34 ग्रंथ लेखन विश्राम
अष्टादश अध्याय 2
परमार्थ के विषय मे अंधे व्यक्ति नवद्वीप तथा ब्रज में जो निगूढ़ सम्बन्ध है अर्थात वह एक होने पर भी दो रूपों में प्रकाशित है , नहीं देख पाते। हे जीव ! श्रीकृष्ण तथा गौर में भी वैसा ही सम्बन्ध है अर्थात वह एक होकर भी दो रूपों में प्रकाशित हैं । श्रीगौर ही माधुर्य रस में युगल किशोर श्रीराधेकृष्ण के रूप में अवतरित होते हैं। हे वल्लभनन्दन ! थोड़े ही दिनों में श्रीरूप तथा श्रीसनातन तुम्हें इस विषय मे बताएंगे। श्रीमनमहाप्रभु ने तुम्हें श्रीधाम वृन्दावन में रहने का अधिकार प्रदान किया है। इस लिए हे जीव तुम ब्रज जाने में और अधिक विलम्ब न करो। इतना कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु ने उनके मस्तक पर अपना चरण रखकर शक्ति संचारित की।महाप्रेम में मत्त होकर श्रीजीव बहुत देर तक मूर्छित अवस्था में श्रीनित्यानन्द प्रभु के चरण कमलों में पड़े रहे। चेतना प्राप्त होने पर श्रीजीव श्रीवास आंगन की रज में लौटने लगे। उनकी देह में सात्विक विकार शोभा पाने लगे।
श्रीजीव क्रंदन करते हुए कहने लगे कि मैंने अपने ही दुर्भाग्य के कारण अपने इन नेत्रों से श्रीगौरसुन्दर के नदिया में किये विहार का दर्शन नहीं कर पाया। जगत के जीवों के उद्धार के लिए ही श्रीगौरहरि ने लीला की थी। किंतु उनकी लीलाओं के दर्शन न कर पाने के कारण मेरे दिन व्यर्थ हो रहे हैं।
श्रीजीव ब्रज जा रहें हैं , ऐसा सुनकर बहुत से सज्जन व्यक्ति साधु महात्मा श्रीवास आंगन में उपस्थित हुए। वृद्ध वैष्णव श्रीजीव को आशीर्वाद देने लगे। जो वैष्णव श्रीजीव से आयु में कम थे , वह उनसे कृपा रूपी प्रसादी माँगने लगे। हाथ जोड़कर श्रीजीव ने सभी वैष्णव से प्रार्थना करते हुए कहने लगे -कृपया आप लोग मेरा कोई अपराध ग्रहण न करना। आप सभी लोग चैतन्य महाप्रभु जी के दास तथा जगत के गुरु है। हे वांछाकल्पतरु वैष्णव गण! इस शुद्र जीव के प्रति ऐसी दया करें जिससे श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु के प्रति मेरी रति मति हो तथा नित्यानन्द जी जन्म जन्म में मेरे प्रभु हों।मैंने बाल्यकाल में ही ग्रह त्याग कर दिया है । मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप लोग ही मेरे एकमात्र बन्धु हैं। वैष्णव कृपा के बिना श्रीकृष्ण की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसलिए आप सभी मुझे अपने चरणों की रज प्रदान करें।
इतना कहकर श्रीजीव ने सबके चरणों मे प्रणाम करते हुए स्तुति की तथा नित्यानन्द प्रभु जी की अनुमति से श्रीजगन्नाथ मिश्र के घर जाकर माता सचि देवी के चरणकमलों में गिरकर व्याकुल हृदय से ब्रज जाने की आज्ञा मांगी। श्रीसचि देवी ने अपने चरणों की रज देकर श्रीजीव को आशीर्वाद देते हुए विदा किया।
प्रभु की आज्ञा को ही सर्वस्व मानते हुए हा गौरांग ! हा गौरांग !कहते हुए क्रंदन करते करते भगवती भगीरथी को पार किया। कुछ देर चलने के पश्चात जीव गोस्वामी ने अनन्त महिमाशाली श्रीनवद्वीप धाम की सीमा को पार किया । वही से उन्होंने श्रीनवद्वीप धाम को साष्टांग प्रणाम करके श्रीधाम वृन्दावन की ओर प्रस्थान किया। उस समय श्रीजीव के हृदय में ब्रजधाम , श्रीयमुना जी तथा श्रीरूप सनातन स्फुरित होने लगे।
मार्ग में रात्रि के समय स्वप्न में उन्हें श्रीगौरहरि के दर्शन हुए , जो उनसे कह रहे थे कि तुम मथुरा जाओ। तुम और रूप सनातन मुझे बहुत प्रिय हो । तुम सब मिलकर भक्ति शास्त्रों को प्रकाशित करो। मेरी श्रीराधेकृष्ण के रूप में युगल सेवा ही तुम्हारा जीवन हो और तुम लोग सदैव ब्रज की लीलाओं के दर्शन करो।स्वप्न देख श्रीजीव परम् आनन्दित हए तथा ब्रजधाम की ओर द्रुतगति से चलने लगे।
ब्रज में जाकर श्रीजीव गोस्वामी पाद ने जो जो कार्य किये उनका वर्णन करना तो सम्भव नहीं है। बाद में सौभाग्यशाली व्यक्ति ही उनका वर्णन करेंगे और सभी साधु व्यक्ति आनन्दित होकर उसे श्रवण करेंगें।
भगवत कृपा पात्र नहीं होने पर भी अधम बुद्धियुक्त भक्तिविनोद ने श्रीधाम की परिक्रमा का वर्णन किया है। वैष्णव चरणों मे मेरी यही प्रार्थना है कि वह मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मेरा श्रीगौरहरि से सम्बन्ध जुड़ जाए, यही मेरी एकमात्र अभिलाषा है।वैष्णवों की कृपा बिना विषयरूपी गड्ढे में पड़ा हुआ कीट , दुराचारी, भक्तिहीन , काम मे रत्त , क्रोध में मत्त और माया का दास मेरे जैसा व्यक्ति किस प्रकार श्रीगौरहरि से अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। यदि श्रीनवद्वीप धाम मेरे प्रति अनुग्रह प्रकाशित करके मेरे हृदय में उदित हों तभी मेरा उद्धार हो सकता है। मुझे विश्वास है कि कुलदेवी प्रोढामाया की अप्रकट कृपा ही अविद्या रूपी संकट से मेरा उद्धार कर सकती है। क्षेत्रपाल सदाशिव मुझ पर कृपा करें ताकि चिन्मय धाम मेरे दृष्टिगोचर हो सके।हे नवद्वीप वासी गौर भक्तो ! मुझ पामर के सिर पर अपने चरणकमल समर्पित कीजिये।आप सभी मेरी इस प्रार्थना को सुनिए ताकि मैं जल्द ही श्रीगौरसुन्दर के चरणकमलों को प्राप्त कर सकूं।दीन हीन होने पर भी मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीजाह्वा देवी के आदेश से श्रीनवद्वीप धाम के महात्म्य का वर्णन किया है।यह ग्रंथ श्रीनवद्वीप तथा श्रीनित्यानन्द प्रभु जी के नाम से भरा हुआ है। इसलिए निश्चित ही यह परम पवित्र ग्रंथ है तथा रचना के दोष से भी कदापि दोषी नहीं है।इस ग्रंथ का पाठ करके गौरभक्त परिक्रमा के वास्तविक फल को अर्जित करें।परिक्रमा करते समय जो इस ग्रंथ की आलोचना करता है , उसे परिक्रमा करने का सौ गुना फल प्राप्त होता है यही शास्त्रों की वाणी है।
श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीमती जांह्वा देवी के सुशीतल चरण कमलों की छाया लेकर दीन हीन भक्ति विनोद द्वारा श्रीनवद्वीप धाम के माहात्म्य का गान किया गया है।
ग्रंथ लेखन विश्राम
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