श्री श्री चैतन्य चरितावली 375 यह संसार समुद्र के समान है। मुझे इसमें तुमने क्यों फेंक दिया, हे नाथ ! इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं। मैं अपने कर्मों के अधीन होकर ही इसमें गोते लगा रहा हूँ, बार-बार डूबता हूँ और फिर तुम्हारी करुणा के सहारे ऊपर तैरने लगता हूँ।इस अथाह सागर के सम्बन्ध में मैं कुछ भी नहीं जानता कि यह कितना गहरा है, किन्तु हे मेरे रमण ! मैं इसमें डुबकियाँ मारते-मारते थक गया हूँ। कभी-कभी खारा पानी मुंह में चला जाता है, तो कैसी होने लगती है। कभी कानों में पानी भर जाता है, तो कभी आँखें ही नमकीन जल से चिरचिराने लगती हैं। कभी-कभी नाक में होकर भी जल चला जाता है। हे मेरे मनोहर मल्लाह ! हे मेरे कोमल प्रकृति केवट ! मुझे अपना नौकर जानकर, सेवक समझकर कहीं बैठने का स्थान दो। तुम तो ग्वाले के छोकरे हो न, बड़े चपल हो। पूछ सकते हो, ‘इस अथाह जल में मैं बैठने के लिये तुझे स्थान कहाँ दूँ। मेरे पास नाव भी तो नहीं जिसमें तुम्हें बिठा लूँ।’ तो हे मेरे रसिकशिरोमणि ! मैं चालाकी नहीं करता, तुम्हें भुलाता नहीं सुझाता हूँ। तुम्हारे पास एक ऐसा स्थान है, जो जल में रहने पर भी नहीं डूबता और उस...