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Showing posts from September, 2023

372

श्री श्री चैतन्य चरितावली  372- इन्‍होंने भी भक्तितत्त्व की खूब पर्यालोचना की है, इनके बनाये हुए चार ग्रन्‍थ प्रसद्धि हैं– (‌1) बृहद्भागवतामृत (दो खण्ड), (2) हरिभक्तिविलास, टीकादिक प्रदर्शिनी, (3) वैष्‍णवतोषिणी (दशम स्‍कन्‍ध की टिप्‍पणी), (4) लीलास्‍तव (दशम चरित्र)। सत्तर वर्ष की आयु में सं. 1615 (ईस्‍वी सन 1558) की आषाढ सुदी चतुर्दशी के दिन इनका गोलोकगमन बताया जता है। ये परम विनयी, भागवत और भगवत-रस-रसिक वैष्‍णव थे। 3 – श्री जीवगोस्‍वामी जी श्री अनूप तनय स्‍वामी श्रीजीव जी का वैराग्‍य परमोत्‍कृष्‍ट था। ये आजन्‍म ब्रह्मचारी रहे। स्त्रियों के दर्शन तक नहीं करते थे। पिता के वैकुण्‍ठवास हो जाने पर और दोनों ताऊओं के गृहत्‍यागी विरागी बन जाने पर इन्‍होंने भी उन्‍हीं के पथ का अनुसरण किया और ये भी सब कुछ छोड़कर श्री वृन्दावन में जाकर अपने पितृव्‍यों के चरणों का अनुसरण करते हुए शास्‍त्र-चिन्‍तन और श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में अपना समय बिताने लगे। ये अपने समय के एक नामी पण्डित थे। व्रजमण्‍डल में इनकी अत्‍यधिक प्रतिष्‍ठा थी। देवताओं को भी अप्राप्‍य व्रज की पवित्र भूमि को परित्‍याग करके ये कहीं भी कि...

371

श्री श्री चैतन्य चरितावली  371- ये मथुरा जी में मधुकरी करने के लिये एक चौबे के घर जाया करते थे। उस चौबे की स्‍त्री परम भक्‍ता और श्रीमदन मोहन भगवान की उपासिका थी। उसके घर बालभाव से श्री मदनमोहन भगवान विराजते थे। सनातन जी उनकी मूर्ति के दर्शनों से अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न होते, असल में तो वे मदनमोहन जी के दर्शनों के ही लिये वहाँ जाते थे। उस चौबिन का एक छोटा सा बालक था। मदनमोहन भी बालक ही ठहरे। दोनों में खूब दोस्‍ती थी। मदन मोहन तो गँवार ग्‍वाले ही ठहरे। ये आचार विचार क्‍या जानें। उस चौबिन के लड़के के साथ ही एक पात्र में भोजन करते। सनातन जी को देखकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि ये मदनमोहन सरकार बड़े विचित्र हैं। एक दिन ये मधुकरी लेने गये। चौबिन इन्‍हें भिक्षा देने लगी। इन्‍होंने आग्रह पूर्वक कहा– ‘माता ! यदि तुम मुझे कुछ देना चाहती हो तो इस बच्‍चे को उच्छिष्‍ट अन्‍न मुझे दे दो।’ चौबिन ने इनकी प्रार्थना स्‍वीकार कर ली और इन्‍हें वही मदन मोहन का उच्छिष्‍ट प्रसाद दे दिया। बस, फिर क्‍या था, इन्‍हें तो उस माखन चोर की लपलपाती जीभ से लगे हुए अन्‍न का चस्‍का लग गया, ये नित्‍यप्रति उसी उच्छिष्‍ट अन्‍न क...

337

श्री श्री चैतन्य चरितावली  337- इसीलिये धीरे से कहने लगे- ‘प्रभो ! हानि ही क्या है, जगदानन्द जी को कष्ट होगा, इन्होंने प्रेमपूर्वक बड़े परिश्रम से इसे स्वयं बनाया है। सेमल की रूई है, फिर आपका शरीर भी तो अत्यंत ही निर्बल है, मुझे स्वयं इसे केले के पत्तों पर पड़ा हुआ देखकर कष्ट होता है।अस्वस्थावस्था में गद्दे का उपयोग करने मे तो मुझे कोई हानि प्रतीत नहीं होती। रुग्णावस्था को ही आपत्तिकाल कहते हैं और आपत्तिकाल में नियमों का पालन न हो सके तो कोई हानि भी नहीं। कहा भी है, ‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति।’ प्रभु ने धीरे-धीरे प्रेम के स्वर में स्वरूप गोस्वामी को समझाते हुए कहा- ‘स्वरूप ! तुम स्वयं समझदार हो। तुम स्वयं सब कुछ सीखे हुए हो, तुम्हें कोई सिखा ही क्या सकता है। तुम सोचो तो सही, यदि संन्यासी इसी प्रकार अपने मन को समझाकर विषयों में प्रवृत्त हो जाय तो अन्त में वह धीरे धीरे महाविषयी बनकर पतित हो जायेगा। विषयों का कहीं अन्त ही नहीं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा उत्पन्न होती जाती है। जहाँ एक बार नियम से भ्रष्ट हुए वहाँ फिर नीचे की ओर पतन ही होता जाता है।पानी का प्रवाह ऊपर से एक बार छूटना चाहिय...

256

श्री श्री चैतन्य चरितावली  256- प्रसाद पाते-पाते प्रभु कहते जाते थे- 'अहा, हमारा कैसा सौभाग्य है; श्रीपाद जी के लाये हुए चावल, गदाधर के हाथ से बनाये हुए फिर गोपीनाथभगवान का महाप्रसाद। इस प्रसाद से श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति होती है। इन चावलों की सुन्दर सुगन्धि ही भक्ति को बढ़ाने वाली है।' महाप्रभु के इस प्रकार प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई।' रथयात्रा के समय नियमानुसार तीसरी बार भक्तों के आने का समय हुआ। अबके भक्त अपनी स्त्रियों को भी साथ लेकर आये थे। भक्तों की विदाई के समय नित्यानन्द जी को एकान्त में बुलाकर महाप्रभु ने उनसे कहा- 'श्रीपाद! आपके लिये विधि-निषेध क्या! आप तो वृन्दावन विहारी गोपकृष्ण के उपासक हैं। बेचारे गँवार ग्वालबाल विधि-निषेध क्या जानें? अब आप एक काम करें, अपना विवाह कर लें और आदर्श गृहस्थ बनकर लोगों के सम्मुख एक सुन्दर आदर्श उपस्थित करें कि गृहस्थ में रहकर भी किस प्रकार भजन, कीर्तन  और परमार्थ-चिन्तन किया जाता है।' गद्गदकण्ठ से अश्रुविमोचन करते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! आप तो घर में सन्तानहीन युवती विष्णुप्रिया जी को छ...

240

श्री श्री चैतन्य चरितावली  240 यदि हीरा-मोती कंकड़ पत्‍थरों की भाँति सर्वत्र मिलने लगें, यदि सुवर्ण मिट्टी की भाँति वैसे ही बिना परिश्रम के खोदने से मिल जाया करे तो न तो जनता में इन वस्‍तुओं का इतना अधिक आदर होगा और न ये बहुमूल्‍य ही समझी जायँगी। इसीलिये मैं बार बार लोगों से कहता हूँ, अपने को मूल्‍यवान बनाना चाहते हो तो किसी भी काम में घोर परिश्रम करो, सर्वसाधारण लोगों से अपने को ऊँचा उठा लो, विश्‍व से प्रेम करना सीखो, तुम मुल्‍यवान हो जाओगे। संसार में सर्वश्रेष्‍ठ समझे जाने वाले राजे महाराजे ने तुम्‍हारे चरणों में लोटेंगे और तुम उनके मान सम्‍मान की कुछ भी परवा न करोगे। महाप्रभु ज्‍यों ज्‍यों राजा से न मिलने की इच्‍छा प्रकट करने लगे। त्‍यों ही त्‍यों कटकाधिप महाराज प्रतापरुद्र जी की प्रभु दर्शन की उत्‍सुकता अधिकाधिक बढ़ती गयी। अब वे सोते-जागते प्रभु के ही सम्‍बन्‍ध में सोचने लगे। जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने कह दिया कि प्रभु स्‍वयं मिलने के लिये सहमत नहीं हैं, तब महाराज ने सार्वभौम के द्वारा प्रभु के अन्‍तरंग भक्‍तों के समीप प्रार्थना की कि वे प्रभु के चित्त को हमारी ओर आ‍कर्षित करें।...

375 last

श्री श्री चैतन्य चरितावली  375 यह संसार समुद्र के समान है। मुझे इसमें तुमने क्‍यों फेंक दिया, हे नाथ ! इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं। मैं अपने कर्मों के अधीन होकर ही इसमें गोते लगा रहा हूँ, बार-बार डूबता हूँ और फिर तुम्‍हारी करुणा के सहारे ऊपर तैरने लगता हूँ।इस अथाह सागर के सम्‍बन्‍ध में मैं कुछ भी नहीं जानता कि यह कितना गहरा है, किन्‍तु हे मेरे रमण ! मैं इसमें डुबकियाँ मारते-मारते थक गया हूँ। कभी-कभी खारा पानी मुंह में चला जाता है, तो कैसी होने लगती है। कभी कानों में पानी भर जाता है, तो कभी आँखें ही नमकीन जल से चिरचिराने लगती हैं। कभी-कभी नाक में होकर भी जल चला जाता है। हे मेरे मनोहर मल्‍लाह ! हे मेरे कोमल प्रकृति केवट ! मुझे अपना नौकर जानकर, सेवक समझकर कहीं बैठने का स्‍थान दो। तुम तो ग्‍वाले के छोकरे हो न, बड़े चपल हो। पूछ सकते हो, ‘इस अथाह जल में मैं बैठने के लिये तुझे स्‍थान कहाँ दूँ। मेरे पास नाव भी तो नहीं जिसमें तुम्‍हें बिठा लूँ।’ तो हे मेरे रसिकशिरोमणि ! मैं चालाकी नहीं करता, तुम्‍हें भुलाता नहीं सुझाता हूँ। तुम्‍हारे पास एक ऐसा स्‍थान है, जो जल में रहने पर भी नहीं डूबता और उस...

374

श्री श्री चैतन्य चरितावली  374 मेरा ऐसा दुर्दैव कि तुम्‍हारे इन सुमधुर नामों में सच्‍चे हृदय से अनुराग ही उत्‍पन्‍न नहीं होता। श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !  हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! (3)  तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सष्णिुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:।। हरिनाम संकीर्तन करने वाले पुरुष को किस प्रकार के गुरु बनाने चाहिये और दूसरों के प्रति उसका व्‍यवहार कैसा होना चाहिये, इसको कहते हैं– भागवत बनने वाले को मुख्‍यतया दो गुरु बनाने चाहिये– ‘एक तो तृण और दूसरा वृक्ष।' तृण से तो नम्रता की दीक्षा ले, तृण सदा सब के पैरों के नीचे ही पड़ा रहता है। कोई दयालु पुरुष उसे उठाकर आकाश में चढ़ा देते हैं, तो वह फिर ज्‍यों का त्‍यों ही पृथ्‍वी पर आकर पड़ जाता है। वह स्‍वप्‍न में भी किसी के सिर पर चढ़ने की इच्‍छा नहीं करता। तृण के अतिरिक्‍त दूसरे गुरु ‘वृक्ष’ से ‘सहिष्‍णुता’ की दीक्षा लेनी चाहिये। सुन्‍दर वृक्ष का जीवन परोपकार के ही लिये होता है। वह भेद-भाव शून्‍य होकर समान भाव से सभी की सेवा करता रहता है।’ जिसकी इच्‍छा हो वही उसकी सुखद शीतल सघन छाया में आकर अपने तन की ताप बुझा ल...

373

श्री श्री चैतन्य चरितावली  373- उसके बाद इनकी फिर महाप्रभु से भेंट नहीं हुई। इनके आगमन का समाचार श्री रूपसनातन जी ने प्रभु के पास पठाया था, तब प्रभु ने एक पत्र भेजकर रूप और सनातन इन दोनों भाइयों को लिखा था कि उन्‍हें स्‍नेह से अपने पास रखना और अपना सगा भाई ही समझना। महाप्रभु ने अपने बैठने का आसन और डोरी इनके लिये भेजी थी। इन दोनों प्रभुपसादी अमूल्‍य वस्‍तुओं को पाकर ये परम प्रसन्‍न हुए। ध्‍यान के समय ये प्रभु की प्रसादी डोरी को सिर पर धारण करके भजन किया करते थे। इनके उपास्‍यदेव श्री राधारमण जी थे। सुनते हैं इनके उपास्‍यदेव पहले शालग्राम के रूप में थे, उन्‍हीं की ये सेवा पूजा किया करते थे, एक बार कोई धनिक वृन्‍दावन में आया। उसने सभी मन्दिरों के ठाकुरों के लिये सुन्‍दर वस्‍त्राभूषण प्रदान किये। इन्‍हें भी लाकर बहुत से सुन्‍दर सुन्‍दर वस्‍त्र और गहने दिये। वस्‍त्र और गहनों को देखकर इनकी इच्‍छा हुई कि यदि हमारे भी ठाकुर जी के हाथ पैर होते तो हम भी उन्‍हें इन वस्‍त्रा भूषणों को धारण कराते। बस, फिर क्‍या था। भगवान तो भक्‍त के अधीन हैं, वे कभी भक्‍त की इच्‍छा को अन्‍यथा नहीं करते। उसी समय...

236

श्री श्री चैतन्य चरितावली  236- आप उनसे राजापने के भाव से न मिलिये। मान लीजिये, वे विषयी ही हैं तो आपकी तो वे कुछ हानि नहीं कर सकते। उलटे उनका ही उद्धार हो जायगा। आपकी कृपा से संसारी लोगों का संसार-बन्‍धन छूट जाता है।’ महाप्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! यह बात नहीं है- आकारादपि भेतव्‍यं स्‍त्रीणां विषयिणामपि। यथाऽहेर्मनस: क्षोभस्‍तथा तस्‍याकृतेरपि। (त्‍यागी पुरुष को) स्त्रियों की और विषयी पुरुषों की आकृति से भी डरना चाहिये; क्‍योंकि साँप से जिस प्रकार चित्त में क्षोभ होता है उसी प्रकार उसकी आकृति से भी होता है।’ फिर उनके साथ वार्तालाप और संसर्ग करना तो दूर रहा। इस उत्तर को सुनकर भट्टाचार्य चुप हो गये, फिर उन्‍होंने प्रभु से इस सम्‍बन्‍ध में कुछ नहीं कहा। वे विषण्‍ण मन से अपने घर लौट गये और सोचने लगे कि राजा को क्‍या उत्तर लिखूँ। इसी सोच-विचार में वे दो-तीन दिन पड़े रहे। उन्‍होंने राजा को कुछ भी उत्तर नहीं लिखा। इसी बीच में राय रामानन्‍द जी विद्यानगर से कटक होते हुए पुरी में प्रभु के दर्शन के निमित्त आये। प्रभु उन्‍हें देखते ही एकदम खिल उठे और भूमि में पड़े हुए राय रामानन्‍द जी को...

241

श्री श्री चैतन्य चरितावली  241 यदि राजपुत्र आना चाहे तो उसे आप प्रसन्‍नतापूर्वक ला सकते हैं।’ प्रभु की आज्ञा पाकर रामानन्‍द जी उसी समय महाराज के निवास स्‍थान में गये। उस समय महाराज सपरिवार पुरी में ठहर हुए थे। स्‍नान यात्रा के तीन दिन पूर्व महाराज को पुरी आ जाना पड़ता है और रथयात्रापर्यन्‍त वे वहाँ रहते हैं, इसीलिये महाराज आये हुए थे। राय रामानन्‍द जी की कहीं भी जाने की रोक टोक नहीं थी, वे भीतर चले गये और राजपुत्र से प्रभु के दर्शनों के लिये कहा। राजपुत्र की पहले से ही इच्‍छा थी। महाराज तथा महारानी की भी आन्‍तरिक इच्‍छा थी। इस‍लिये रामानन्‍द जी ने राजपुत्र को खूब सजाया। राजपुत्र एक तो वैसे ही बहुत अधिक सुन्‍दर था। फिर कवि हृदय रामानन्‍द जी ने अपने हाथों से उसका श्रृंगार किया। राजपुत्र के कमल के समान सुन्‍दर बड़े बड़े नेत्र थे, माथा चौड़ा था और दोनों भृकुटियाँ कमान के समान चढ़ाव-उतार की थीं। रामानन्‍द जी ने राजपुत्र के दोनों कानों में मोतियों से युक्‍त बड़े बड़े कुण्‍डल पहनाये। गले में मोतियों का हार पहनाया तथा शरीर पर बहुत ही बढ़ियाँ पीले रंग के वस्‍त्र पहनाये। कामदारी बहुमूल्‍य पी...

370

श्री श्री चैतन्य चरितावली  370 इन्‍होंने अपने अग्रज को देखकर उनको अभिवादन किया और बैठने के लिये सुन्‍दर-सा आसन दिया। श्री रूप जी अपने भाई के लिये भोजन बनाने लगे। उन्‍होंने प्रत्‍यक्ष देखा कि भोजन का सभी सामान प्‍यारी जी ही जुटा रही हैं, सनातन जी को इससे बड़ा क्षोभ हुआ। वे चुपचाप बैठे देखते रहे। जब भोजन बनकर तैयार हो गया तो श्री रूप जी ने उसे भगवान के अर्पण किया, भगवान प्‍यारी जी के साथ प्रत्‍यक्ष होकर भोजन करने लगे। उनका जो उच्छिष्‍ट महाप्रसाद बचा उसका उन्‍होंने श्री सनातन जी को भोजन कराया। उसमें अमृत से भी बढ़कर दिव्‍य स्‍वाद था। सनातन जी ने कहा– ‘भाई ! तुम बड़े भाग्‍यशाली हो, जो रोज प्‍यारी प्यारे के अधरामृत उच्छिष्‍ट अन्‍न का प्रसाद पाते हो, किन्‍तु सुकुमारी लाड़िली जी को तुम्‍हारे सामान जुटाने में कष्‍ट होता होगा, यही सोचकर मुझे दु:ख होता है।’ इतना कहकर श्री सनातन जी चले गये और उनका जो उच्छिष्‍ट महाप्रसाद शेष रहा उसको बड़ी ही रुचि और स्‍वाद के साथ श्री रूप जी ने पाया। किसी काव्‍य में श्री रूप जी ने प्‍यारी जी की वेणी की काली नागिन से उपमा दी थी। यह सोचकर सनातन जी को बड़ा दु:ख ह...

369

श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली  369- उन्‍होंने इन्‍हीं के आदेशानुसार श्री गौरांग महाप्रभु का एक बड़ा भारी मन्दिर बनवाया और उसमें श्री गौरांग और श्री विष्‍णुप्रिया जी की युगल मूर्तियों की स्‍थापना की गयी। इसके उपलक्ष्‍य में एक बड़ा भारी महामहोत्‍सव किया और बहुत दिनों तक निरन्‍तर कीर्तन-सत्‍संग होता रहा।नरोत्तम ठाकुर का प्रभाव उन दिनों बहुत ही अधिक था, बड़े-बड़े राजे-महाराजे इनके मंत्र-शिष्‍य थे। बड़े पण्डित इन्‍हें नि:संकोच भाव से साष्‍टांग प्रणाम करते। ये बँगला भाषा के सुकवि भी थे। इन्‍होंने गौरप्रेम में उन्‍मत्त होकर हजारों पदों की रचना की है। इनकी पदावलियों का वैष्‍णवसमाज में बड़ा आदर है। इन्‍होंने परमायु प्राप्‍त की थी। अन्‍त समय ये गंगा जी के किनारे गम्‍भीरा नामक ग्राम में अपने एक शिष्‍य गंगा नारायण पण्डित के यहाँ चले गये। कार्तिक की कृष्‍णा पंचमी का दिन था। प्रात:काल ठाकुर महाशय अपने प्रिय शिष्‍य गंगानारायण पण्डित तथा रामकृष्‍ण के साथ गंगा-स्‍नान के निमित्‍त गये। वे कमर तक जल में चले गये और अपने शिष्‍यों से कहा– ‘हमारे शरीर को तो थोड़ा मलो।’ शिष्‍यों ने गुरुदेव की आज्ञा का पाल...

367

श्री श्री चैतन्य चरितावली  367- सरकार ठाकुर बच्‍चों की तरह दहाड़े मारकर रुदन करने लगे। श्री निवास जी के दोनों नेत्र रुदन करते-करते फूल गये थे। वे कण्‍ठ रुंध जाने के कारण कुछ कह भी नहीं सकते थे। सरकार ठाकुर ने इन्‍हें कई दिनों तक अपने ही यहाँ रखा। इसके अनन्‍तर वे घर नहीं गये। अब उनकी इच्‍छा श्री चैतन्‍य की क्रीड़ा-भूमि के दर्शनों की हुई। वे उसी समय सरकार ठाकुर से विदा होकर नवद्वीप में आये। उन दिनों विष्‍णुप्रिया देवी जी घोर तपस्‍यामय जीवन बिता रही थीं। वे किसी से भी बातें नहीं करती थीं, किन्‍तु उन्‍हें स्‍वप्‍न में श्री गौरांग का आदेश हुआ कि ‘श्री निवास हमारा ही अंश है, इससे मिलने में कोई क्षति नहीं। इसके ऊपर तुम कृपा करो।’ तब उन्‍होंने श्री निवास जी को स्‍वयं बुलाया। वे इस छोटे बालक के ऐसे त्‍याग, वैराग्‍य, प्रेम और रूप-लावण्‍य को देखकर बड़ी ही प्रसन्‍न हुईं। प्रिया जी ने उनके ऊपर परम कृपा प्रदर्शित की। इनसे बातें कीं, इनके मस्‍तक पर अपना पैर रखा और अपने घर के बाहरी दालान में इन्‍हें कई दिनों तक रखा। जगन्‍माता विष्‍णुप्रिया जी से विदा होकर ये शान्तिपुर में अद्वैताचार्य की जन्‍मभूमि...

366

श्री श्री चैतन्य चरितावली  366 वहाँ उन्‍होंने विरह-वेदना में बेचैन बैठे हुए पण्डित गोस्‍वामी को देखा। पण्डित गोस्‍वामी चैतन्‍य–विरह में विक्षिप्‍त-से हो गये थे। उनके दोनों नेत्रों से सतत अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। श्री निवास जी ‘हा चैतन्‍य !’ कहते-कहते उनके चरणों में गिर पड़े। आंसुओं के भरे रहने के कारण पण्डित गोस्‍वामी श्री निवास जी को देख नहीं सके। उन्‍होंने अत्‍यन्‍त ही करुणस्‍वर में कहा– ‘भैया ! तुम कौन हो ? इस सुमधुर नाम को सुनाकर तुमने मेरे शिथिल अंगों में पुन: शक्ति का संचार-सा कर दिया है। आज मेरे हृदय में तुम्‍हारे इन सुमधुर वाक्‍यों से बडी शान्ति-सी प्रतीत हो रही है। तुम श्री निवास तो नहीं हो ? दोनों हाथों की अं‍जलि बांधे हुए श्री निवास जी ने कहा– ‘प्रभो! इस अधम भाग्‍यहीन का ही नाम श्री निवास है। स्‍वामिन ! इस दीन-हीन कंगाल का नाम आपको याद है, प्रभो ! मैं बड़ा हतभागी हूँ कि इस जीवन में श्री चैतन्‍य-चरणों के साक्षात दर्शन न कर सका। महाप्रभु यदि स्‍वप्‍न में मुझे आदेश न देते तो मैं उसी क्षण अपने प्राणों को विसर्जन करने का संकल्‍प कर चुका था। चैतन्‍य–चरणों के दर्शन बिना इस जीव...

365

श्री श्री चैतन्य चरितावली  365- श्री श्री निवासाचार्य जी…. आचार्य श्री निवास जी के पूजनीय पितृदेव श्री चैतन्‍यदास बर्दवान जिले के अन्‍तर्गत चाकन्‍दी नामक ग्राम में रहते थे। वे श्री चैतन्‍यदेव के अनन्‍य भक्‍तों में से थे। असल में उनका नाम तो था गंगाधर भट्टाचार्य, किन्‍तु श्री चैतन्‍य के प्रेम-बाहुल्‍य के कारण लोग इन्‍हें ‘चैतन्‍यदास’ कहने लगे थे।महाप्रभु जब गृह त्‍यागकर कटवा में केशव भारती के स्‍थान पर संन्‍यास-दीक्षा लेने आये, तब वहाँ उनके दर्शनों के लिये बहुत से आदमी आये हुए थे। उन आगत मनुष्‍यों में से भट्टाचार्य गंगाधरजी भी थे। उन्‍होंने यह हृदयविदारक दृश्‍य अपनी आँखों से देखा था। बस, उसी शोक में ये पागलों की तरह हा चैतन्‍य ! हा चैतन्‍य ! कहकर फिरने लगे, तभी से वे चैतन्‍यदास के नाम से पुकारे जाने लगे ! ईश्‍वर की इच्‍छा बडी ही प्रबल होती है। वृद्धावस्‍था में चैतन्‍यदास जी को सन्‍तान का मुख देखने की इच्‍छा हुई। विवाह तो इनका बहुत पहले ही हो चुका था, इनकी धर्म पत्‍नी श्री लक्ष्‍मीप्रिया जी बड़ी ही पतिपरायणा सती-साध्‍वी नारी थीं। वे अपने पति को संसारी विषयों से विरक्‍त देखकर खिन्‍न न...

368

श्री श्री चैतन्य चरितावली  368 निवासाचार्य जी का पुण्‍यमय अलौकिक शरीर वृन्‍दावन भूमि के पावन कणों के साथ एकीभूत हो गया। वे वैष्‍णवों के परम आदरणीय आचार्य अपनी अनुपम भक्ति और त्‍यागमयी वृत्ति के द्वारा प्रवृत्तिपक्ष वाले वैष्‍णवों के लिये एक परम आदर्श उपस्थित कर गये। ठाकुर नरोत्‍तमदास जी…. पद्मा नदी के किनारे पर खेतरी नाम की एक छोटी सी राजधानी है। उसी राज्‍य में स्‍वामी श्री कृष्‍ण नन्‍ददत्त मजूमदार के यहाँ नारायणी देवी के गर्भ से ठाकुर नरोत्तमदास जी का जन्‍म हुआ। ये बाल्‍यकाल से ही विरक्‍त थे। घर में अतुल ऐश्‍वर्य था, सभी प्रकार के संसारी सुख थे, किन्‍तु इन्‍हें कुछ भी अच्‍छा नहीं लगता था। ये वैष्‍णवों के द्वारा श्रीगौरांग की लीलाओं का श्रवण किया करते थे। श्रीरूप तथा सनातन और श्री रघुनाथ दास जी के त्‍याग और वैराग्‍य की कथाएँ सुन-सुनकर इनका मन राज्‍य, परिवार तथा धन-सम्‍पत्ति से एकदम फिर गया। ये दिन-रात श्री गौरांग की मनोहर मूर्ति का ही ध्‍यान करते रहे। सोते-जागते, उठते-बैठते इन्‍हें चैतन्यलीलाएँ ही स्‍मरण होने लगीं। घर में इनका चित्त एकदम नहीं लगता था। इसलिये ये घर को छोड़कर कहीं भा...

364

श्री श्री चैतन्य चरितावली  364 जाह्नवी जी आज तक कभी श्रीविष्‍णुप्रिया जी से साक्षात्‍कार नहीं हुआ था। अपने पति अवधूत नित्‍यानन्‍द द्वारा वे विष्‍णुप्रिया जी के गुणों को सुनती रहती थीं। अब जब उन दोनों ने विष्‍णुप्रिया जी के ऐसे कठारे तप की बात सुनी तब तो श्री विष्‍णुप्रिया जी के दर्शनों की उनकी इच्‍छा प्रबल हो उठी। वे दोनों शान्तिपुर से श्री अद्वैताचार्य के घर आयीं और वहाँ से अद्वैताचार्य की गृहिणी श्री सीता देवी को साथ लेकर विष्‍णुप्रिया जी के दर्शनों को चलीं। नवद्वीप में वे वंशीवदन के घर आकर उतरीं। इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि वंशीवदन इस असार संसार को सदा के लिये त्‍याग गये थे, उनके चैतन्‍यदास और निताई दास ये दो पुत्र थे। बड़े पुत्र के उन दिनों एक पुत्र हुआ था, जिसका नाम घर वालों ने रामचन्‍द्र रखा था। आग चलकर ये ही रमाई पण्डित के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनमें वंशीवदन का अंश माना जाता है। विष्णु प्रिया जी ने अवधूत की धर्मपत्नियों के आगमन का समाचार सुना। उन्‍होंने उन बेचारियों को पहले कभी नहीं देखा था। हां, वे सुना करती थीं कि अवधूत अब गृहस्‍थी बनकर रहते हैं। प्रिया जी बाहर तो ...

363

श्री श्री चैतन्य चरितावली  363- उसी समय स्‍वप्‍न में विष्णु प्रियाजी ने देखा– मानों प्रत्‍यक्ष श्री गौरांग आकर कह रहे हैं– ‘जिस नीम के नीचे मैंने माता के स्‍तन का पान किया था, उसी के नीचे मेरी काष्‍ठ की मूर्ति स्‍थापित करो, मैं उसी में आकर रहूँगा।’  विष्‍णुप्रिया देवी उसी समय चौंककर उठ बैठीं, प्रात:काल होने को था, वंशीवदन भी जाग गया और उसने भी उसी क्षण ठीक यही स्‍वप्‍न देखा था। जब दोनों ने परस्‍पर एक-दूसरे को स्‍वप्‍न की बात सुनायी, तब तो शीघ्र ही दारुमयी मूर्ति की स्‍थापना का अयोजन होने लगा। वंशीवदन ने उसी नीम की एक सुन्‍दर लकडी काटकर बढ़ई से एक बहुत ही सुन्‍दर श्री गौरांग की मूर्ति बनवायी। पंद्रह दिन में मूर्ति बनकर तैयार हो गयी, वंशीवदन ने लोहे की सलाका से उस पर अपना नाम खोदा। जब वस्‍त्राभूषण पहनाकर श्रीगौरांग विग्रह को सिंहासन पर पधराया गया, तब सभी को उसमें प्रत्‍यक्ष श्रीगौरांग के दर्शन होने लगे। वंशीवदन ने दूर-दूर से भक्‍तों को बुलाकर खूब धूमधाम से उस मूर्ति की प्रतिष्‍ठा की और एक बड़ा भारी भण्‍डारा किया। विष्णु प्रिया जी ने श्रीविग्रह की नित्‍य-नैमित्तिक पूजा के निमित्त...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली 356- श्रीकृष्‍ण के अंग की उस दिव्‍य गन्‍ध के वश में नासिका हो गयी है, वह सदा उसी गन्‍ध की आशा करती रहती है। कभी तो उस गन्‍ध को पा जाती है और कभी नहीं भी पाती है। जब पा लेती है तब पेट भरकर खूब पीती है और फिर भी ‘पीऊँ और पीऊँ’ इसी प्रकार कहती रहती है। नहीं पाती तो प्‍यास से मर जाती है।इस नटवर मदनमोहन ने रूप की हाट लगा रखी है। ग्राहकरूपी जो जगत की स्त्रियां हैं उन्‍हें लुभाता है। यह ऐसा विचित्र व्‍यापारी है कि बिना ही मूल्‍य वैसे ही उस दिव्‍य गन्‍ध को दे देता है और गन्‍ध को देकर अन्‍धा बना देता है। जिससे वे बेचारी स्त्रियों अपने घर का रास्‍ता भूल जाती हैं। इस प्रकार गन्‍ध के द्वारा जिनका मन चुराया गया है, ऐसे गौरहरि भ्रमर की भाँति इधर-उधर दौड़ रहे थे। वे वृक्ष और लताओं के समीप जाते हैं कि कहीं श्रीकृष्‍ण मिल जायँ किन्‍तु वहाँ श्रीकृष्‍ण नहीं मिलते, केवल उनके शरीर की दिव्‍य गन्‍ध ही मिलती हैं।इस प्रकार श्रीकृष्‍ण की गंध के पीछे घूमते-घूमते सम्‍पूर्ण रात्रि  व्‍यतीत हो गयी। निशा अपने प्राणनाथ के वियोगदु:ख के स्‍मरण से कुछ म्‍लान-सी हो गयी। उसके मुख का तेज फीका ...