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श्रीनवद्वीपधाम माहात्म्य

एकादश अध्याय 1

  श्रीनवद्वीप के चन्द्रस्वरूप श्रीशचीनन्दन की जय हो ! जय हो ! अवधूत नित्यानन्द प्रभु की जय हो ! जय हो !  श्रीअद्वैत आचार्य की जय हो ! जय हो ! श्रीगदाधर और श्रीवास पंडित की जय हो ! जय हो ! अन्य सभी तीर्थों के सारस्वरूप श्रीनवद्वीप धाम की जय हो ! जय हो ! जिस धाम में श्रीगौरसुन्दर अवतरित हुए हैं।श्रीनित्यानन्द प्रभु ने कहा सभी सुनो यह स्थान पँचवेणी है जहां पांच नदियों का संगम होता है।भगीरथी , मंदाकिनी तथा अलकनंदा के साथ सरस्वती गुप्त रूप से प्रवाहित होती है। पश्चिम में यमुना के साथ भोगवती आती है जिसके साथ मानस गंगा भी बहुत तेज़ी से बहती है। ऋषिगण इस स्थान को महा महाप्रयाग कहते हैं क्योंकि उन्होंने इस स्थान पर ब्रह्मा जी के साथ बैठकर कोटि कोटि यज्ञ किये हैं। ब्रह्मास्त्र नामक इस स्थान की महिमा अपार है । यहां स्नान करने से पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता। शुष्कधारा सम अन्य किसी तीर्थ का महत्व इसके समान नहीं है। यदि यहां कोई व्यक्ति जल में , स्थल में या अंतरिक्ष मे शरीर छोड़ता है तो उसे गोलोक की प्राप्ति होती है। गंगा तट पर यह भूमि ऊंची होने के कारण पहाड़ समान लगती है इसलिए सभी इस स्थान को कुलिया पहाड़ कहते हैं। शास्त्रों में इसे कोलद्वीप कहते हैं। इस स्थान से सम्बंधित सतयुग का एक उपाख्यान श्रवण करो।

   वासुदेव नाम का एक ब्राह्मण बालक हर समय श्रीवराह देव की पूजा करता था तथा उनकी सेवा किया करता था। प्रतिदिन उनसे प्रार्थना करता कि हे प्रभु मुझ पर कृपा कर दर्शन दीजिये जिससे मेरा तथा इन नेत्रों का जीवन धारण करना सफल हो। एक दिन ऐसा कहकर वह बालक वहां की रज में लौटपोट होने लगा तथा मन मे विचार आया कि यदि मेरे प्रभु मुझे दर्शन न दें तो मेरा जीवन धारण करना व्यर्थ है। कुछ दिन बाद श्रीवराह देव् ने कोलद्वीप में उसे अपने दर्शन दिए। श्रीवराह देव् के सभी अंग अनेक रत्न जड़ित आभूषणों से भूषित थे। उनके चरणकमल , गला, नाक,मुख तथा नेत्र सभी अंग मन को हरण करने वाले थे। उनका दिव्य कलेवर पर्वत के समान था। विप्र उनके दर्शन करके स्वयम को धन्य अति धन्य मानने लगा। भूमि पर गिरकर उनके चरणों मे रोने लगा।उस ब्राह्मण की भक्ति देख प्रभु अति प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा तुम मेरे भक्त हो मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो। कलियुग में मैं इस नवद्वीप में गौर रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाएं प्रकाशित करूंगा । इस धाम के समान कोई तीर्थ नहीं है परंतु अभी यह गुप्त है। यहां पर सम्पूर्ण तीर्थो का वास है। जिस स्थान पर ब्रह्मा के यज्ञ में प्रकाशित होकर मैंने अपने दांत से हिरनाक्षय के अंगों को चीरा था यह वही पुण्यभूमि है जहां मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हूँ। इस धाम में वास करने से सभी तीर्थों का वास हो जाता है।तुम अनायास ही महासंकीर्तन का दर्शन कर पाओगे तथा गौरलीला का दर्शन करोगे। इतना कहकर श्रीवराह देव् वहां से चले गए। तभी एक आकाशवाणी हुई जो उससे कह रही थी तुम श्रीमन महाप्रभु के तत्व को समझने हेतु शास्त्रों का अनुसंधान करो। क्योंकि वह परम विद्वान था उसने शास्त्रों का अध्ययन करने उपरांत विचार किया कि वैवस्वत मन्वंतर में कलियुग की प्रथम संध्या को श्रीगौरसुन्दर इस नवद्वीप में लीला प्रकाशित करेंगे। ऋषियों ने यह सब शास्त्रों में गुप्त रूप से इंगित किया है । केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही इस तत्व को समझ सकते हैं।

     महाप्रभु जी की लीला प्रकाशित होने पर यह सभी तथ्य प्रकाशित हो जाएंगे , परन्तु अभी सब कुछ गोपन रखने योग्य है। वह प्रसन्न होकर संकीर्तन करने लगा तथा मन ही मन श्रीगौरहरि का नाम गायन करने लगा। पर्वत के समान दिखाई देने वाले श्रीवराह देव (कोलदेव) के दर्शन कर उसने मन ही मन सोचा कि यही नवद्वीप धाम का कोलद्वीप नाम का स्थान है। तब से इस स्थान को कोलद्वीप नाम से पुकारा जाता है। श्रीनित्यानन्द प्रभु ने कहा यही स्थान वृन्दावन की नित्यलीला में गोवर्धन पर्वत है। इसके उत्तर में श्री बहुलावन का दर्शन करो । इसकी रूप छटा दसों दिशाओं को आलोकित कर रही है। वृन्दावन में जिस क्रम से द्वादश वन है उस क्रम से यहा पर नहीं है। श्रीमन महाप्रभु की इच्छा से यहां क्रम विपर्यय है। इसका ऐसा होने का कारण महाप्रभु जी की इच्छा है। यहां पर यह जिस क्रम से व्यवस्थित है इसी क्रम से इनका दर्शन करना चाहिए। इससे प्रेम में वृद्धि होती है। कुछ दूर जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभु ने समुद्रगढ़ के दर्शन करने को कहा। यहां पर साक्षात द्वारकापुरी तथा श्रीगंगासागर दो तीर्थ वास करते हैं। यहां पर समुद्रसेन नामक राजा रहते थे। वह बहुत बड़े कृष्ण भक्त थे। भगवान श्रीकृष्ण के बिना वह कुछ भी नहीं जानते थे। बंगाल में दिग्विजय के समय जब भीमसेन ने अपने सैन्य बल से समुद्रगढ़ को घेर लिया तब राजा ने विचार किया कि श्रीकृष्ण ही पांडव भाइयों के एकमात्र आश्रय हैं। यदि इनपर कोई वि्पति आये तो यदुपति इनकी रक्षा हेतु दौड़ पड़ते हैं। यदि मैं किसी तरह भीमसेन को भयभीत कर दूं तो यह श्रीकृष्ण को ही पुकारेंगे । वह भीमसेन की पुकार सुनकर समुद्रगढ़ दौड़ आएंगे तथा मैं अनायास ही उनके श्याम रूप का दर्शन कर पाऊँगा। ऐसा सोचकर राजा ने अपने सम्पूर्ण सैन्य बल के साथ युद्ध हेतु प्रस्थान किया। श्रीकृष्ण का स्मरण कर राजा बाण चलाने लगे तो भीम बहुत भयभीत हुआ। घोर विपत्ति देख भीम मन ही मन क्रंदन करने लगे। हे नाथ ! अपने चरणकमलों का आश्रय देकर दास की रक्षा करो। मैं इस राजा के सामने टिक नहीं पा रहा हूँ। यदि मैं हार गया तो यह बहुत लज्जा की बात होगी तथा मैं सहन नहीं कर सकूंगा। क्रमशः

जय निताई जय गौर

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