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श्री श्री चैतन्य चरितावली 140- प्रभु की हुंकार और गर्जना को सुनकर सभी लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। लोगों को भयभीत देखकर श्रीवास पण्डित ने प्रभु से भाव-संवरण करने की प्रार्थना की। श्रीवास की प्रार्थना पर प्रभु मूर्च्छित होकर गिर पड़े और थोड़ी देर में प्रकृतिस्थ हो गये। एक बार वनमाली आचार्य नाम का एक कर्मकाण्डी की ब्राह्मण अपने पुत्र सहित प्रभु के पास आया और उनके पादपद्मों में प्रणाम करके उसने अपनी निष्कृति का उपाय पूछा। प्रभु ने उसके ऊपर कृपा प्रदर्शित करते कहा- ‘इस कलिकाल में कर्मकाण्ड की क्रियाओं का सांगोपांग होना बड़ा दुस्साध्य है। अन्य युगों की भाँति इस युग में द्रव्य-शुद्धि, शरीरशुद्धि बन ही नहीं सकती। इसलिये इस युग में तो बस, एकमात्र भगवन्नाम ही आधार है।’ जैसा कि सभी शास्त्रों में बताया गया है- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा। प्रभु के उपदेशानुसार वह कर्मकाण्डी ब्राह्मण परम भागवत वैष्णव बन गया। एक दिन प्रभु विष्णु-मण्ड पर बैठकर बलदेव जी के आवेश में आकर ‘मधु लाओ, मधु लाओ’ इस प्रकार कहने लगे। नित्यानंद ...