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Showing posts from December, 2022

cc 106

श्री श्री चैतन्य चरितावली  106- आगे किसी को ऐसा काम करने की हिम्मत ही न पड़े। इस्लाम धर्म के अनुसार तो इसकी सजा प्राण दण्ड ही है। किंतु सीधे-सादे प्राणदण्ड देना ठीक नहीं। इसकी पीठ पर बेंत मारते हुए इसे बाईस बाजारों में होकर घुमाया जाय और बेंत मारते-मारते ही इसके प्राण लिये जायँ। तभी सब लोगों को आगे ऐसा करने की हिम्मत न होगी। मुलुकपति ने विवश होकर यही आज्ञा लिख दी। बेंत मारने वाले नौकरों ने महात्मा हरिदास जी को बाँध लिया और उनकी पीठ पर बेंत मारते हुए उन्हें बाजारों में घुमाने लगे। निरन्तर बेंतों के आघात से हरिदास के सुकुमार शरीर की खाल उधड़ गयी। पीठ में से रक्त की धारा बहने लगी। निर्दयी जल्लाद उन घावों पर ही और भी बेंत मारते जाते थे, किंतु हरिदास के मुख में से वही पूर्ववत हरिध्वनि ही हो रही थी। उन्हें बेंतों की वेदना प्रतीत ही नहीं होती थी। बाजार में देखने वाले उनके दुःख को न सह सकने के कारण आँखें बंद कर लेते थे, कोई-कोई रोने भी लगते थे, किंतु हरिदास जी के मुख से ‘उफ’ भी नहीं निकलती थी। वे आनन्द के साथ श्रीकृष्ण का कीर्तन करते हुए नौकरों के साथ चले जा रहे थे। उन्हें सभी बाजार में घु...

cc 103

श्री श्री चैतन्य चरितावली  103- जिसकी जिह्वा को सुमधुर श्रीहरि के नामरूपी रस का चस्का लग गया है, उसके लिये फिर संसार में प्राप्त वस्तु ही क्या रह जाती है? यज्ञ, याग, जप, तप, ध्यान, पूजा, निष्ठा, योग, समाधि सभी का फल भगवन्नाम में प्रीति होना ही है, यदि इन कर्मों के करने से भगवन्नाम में प्रीति नहीं हुई, तो इन कर्मों को व्यर्थ ही समझना चाहिये। इन सभी क्रियाओं का अन्तिम और सर्वश्रेष्ठ फल यही है कि भगवन्नाम में निष्ठा हो। साध्य तो भगवन्नाम ही है, और सभी कर्म तो उसके साधनमात्र हैं। नाम-जप में देश, काल, पात्र, जाति, वर्ण, समय-असमय, शुचि-अशुचि इन सभी बातों का विचार नहीं होता। तुम जैसी हालत में हो, जहाँ हो, जैसे हो, जिस-किसी भी वर्ण के हो, जैसी भी स्थिति में हो, हर समय और हर काल में श्रीहरि के सुमधुर नामों का संकीर्तन कर सकते हो। नाम-जप से पापी-से-पापी मनुष्य भी परमपावन बन जाता है, अत्यन्त नीच-से-नीच भी सर्वपूज्य समझा जाता है, छोटे-से-छोटा भी सर्वश्रेष्ठ हो जाता है और बुरे-से-बुरा भी महान भगवद्भक्त बन जाता है। कबीरदास जी कहते हैं- नाम जपत कुष्ठी भलो, चुइ-चुइ गिरै जो चाम। कंचन देह किस कामकी,...

cc105

श्री श्री चैतन्य चरितावली  105- उस समय सम्पूर्ण देश में मुसलमानों का प्राबल्य था। विशेषकर बंगाल में तो मुसलमानी सत्ता का और मुसलमानी धर्म का अत्यधिक जोर था। इस्लाम धर्म के विरुद्ध कोई चूँ तक नहीं कर सकता था। स्थान-स्थान पर इस्लाम धर्म के प्रचार के निमित्त क़ाज़ी नियुक्त थे, वे जिसे भी इस्लामधर्म के प्रचार में विघ्न समझते, उसे ही बादशाह से भारी दण्ड दिलाते, जिससे फिर किसी दूसरे को इस्लामधर्म के प्रचार में रोड़ा अटकाने का साहस न हो।एक प्रकार से उस समय के कर्ता-धर्ता तथा विधाता धर्म के ठेकेदार क़ाज़ी ही थे। शासन-सत्ता पर पूरा प्रभाव होने के कारण क़ाज़ी उस समय के बादशाह ही समझे जाते थे। फुलिया के आसपास में गोराई नाम का एक क़ाज़ी भी इसी काम के लिये नियुक्त था। उसने जब हरिदास जी का इतना प्रभाव देखा तब तो उसकी ईर्ष्या का ठिकाना नहीं रहा। वह सोचने लगा- ‘हरिदास के इतने बढ़ते प्रभाव को यदि रोका न जायगा तो इस्लाम धर्म को बड़ा भारी धक्का पहुँचेगा। हरिदास जाति का मुसलमान है। मुसलमान होकर वह हिन्दुओं के धर्म का प्रचार करता है। सरह की रूप से वह कुफ्र करता है। वह काफिर है, इसलिये काफिर को कत्ल करन...

cc104

श्री श्री चैतन्य चरितावली  104- वह सुबह से आती, दोपहर तक बैठती, हरिदास जी लय से गायन करते रहते- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। बेचारी बैठे-बैठे स्वयं भी इसी मन्त्र को कहती रहती। शाम को आती तो आधी रात्रि तक बैठी रहती। हरिदास जी का जप अखण्डरूप से चलता रहता- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। चार दिन निरन्तर हरिनामस्मरण से उसके सभी पापों का क्षय हो गया। पापों के क्षय हो जाने से उसकी बुद्धि एकदम बदल गयी, अब तो उसका हृदय उसे बार-बार धिक्कार देने लगा। ऐसे महापुरुष के निकट मैं किस बुरे भाव से आयी थी, इसका स्मरण करके वह मन-ही-मन अत्यन्त ही दुःखी होने लगी। अन्त में उससे नहीं रहा गया। वह अत्यन्त ही दीन भाव से हरिदास जी के चरणों में गिर पड़ी और आँखों से आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठ से कहने लगी- ‘महाभाग! सचमुच ही आप पतितपावन हैं। आप जीवों पर अहैतु की कृपा ही करते हैं। आप परम दयालु हैं, अपनी कृपा के लिये आप पात्र-अपात्र का विचार न करके प्राणिमात्र के प्रति समान भाव से दया करते हैं। मुझ-जैसी पतिता, लोकनिन्दिता और खोट...

cc 102

श्री श्री चैतन्य चरितावली  102- यही बात नहीं कि ऐसा भाव इन्हें भगवान का ही आवे, नाना देवी-देवताओं का भाव भी आ जाता था। कभी तो बलदेव के भाव में लाल-लाल आँखें करके जोरों से हुंकार करते और ‘मदिरा-मदिरा’ कहकर शराब माँगते, कभी इन्द्र के आवेश में आकर वज्र को घुमाने लगते। कभी सुदर्शन-चक्र का आह्वान करने लगते। एक दिन एक जोगी बड़े ही सुमधुर स्वर से डमरू बजाकर शिव जी के गीत गा-गाकर भिक्षा माँग रहा था। भीख माँगते-माँगते वह इनके भी घर आया। शिवजी के गीतों को सुनकर इन्हें महादेव जी का भाव आ गया और अपनी लटों को बखेरकर शिव जी के भाव में उस गाने वाले के कन्धे पर चढ़ गये और जोरों के साथ कहने लगे- ‘मैं ही शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। तुम वरदान माँगो, मैं तुम्हारी स्तुति से बहुत प्रसन्न हूँ।’ थोड़ी देर के अनन्तर जब इनका वह भाव समाप्त हो गया तो कुछ अचेतन-से होकर उसके कन्धे पर से उतर पड़े और उसे यथेच्छ भिक्षा देकर विदा किया। इस प्रकार भक्तों को अपनी-अपनी भावना के अनुसार नाना रूपों के दर्शन होने लगे और इन्हें भी विभिन्न देवी-देवताओं तथा परम भक्तों के भाव आने लगे। जब वह भाव शान्त हो जाता, तब ये उस भाव में कही...

cc 101

श्री श्री चैतन्य चरितावली  101- माता इनकी ऐसी भोली-भाली बातें सुनकर हँसने लगीं। उन्होंने जल्दी से दो थालियों में भोजन परोसा। विष्णुप्रिया जी ने दोनों के हाथ-पैर धुलाये। हाथ-पैर धोकर दोनों भोजन करने बैठे। माता प्रेम से अपने दोनों पुत्रों को परोसने लगीं। प्रभु के साथ में और भी उनके दो-चार अन्तरंग भक्त आ गये थे। वे उन दोनों भाइयों को इस प्रकार प्रेमपूर्वक भोजन करते देख प्रेमसागर में आनन्द के साथ गोते लगाने लगे।दोनों भाइयों को भोजन कराते हुए माता ऐसी प्रतीत होने लगी मानो श्री कौसल्या जी अपने श्रीराम और लक्ष्मण दोनों प्रिय पुत्रों को भोजन करा रही हों अथवा यशोदा मैया श्रीकृष्ण-बलराम को साथ ही बिठाकर छाछ खिला रही हों। माता का अन्तःकरण उस समय प्रसन्नता के कारण अत्यन्त ही आनन्दित हो रहा था। उनका अगाध मातृ-प्रेम उमड़ा ही पड़ता था। दोनों भाई भोजन करते-करते भाँति-भाँति की विनोदपूर्ण बातें कहते जाते थे। भोजन करके प्रभु चुपचाप बैठ गये, नित्यानन्द जी भोजन करते ही रहे। प्रभु की थाली में बहुत-सा भात बचा हुआ देखकर नित्यानन्दजी बोले- 'यह क्यों छोड़ दिया है, इसे भी खाना होगा।' प्रभु ने असमर्थता प्...

cc 100

श्री श्री चैतन्य चरितावली  100- जिसे अपने हाथ-पैरों से कमाकर खाने का अभिमान है, वह उस छोटे शिशु के सुख को क्या समझ सकता है, जिसे भूख-प्यास तथा सुख-दुःख में एकमात्र माता की गोद का ही सहारा है और जो आवश्यकता पड़ने पर रोने के अतिरिक्त और कुछ जानता ही नहीं? माता चाहे कहीं भी रहे, उसे अपने उस मुनमुना से बच्चे का हर समय ध्यान ही बना रहता है, उसके सुख-दुःख का अनुभव माता स्वयं अपने शरीर में करती है। नित्यानन्द जी ने भी प्रभु के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया और महाप्रभु श्रीवास के भी सर्वस्व थे। प्रभु दोनों के ही उपास्यदेव थे, किंतु नित्यानन्द तो उनके बाहरी प्राण ही थे। नित्यानन्दजी श्रीवास पण्डित के ही घर रहते। उनकी पत्नी मालिनीदेवी तथा वे स्वयं इन्हें पुत्र से भी बढ़कर प्यार करते। नित्यानन्द जी सदा बाल्यभाव में ही रहते। वे अपने हाथ से भोजन नहीं करते, तब मालिनी देवी अपने हाथों से इन्हें भात खिलातीं। कभी खाते-खाते ही बीच में से भाग जाते, और दाल-भात को सम्पूर्ण शरीर पर लपेट लेते। भोजन करके बालकों की भाँति घूमते रहना ही इनका काम था। कभी मुरारी गुप्त के घर जाते, कभी गंगादास जी की पाठशाला में ही जा ...

cc 99

श्री श्री चैतन्य चरितावली  99- क्षणभर पहले जिन्हें वे संसारी विषयी समझ रहे थे, उन्हें अब इस प्रकार प्रेम में पागलों की भाँति प्रलाप करते देखकर वे भौंचक्के-से रह गये। उनके त्याग, वैराग्य और उपरति के भाव न जाने कहाँ विलीन हो गये, अपने को बार-बार धिक्कार देने लगे कि ऐसे परम वैष्णव के प्रति मैंने ऐसे कलुषित विचार रखकर घोर पाप किया है। वे मन-ही-मन अपने पाप का प्रायश्चित सोचने लगे। अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि वैसे तो हमारा यह अपराध अक्षम्य है। भगवदपराध तो क्षम्य हो भी सकता है, किंतु वैष्णवापराध तो सर्वदा अक्षम्य है। इसके प्रायश्चित्त का एक ही उपाय है। हम इनसे मन्त्र-दीक्षा ले लें, इनके शिष्य बन जायँ, तो गुरु-भाव से ये स्वयं ही क्षमा कर देंगे। ऐसा निश्चय करके इन्होंने अपना भाव मुकुन्ददत्त के सम्मुख प्रकट किया। इनके ऐसे विशुद्ध भाव को समझकर मुकुन्ददत्त को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने इनके विमलभाव की सराहना की। बहुत देर के अनन्तर पुण्डरीक महाशय प्रकृतिस्थ हुए। सेवकों ने उनके शरीर को झाड़-पोंछकर ठीक किया। शीतल जल से हाथ-मुँह धोकर वे चुपचाप बैठ गये। तब विनीत भाव से मुकुन्द ने कहा- ‘महा...

cc 98

श्री श्री चैतन्य चरितावली  98- वह कौन-सा सुदिवस होगा जब मैं उन्हें प्रेम से आलिंगन करके रुदन करूँगा? प्रभु की ऐसी बात सुनकर सभी को परम प्रसन्नता हुई और सब-के-सब पुण्डरीक विद्यानिधि के दर्शन के लिये परम उत्सुकता प्रकट करने लगे। सबने अनुमान लगा लिया कि जब प्रभु उनके लिये इस प्रकार रुदन करते हैं, तो वे शीघ्र ही नवद्वीप में आने वाले हैं। प्रभु के स्मरण करने पर अपने घर में ठहर ही कौन सकता है, इसीलिये सब भक्त विद्यानिधि के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। एक दिन चुपचाप पुण्डरीक महाशय नवद्वीप पधारे। किसी को भी उनके आने का पता नहीं चला। बहुत-से भक्तों ने उन्हें देखा भी, किंतु उन्हें देखकर कौन अनुमान लगा सकता था कि ये परम भागवत वैष्णव हैं? भक्तों ने उन्हें कोई सांसारिक धनी-मानी पुरुष ही समझा, इसीलिये भक्त उनके आगमन से अपरिचित ही रहे। मुकुन्द दत्त भी चटगाँव निवासी एक परम भागवत वैष्णव विद्यार्थी थे। इनका कण्ठ बड़ा ही सुमधुर था। अद्वैताचार्य के समीप ये अध्ययन करते थे और उनकी सत्संग-सभा में अपने मनोहर गायन से भक्तों को आनन्दित किया करते थे। जब से प्रभु का प्रकाश हुआ है, तब से वे इन्हीं की शरण में आ ...

cc97

श्री श्री चैतन्य चरितावली  97- प्रभु बार-बार आग्रह कर-करके आचार्य को और अधिक परसवा देते और आचार्य भी प्रेम के वशीभूत होकर उसे पा लेते। इस प्रकार उस दिन तीनों ने ही अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक भोजन किया। किंतु उस भोजन में चारों ओर से प्रेम-ही-प्रेम भरा था। भोजनोपरान्त प्रभु ने श्रीविष्णुप्रिया से लेकर आचार्य तथा श्रीवास पण्डित को मुख-शुद्धि के लिये ताम्बूल दिया। कुछ आराम करने के अनन्तर प्रभु की आज्ञा लेकर अद्वैत तो शान्तिपुर चले गये और श्रीवास अपने घर को चले गये। प्रच्छन्न भक्त पुण्डरीक विद्यानिधि.... जिनके हृदय में भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी है, जिनका हृदय श्याम-रंग में रँग गया है, जिनकी भगवान के सुमधुर नामों तथा उनकी जगत-पावनी लीलाओं में रति है, उन बड़भागी भक्तों ने ही यथार्थ में मनुष्य-शरीर को सार्थक बनाया है। प्रायः देखा गया है कि जिनके ऊपर भगवत्कृपा होती है, जो प्रभु के प्रेम में पागल बन जाते हैं, उनका बाह्य जीवन भी त्यागमय बन जाता है, क्योंकि जिसने उस अद्भुत प्रेमासव का एक बार भी पान कर लिया, उसे फिर त्रिलोकी के जो भी संसारी सुख हैं, सभी फीके-फीके-से प्रतीत होने ल...

cc 96

श्री श्री चैतन्य चरितावली  96- जब मेरी उन्माद की-सी अवस्था हो जाती है, तब उसमें न जाने मैं क्या-क्या बक जाता हूँ, उसका स्मरण मुझे स्वयं ही नहीं रहता। मैंने अपनी उन्मादावस्था में आचार्य से कुछ कह दिया होगा, उसका स्मरण मुझे अब बिलकुल नहीं है। यह सुनकर कुछ दीनता के भाव से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! आप हमारी हर समय क्यों वंचना किया करते हैं, लोगों को जब उन्माद होता है, तो उनसे अन्य लोगों को बड़ा भय होता है। लोग उनके समीप जाने तक में डरते हैं, किंतु आपका उन्माद तो लोगों के हृदयों में अमृत-सिंचन-सा करता है। भक्तों को उससे बढ़कर कोई दूसरा आनन्द ही प्रतीत नहीं होता। क्या आपका उन्माद सचमुच में उन्माद ही होता है? यदि ऐसा हो तो फिर भक्तों को इतना अपूर्व आनन्द क्यों होता है? आप में सर्वसामर्थ्य है। आप जिस समय जैसा चाहें रूप दिखा सकते हैं।’ प्रभु ने कहा- ‘पण्डित जी! सचमुच में आप विश्वास कीजिये, किसी को कोई रूप दिखाना मेरे बिलकुल अधीन नहीं है। किस समय कैसा रूप बन जाता है, इसका मुझे स्वयं पता नहीं चलता। आप कहते हैं, आचार्य श्यामसुन्दररूप के दर्शन करना चाहते हैं। यह मेरे हाथ की बात थोड़े ही है...

cc 95

श्री श्री चैतन्य चरितावली  95- श्रीके वास में आकर्षण ही ऐसा है कि हम- जैसे सैकड़ों मनुष्य उनके प्रभाव से खिंचे चले आवेंगे।’ श्रीवास पण्डित इस गूढ़ोक्ति से बड़े प्रसन्न हुए, उसे प्रभु के ऊपर घटाते हुए कहने लगे- ‘जब लक्ष्मी देवी थीं, तब थीं, अब तो वे यहाँ वास नहीं करतीं, अब तो वे नवद्वीप से अन्तर्धान हो गयीं। (गौरांग महाप्रभु की पहली पत्नी का नाम ‘लक्ष्मी’ था। ‘श्री’ के माने लक्ष्मी लगाकर श्रीवास पण्डित ने कहा- अब यहाँ श्री का वास नहीं है।) प्रभु ने जब देखा श्रीवास हमारे ऊपर घटाने लगे हैं तब आपने जल्दी से कहा- ‘पण्डित जी! यह आप कैसी बात कर रहे हैं? श्री के माने है ‘भक्त’। जहाँ पर आप-जैसे भक्त विराजमान हैं वहाँ श्री का वास अवश्य ही होना चाहिये, भला ऐसे स्थान को छोड़कर ‘भक्ति’ या ‘श्री’ कहीं जा सकती हैं?’ इस पर आचार्य कहने लगे- ‘हाँ’ ठीक तो है। श्री के बिना हरि रह ही कैसे सकते हैं?’ ‘श्री’ विष्णुप्रिया नाम रखकर नवद्वीप में अवस्थित हैं अथवा उन्होंने श्री के साथ विष्णुप्रिया अपने नाम में और जोड़ लिया है, अब वे केवल श्री न होकर ‘श्रीविष्णुप्रिया’ बन गयी हैं।’ बात को दूसरी ओर घटाते हुए प्र...

cc 94

श्री श्री चैतन्य चरितावली  94- वे रोते-रोते बार-बार इस श्लोक को पढ़ते थे-   नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।। श्लोक पढ़ते-पढ़ते वे और भी गौरांग को लक्ष्य करके भाँति-भाँति की स्तुति करने लगे। स्तुति करते-करते वे बेसुध-से हो गये। इसी बीच अद्वैताचार्य की पत्नी सीतादेवी ने प्रभु की पूजा की। प्रभु ने भावावेश में आकर उन दोनों के मस्तकों पर अपने श्रीचरण रखे। प्रभु के पदपद्मों के स्पर्शमात्र से आचार्यपत्नी और आचार्य आनन्द में विभोर होकर रुदन करने लगे। प्रभु ने आचार्य को आश्वासन देते हुए कहा- ‘आचार्य! अब जल्दी से उठो, अब देर करने का काम नहीं है। अपने संकीर्तन द्वारा मुझे आनन्दित करो।’ प्रभु का आदेश पाते ही, आचार्य दोनों हाथों को ऊपर उठाकर प्रेम के साथ संकीर्तन करने लगे। सभी भक्त अपने-अपने वाद्यों को बजा-बजाकर आचार्य के साथ संकीर्तन करने में निमग्न हो गये। आचार्य प्रेम के आवेश में जोरों से नृत्य कर रहे थे, उन्हें शरीर की तनिक भी सुध-बुध नहीं थी। वे प्रेम में इतने मतवाले बने हुए थे कि कहीं पैर रखते थे और कहीं जाकर पैर पड़ते थे। धीरे-धीरे स्वेद, क...

cc 93

श्री श्री चैतन्य चरितावली  93- उस समय आचार्य अपने घर के सामने बैठे हुए थे, दूर से ही श्रीवास पण्डित के अनुज को आते देखकर वे गद्गद हो उठे, उनकी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। आचार्य समझ गये कि ‘अब हमारे शुभ दिन आ गये। कृपा करके प्रभु ने हमें स्वयं बुलाने के लिये रमाई पण्डित को भेजा है, भगवान भक्त की प्रतिज्ञा की इतनी अधिक परवा करते हैं कि उसके सामने वे अपना सब ऐश्वर्य भूल जाते हैं।’ इसी बीच रमाई ने आकर आचार्य को प्रणाम किया। आचार्य ने भी उनका प्रेमालिंगन किया।आचार्य से प्रेमालिंगन पाकर रमाई पण्डित एक ओर खड़े हो गये और आचार्य की ओर देखकर कुछ मुसकराने लगे। उन्हें मुसकराते देखकर आचार्य कहने लगे- ‘मालूम होता है, प्रभु ने मुझे स्मरण किया है, किंतु मुझे कैसे पता चले कि यथार्थ में वे ही मेरे प्रभु हैं? जिन प्रभु को पृथ्वी पर संकीर्तन का प्रचार करने के निमित्त मैं प्रकट करना चाहता था, वे मेरे आराध्यदेव प्रभु ये ही हैं, इसका तुम लोगों के पास कुछ प्रमाण है?’ कुछ मुसकराते हुए रमाई पण्डित ने कहा- ‘आचार्य महाशय! हम लोग तो उतने पण्डित तो नहीं हैं। प्रमाण और हेतु तो आप-जैसे विद्वान ही समझ सकते हैं...

cc 91

श्री श्री चैतन्य चरितावली  91- इतना सुनते ही श्रीवास, मुरारी, गदाधर आदि सभी भक्त निमाई और निताई के सहित गंगास्नान के निमित्त चल दिये। नित्यानन्द जी का स्वभाव बिलकुल छोटे बालकों का-सा था, वे कुदक-कुदककर रास्ते में चलते। गंगा जी में घुस गये तो फिर निकलना सीखे ही नहीं, घंटों जल में ही गोते लगाते रहते। कभी उलटे होकर बहुत दूर तक प्रवाह में ही बहते चले जाते। सब भक्तों के सहित वे भी स्नान करने लगे। सहसा उसी समय एक नाग इन्हें जल में दिखायी दिया। जल्दी से आप उसे ही पकड़ने के लिये दौड़े। यह देखकर श्रीवास पण्डित ‘हाय, हाय’ करके चिल्लाने लगे, किंतु ये किसी की कब सुनने वाले थे, आगे बढ़े ही चले जाते थे। जब श्रीवास के कहने से स्वयं गौरांग ने इन्हें आवाज दी, तब कहीं जाकर ये लौटे। इनके सभी काम अजीब ही होते थे, इससे पहली ही रात्रि में इन्होंने न जाने क्या सोचकर अपने दण्ड-कमण्डलु आदि सभी को तोड़-फोड़ डाला। प्रभु ने इसका कारण पूछा तो ये चुप हो गये। तब प्रभु ने उन्हें बड़े आदर से बीन-बीनकर गंगाजी में प्रवाहित कर दिया।व्यासपूर्णिमा के दिन सभी भक्त स्नान, सन्ध्या-वन्दन करके श्रीवास पण्डित के घर आये। पण्ड...

cc 92

श्री श्री चैतन्य चरितावली  92- जिसका आप उद्धार करना चाहें उसका उद्धार कीजिये। श्रीहरि के सुमधुर नामों का वितरण कीजिये। यदि आप ही जीवों के ऊपर कृपा करके भगवन्नाम का वितरण न करेंगे तो पापियों का उद्धार कैसे होगा?’ प्रभु के कोमल कर स्पर्श से निताई की मूर्च्छा भंग हुई, वे अब कुछ-कुछ प्रकृतिस्थ हुए। नित्यानन्द जी को होश में देखकर प्रभु भक्तों से कहने लगे- ‘व्यासपूजा तो हो चुकी, अब सभी मिलकर एक बार सुमधुर स्वर से श्रीकृष्ण-संकीर्तन और कर लो।’ प्रभु की आज्ञा पाते ही पखावज बजने लगी, सभी भक्त हाथों में मजीरा लेकर बड़े ही प्रेम से कीर्तन करने लगे। सभी प्रेम में विह्वल होकर एक साथ-   हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। - इस सुमधुर संकीर्तन को करने लगे। संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि से श्रीवास पण्डित का घर गूँजने लगा। संकीर्तन की आवाज सुनकर बहुत-से दर्शनार्थी द्वार पर आकर एकत्रित हो गये, किंतु घर का दरवाजा तो बंद था, वे बाहर खड़े-ही खड़े संकीर्तन का आनन्द लूटने लगे। इस प्रकार संकीर्तन के आनन्द में किसी को समय का ज्ञान ही न रहा। दिन डूब गया। तब प्रभु ने सं...

cc 90

श्री श्री चैतन्य चरितावली  90- शिष्य गुरु को ही साक्षात परब्रह्म का साकार स्वरूप मानकर उसकी वन्दना करे, इन सभी का फल अन्त में एक ही होगा, सभी अपने अन्तिम अभीष्ट तक पहुँच सकेंगे। सभी को अपनी-अपनी भावना के अनुसार प्रभु-पद-प्राप्ति अथवा मुक्ति मिलेगी। सभी के दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जायगा। यह तो सचेतन साकार वस्तु के प्रति प्रेम करने की पद्धति है, हिंदू-धर्म में तो यहाँ तक माना गया है कि पत्थर, मिट्टी, धातु अथवा किसी भी प्रकार की मूर्ति बनाकर उसी में ईश्वर-बुद्धि से पूजन करोगे तो तुम्हें शुद्ध-विशुद्ध प्रेम की ही प्राप्ति होगी। किंतु इसमें दम्भ या बनावट न होनी चाहिये। अपने हृदय को टटोल लो कि इसके प्रति हमारा पूर्ण अनुराग है या नहीं, यदि किसी के भी प्रति तुम्हारा पूर्ण प्रेम हो चुका तो बस, तुम्हारा कल्याण ही है, तुम्हारा सर्वस्व तो वही है। नित्यानन्द प्रभु बारह-तेरह वर्ष की अल्पवयस में ही घर छोड़कर चले आये थे। लगभग बीस वर्षों तक ये तीर्थों में भ्रमण करते रहे, इनके साथी संन्यासीजी इन्हें छोड़कर कहाँ चले गये, इसका कुछ भी पता नहीं चलता, किंतु इतना अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि उन महात्म...

cc 89

श्री श्री चैतन्य चरितावली  89- उन छिद्रों में से विश्वमोहिनी ध्वनि सुनायी पड़ रही है। पीछे-पीछे ग्वालबाल यशोदानन्दन का यशोगान करते हुए जा रहे हैं, इस प्रकार के मुरलीमनोहर अपनी पदरज से वृन्दावन की भूमि को पावन बनाते हुए व्रज में प्रवेश कर रहे हैं।’ जगत को उन्मादी बनाने वाले इस भाव को सुनकर जब अवधूतशिरोमणि शुकदेव जी भी प्रेम में पागल बन गये, तब फिर भला हमारे सहृदय अवधूत नित्यानन्द अपनी प्रकृति में कैसे रह सकते थे? श्रीवास पण्डित के मुख से इस श्लोक को सुनते ही वे मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इनके मूर्च्छित होते ही प्रभु ने श्रीवास से फिर श्लोक पढ़ने को कहा।श्रीवास के दुबारा श्लोक पढ़ने पर नित्यानन्द प्रभु जोरों से हुंकार देने लगे। उनके दोनों नेत्रों से अविरल अश्रु बह रहे थे। शरीर के सभी रोम बिलकुल खड़े हो गये। पसीने से शरीर भीग गया। प्रेम में उन्मादी की भाँति नृत्य करने लगे। प्रभु ने नित्यानन्द को गले से लगा लिया और दोनों महापुरुष परस्पर में एक-दूसरे को आलिंगन करने लगे। नित्यानन्द प्रेम में बेसुध-से प्रतीत होते थे, उनके पैर कहीं-के-कहीं पड़ते थे, जोर से ‘हा कृष्ण! हा कृष्ण!’ कहक...

cc88

श्री श्री चैतन्य चरितावली  88- नित्यानन्द प्रभु अनिमेष-दृष्टि से गौरांग के मुख-चन्द्र की ओर निहार रहे थे। भक्तों ने देखा, उनकी पलकों का गिरना एकदम बंद हो गया है। सभी स्थिर भाव से मन्त्रमुग्ध की भाँति नित्यानन्द प्रभु की ओर देख रहे थे। प्रभु ने अपने मन में सोचा- ‘भक्तों को नित्यानन्द जी की महिमा दिखानी चाहिये। इन्हें कोई प्रेमप्रसंग सुनाना चाहिये, जिसके श्रवण से इनके शरीर में सात्त्विक भावों का उद्दीपन हो। इनके भावों के उदय होने से ही भक्त इनके मनोगत भावों को समझ सकेंगे।’ यह सोचकर प्रभु ने श्रीवास पण्डित को कोई स्तुति-श्लोक पढ़ने के लिये धीरे से संकेत किया। प्रभु के मनोगत भाव को समझकर श्रीवास इस श्लोक को पढ़ने लगे-    बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान्वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के इस श्लोक में कितना माधुर्य है, इसे तो संस्कृत-साहित्यानुरागी सहृदय रसिक भक्त ही अनुभव कर सकते हैं, इसका भाव शब्दों में व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। व्रजमण्डल के भक्तगण...

cc87

श्री श्री चैतन्य चरितावली  87- संन्यासी शाप देकर मेरा सर्वस्व नाश कर सकते हैं। इसलिये चाहे जो हो पुत्र को इन्हें दे ही देना चाहिये।’ यह सोचकर वे पद्मावती देवी के पास गये और उनसे जाकर सभी वृत्तान्त कहा। भला, जिसे नित्यानन्द-जैसे महापुरुष की माता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह अपने धर्म से विचलित कैसे हो सकती है? पुत्र-मोह के कारण वह कैसे अपने धर्म को छोड़ सकती है? सब कुछ सुनकर उसने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया- ‘मैं तो आपके अधीन हूँ। जो आपकी इच्छा है, वही मेरी भी होगी, पुत्र-वियोग का दुःख असह्या होता है, किंतु पतिव्रताओं के लिये पति-आज्ञा-उल्लंघन का दुःख उसे भी अधिक असह्या होता है, इसलिये आपकी जैसी इच्छा हो करें। मैं सब प्रकार से सहमत हूँ, जिसमें धर्मलोप न हो वही कीजिये।’ पत्नी की अनुमति पाकर हाड़ाई पण्डित ने अपने प्राणों से भी प्यारे प्रिय पुत्र को रोते-रोते संन्यासी के हाथों में सौंप दिया। धर्मनिष्ठ नित्यानन्द जी ने भी इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं की। वे प्रसन्नतापूर्वक संन्यासी के साथ हो लिये। उन्होंने पीछे फिरकर फिर अपने माता-पिता तथा कुटुम्बियों की ओर नहीं देखा। संन्यासी जी के साथ ...