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श्री श्री चैतन्य चरितावली 372- इन्होंने भी भक्तितत्त्व की खूब पर्यालोचना की है, इनके बनाये हुए चार ग्रन्थ प्रसद्धि हैं– (1) बृहद्भागवतामृत (दो खण्ड), (2) हरिभक्तिविलास, टीकादिक प्रदर्शिनी, (3) वैष्णवतोषिणी (दशम स्कन्ध की टिप्पणी), (4) लीलास्तव (दशम चरित्र)। सत्तर वर्ष की आयु में सं. 1615 (ईस्वी सन 1558) की आषाढ सुदी चतुर्दशी के दिन इनका गोलोकगमन बताया जता है। ये परम विनयी, भागवत और भगवत-रस-रसिक वैष्णव थे। 3 – श्री जीवगोस्वामी जी श्री अनूप तनय स्वामी श्रीजीव जी का वैराग्य परमोत्कृष्ट था। ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। स्त्रियों के दर्शन तक नहीं करते थे। पिता के वैकुण्ठवास हो जाने पर और दोनों ताऊओं के गृहत्यागी विरागी बन जाने पर इन्होंने भी उन्हीं के पथ का अनुसरण किया और ये भी सब कुछ छोड़कर श्री वृन्दावन में जाकर अपने पितृव्यों के चरणों का अनुसरण करते हुए शास्त्र-चिन्तन और श्रीकृष्ण-कीर्तन में अपना समय बिताने लगे। ये अपने समय के एक नामी पण्डित थे। व्रजमण्डल में इनकी अत्यधिक प्रतिष्ठा थी। देवताओं को भी अप्राप्य व्रज की पवित्र भूमि को परित्याग करके ये कहीं भी कि...