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Showing posts from April, 2023

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  229- श्रीभगवन्‍नाम-संकीर्तन में अनन्‍त शक्ति है।’ यह कहकर महाप्रभु स्‍वयं अपने दोनों बाहुओं को उठाकर उच्‍च स्‍वर से हरि-नाम-संकीर्तन करने लगे। उस समय प्रेम के भावावेश में उनके दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, शरीर के रोम खड़े हुए थे, रोमकूपों में से पसीना फब्‍बारे की तरह निकल रहा था। उनकी ऐसी दशा देखकर सभी देव दासियाँ अपने नारी-सुलभ कमनीय कण्‍ठ से- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण हरे हरे।। इस महामन्‍त्र का उच्‍च स्‍वर में कीर्तन करने लगीं। सम्‍पूर्ण देवालय महामन्‍त्र की ध्‍वनि से गूँजने लगा। उस संकीर्तन की बा़ढ़ में उन देव दासियों के समस्‍त पाप धुलकर बह गये, वे भगवन्‍नाम के प्रभाव से निष्‍पाप बन गयीं। उनमें से जो प्रधान देव-दासी थी, उसका नाम इन्दिरा था, वह आकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ी और अत्‍यन्‍त ही दीनभाव से कहने लगीं- ‘प्रभो! व्‍यभिचार करते करते मेरी यह अवस्‍था हो गयी। अब ऐसी कृपा कीजिये कि श्रीहरि के चरणों में भक्ति हो।’ प्रभु ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा-‘देवि ! श्रीकृष्‍ण दयामय हैं, वे दीनों पर अत्‍य...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  227- जब रावण को मारकर भगवान ने सीता जी की अग्नि परीक्षा की, तब अग्नि ने असली सीता जी को निकालकर दे दिया। वास्‍तव में रावण सीता जी की छाया को ही हरकर ले गया था। असली सीता का तो उसने स्‍पर्श तक नहीं किया।’ भक्‍तवत्‍सल महाप्रभु इस प्रसंग को सुनकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने सोचा- ‘इसकी प्रतिलिपि करके उस परमभक्‍त रामदास को दिखानी चाहिये।’ फिर प्रभु ने सोचा-‘यदि मैं नवीन पत्र पर प्रतिलिप करके ले गया तो बहुत सम्‍भव है, नूतन श्‍लोक समझकर उसे विश्‍वास न हो।’ इसलिये प्रभु ने उस कथा कहने वाले ब्राह्मण से कहा- ‘हम इस पृष्‍ठ की नकल करके आपको दे देंगे। इस पुराने पृष्‍ठ को आप हमें दे दें। कथावाचक ने प्रभु की इस बात को स्‍वीकार कर लिया और प्रभु ने उसकी नूतन प्रतिलिप करके तो उस कथावाचक को दे दी और वह पुराना पृष्‍ठ अपने पास रख लिया।उस पृष्‍ठ को लेकर दयालु गौरांग फिर दक्षिण मथुरा में रामभक्‍त ब्राह्मण के घर आये और उसे कूर्मपुराण के पुराने पृष्‍ठ को दिखाते हुए प्रभु ने कहा- ‘लीजिये अब तो आपको सन्‍तोष होगा। यह तो कूर्मपुराण में ही लिखा है कि रावण सीता की छाया को हरक...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  226- जिससे संसार सागर से मैं भी पति के चरणों का अनुगमन कर सकूँ।’ महाप्रभु की आज्ञा से तीर्थराम ने अपनी पत्‍नी को हरि-नाम मन्‍त्र का उपदेश दिया। वह भी अपना सारा धन कंगालों को बांटकर तीर्थराम के साथ हरिनाम संकीर्तन करने लगी। महाप्रभु सात दिन तक बटेश्‍वर में ठहरे। वहाँ रहकर वे धनीराम को उपदेश देते थे। प्रभु ने उससे कहा- ‘बहुत ग्रन्‍थों के मायाजाल में मत पड़ना। भगवान केवल विश्‍वास से ही प्राप्‍त हो सकते हैं। सम्‍पूर्ण जगत के वैभव को तृण-समान समझना और निरन्‍तर भगवन्‍नाम संकीर्तन में लगे रहना यही वेद शास्‍त्रों का सार है।’ इस प्रकार तीर्थराम और उन दो सुन्‍दरी वेश्‍याओं को प्रेम दान करके महाप्रभु श्रीरंगम में चले गये थे और श्रीरंग में ही चातुर्मास्‍य किया। जब वर्षा समाप्‍त हो गयी, तब प्रभु ने श्रीरंगम से आगे चलने का विचार किया। दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण….. साधारण मनष्‍य जिन कामों को करते हैं, उन्‍हीं को महापुरुष भी किया करते हैं। किन्‍तु साधारण लोगों के कार्य अपने सुख के लिये होते हैं और महापुरुषों के काम समस्‍त जीवों के कल्‍याण के निमित्त होते हैं। महात्‍मा तो...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  225- तीर्थराम इन बातों को सुन रहा था। प्रभु के संकीर्तन के श्रवणमात्र से ही उसका धैर्य टूट गया था। अब रहा सहा धैर्य इस असम्‍भव घटना ने तोड़ दिया। परमसुन्‍दरी दो युवती एकान्‍त में जिससे प्रेमालाप करने की प्रार्थना करने की प्रार्थना करें और वह उन्‍हें माता कहकर सम्‍बोधन करे, वह कोई मनुष्‍य नहीं, ईश्‍वर है। यह संसारी प्राणी का काम नहीं, ये तो देवताओं के भी देवताओं का काम है। यह सोचते सोचते वह महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़ा और बड़े ही जोर से चीत्‍कार मारकर कहने लगा- ‘हा प्रभो ! मुझ पापी का उद्धार करो, प्रभो ! मुझे अपने चरणों में शरण दो।’ महाप्रभु ने उसे उठाकर छाती से लगाया और प्रेम में विह्वल होकर जोर-जोर से नृत्‍य करते हुए संकीर्तन करने लगे। वे अविरलभाव से प्रेमाश्रु विमोचन करते हुए नृत्‍य करने लगे। भावावेश में उनके शरीर का वस्‍त्र जमीन पर गिर पड़ा। इससे उनके दीप्तिमान श्रीअंगों से तेज की किरणें फूट फूटकर उस नीरव स्‍थान को आलोकित करने लगीं। वे वेश्‍याएँ भी इस अदभुत चमत्‍कार को देखकर भावावेश में अपने को भूल गयीं और भगवान के नाम का कीर्तन करती हुई नृत्‍य क...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  224- महाप्रभु जब दक्षिण के समस्‍त तीर्थों में भ्रमण करते करते श्रीरंगम आ रहे थे, तब रास्‍ते में अक्षयवट नामक तीर्थ में ठहरे। रास्‍ते में महाप्रभु का जीवननिर्वाह भिक्षा पर ही होता था। किसी दिन भिक्षा मिल जाती थी, किसी दिन नहीं भी मिलती थी, कृष्‍णदास भट्टाचार्य प्रभु को भिक्षा बनाकर खिलाते थे। एक दिन भिक्षा का कहीं संयोग ही न लगा। तीर्थ में उपोषण का भी विधान है, अत: उस दिन महाप्रभु ने कुछ भी नहीं लिया। एक निर्जन स्‍थान में शिव जी के समीप वे कीर्तनानन्‍द में मग्‍न हुए- कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण हे।' कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण हे।। कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण रक्ष माम्। कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण पाहि माम्।। इस महामन्‍त्र को जोर जोर से उच्‍चारण कर रहे थे। रास्‍ते के श्रम से उनके श्रीमुख पर कुछ श्रीमजन्‍य थकावट के चिह्न प्रतीत होते थे। उनके समस्‍त अंगों से एक प्रकार का तेज सा निकल रहा था।वे प्रेमानन्‍द में मग्‍न हुए उच्‍च स्‍वर से नाम संकीर्तन में मग्‍न थे। इतने में ही तीर्...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  223- इसी से अब तक ये तीर्थ पावनता की रक्षा करते हुए संसारी लोगों के पाप तापों को शमन करने में समर्थ बने हुए हैं। महाप्रभु प्रात:काल गोदावरी में स्‍नान करके विद्यानगर से आगे के लिये चल दिये। वे गौतमी, गंगा, मल्लिकार्जुन, अहोबलनृसिंह, सिद्धवट, स्‍कन्‍धक्षेत्र, त्रिपठ, वृद्धकाशी, बौद्धस्‍थान, त्रिपती, त्रिमल्‍ल, पानानृसिंह, शिवकांची, विष्‍णुकांची, त्रिकालहस्‍ती, वृद्धकोल, शियालीभैरवी, काबेरीतीर, कुम्‍भकर्ण-कपाल आदि पुण्‍य तीर्थों में दर्शन स्‍नान आदि करते हुए और अपने दर्शनों से नर नारियों को कृतार्थ करते हुए श्रीरंग क्षेत्र पर्यन्‍त पहुँचे। रास्‍ते में महाप्रभु सर्वत्र श्रीहरि नामों का प्रचार करते जाते थे। लाखों मनुष्‍य प्रभु के दर्शनमात्र से ही भगवद्भक्‍त बन गये। प्रभु रास्‍ते में चलते-चलते इस मन्‍त्र का उच्‍चारण करते जाते थे।महाप्रभु सायंकाल के समय जंगलों में घूमने जाया करते थे। एक दिन वे एक बगीचे में गये। वहाँ जाकर उन्‍होंने देखा एक ब्राह्मण आसन लगाये बड़े ही प्रेम के साथ गदगद कण्‍ठ से गीता का पाठ कर रहा है। यद्यपि वह श्‍लोकों का उच्‍चारण अशुद्ध कर रहा था...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  222- राय ने कहा- ‘प्रभो ! जिसकी सम्‍पूर्ण चेष्‍टाएँ श्रीकृष्‍ण की प्रेमप्राप्ति के ही निमित्त हों, जो सतत श्रीकृष्‍ण के ही मधुर नामों का उच्‍चारण करता हुआ उन्‍हें ही पाने का प्रयत्‍न करता रहता है, वही सर्वश्रेष्‍ठ मुक्‍त पुरुष है।’ प्रभु ने पूछा- ‘आप किस गान को सर्वश्रेष्‍ठ गान समझते हैं?’  राय ने कहा- ‘श्रीकृष्‍ण! गोविन्‍द! हरे! मुरारे!  हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ ‘इस सुमधुर नामों के गान को ही मैं सर्वश्रेष्‍ठ गायन समझता हूँ।’  प्रभु ने पूछा- ‘आप जीवों के कल्‍याण के निमित्त सर्वश्रेष्‍ठ कार्य किसे समझते हैं ?’  राय ने कहा- ‘प्रभो ! महत्‍पुरुषों के पादपद्मों की पावन पराग से अपने मस्‍तक को अलंकृत बनाये रहना और उनके मुख नि:सृत अमृत वचनों का कर्णरन्‍ध्रों से निरन्‍तर पान करते रहना-इसे ही मैं जीवों के कल्‍याण का मुख्‍य हेतु समझता हूँ।’  प्रभु ने पूछा- ‘प्राणिमात्र के लिये सर्वश्रेष्‍ठ स्‍मरणीय क्‍या वस्‍तु है ?’ राय ने कहा- ‘श्रीकृष्‍ण!’ गोविन्‍द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ ‘बस यही सर्वश्रेष्‍ठ स्‍मरणीय है।’  प्रभु ने ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  221- केवल संकेत से बहुत ही थोड़ा-सा लक्ष्‍य किया है- बस, इससे आगे मैं और कुछ न कह सकूँगा।’ इतना सुनते ही प्रभु एकदम उठकर खडे़ हो गये और राय महाशय का गाढ़-आलिंगन करते हुए कहा- ‘धन्‍य है, धन्‍य है। आपने तो प्रेम की पराकाष्‍ठा ही कर डाली। आपने तो साध्‍यतत्त्व को परिसीमा पर पहुँचा दिया। भला, श्रीराधिका जी के प्रेम की प्रशंसा कर ही कौन सकता है? उनका ही प्रेम तो सर्वश्रेष्‍ठ है। अब आप मुझे उन दोनों के विलास की पूर्ण महिमा सुनाइये।’ इतना सुनते ही राय महाशय ने अपने कोकिलकूजित कमनीय कण्‍ठ से इस श्‍लोक को बड़े ही लय के साथ पढ़ने लगे- वाचा सूचितशर्वरीरतिकलाप्रागल्‍भया राधिकां व्रीडाकुञ्चितलोचनां विरचयन्‍नग्रे सखीनामसौ। तदवक्षोरुहचित्रकेलिमकरीपाण्डित्‍यपारगंत: कैशोरं सफलीकरोति कलयन कुञ्जे विहारं हरि:। बस, यही रास-विलास पराकाष्‍ठा है। प्रभु इसको सुनकर बड़े ही प्रसन्‍न हुए। प्रभु ने राय महाशय का जोर से आलिंगन किया और दोनों प्रेम में प्रमत्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। राय रामानन्‍द से साधन-सम्‍बन्‍धी प्रश्‍न…. दोनों ही पागल हों, दोनों की दृष्टि में संसारी पदार्थ निस्‍सार ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  220- उस रस को प्राप्‍त करके जीव आनन्‍दमय हो जाता है। किन्‍तु एक बात अभी शेष रह गयी। उस रस का आस्‍वादन किसी न किसी प्रकार के सम्‍बन्‍ध से ही किया जा सकता है, इसलिये भगवान के साथ किस सम्‍बन्‍ध से उस रस का आस्‍वादन किया जाय, इसे जानने की मेरी बड़ी इच्‍छा है, कृपा करके इसे और बताइये? यह सुनकर राय महाशय कहने लगे- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ भगवान के प्रति दास्‍यभाव रखना ही सर्वश्रेष्‍ठ सम्‍बन्‍ध है, क्‍योंकि बिना दास्‍यभाव अवश्‍य रहता है। वह अत्‍यन्‍त पीड़ा के समय में व्‍यक्‍त भी हो जाता है। नन्‍द जी का भगवान के प्रति वात्‍सल्‍य-स्‍नेह था; किन्‍तु मथुरा से जाकर जब भगवान का सन्‍देश उद्धव जी ने नन्‍दबाबा आदि गोपों को सुनाया और कुछ दिन वज्र में रहकर जब वे लौटने लगे, तब अत्‍यन्‍त ही कातर-भाव से दु:खी होकर नन्‍दबाबा ने कहा था- ‘मनसो वृत्तयो न: स्‍यु: कृष्‍णपादाम्‍बुजाश्रया:’ अर्थात हे उद्धव ! हमारे मन की वृत्ति सदा श्रीकृष्‍ण के चरणों का आश्रय करने वाली हो। पुत्र की तरह स्‍नेह करने वाले पिता का दास्‍यभाव घोर दु:ख के समय अपने-आप ही उमड़ पड़ा। इसी प्रकार जब ब्रह्मा जी गौओ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  219- अच्‍छी बात है, जो मेरे अन्‍त:करण में प्रेरणा हो रही है, उसे मैं आपकी ही कृपा से आपके सामने प्रकट करता हूँ। पहले क्‍या कहूँ, सो बताइये?’ प्रभु ने कहा- ‘मनुष्‍य का जो कर्तव्‍य है उसका कथन करिये।’ राय महाशय ने कहा- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ- स्‍वे स्‍वे कर्मण्‍यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:। अर्थात-  अपने-अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल कर्म करते रहने से मनुष्‍य परम सिद्धि को प्राप्‍त हो सकते हैं, अत: जो जिस वर्ण में हो उसके कर्मों को करता हुआ उन्‍हीं के द्वारा विष्‍णु भगवान की आराधना कर सकता है। वर्णाश्रम को छोड़कर भगवान के प्रसन्‍न करने का और तो कुछ कोई सरल, सुगम और सुकर उपाय सूझता नहीं। शास्‍त्रों में भी स्‍थान-स्‍थान पर वर्णाश्रम पर ही अत्‍यधिक जोर दिया गया है। श्रीमभगवदगीता में तो स्‍थान-स्‍थान पर जोरों के साथ वर्णाश्रम धर्म के अनुसार कर्म करने के लिये आग्रह किया गया है और उसी के द्वारा सिद्धि मानी गयी है। महाप्रभु राय महाशय के मुख से वर्णाश्रमधर्म की बात सुनकर बड़े प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने मुसकराते हुए कहा-‘राय महाशय ! यह आपने बहुत सुन्‍दर बात कही। सचमु...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  218- कई कारणों से उन्‍होंने अपने इस भाव को संवरण किया। इतने में ही उस समृद्धशाली पुरुष ने भूमिष्‍ठ होकर महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया। उस पुरुष को प्रणाम करते देखकर प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह से एक अपरिचित पुरुष की भाँति पूछा- ‘क्‍या आपका ही नाम राजा रामानन्‍द राय है?’ दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से राय महाशय ने उत्तर दिया- ‘भगवन! इस दीन-हीन, भक्ति-हीन शूद्राधम को रामानन्‍द कहते हैं?’ इतना सुनते ही प्रभु ने उठकर रामानन्‍द राय का आलिंगन किया और बड़े ही स्‍नेह के साथ कहने लगे- ‘राय महाशय! मुझे सार्वभौम भट्टाचार्य ने आपका परिचय दिया था; उन्‍हीं की आज्ञा शिरोधार्य करके केवल आपके ही दर्शनों की इच्‍छा से मैं विद्यानगर आया हूँ। मैं सोच रहा था कि आपसे भेंट किस प्रकार हो सकेगी, सो कृपासागर प्रभु का अनुग्रह तो देखिये, अकस्‍मात ही आपके दर्शन हो गये। आज आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हो गया। मेरी सम्‍पूर्ण यात्रा सफल हो गयी। मेरा संन्‍यास लेना सार्थक हो गया, जो आप-जैसे परम भागवत भक्‍त के मुझे स्‍वत: ही दर्शन हो गये।’ हाथ जोड़े हुए दीनतापू...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  217- इनके राय रामानन्‍द, गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और वाणीनाथ नामक-ये पाँच पुत्र थे। ये उड़ीसा के महाराज प्रताप रुद्र के राजदरबार में एक प्रधान कर्मचारी थे। इनके तीन लड़के भी महाराज के दरबार में ही ऊंचे-ऊंचे अधिकारों पर आसीन होकर राज-काज करते थे। गोपीनाथ कटक-दरबार की ओर से मालजेठा-प्रदेश के शासक थे। वाणीनाथ दरबार में ही किसी उच्‍च पद पर प्रतिष्ठित थे और राय रामानन्‍द उत्‍कल देश के अन्‍तगर्त विद्यानगर राज्‍य के शासक थे। इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि उस समय भारतवर्ष में छोटे-छोटे सैकड़ों स्‍वतन्‍त्र राज्‍य थे। उस अपने छोटे-से प्रदेश के शासक नृपतिगण सनातन-परिपाटी के अनुसार धर्म को प्रधान मानकर प्रजा का पालन करते थे और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध भी करते थे। तैलंग देश में भी बहुत से छोटे छोटे राज्‍य थे। उनमें से ‘कोटदेश’ नामका एक छोटा-सा राज्‍य था, जिसकी राजधानी विद्यानगर थी। वर्तमान समय में गोदावरी के उत्तर तटपर स्थित राजमहेन्‍द्री को ही उस प्रदेश की प्रधान नगरी समझना चाहिये, किन्‍तु पुराना विद्यानगर तो गोदावरी के दक्षिण तीर पर अवस्थित था ...

cc 216

श्री श्री चैतन्य चरितावली  216- जहाँ भी किसी साधु-महात्‍मा के आगमन का समाचार पाता, वहीं आकर वह उनकी दूर से चरणवन्‍दना करता। प्रारब्‍ध-कर्मों से उस परमभागवत वैष्‍णव के सम्‍पूर्ण अंग में गलित कुष्‍ठ हो गया था, इससे उसे तनिक भी क्‍लेश नहीं होता था। वह उसे प्रारब्‍ध-कर्मों का भोग समझकर प्रसन्‍नतापूर्वक सहन करता था। उसके सम्‍पूर्ण अंगों में घाव हो गये थे और उनमें कीड़े पड़ गये थे। वासुदेव उन कीड़ों को निकालने की कोशिश नहीं करता। यही नहीं किन्‍तु जो कीड़ा आप-से-आप ही निकलकर पृथ्‍वी पर गिर पड़ता, उसे उठाकर वह फिर ज्‍यों-का-त्‍यों ही अपने शरीर के घावों में रख लेता और पुचकारता हुआ कहता- ‘भैया ! तुम पृथ्‍वी पर कहाँ जाओगे, किसी के पैरों के नीचे कुचल जाओगे, इसलिये यहीं रहो, यहाँ खाने को भी आहार मिलता रहेगा।’ संसारी लोग उसके इस व्‍यवहार को देखकर हंसते और उसे पागल बताते, किंतु उसे संसारी लोगों की परवा ही नहीं थी। वह तो अपने प्‍यारे को प्रसन्‍न करना चाहता था, संसार यदि बकता है तो उसे बकने दो। उसकी दृष्टि में संसार पागल है और संसार की दृष्टि में वह पागल है। वासुदेव कुष्‍ठीका उद्धार….. उसने प्रात: ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  215- जितना कि इन सर्वसमर्थ ईश्‍वरों के पदाघात से। तीर्थों का तीर्थत्‍व जो अभी तक ज्‍यों का त्‍यों ही अक्षुण्‍ण बना हुआ है, इसका सर्वप्रधान कारण यही है कि ऐसे महानुभाव तीर्थों में आकर अपने पादस्‍पर्श से तीर्थों से एकत्रित हुए पापों को भस्‍म कर देते हैं, जिससे तीर्थ फिर ज्‍यों- के-त्‍यों ही निर्मल हो जाते हैं। महाप्रभु चैतन्‍यदेव दक्षिण की ओर यात्रा कर रहे थे। वे जिस ग्राम में होकर निकलते उसी में उच्‍चस्‍वर से भगवन्‍नामों का घोष करते। उन हृदयग्राही सुमधुर भगवन्‍नामों को प्रभु की चित्ताकर्षक मनोहर वाणी द्वारा सुनकर ग्रामों के झुंड-के झुंड स्‍त्री-पुरुष आ-आकर प्रभु को घेर लेते। महाप्रभु उनके बीच में खड़े होकर कहते- हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्‍द माधव गोविन्‍द बोल।। प्रभु के स्‍वर में स्‍वर मिलाकर छोटे-छोटे बच्‍चे ताली बजा-बजाकर जोरों के साथ नाचते हुए कहने लगते- हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्‍द माधव गोविन्‍द बोल।। बच्‍चों के साथ बड़े भी गाने लगते और बहुत-से तो पागलों की तरह नृत्‍य ही करने लगते। इस प्रकार प्रभु जिधर होकर निकलते उधर ही श्रीहरि नाम की गूँज ...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  214- आप प्रसन्‍न होकर मुझे अनुमति प्रदान कीजिये।’ कुछ विवशता प्रकट करते हुए शोक के स्‍वर में भट्टाचार्य ने कहा- ‘आप स्‍वतन्‍त्र ईश्‍वर हैं, आपकी इच्‍छा के विरुद्ध बर्ताव करने की शक्ति ही किसमें है? आप दक्षिण-देश के तीर्थों की यात्रा करने के निमित्त अवश्‍य ही जायँगें, किंतु मेरी हार्दिक इच्‍छा है कि कुछ काल यहाँ और रहकर मेरी सेवा स्‍वीकार कीजिये।’ भक्‍तवत्‍सल गौरांग अपने परमप्रिय कृपापात्र सार्वभौम भट्टाचार्य के इस अनुरोध की उपेक्षा न कर सके। वे पाँच दिनों तक भट्टाचार्य की सेवा को स्‍वीकार करके पुरी में ही रहे और नित्‍यप्रति भट्टाचार्य के ही घर उनकी प्रसन्‍नता के निमित्त भिक्षा करते रहे। भट्टाचार्य की पत्‍नी भाँति-भाँति के सुस्‍वादु पदार्थ बना-बनाकर प्रभु को भि़क्षा कराती थीं। इस प्रकार पाँच दिनों तक भट्टाचार्य के घर भिक्षा करके और उनके चित्त को सन्‍तुष्‍ट बनाकर प्रभु ने दक्षिण-यात्रा की तैयारियाँ कीं। प्रात: काल प्रभु भक्‍तों के सहित उठकर नित्‍य-कर्म से निवृत हुए। उसी समय अपने दो-चार प्रधान शिष्‍यों के सहित सार्वभौम भट्टाचार्य प्रभु के स्‍थान पर आ पहुँचे।...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  213- मुकुंद दूसरों के कष्‍ट को नहीं देख सकते। विशेषकर मेरे शरीर के कष्‍ट से तो ये क्षुभित हो उठते हैं। इन्‍हें मेरे संन्‍यास के नियमों की कठोरता असह्य मालूम पड़ती है। ये मेरे पैदल भ्रमण,  कम वस्‍त्रों में निर्वाह, त्रिकाल स्‍नान, भिक्षान्‍न से उदरपूर्ति और जहाँ स्‍थान मिल गया वहीं पड़ रहने वाले नियमों से मन-ही-मन दु:खी रहते हैं। यद्यपि ये मुख से कुछ भी नहीं कहते, किन्‍तु इनके मनोगत भाव मुझसे छिपे नहीं रहते। इनके मानसिक दु:ख से मुझे भी क्‍लेश होता है। मैं अपने नियमों को छोड़ न सकूँगा, ये अपने कोमल स्‍वभाव को कठोर बना न सकेंगे, इसलिये इन्‍हें साथ ले जाना मेरे लिये असम्‍भव है।’ इन सब बातों को सुनकर नित्‍यानन्‍द जी ने कुछ खिन्‍न मन से कहा- ‘प्रभो ! आपकी इच्‍छा के विरुद्ध करने की सामर्थ्‍य ही किसमें है; किन्‍तु मेरी एक अन्तिम प्रार्थना है, इसके लिये मैं बार-बार चरणों में प्रार्थना करता हूँ कि इसे आप अवश्‍य स्‍वीकार करेंगे।’ प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही ममता प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘श्रीपाद ! आप यह कैसी बात कर रहे हैं। आप तो मेरे पूज्‍यमान और गुरुतुल्‍य हैं। आपकी...

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श्री श्री चैतन्य चरितावली  212- सभी प्रभु के इस निश्‍चय को सुनकर अवाक रह गये। उनमें से नित्‍यानन्‍द जी बोल उठे- ‘प्रभो ! आप तो निश्‍चय करके आये थे कि हम नीलाचल में ही रहेंगे।सभी भक्‍तों को भी आप इसी प्रकार का आश्‍वासन दे आये थे, किन्‍तु अब आप यह कैसी बातें कर रहे हैं? आपके सभी कार्य अलौकिक होते हैं। आप क्‍या करना चाहते हैं, इसे कोई नहीं जान सकता। आपके मनोगत भावों को समझ लेना मानवीय बुद्धि के परे की बात है। आप सर्वसमर्थ हैं, जो चाहें सो करें, किन्‍तु पुरी जैसे परम पावन क्षेत्र को परित्‍याग करके आप दक्षिण की ओर क्‍यों जाना चाहते हैं?’ महाप्रभु ने कुछ सोचकर कहा- ‘हमारे ज्‍येष्‍ठ बन्‍धु महामहिम विश्‍वरूप जी दक्षिण देश की ही ओर गये थे, मैं उधर जाकर उनकी खोज करूँगा। संन्‍यास लेकर उनकी खोज करना मेरा सर्वप्रधान कर्तव्‍य है।’ कुछ दु:ख की सूखी हंसी हंसते हुए दामोदर पण्डित ने कहा- ‘भाई को खोजने के लिये जा रहे हैं, इसे तो हम खूब जानते हैं, यह तो आपका बहानामात्र है। यथार्थ बात तो कुछ और ही हैं। मालूम होता है, दक्षिण देश को पावन करने की इच्‍छा है सो हम मना थोड़े ही करते हैं और मना करें भी तो आप ...

cc 211

श्री श्री चैतन्य चरितावली  211- अर्थात श्रीमद्भागवत में सर्ग-विसर्ग, स्थिति, पोषण, ऊति, मन्‍वन्‍तर, ईश-कथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय- इन दसों का वर्णन हैं। इनमें दसवां विषय जो सबके आश्रयस्‍वरूप श्रीकृष्‍ण हैं उन्‍हीं के तत्त्वज्ञान के निमित्त महात्‍मा पुरुष यहाँ इन सर्गादि नौ लक्षणों का स्‍वरूप वर्णन करते हैं। जिनमें श्रुति के द्वारा स्‍तुति आदि से प्रत्‍यक्ष वर्णन करते हैं और भाँति-भाँति के आख्‍यान कहकर अन्‍त में तात्‍पर्यरूप से भी उसी का वर्णन करते हैं। सारांश यही कि चाहे तो देवता आदि के द्वारा तू ही सबका आश्रय है, यह कहकर उनका वर्णन किया हो या अम्‍बरीष आदि की कथा कहकर अन्‍त में यह तात्‍पर्य निकालो कि बिना भगवत-शरण प्राप्‍त किये कल्‍याण नहीं। कैसे भी कहा जाय। सर्वत्र उसी दसवें ‘आश्रयभूत’ श्रीकृष्‍ण के चरणों में प्रीति होने के ही निमित्त श्रीमद्भागवत की रचना हुई है। इसलिये ‘मुक्तिपद’ वे ही श्रीकृष्‍णभगवान हो सकते हैं। यहाँ सार्ष्टि, सामीप्‍यादि मुक्ति से तात्‍पर्य नहीं है।’ सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! मुझे तो आपकी इस व्‍याख्‍या से सन्‍तोष हो गया और यही यहाँ मुक्तिपद शब्‍द का भाव होगा ...