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श्री श्री चैतन्य चरितावली 106- आगे किसी को ऐसा काम करने की हिम्मत ही न पड़े। इस्लाम धर्म के अनुसार तो इसकी सजा प्राण दण्ड ही है। किंतु सीधे-सादे प्राणदण्ड देना ठीक नहीं। इसकी पीठ पर बेंत मारते हुए इसे बाईस बाजारों में होकर घुमाया जाय और बेंत मारते-मारते ही इसके प्राण लिये जायँ। तभी सब लोगों को आगे ऐसा करने की हिम्मत न होगी। मुलुकपति ने विवश होकर यही आज्ञा लिख दी। बेंत मारने वाले नौकरों ने महात्मा हरिदास जी को बाँध लिया और उनकी पीठ पर बेंत मारते हुए उन्हें बाजारों में घुमाने लगे। निरन्तर बेंतों के आघात से हरिदास के सुकुमार शरीर की खाल उधड़ गयी। पीठ में से रक्त की धारा बहने लगी। निर्दयी जल्लाद उन घावों पर ही और भी बेंत मारते जाते थे, किंतु हरिदास के मुख में से वही पूर्ववत हरिध्वनि ही हो रही थी। उन्हें बेंतों की वेदना प्रतीत ही नहीं होती थी। बाजार में देखने वाले उनके दुःख को न सह सकने के कारण आँखें बंद कर लेते थे, कोई-कोई रोने भी लगते थे, किंतु हरिदास जी के मुख से ‘उफ’ भी नहीं निकलती थी। वे आनन्द के साथ श्रीकृष्ण का कीर्तन करते हुए नौकरों के साथ चले जा रहे थे। उन्हें सभी बाजार में घु...