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Showing posts from January, 2023

cc 140

श्री श्री चैतन्य चरितावली  140- प्रभु की हुंकार और गर्जना को सुनकर सभी लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। लोगों को भयभीत देखकर श्रीवास पण्डित ने प्रभु से भाव-संवरण करने की प्रार्थना की। श्रीवास की प्रार्थना पर प्रभु मूर्च्छित होकर गिर पड़े और थोड़ी देर में प्रकृतिस्‍थ हो गये। एक बार वनमाली आचार्य नाम का एक कर्मकाण्‍डी की ब्राह्मण अपने पुत्र सहित प्रभु के पास आया और उनके पादपद्मों में प्रणाम करके उसने अपनी निष्‍कृति का उपाय पूछा। प्रभु ने उसके ऊपर कृपा प्रदर्शित करते कहा- ‘इस कलिकाल में कर्मकाण्‍ड की क्रियाओं का सांगोपांग होना बड़ा दुस्‍साध्‍य है। अन्‍य युगों की भाँति इस युग में द्रव्‍य-शुद्धि, शरीरशुद्धि बन ही नहीं सकती। इसलिये इस युग में तो बस, एकमात्र भगवन्‍नाम ही आधार है।’ जैसा कि सभी शास्‍त्रों में बताया गया है- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्‍त्‍येव नास्‍त्‍येव नास्‍त्‍येव गतिरन्‍यथा। प्रभु के उपदेशानुसार वह कर्मकाण्‍डी ब्राह्मण परम भागवत वैष्‍णव बन गया। एक दिन प्रभु विष्‍णु-मण्‍ड पर बैठकर बलदेव जी के आवेश में आकर ‘मधु लाओ, मधु लाओ’ इस प्रकार कहने लगे। नित्‍यानंद ...

cc 139

श्री श्री चैतन्य चरितावली 139- आनन्‍द क्‍या है? कोई मीठी चीज हो तो मंगाओ, दूध के पश्‍चात मीठा मुंह होगा!” आम के रस को चूसते हुए नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘प्रभों! ये लोग वाममार्गी हैं। मदिरा को ‘आनन्‍द’ कहकर पुकारते हैं। यह सुनकर प्रभु को बड़ा दु:ख हुआ। वे चारों ओर घिरे हुए सिंह की भाँति देखने लगे। इतने में ही स्‍त्री के बुलाने पर संन्‍यासी महाशय भीतर चले गये। उसी समय प्रभु जलपान के बीच में से ही उठकर दौड़ पड़े। नित्‍यानंद जी भी पीछे-पीछे दौड़े। इन दोनों को जलपान के बीच में ही भागते देखकर संन्‍यासी जी भी इन्‍हें लौटाने के लिये चले। प्रभु जल्‍दी से गंगा जी में कूद पड़े और तैरते हुए शांतिपुर की ओर चलने लगे। नित्‍यानंद जी तो तैरने के आचार्य ही थे, वे भी प्रभु के पीछे-पीछे तैरने लगे। गंगा जी के बीच में ही प्रभु का आवेश आ गया। दो कोस के लगभग तैरकर ये शांतिपुर के घाटपर पहुँचे और घाट से सीधे ही आचार्य के घर पहुँचे। दूर से ही हरिदास जी ने प्रभु को देखकर उनकी चरण-वंदना की, किंतु प्रभु को कुछ होश नहीं था, वे सीधे अद्वैताचार्य के ही समीप पहुँचे। उन्‍हें देखते ही प्रभु ने कहा- ‘क्‍यों! फिर सूत्र ज्ञान...

cc 138

श्री श्री चैतन्य चरितावली  138- प्रभु के बैठ जाने पर मुरारी ने विनीतभाव से इस प्रकार असमय में पधारने का कारण जानना चा‍हा। प्रभु ने कुछ हंसते हुए कहा- ‘तुम्‍हीं तो वैद्य होकर आफल कर देते हो। लाओ कुद ओषधि तो दो।’ आश्‍चर्य प्रकट करते हुए मुरारी ने पूछा- ‘प्रभो! ओषधि कैसी? किस रोग की ओषधि चाहिये? रातभर में ही क्‍या विकार हो गया? प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘तुम्‍हें मालूम नहीं है क्‍या विकार हो गया? अपनी स्‍त्री से तो पूछो। रात को तुमने मुझे कितना घृतमिश्रित दाल-भात खिला दिया। तुम प्रेम से खिलाते जाते थे, मैं भला तुम्‍हारे प्रेम की उपेक्षा कैसे कर सकता था? जितना तुमने खिलाया, खाता गया। अब अजीर्ण हो गया है और उसकी ओषधि भी तुम्‍हारे पास ही रखी है। यह देखो, यही इस अजीर्ण की ओषधि है।’ यह कहते हुए प्रभु वैद्य की खाट के समीप रखे हुए उनके उच्छिष्‍ट पात्र का जल पान करने लगे। मुरारी यह देखकर जल्‍दी से प्रभु को ऐसा करने से निवारण करने लगे। किंतु तब तक प्रभु आधे से अधिक जल पी गये। यह देखकर मुरारी प्रेम के रोते-रोते प्रभु के पादद्मों में लोटने लगे। एक दिन प्रभु ने अत्‍यंत ही स्‍नेह के सहित मुरारी गुप्...

cc 137

श्री श्री चैतन्य चरितावली  137- निहाल हो जाते हैं, धन्‍य हो जाते हैं, लज्‍जा, घृणा तथा भय से रहित होकर वे भी पागलों की भाँति प्रलाप करने लगते हैं। उन पागलों के चरित्र में कितना आनन्‍द है, कैसा अपूर्व रस है। उनकी मार-पीट,गाली-गलौज, स्‍तुति-प्रार्थना, भोजन तथा शयन सभी कामों में प्रेम का सम्‍पुट लगा होने से ये सभी काम दिव्‍य और अलौकिक- से प्रतीत होते हैं। उनके श्रवण से सहृदय पुरुषों को सुख होता है, वे भी उस प्रेमासव के लिये छटपटाने लगते हैं और उसी छटपटाहट के कारण वे अंत में प्रभु-प्रेम के अधिकारी बनते हैं।महाप्रभु अब भक्‍तों के साथ लेकर नित्‍यप्रति बड़ी ही मधुर-मधुर लीलाएँ करने लगे। जब से जगाई-मधाई का उद्धार हुआ और वे अपना सर्वस्‍व त्‍यागकर श्रीवास पण्डित के यहाँ रहने लगे, तब से भक्‍तों का उत्‍साह अत्‍यधिक बढ़ गया है। अन्‍य लोग भी संकीर्तन के महत्त्व को समझने लगे हैं। अब संकीर्तन की चर्चा नवद्वीप में पहले से भी अधिक होने लगी है। निंदक अब भाँति-भाँति से कीर्तन को बदनाम करने की चेष्‍टा करने लगे हैं। मुरारी गुप्‍त प्रभु के सहपाठी थे, वे प्रभु से अवस्‍था में भी बड़े थे। प्रभु उन्‍हें अत्‍...

cc136

श्री श्री चैतन्य चरितावली  136- प्राण रहते तो मैं उस दुष्‍ट के साथ कभी न जाऊँगी।इस शरीर पर तो उन भगवान वासुदेव का ही अधिकार है। जीवित शरीर का वे ही उपभोग कर सकते है।’ यह सोचकर वह अपने प्राणनाथ के लिये प्रेम-पाती लिखने को बैठी- श्रुत्‍वा गुणान्‍भुवनसुंदर श्रृण्‍वतां ते निर्विश्‍य कर्णविवरैर्हरतोऽंगतापम्। रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे। इस प्रकार सात श्‍लोक लिखकर एक ब्राह्मण के हाथ उसने अपनी वह प्रणयरस से पूर्ण पाती द्वारिका को भगवान के पास भिजवायी। महाप्रभु भी उसी तरह से हाथ के नखों के द्वारा रुक्मिणी के भावावेश में अपने प्‍यारे श्रीकृष्‍ण को प्रेमपाती-सी लिखने लगे। वे उसी भाव से विलख-विलखकर रुदन करने लगे और रोते-रोते उन्‍हीं भावों को प्रकट भी करने लगे। कुछ काल के अनन्‍तर वह भाव शांत हुआ। बाहर रंगमंच पर अद्वैताचार्य सुप्रभा और गोपी के साथ मधुर भाव की बातें कर रहे थे। हरिदास कंधे पर लट्ठ रखकर ‘जागो-जागो’ कहकर घूम रहे थे। सभी भक्त प्रेम में विभोर होकर रुदन कर रहे थे। इतने में ही जगन्‍मोहिनी रूप को धारण किये हुए प्रभु ने रंग-मंचपर प्रवेश किया। प्रभु के...

cc 135

श्री श्री चैतन्य चरितावली  135- इतने में ही क्या देखते हैं कि हाथ में वीणा लिये हुए पीले वस्त्र पहने सफेद दाढ़ी वाले नारद जी अपने शिष्‍य के सहित रंग-मंच पर ‘श्रीकृष्‍ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव’ इस पद को गाते हुए धीरे-धीरे घुम रहे हैं। उस समय श्रीवास नारद-वेश में इतने भले मालूम पड़ते थे कि कोई उन्हें पहचान ही नहीं सकता था कि ये श्रीवास पण्डित हैं। शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी,रामनामी दुपट्टा ओढे़ कमण्‍डलु हाथ में लिये नारद जी के पीछे-पीछे घूम रहे थे। स्त्रियाँ श्रीवास के इस रूप को देखकर विस्मित हो गयीं! शचीमाता ने हंसकर मालिनी देवी से पूछा- ‘‍क्यों? यही तुम्हारे पति हैं न? मालिनी देवी ने कुछ मुसकराते हुए कहा- ‘क्या पता तुम ही जानो!’ श्रीवास पण्डित ने वेश ही नारद का नहीं बना रखा था, सचमुच उन्हें उस समय नारद मुनि का वास्तविक आवेश हो आया था। उसी आवेश में आपने अपने साथ के शिष्‍य से कहा- ‘ब्रह्मचारी! क्या बात है? यहाँ तो नाटक का कोई रंग-ढंग दिखायी नहीं पड़ता?’ उसी समय सूत्रधार के साथ सुप्रभा के सहित गोपीवेश में गदाधर ने प्रवेश किया। इन्हें देखकर नारद जी ने पूछा- ‘तुम कौन हो?’...

cc 134

श्री श्री चैतन्य चरितावली  134- बुद्धिमन्त खाँ जमीदार और धनवान थे, वे भाँति-भाँति साज-बाज के सामान आचार्यरत्न के घर ले आये। एक ऊंचे चबूतरा पर रंगमंच बनाया गया। दायीं ओर स्त्रियों के बैठने की जगह बनायी गयी और सामने पुरुषों के लिये। नियत समय पर सभी भक्‍तों की स्त्रियाँ आचार्यरत्न के घर आ गयीं। मालिनी देवी और श्री विष्‍णुप्रिया के सहित शचीमाता भी नाटयाभिनय को देखने के लिये आ गयीं। सभी भक्त क्रमश: इकट्ठे हो गये। सभी भक्तों के आ जाने पर किवाड़ बंद कर दिये गये और लीला-अ‍भिनय आरम्भ हुआ। भीतर बैठे हुए आचार्य वासुदेव पात्रों का रंगमंच पर भेजने के लिये सजा रहे थे। इधर पर्दा गिरा। सबसे पहले मंगलाचरण हुआ। अभिनय में गायन करने के लिये पांच आदमी नियुक्त थे। पुण्‍डरीक, विद्यानिधि, चन्द्रशेखर आचार्यरत्न और श्रीवास पण्डित के रमाई आदि तीनों भाई। विद्यानिधि का कण्‍ठ बड़ा ही मधुर था। वे पहले गाते थे। उनके स्वर में ये चारों अपना स्वर मिलाते थे। विद्यानिधि ने सर्वप्रथम अपने कोमल कण्‍ठ से इस श्‍लोक का गायन किया- जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम्।। स्थिरचरवृजिनघ्‍न: सुस्मितश्...

cc133

श्री श्री चैतन्य चरितावली  133- रजनी की नीरवता की नाश करती हुई यमुना अपने नीले रंग के जल के साथ हुंकार करती हुई धीरे-धीरे बह रही थी। उसी समय मोहन की मनोहर मुरली की सुरीली तान गोपिकाओं के कानों में पड़ी।’ बस, इतना सुनना था कि प्रभु पछाड़ खाकर भूमि पर गिर पड़े और आँखों से अविरल अश्रु बहाते हुए श्रीवास पण्डित से कहने लगे- ‘हाँ, फिर क्‍या हुआ? आगे कहो। कहते क्‍यों नहीं? मेरे तो प्राण उस मुरली की सुरीली तान को सुनने के लिये लालायित हो रहे हैं।’ श्रीवास फिर कहने लगे- ‘उस मुरली की ध्‍वनि जिसके कानों में पड़ी, जिसने वह मनमोहनी तान सुनी, वही बेसुध हो गयी। सभी अकी-सी, जकी-सी, भूली-सी, भटकी-सी हो गयीं। उन्‍हें तन-बदन की तनिक भी सुधि न रही। उस समय- निशम्‍य गीतं तदनंगवर्धनं व्रजस्त्रिय: कृष्‍णगृहीतमानसा:।  आजग्‍मुरन्‍योन्‍यमलक्षितोद्यमा: स यत्र कान्‍तो जवलोलकुण्‍डला:। ‘उस अनंगवर्धन करने वाले मुरली के मनोहर गान को सुनकर जिनके मन को श्रीकृष्‍ण ने अपनी ओर खींच लिया है, ऐसी उन गोकुल की गोपियों ने सापत्‍न्‍य-भाव से अपने अनेकों उद्योग को एक-दूसरी पर प्रकट नहीं किया। वे श्रीकृष्‍ण की उस जगन्‍मोहन...

cc 132

श्री श्री चैतन्य चरितावली  132- श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘मुझे तो इनसे पहले भी कभी द्वेष नहीं था और अब भी नहीं है, यदि प्रभु ने इन्‍हें क्षमा कर दिया है, तो ये अब दु:ख से मुक्‍त हो ही गये। देखते-ही-देखते उसका सम्‍पूर्ण शरीर नीरोग हो गया। इसी प्रकार एक दिन एक और ब्राह्मण संकीर्तन देखने के लिये आया। जब उसने किवाड़ों को भीतर से बंद देखा तब तो वह क्रोध के मारे आगबबूला हो गया और की‍र्तन वालों को खरी-खोटी सुनाता हुआ अपने घर लोट गया। दूसरे दिन गंगा जी के घाटपर जब उसने प्रभु के सहित स्‍नान करते देखा तब तो उसने क्रोध में भरकर प्रभु से कहा- ‘तुम्‍हें अपने कीर्तन का बड़ा अभिमान है। दस-बीस भोले-भाले लोगों को कठपुतलियों की तरह हाथ के इशारे से नचाते रहते हो। लोग तुम्‍हारी पूजा करते हैं, इससे तुम्‍हें बड़ा अहंकार हो गया है। जाओ मैं तुम्‍हें शाप देता हूँ, कि जिस संसारी सुख के मद में तुम इतने भूले हुए हो, वह तुम्‍हारा संसारी सुख शीघ्र ही नष्‍ट हो जाय।’ ब्राह्मण के ऐसे वाक्‍यों को सुनकर सभी भक्‍त आश्‍चर्य के साथ उस ब्राह्मण के मुख की ओर देखने लगे। कुछ लोगों को थोड़ा क्रोध भी आ गया, प्रभु ने उन सबको रो...

cc 131

श्री श्री चैतन्य चरितावली  131- वे कलिकाल में श्रीभगवन्‍नाम को ही मुख्‍य समझते थे और सभी कर्मों को गौण मानते हुए भी उन्‍होंने गार्हस्‍थ्‍य-जीवन में न तो स्‍वयं ही उन सबका परित्‍याग किया और न कभी उनका खण्‍डन ही किया। वे स्‍वयं दोनों कालों की संख्‍या, तर्पण, पितृश्राद्ध, पर्व, उत्‍सव, तीर्थ, व्रत एवं वैदिक संस्‍कारों को करते तथा मानते थे, उन्‍होंने अपने आचरणों और चेष्‍टाओं द्वारा भी इन सबकी कहीं उपेक्षा नहीं की। श्रीवास, अद्वैताचार्य, मुरारी गुप्‍त, रमाई पण्डित, चन्‍द्रशेखर आचार्य आदि उनके सभी अंतरंग भक्‍त भी परम भागवत होते हुए इन सभी मर्यादाओं का पालन करते थे। भावावेश के समय को छोड़कर वे कभी भी किसी के सामने अपनी बड़ाई की कोई बात नहीं कहते थे। अपने से बड़ों के सामने वे सदा नम्र ही बने रहते। श्रीवास, नंदनाचार्य, चन्‍द्रशेखराचार्य, अद्वैताचार्य आदि अपने सभी भक्‍तों को वे वृद्ध समझकर पहले से प्रणाम करते थे। संसार का एक नियम होता है कि किसी एक ही वस्‍तु के जब बहुत-से इच्‍छुक होते हैं, तो वे परस्‍पर में विद्वेष करने लगते हैं, हमें उस अपनी इष्‍ट वस्‍तु के प्राप्‍त होने की तनिक भी आशा चाहे...

cc 130

श्री श्री चैतन्य चरितावली  130- प्रभु ने इन्हें भाँति-भाँति से आश्‍वासन दिलाया। जगाई तो प्रभु के आश्‍वासन से थोड़ा-बहुत शान्त भी हुआ, किंतु मधाई का पश्‍चात्ताप कम न हुआ। उसे रह-रहकर वह घटना याद आने लगी, जब उसने निरपराध नित्यानन्द जी के मस्तक पर निर्दयता के साथ प्रहार किया था। इसके स्मरण मात्र से उसके रोंगटे खडे़ हो जाते और वह जोरों के साथ रुदन करने लगते। ‘हाय! मैंने कितनी बड़ी निचता की थी। ए‍क महापुरुष को अ‍कारण ही इतना भारी कष्‍ट पहुँचाया। यदि उस समय भगवान का सुदर्शनचक्र आकर मेरा सिर काट लेता या नित्यानन्द जी ही मेरा वध कर डालते तो मैं कृतकृत्य हो जाता। वध करना या कटुवाक्‍य कहना तो अलग रहा, वे महामहिम अवधूत तो उलटे मेरे कल्‍याण के निमित्त प्रभु से प्रार्थना ही करते रहे और प्रसन्नचित्त से भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए हमारा भला ही चाहते रहे। इस प्रकार वह सदा इसी सोच में रहता। एक दिन एकान्त में मधाई ने जाकर श्रीपाद नित्यानन्द जी ने चरण पकड़ लिये और रोते-रोते प्रार्थना की- ‘प्रभो! मैं अत्यन्त ही नीच और पामर हूँ। मैंने घोर पाप किये हैं। उन सब पापों को तो भुला भी सकता हूँ। किंतु आपके ऊपर...

cc129

श्री श्री चैतन्य चरितावली  129- प्रभु की आज्ञा पाते ही दोनों ने अपने-अपने हाथों में जल लिया। तब प्रभु ने गम्‍भीरता स्‍वर में अत्‍यंत ही स्‍नेह के साथ दयार्द्र होकर कहा- ‘आजतक तुम दोनों भाइयों ने जितने पाप किये हों, इन जन्‍म में या पिछले कोटि जन्‍मों में, उन सभी को मुझे दान कर दो।' हाथ के जल को जल्‍दी से फेंकते हुए अत्‍यंत ही दीनता के साथ कातरस्‍वर में उन दोनों भाइयों न कहा- ‘प्रभो! हमारा हृदय फट जायगा। भगवन! हम मर जायँगे। हमें ऐसा घोर कर्म करने की आज्ञा अब न प्रदान कीजिये। प्रभो! हम आपकी इतनी कृपा सहन नहीं कर सकते। हे दीनों के दयाल! जिन चरणों में भक्‍तगण नित्‍यप्रति भाँति-भाँति के सुगन्धित चंदन और विविध प्रकार के पत्र-पुष्‍प चढ़ाते हैं, उनमें हमें अपने असंख्‍यों पापों को चढ़ाने की आज्ञा न दीजिये। संसार हमें धिक्‍कारेगा कि प्रभु के पावन पादपद्मों में इन पापी पामर प्राणियों ने अपने पाप-पुंजों को अर्पण किया। प्रभो! हम दब जायंगे। यह काम हमसे कभी नहीं होने का।‘ प्रभु ने इन्‍हें धैर्य बंधाते हुए कहा- 'भाइयो! तुम घबड़ाओं नहीं। तुम्‍हारे पापों को ग्रहण करके मैं पावन हो जाऊगाँ। मेरा जन्...

cc 128

श्री श्री चैतन्य चरितावली  128- धन, जन, सेना तथा अधिकार सभी के मद में वे अपने को ही कर्ता समझे बैठे थे, इसलिये प्रभु भी इनसे दूर ही रहे आते थे। जिस क्षण ये अपने सभी प्रकार के अधिकार और बलों को भुलाकर निर्बल और निष्किंचन बन गये उसी समय प्रभु ने इन्‍हें अपनी शरण में ले लिया। उस क्षणभर के ही उपशम से वे उम्रभर के पुराने पापी सभी वैष्‍णवों के कृपाभाजन बन गये। प्रपन्‍नता और शरणागति में ऐसा ही जादू है। जिस क्षण ‘तेरा हूँ’ कहकर सच्‍चे दिल से उनसे प्रार्थना करो उसी क्षण वे अपना लेते हैं, वे तो भक्तों के लिये भूखे-से बैठे रहते हैं। लोगों के मुख की ओर ताकते रहते हैं कि कोई अब कहे कि ‘मैं तुम्‍हारा हूँ’, यहाँ तक कि अजामिलने झूठे ही पुत्र के बहाने ‘नारायण’ शब्‍द कह दिया। बस, इतने से ही उसकी रक्षा की और उसके जन्‍मभर के पाप क्षमा कर दिये।भक्‍तगण जगाई-मधाई दोनों भाइयों को साथ लेकर प्रभु के यहाँ आये। सभी भक्त यथास्‍थान बैठ गये। एक उच्‍चासर पर प्रभु विराजमान हुए। उनकें दायें-बायें गदाधर और नित्‍यानंद जी बैठे। सामने वृद्धआचार्य अद्वैत विराजमान थे। इनके अतिरिक्‍त पुण्‍डरीक, विद्यानिधि, हरिदास, गरुड़, ...

cc127

श्री श्री चैतन्य चरितावली  127- आप इनके उद्धार का श्रेय मेरे सिर पर लादना चाहते हैं, किंतु इस बात को तो सभी जानते हैं कि पतितपावन गौर में ही ऐसे पापियों को उबारने की सामर्थ्‍य है।प्रभो! मैं हृदय से कहता हूँ, मेरे हृदय में मधाई के प्रति अणुमात्र भी विद्वेष के भाव नहीं है। यदि मैंने जन्‍म-जन्‍मान्‍तरों में कभी भी कोई सुकृत किया हो, तो उन सबका पुण्‍य मैं इन दोनों भाइयों को प्रदान करता हूँ। इतना सुनते ही प्रभु ने दौड़कर मधाई को अंक में उठा लिया और जोरों से उसका आलिंगन करते हुए कहने लगे- ‘मधाई! अब तुम मेरे अत्‍यंत ही प्रिय हो गये। श्रीपाद ने तुम्‍हें क्षमा कर दिया। उन्‍होंने अपने सभी पुण्‍य प्रदान करके तुम्‍हें भागवत वैष्‍णव बना दिया। तुम आज से मरे अन्‍तरंग भक्‍त हुए। श्रीपाद की कृपा से तुम पापरहित बन गये।' प्रभु का प्रेमालिंगन और आश्‍वासन पाने से मधाई के आनन्‍द की सीमा न रही। वह उसी क्षण मूर्च्छित होकर प्रभु के पादपद्मों में पड़ गया। प्रभु के दोनों पैरों को पकड़े हुए नवद्वीप के सर्वेसर्वा और एकमात्र शासनकर्ता वे दोनों भाई धूलि में लोटे हुए रुदन कर रहे थे। भक्त तथा नगर के अन्‍य नर-नारी ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  126- निताई के ऐसी प्रार्थना करने पर भी प्रभु का क्रोध शांत नहीं हुआ। इधर प्रभु को क्रुद्ध देखकर सभी भक्‍त विस्मित-से हो गये। सभी आश्‍चर्य के साथ प्रभु के कुपित मुख की ओर संभ्रमभाव से देखने लगे। सभी को प्रतीत होने लगा कि आज संसार में महाप्रलय हो जायगा। सम्‍पूर्ण संसार प्रभु के प्रकोप से भस्‍मीभूत हो जायगा। प्रभु की ऐसी दशा देखकर कुछ भक्‍त अपने-आपको न रोक सके। मुरारी गुप्‍त आदि वीर भक्‍त महावीर के आवेश में आकर उन दोनों पापी भाइयों के संहार के निमित्त स्‍वयं उद्यत हो गये। उस समय भक्‍तों के हृदयों में एक प्रकार की भारी खलबली-सी मची हुई थी। उत्तेजित भक्‍त मण्‍डली को देखकर जगाई-मधाई के सभी सेवक डर के कारण थर-थर कांपने लगे। हजारों नर-नारी घटनास्थल पर आ-आकर एकत्रित हो गये। सम्‍पूर्ण नगर में एक प्रकार का कोलाहल-सा मच गया। नित्‍यानंद जी उत्तेजित हुए मुरारी गुप्‍त आदि भक्‍तों के पैरों में गिर-गिरकर उनसे शांत होने के लिये कह रहे थे। प्रभु से भी वे बार-बार शां‍त होने की प्रार्थना कर रहे थे। वे दोनों भाई डरे हुए-से चुपचाप खड़े थे। उन्‍हें कुछ सूझता ही नहीं था कि अब क्‍...

cc125

श्री श्री चैतन्य चरितावली  125- प्रभु ने मुसकराते हुए कहा- ‘भक्‍तवृंद! जिनके उद्धार के निमित्त आप सब लोग इतने चिंतित हैं, जिनकी मंगल-कामना के लिये आप सभी के हृदयों में इतनी अधिक इच्‍छा है, उनका तो उद्धार अब हुआ ही समझो। अब उनके उद्धार में क्‍या देरी है? जिन्‍हें श्रीपाद के दर्शनों का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो चुका, वे पापी रह ही कैसे सकते हैं? श्रीपाद के दर्शन व्‍यर्थ कभी नहीं जाते। ये उनका कल्‍याण अवश्‍य करेंगे।’ प्रभु के ऐसे आश्‍वासन-वाक्‍य सुनकर भक्‍त अपने-अपने स्‍थानों को चले गये। एक दिन रात्रि के समय नित्‍यानंद जी महाप्रभु के घर की ओर आ रहे थे। निताई ने जान-बूझकर, केवल उन दोनों भाइयों के उद्धार के नि‍मित्त ही रात्रि में उधर से आने की बात सोची थी। ये धीरे-धीरे भगवन्‍नाम का उच्‍चारण करते हुए इनके डेरे के सामने होकर ही निकले। उस समय ये दोनों शराब के नशे में चूर हुए बैठे थे। नित्‍यानंद को रात्रि में उधर से जाते देखकर लाल आँखे किये हुए मदिरा की बेहोशी में मधाई ने पूछा- ‘कौन जा रहा है?’ नित्‍यानंद जी भला क्‍यों उत्तर देने वाले थे, वे चुप ही रहे, इस पर उसने डांटकर जोर से कहा- ‘अरे, कौन जा...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  123- उनका स्‍वभाव ही ऐसा होता है कि बिना कहे ही वे दीन-दु:खियों पर दया करते रहते हैं। बिना दया किये वे रह ही नहीं सकते। जैसे कि नीतिकारों ने कहा है- पद्माकरं दिनकरो विकचं करोति चन्‍द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्। नाभ्‍यर्थितो जलधरोअपि जलं ददाति  सन्‍त: स्‍वयं परहितेषु कृताभियोगा:। रात्रि के दु:ख से सिकुड़े हुए कमल मरीचिमाली भगवान भुवन-भास्‍कर के समीप अपना दुखड़ा रोने के लिये नहीं जाते, बिना कहे ही कमलबन्धु भगवान दिवाकर उनके दु:खों को दूर करके उन्हें विकसित कर देते हैं। कुमुदिनीकी लज्जा से अवगुण्ठित कलिका को कलानाथ भगवान शशधर स्वयं ही प्रस्फुटित कर देते हैं। बिना याचना के ही जल से भरे हुए मेघ अपने सम्पूर्ण जल को बरसाकर प्राणियों के दु:ख को दूर करते हैं। इसी प्रकार महान संतगण भी स्वयं ही दूसरों के उपकार के निमित्त सदा कुछ-न-कुछ उद्योग करते ही रहते हैं। परोपकार करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। जैसे सभी प्राणी जान में, अनजान में स्वांस लेते ही रहते हैं, उसी प्रकार संत-महात्मा जो-जो भी चेष्‍टा करते हैं, वे सभी लोक-कल्याणकारी ही होती हैं। हंसते हुए नित्यानन्दज...

cc124

श्री श्री चैतन्य चरितावली  124- जैसे सभी प्राणी जान में, अनजाने में स्वांस लेते ही रहते हैं, उसी  प्रकार संत-महात्मा जो-जो भी चेष्‍टा करते हैं, वे सभी लोक-कल्याणकारी ही होती हैं। जगाई-मधाई का उद्धार..... सचमुच में जिसका हृदय कोमल है, जो सभी प्राणियों को प्रेम की दृष्टि से देखता है, जिसकी बुद्धि घृणा और द्वेष के कारण मलिन नहीं हो गयी है, परोपकार करना जिसका व्यसन ही बन गया है, ऐसा साधु पुरुष यदि सच्चे हृदय से किसी घोर पापी-से-पापी का भी कल्याण चाहे तो उसके धर्मात्मा बनने में संदेह ही नहीं। महात्माओं की स्वाभाविक इच्छा अमोघ होती है, यदि वे प्रसन्नतापूर्वक किसी के ओर देखभर लें, बस, उसी समय उसका बेड़ा पार है। साधुओं के साथ खोटी बुद्धि से किया हुआ संग भी व्यर्थ नहीं होता। साधुओं से द्वेष रखने वालों का भी कल्याण ही होते देखा गया है, यदि पापी के ऊपर किसी अपराध के कारण कभी क्रोध न करने वाले महात्माओं को दैवात क्रोध आ गया तब तो उसका सर्वस्व ही नाश हो जाता है, किंतु प्राय: महात्माओं को क्रोध कभी नाममात्र को ही आता है, वे अपने अहित करने वाले का भी सदा हित ही करते हैं। प्रहार करने पर भी वे...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  121- जिस मुहल्‍ले में इनका डेरा पड़ जाता, उस मुहल्‍ले के लोगों के प्राण सूख जाते। कोई भी इनके सामने होकर नहीं निकलता था, सभी आँख बचाकर निकल जाते। इस प्रकार इनके पाप पराकाष्‍ठापर पहुँच गये थे। उस समय ये नवद्वीप में अत्‍याचारों के लिये रावण-कंस की तरह, व‍क्रदंत-शिशुपाल की तरह, नादिरशाह-गजनी की तरह तथा डायर-आडायर की तरह प्रसिद्ध हो चुके थे।एक दिन ये मदिरा के मद में उन्‍मत्त हुए पागलों की भाँति प्रलाप-सा करते हुए लाल-लाल आँखें किये जा रहे थे। रास्‍ते में नित्‍यानंद जी और हरिदास जी ने इन्‍हें देखा। इनकी ऐसी शोचनीय और विचित्र दशा देखकर नवद्वीप में नये ही आये हुए नित्‍यानंद जी लोगों से पूछने लगे- ‘क्‍यों जी! ये लोग कौन हैं और इस प्रकार पागलों की तरह क्‍यों बकते जा रहे हैं? वेषभूषा से तो ये कोई सभ्‍य पुरुष-से जान पड़ते हैं!’ लोगों ने कुछ सूखी हंसी हंसते हुए उत्तर दिया- ‘मालूम पड़ता है अभी आपको इनसे पाला नहीं पड़ा है। तभी ऐसी बातें पूछ रहे हैं। ये यहाँ के साक्षात यमराज हैं। पापियों को भी सम्भवतया यमराज से इतना डर न लगता होगा जितना कि नवद्वीप के नर-नारियों को इन नर...