षों के पश्‍चात प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर सभी प्रेम में बेसुध हो गये और प्रेम के अश्रु बहाते हुए प्रभु के पीछे पीछे चले।इतने में सामने से सार्वभौम भट्टाचार्य तथा गोपीनाथाचार्य प्रभु को आते हुए दिखायी दिये। प्रभु ने अस्‍त व्‍यस्‍त भाव से दौड़कर उनका जल्‍दी से आलिंगन करना चाहा, किन्‍तु वे इससे पहले ही प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु ने उनको स्‍वयं उठाया, उनका आलिंगन किया और उनके वस्‍त्रों में लगी हुई धूलि को अपने हाथों से पोंछा। सभी लोग प्रभु के पीछे पीछे चले। सबसे पहले महाप्रभु जगन्‍नाथ जी के दर्शन के लिये गये। वहाँ के कर्मचारी प्रभु की प्रतीक्षा में सदा चिन्तित से बने रहते थे। सहसा प्रभु के आगमन का समाचार सुनकर सभी आनन्‍द के सहित नृत्‍य करने लगे। प्...

230

श्री श्री चैतन्य चरितावली  230- नौराजी अपने दल के सब आदमियों को बुलाकर वह गदगद कण्‍ठ से कहने लगा- ‘भाइयो ! हम सब इतने दिन साथ रहे, तुम्‍हें मैं समय समय पर उचित-अनुचित आज्ञा देता रहा और तुमने भी प्राणों की कुछ भी परवा न करके मेरी समस्‍त आज्ञाओं का पालन किया। साथ में रहने से और नित्‍य के व्‍यवहारों से गलती और अपराधों का होना स्‍वाभाविक ही है; इसलिये भाई ! मुझसे जिसका भी अपकार हुआ हो, वह मुझे सच्‍चे हृदय से क्षमा कर दे। अब मैं अपने भगवान की शरण में जा रहा हूँ।जिनकी शरण में जाने से पापी-से-पापी भी सुखी और निर्भय हो जाता है। अब मैं किसी जीव की हिंसा न करूँगा। आज से मेरे लिये सभी प्राणी उस परमपिता परमात्‍मा के पुत्र हैं। जान बूझकर अब मैं एक चींटी की भी हिंसा नहीं करूँगा। बाल्‍यकाल से अब तक मैंने धन के लिये न जाने कितने पाप किये हैं, कितनी हिंसाएँ की हैं। अरबों-करोड़ों रुपये इन हाथों से लूटे हैं और खर्च किये हैं। अब मैं द्रव्‍य को अपने हाथों से स्‍पर्श भी न करूँगा। अब तक हजारों आदमियों का मेरे द्वारा प्रतिपालन होता था, आज से मैं स्‍वयं भिखारी बन गया हूँ, अब पेट की ज्‍वाला को बुझाने के लिय...

228

श्री श्री चैतन्य चरितावली  228- वह कहने लगा- ‘आपकी आकृति से ही प्रतीत हो रहा है कि आप कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। संन्‍यासी होकर भी इतनी नम्रता, यह तो महान आश्‍चर्य की बात है। इतनी सरलता, इतनी भक्ति और ऐसे प्रेम के सात्त्विक विकार मेरे गुरुदेव के कृपापात्र संन्‍यासियों को छोड़कर और किसी संन्‍यास में नहीं पाये जाते। आप अपना परिचय मुझे दीजिये।’ प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से कहा- ‘संन्‍यासियों में भक्तिभाव के प्रवर्तक भगवान माधवेन्‍द्रपुरी के प्रधान शिष्‍य श्रीमत ईश्‍वरपुरी महाराज मेरे मन्‍त्र-दीक्षा-गुरु हैं। संन्‍यास के गुरु मेरे श्रीमत केशवभारती महाराज हैं।’ श्रीरंगपुरी महाराज ने पूछा- ‘आपकी पूर्वाश्रम की जन्‍मभूमि कहाँ है?’ प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘इस शरीर का जन्‍म गौड़देश में भगवती भागीरथी के तट पर नवद्वीप नामके नगर में हुआ है। प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए पुरी महाराज कहने लगे- ‘ओहो ! तब तो आप अपने बड़े ही निकट सम्‍बन्‍धी हैं। श्रीअद्वैताचार्य को तो आप जानते ही होंगे, मैं अपने गुरुदेव के साथ पहले नवद्वीप गया था। वहाँ पर जगन्‍नाथ मिश्र नामके एक बड़े श्रद्धालु ब्राह्मण हैं, उनक...

342

श्री श्री चैतन्य चरितावली  342 उस स्‍थान का नाम पहले से ही गम्‍भीरा था या प्रभु के गम्‍भीरा भाव से रहने के कारण उसको लोग गम्‍भीरा कहने लगे, इसका ठीक ठीक पता नहीं।अनुमान ऐसा ही लगाया जाता है कि प्रभु के अन्‍त:पुर के समान उसमें अपने अन्‍तरंग भक्‍तों के साथ रागमय ऐकान्तिक जीवन बिताने के ही कारण इस स्‍थान को भक्‍त ‘गम्‍भीरा’ के नाम से पुकारने लगे होंगे। प्रभु ने गम्‍भीरा मन्दिर में रहकर जो बारह वर्ष बिताये और उस अवस्‍था में जो उन्‍होंने लीलाएँ कीं उन्‍हें भक्‍त ‘गम्‍भीरालीला’ के नाम से जानते और कहते हैं। गौड़ीय वैष्‍णवग्रन्‍थों में सर्वत्र ‘गम्‍भीरालीला’ शब्‍द का व्‍यवहार मिलता है। इन बारह वर्षो में प्रभु के शरीर में जो-जो प्रेम के भाव उत्‍पन्‍न हुए, उनकी जैसी-तैसी अलौकिक दशाएँ हुईं वह किसी भी महापुरुष के शरीर में प्रत्‍यक्ष रीति से प्रकट नहीं हुईं। उन्‍होंने प्रेम की पराकाष्‍ठा करके दिखा दी, मधुर रस का आस्‍वादन किस प्रकार किया जाता है, इसका उन्‍होंने साकार स्‍वरूप दिखला दिया।उन दिनों स्‍वरूपदामोदर और राय रामानन्‍द, ये ही प्रभु के उस भाव के प्रधान ज्ञाता थे। महाप्रभु निरन्‍तर वियोगिनी ...

344

श्री श्री चैतन्य चरितावली  344 वे आठ विकार हैं– स्‍तम्‍भ, कम्‍प, स्‍वेद, वैवर्ण्‍य, अश्रु, स्‍वरभंग, पुलक और प्रलय। ये भय, शोक, विस्‍मय, क्रोध और हर्ष की अवस्‍था में उत्‍पन्‍न होती हैं। प्रेम के लिये ही इन भावों को ‘सात्त्विक विकार’ कहा गया है। स्‍तम्‍भ– शरीर का स्‍तब्‍ध हो जाना। मन और इन्द्रियाँ जब चेष्‍टारहित होकर निश्‍चल हो जाती हैं, उस अवस्‍था को स्‍तम्‍भ कहते हैं। कम्‍प– शरीर में कँपकँपी पैदा हो जाय उसे ‘वेपथु’ या ‘कम्‍प‘ कहते हैं। अर्जुन की युद्ध के अभाव में भये के कारण ऐसी दशा हुई थी। उन्‍होंने स्‍वयं कहा है– ‘वेपथुश्‍च शरीरे में रोमहर्षश्‍च जायते’। अर्थात ‘मुझे कँपकँपी छूट रही है, रोंगटे खडे हो गये हैं।’ स्‍वेद– शरीर में से पसीना छूटना या पसीने में ‘लथपथ’ हो जाना इसे ‘स्‍वेद’ कहते हैं। अश्रु– बिना प्रयत्‍न किये शोक, विस्‍मय, क्रोध अथवा हर्ष के कारण आँखों में से जो जल निकलता है उसे अश्रु कहते हैं। हर्ष में जो अश्रु निकलते हैं वे ठण्‍डे होते हैं और वे प्राय: आँखों की कोर से नीचे को बहते हैं। शोक के अश्रु गरम होते हैं और वे बीच से ही बहते हैं। स्‍वरभंग– मुख से अक्षर स्‍पष्‍ट उ...

343

श्री श्री चैतन्य चरितावली  343- आप उसी का समर्थन करते हुए स्‍पष्‍ट स्‍वीकार भी करते हैं। लिख्‍यते श्रीलगौरेन्‍दोरत्‍यद्भुतमलौकिकम्। यैर्दृष्‍टं तन्‍मुखच्‍छ्रुत्‍वा दिव्‍योन्‍मादविचेष्टितम्।।[श्रीचैतन्‍य. 17।1] अर्थात  ‘श्रीगौरांग महाप्रभु की अत्‍यद्भुत अलौकिक दिव्‍योन्‍मादकारक चेष्‍टाओं को– जिन्‍होंने (श्रीरघुनाथदास जी ने) अपनी आँखों से उन चेष्‍टाओं को प्रत्‍यक्ष देखा है, उन्‍हीं के मुख से सुनकर मैं लिखता हूँ।’  इस बात से तो अब सन्‍देह के लिये कोई स्‍थान ही नहीं रह जाता।यदि कोई साधारण मनुष्‍य उनसे इस बात को कहता तो वे उसका विश्‍वास भी न करते, किन्‍तु जब साक्षात रघुनाथ जी ही उनसे कह रहे हैं जो कि निरन्‍तर बाहर वर्षों तक प्रभु के समीप ही रहे थे तब तो उन्‍हें भी विश्‍वास करना ही पड़ा, इस बात को वे स्‍वयं कहते हैं– शास्‍त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय,  इतर लोकेर ताते ना हय निश्‍चय। रघुनाथदासेर सदा प्रभु के संगे स्थिति,  तार मुखे सुनि लिखि करिया प्रतीति। अर्थात  ‘महाप्रभु के इन दिव्‍योन्‍मादकारी भावों को यदि कोई इतर पुरुष कहता तो सम्‍भवतया निश्‍चय भी न होता, किन्‍तु ...

341

श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली  341 गम्‍भीरा-मन्दिर में श्री गौरांग ….. प्रेम नामक अद्भुत पदार्थ किसके कर्णगोचर हो सकता था? नाम की महिमा को कौन जान सकता था? वृन्‍दावन की माधुरी में किसका प्रवेश हो सकता था? उत्‍तम रस श्रंगार के चमत्‍कारपूर्ण माधुर्य की सीमा राधा को कौन जान पाता?  एक श्रीचैतन्‍यचन्‍द्र महाप्रभु ने अपनी स्‍वाभाविक परम करुणा के द्वारा इन सभी बातों को पृथ्वी पर प्रकट कर दिया।महाप्रभु गौरांगदेव चौबीस वर्ष की अल्‍पावस्‍था में कठोर संन्‍यास धर्म की दीक्षा लेकर पुरी पधारे। पहले छ: वर्षों में तो वे भारतवर्ष के विविध तीर्थों  में भ्रमण करते रहे और सबसे अन्‍त में आपने श्री वृन्‍दावन धाम की यात्रा की। महाप्रभु की यही अन्तिम यात्रा थी। वृन्‍दावन से लौटकर अन्‍त के अठारहों वर्षों तक आप अविच्छिन्‍न भाव से सचल जगन्‍नाथ के रूप में पुरी अथवा नीलाचंल में ही अवस्थित रहे। फिर आपने पुरी की पावन पृथ्वी का परित्‍याग करके कहीं को भी पैर नहीं बढ़ाया। गौड़ देश से रथ यात्रा के समय प्रतिवर्ष बहुत से भक्‍त आया करते थे और वे बरसात के चार महीनों तक प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट रहकर अपने-...

340

श्री श्री चैतन्य चरितावली  340- प्रभु जब काशी पधारे थे तभी इन्‍होंने प्रभु को आत्‍म समर्पण कर दिया था। प्रभु के पुरी आ जाने पर इनकी पुन: प्रभु के पादपद्मों के दर्शनों की इच्‍छा हुई। अत: ये काशी जी से गौड़ होते हुए नीलाचंल की ओर चल दिये। रास्‍ते इन्‍हें रामदास विश्‍वास नामक एक कायस्‍थ महाशय मिले। ये गोड़ेश्‍वर के दरबार में मुनीम थे। रामानन्‍दी सम्‍प्रदाय के थे, वैसे बड़े भारी पण्डित, विनयी और ब्रह्मण्‍य थे। वे भी जगन्‍नाथ जी के दर्शनों को जा रहे थे।रघुनाथ जी को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और इतने योग्य साथी को पाकर वे परम प्रसन्न हुए। उन्होंने रघुनाथ जी की पुटली जबरदस्‍ती ले ली तथा और भी उनकी विविध प्रकार से सेवा करने लगे। रघुनाथ जी इससे कुछ संकुचित होते और कहते– ‘आप इतने बड़े पण्डित हैं, इतने भारी प्रतिष्ठित पुरुष हैं, आपको मेरी इस प्रकार सेवा करना शोभा नहीं देता।’ वे विनीतभाव से उत्‍तर देते– ‘मैं नीच, अधम, छोटी जाति में उत्‍पन्‍न होने वाला भला आपकी सेवा कर ही क्‍या सकता हूँ फिर भी जो मुझसे हो सकती है, उससे आप मुझे वंचित न रखिये। साधु ब्राह्मणों की सेवा करना तो हमारा कर्तव्‍य है। हम...

339

श्री श्री चैतन्य चरितावली  339 इसलिये वे तो मुँह में डालकर उनकी गुठलियों को धीरे-धीरे चूसने लगे। जो नहीं जानते थे वे जल्दी में मुँह में डालकर चबाने लगे। चबाते ही मुँह जहर कड़वा हो गया, नेत्रों में पानी आ गया। सभी सी-सी करते हुए इधर उधर दौड़ने लगे। न तो खाते बनता था। न थूकते ही। वृन्दावन के प्रभुदत्त प्रसाद को भला थूकें कैसे और खाते हैं तो प्राणों पर बीतती है। खैर, जैसे तैसे जल के साथ भक्त उन्हें निगल गये। प्रभु हँसते-हँसते कह रहे थे- ‘व्रज का प्रसाद पाना कोई सरल नहीं है। जो विषय भोगों को ही सर्वस्व समझ बैठे हैं, उनको न तो व्रज की भूमि में वास करने का अधिकार है और न व्रज के महा प्रसाद को पाने का ही। व्रजवासी बनने का सौभाग्य तो उसे ही प्राप्त हो सकेगा जिसकी सभी वासनाएँ दूर हो गयी होंगी।’ इस प्रकार जगदानन्द जी के आने से सभी भक्तों को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे उसी प्रकार सुखपूर्वक फिर प्रभु के पास रहने लगे। जगदानन्द जी का हृदय शुद्ध था, उनका प्रभु के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। वे प्रभु के शरीर से ही अत्यधिक प्रेम करते थे। यह ठीक भी है। जिस कागज पर चित्र बना हुआ है उस कागज को यदि कोई प्यार कर...

334

श्री श्री चैतन्य चरितावली  334- कालिदास जी ने कहा- ‘जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती। वह तो जातिबन्धनों से परे होता है। उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता, वही सबसे श्रेष्ठ होता है। इसलिये आप जाति-कुल का भेदभाव न करें। आप परम भागवत हैं, आपकी पदधूलि से मैं पावन हो जाऊँगा, आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करें।’ झाड़ू भक्त ने कहा- ‘मालिक ! आपकी इस बात को मैं मानता हूँ कि भगवद्भक्त वर्ण और आश्रमों से परे होता है। वह सबका गुरु और पूजनीय होता है, उससे बढ़कर कोई भी नहीं होता, किन्तु वह भक्त होना चाहिये। मैं अधम भला भक्तिभाव क्या जानूँ। मुझे तो भगवान में तनिक भी प्रीति नहीं। मैं तो संसारी गर्त में फँसा हुआ नीच विषयी पुरुष हूँ।’ कालिदास जी ने कहा- ‘सचमुच सच्चे भक्त तो आप ही हैं। जो अपने को भक्त मानकर सबसे अपनी पूजा कराता है, अपने भक्तिभाव का विज्ञापन बाँटता फिरता है, वह तो भक्त नहीं दुकानदार है, भक्ति के नाम पर पूजा प्रतिष्ठा खरीदने वाला बनिया है। सच्चा भक्त तो आपकी तरह सदा अमानी, अहंकार रहित, सदा दूसरों को मान प्रदान करने वाला होता है, उसे इस बात का स्वप्न में भी अभिमान नहीं होता कि मैं भक्त हू...

337

श्री श्री चैतन्य चरितावली  337- इसीलिये धीरे से कहने लगे- ‘प्रभो ! हानि ही क्या है, जगदानन्द जी को कष्ट होगा, इन्होंने प्रेमपूर्वक बड़े परिश्रम से इसे स्वयं बनाया है। सेमल की रूई है, फिर आपका शरीर भी तो अत्यंत ही निर्बल है, मुझे स्वयं इसे केले के पत्तों पर पड़ा हुआ देखकर कष्ट होता है।अस्वस्थावस्था में गद्दे का उपयोग करने मे तो मुझे कोई हानि प्रतीत नहीं होती। रुग्णावस्था को ही आपत्तिकाल कहते हैं और आपत्तिकाल में नियमों का पालन न हो सके तो कोई हानि भी नहीं। कहा भी है, ‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति।’ प्रभु ने धीरे-धीरे प्रेम के स्वर में स्वरूप गोस्वामी को समझाते हुए कहा- ‘स्वरूप ! तुम स्वयं समझदार हो। तुम स्वयं सब कुछ सीखे हुए हो, तुम्हें कोई सिखा ही क्या सकता है। तुम सोचो तो सही, यदि संन्यासी इसी प्रकार अपने मन को समझाकर विषयों में प्रवृत्त हो जाय तो अन्त में वह धीरे धीरे महाविषयी बनकर पतित हो जायेगा। विषयों का कहीं अन्त ही नहीं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा उत्पन्न होती जाती है। जहाँ एक बार नियम से भ्रष्ट हुए वहाँ फिर नीचे की ओर पतन ही होता जाता है।पानी का प्रवाह ऊपर से एक बार छूटना चाहिय...

336

श्री श्री चैतन्य चरितावली  336- दो दिन तक न तो अन्न जल ग्रहण किया और न बाहर निकले। प्रणयकोप में भीतर ही पड़े रहे। जगदानन्द जी की एकनिष्ठा…. शास्त्रों में भक्तों के उत्तम, मध्यम और प्राकृत रूप से तीन भेद बताये गये हैं। जो भक्त अपने इष्ट देव को सर्वव्यापक समझकर प्राणिमात्र के प्रति श्रद्धा के भाव रखता है और सभी वस्तुओं में इष्टबुद्धि रखकर उनका आदर करता है, वह सर्वोत्तम भक्त है। जो अपने इष्ट में प्रीति रखता है और अपने ही समान इष्ट बन्धुओं के प्रति श्रद्धा का भाव, असाधकों के प्रति कृपा के भाव, विद्वेषियों और भिन्न मत वालों के प्रति उपेक्षा के भाव रखता है, वह मध्यम भक्त है और जो अपने इष्ट के विग्रह में ही श्रद्धा के साथ उन श्री हरि की पूजा करता तथा भगवत भक्तों की तथा अन्य पुरुषों से एकदम उदासीन रहता है, वह प्राकृत भक्त है।प्राकृत भक्त बुरा नहीं है, भक्ति का सच्चा श्री गणेश तो यहीं से होता है, जो पहले प्राकृत भक्त नहीं बना वह उत्तम तथा मध्यम भक्त बन ही कैसे सकता है। नीचे की सीढ़ियों को छोड़कर सबसे ऊँची पर बिना योगेश्वरेश्वर कृपा से कोई भी नहीं जा सकता। पण्डित जगदानन्द जी सरल प्रकृति के भ...

335

श्री श्री चैतन्य चरितावली  335- तब ये भी प्रभु दण्ड लिये एक साधारण सेवक की भाँति उनके पीछे पीछे चले और रास्ते भर ये स्वयं भिक्षा माँगकर प्रभु तथा अन्य सभी साथियों को भोजन बनाकर खिलाते थे। प्रभु के पहले वृन्दावन आने पर ये भी साथ चले थे और फिर रामकेलि से ही उनके साथ लौट भी आये थे। प्रभु के नीलाचल में स्थायी रहने पर ये भी वहाँ स्थायी रूप से रहने लगे। बीच बीच में प्रभु की आज्ञा से शची माता के लिये भगवान का प्रसादी वस्त्र और महाप्रसाद लेकर ये नवद्वीप आया जाया भी करते थे। प्रभु के प्रति इनका अत्यन्त ही मधुर भाव था। भक्त इनके अत्यन्त ही कोमल मधुर भाव को देखकर इन्हें सत्यभामा का अवतार बताया करते थे और सचमुच इनकी उपासना थी भी इसी भाव की। ये प्रभु के संन्यास की कुछ भी परवा नहीं करते थे। ये चाहते थे, प्रभु खूब अच्छे अच्छे पदार्थ खायें, सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहनें और अच्छे अच्छे स्वच्छ और सुन्दर आसनों पर शयन करें। प्रभु यतिधर्म के विरुद्ध इन वस्तुओं का सेवन करना चाहते नहीं थे।बस, इसी बात पर कलह होती ! कलह का प्रधान कारण यही था कि जगदानन्द प्रभु के शरीर की तनिक सी भी पीड़ा को सहन नहीं कर सकते थे...

338

श्री श्री चैतन्य चरितावली  338- गोकुल में ये दोनों यमुना जी के तट पर एक गुफा में ठहरे। रहते तो दोनों गुफा में थे किन्तु भोजन के लिये जगदानन्द जी तो एक मन्दिर में जाते थे और वहाँ अपना भोजन अपने हाथ ये बनाकर पाते थे।सनातन जी महावन में से जाकर मधुकरी कर लाते थे। तब तक गोकुल इतना बड़ा गाँव नहीं बना था। गोस्वामियों की ही दो तीन बैठकें तथा मन्दिर थे। इसीलिये भिक्षा के लिये इन्हें डेढ़ दो मील रोज जाना पड़ता था। एक दिन जगदानन्द जी ने सनातन जी का निमन्त्रण किया। सनातन जी तो समान दृष्टि रचाने वाले उच्च कोटि के भक्त थे। वे संन्यासी मात्र को चैतन्य का ही विग्रह समझकर उनके प्रति उदार भाव रखते थे।वे अपने गुरु में और श्रीकृष्ण में कोई भेदभाव नहीं मानते थे, इसलिये उन्होंने श्री चैतन्य देव को श्रीकृष्ण या अवतारी सिद्ध न करके श्रीकृष्ण लीलाओं का ही वर्णन किया है। उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण और चैतन्य में कोई भेदभाव होता तब तो वे सिद्ध करने की चेष्टा करते।मुकन्द सरस्वती नाम के एक संन्यासी थे, उन्होंने सनातन गोस्वामी को एक अपने ओढ़ने का गेरुए रंग का वस्त्र दिया था। सनातन जी तो एक गुदड़ी के सिवा कुछ रखते...