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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पण्डित जगन्नाथ मिश्र अपने पिता की अनुमति से संस्कृत विद्या पढ़ने के लिये सिलहट से नवद्वीप में आये और पण्डित गंगादास जी की पाठशाला में अध्ययन करने लगे। इनकी बुद्धि कुशाग्र थी, पढ़ने-लिखने में ये तेज थे इसलिये अल्पकाल में ही, इन्होंने काव्यशास्त्रों का विधिवत अध्ययन करके पाठशाला से ‘पुरन्तर’ की पदवी प्राप्त कर ली।इनके रूप-लावण्य तथा विद्या-बुद्धि से प्रसन्न होकर नवद्वीप के प्रसिद्ध पण्डित श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती ने अपनी ज्येष्ठा कन्या शची देवी का इनके साथ विवाह कर दिया। पण्डित नीलाम्बर चक्रवर्ती भी नवद्वीप निवासी नहीं थे। इनका आदिस्थान फरीदपुर के जिले में मग्डोवा नामक एक छोटे-से ग्राम में था। ये भी विद्याध्ययन के निमित्त नवद्वीप आये थे और पढ़-लिखकर फिर यहीं रह गये। इनका घर ‘बेलपुकुरिया’ में काजीपाड़ा के समीप था। इनके यज्ञेश्वर और हिरण्य दो पुत्र और दो कन्याएँ थीं। छोटी कन्या का विवाह श्री चन्द्रशेखर आचार्यरत्न के साथ हुआ था और बड़ी कन्या जगन्माता शची देवी का पण्डित जगन्नाथ मिश्र के साथ। रूपवती और कुलवती पत्नी को पाकर पुरन्दर महाशय परम सन्तुष्ट हुए और फिर सिलहट न जाकर वहीं मायापुर में घर बनाकर रहने लगे। मायापुर में और भी बहुत-से सिलहटनिवासी ब्राह्मण रहते थे।

पण्डित जगन्नाथ मिश्र भी वहीं रहने लगे। मायापुर नवद्वीप का ही एक मुहल्ला है। आजकल जो नगर नवद्वीप के नाम से प्रसिद्ध है, वह तो उस समय ‘कुलिया’ नामक ग्राम था। पुराना नवद्वीप तो कुलिया के सामने गंगा जी के उस पार पूर्व किनारों पर अवस्थित था, जो आजकल बामनपूकर नाम से पुकारा जाता है। कहा जाता है कि प्राचीन नवद्वीप की परिधि 16 कोस की थी, उसमें अन्तःद्वीप, सीमन्तद्वीप, गोद्रुमद्वीप, मध्यद्वीप, कोलद्वीप, ऋतुद्वीप, जन्हूद्वीप, मोदद्रुमद्वीप और रुद्रद्वीप ये 9 द्वीप थे। इन नवों को मिलाकर ही नवद्वीप कहते थे। मायापुर जहाँ पर पण्डित जगन्नाथ मिश्र रहते थे, वह मध्यद्वीप के अन्तर्गत था, अब उस स्थान का पता भी नहीं है कि कहाँ गया। भगवती भागीरथी के गर्भ में वे सभी प्राचीन स्थान विलीन हो गये, केवल महाप्रभु की कीर्ति के साथ उनके नाममात्र ही शेष रह गये हैं। पण्डित जगन्नाथ मिश्र अपनी सर्वगुणसम्पन्ना पत्नी के साथ सुखपूर्वक नवद्वीप में रहने लगे।

शची देवी के गर्भ से एक-एक करके 8 कन्याओं का जन्म हुआ और वे अकाल में ही कालकवलित बन गयीं। इससे मिश्र-दम्पति का गार्हस्थ्य-जीवन कुछ चिन्तामय और दुःखमय बना हुआ था। गृहस्थी के लिये सन्तानहीन होना जितना कष्टप्रद है, उससे भी अधिक कष्टप्रद सन्तान होकर उसका जीवित न रहना है, किन्तु इस धर्मप्राण-दम्पति का यह दुख और अधिक कालतक न रह सका। थोडे़ ही दिनों के अनन्तर शची देवी के गर्भ से एक पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ, जिसका नाम मिश्र जी ने विश्वरूप रखा। विश्वरूप सचमुच में ही विश्वरूप थे। माता-पिता को इस अद्वितीय रूप-लावण्ययुक्त पुत्र को पाकर परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। चन्द्रमा की कलाओं के समान विश्वरूप धीरे-धीरे बड़े होने लगे। इसप्रकार विश्वरूप की अवस्था नव दस वर्ष की हुई होगी कि तभी माघ-मास में शची देवी के फिर गर्भ रहा। बस, इसी गर्भ से महाप्रभु चैतन्यदेव का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रादुर्भाव........

श्रीमद्भागवत तथा गीता में भगवान ने बार-बार श्रीमुख से जोर देकर कहा है कि मेरे पाने का एकमात्र उपाय भक्ति ही है। मैं योग से, ज्ञान से, जप से, तप से, समाधि से तथा यज्ञ-यागादि अन्य वैदिक कर्मों से इतना तुष्ट नहीं होता जितना कि भक्ति से प्रसन्न होता हूँ, केवल अनन्य भक्ति के ही द्वारा मेरा यथार्थ ज्ञान होता है कि मैं कैसा हूँ और मेरा प्रभाव कितना है। जिस भक्ति की इतनी महिमा है, वह भक्ति जिसके हृदय में हो उस भाग्यवान भक्त के महत्त्व का वर्णन भला कौन कर सकता है। वास्तव में भगवान और भक्त नाममात्र के ही लिये दो हैं, भक्त भगवान के साकार विग्रह का ही नाम है। भगवान स्वयं ही कहते हैं- ‘मैं तो भक्तों के अधीन हूँ, कोई मेरा अपराध कर दे तो उसे तो मैं क्षमा कर भी सकता हूँ, किन्तु भक्तद्रोही के अपराध को मैं क्षमा करने में असमर्थ हूँ।’ भगवान भक्तों की महिमा को बतलाते हैं कि मैं भक्तों के पीछे-पीछे सदा इसलिये घूमा करता हूँ कि उनके चरणों की धूलि उड़कर मेरे ऊपर पड़ जाय तो मैं पावन हो जाऊँ। यहीं तक नहीं, भगवान स्वयं भक्तों का भजन करते हैं।

भगवान हस्तिनापुर में ही विराजमान थे। महाराज युधिष्ठिर प्रायः हर समय ही उनके पास रहते थे, उन्हें भगवान् के बिना चैन ही नहीं पड़ता था। एक दिन रात्रि के बारह बजे महाराज भगवान के स्थान पर पहुँचे। उस समय भगवान समाधि में बैठे हुए थे। धर्मराज बहुत देर तक हाथ जोडे़ खड़े रहे। कुछ काल के अनन्तर भगवान की समाधि भंग हुई। सामने धर्मराज को खडे़ देखकर उन्होंने उनका स्वागत किया और असमय में आने का कारण पूछा। धर्मराज ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया- ‘भगवन! और बातें तो मैं फिर पूछूँगा, इस समय जो मुझे बड़ा भारी संशय हुआ है, उसका उत्तर पहले दीजिये। आप चराचर जगत के एकमात्र स्वामी हैं, सम्पूर्ण प्राणियों के आप ही भजनीय हैं। ऋषि, महर्षि, देव, दानव, देवता तथा मनुष्य सभी आपका ध्यान करते हैं, इस समय आपको समाधि में बैठा देखकर मुझे महान कुतूहल उत्पन्न हुआ है कि आप किसका ध्यान करते होंगे? धर्मराज के प्रश्न को सुनकर भगवान् हँसे और मन्द-मन्द मुस्कान के साथ बोले- ‘धर्मराज! यह ठीक है कि सम्पूर्ण जगत् का एकमात्र मैं ही भजनीय हूँ, किन्तु मेरे भी भजनीय भक्त हैं, मैं सदा भक्तों का ध्यान किया करता हूँ।’
यह सुनकर धर्मराज ने पूछा- ‘अच्छा इस समय आप किसका ध्यान कर रहे थे?’ भगवान ने गद्गद-कण्ठ से कहा- ‘जिन्होंने सर्वस्व त्याग कर केवल मेरे में ही अपने मन को लगा रखा है, जो एक-दो दिन से नहीं कई महीनों से बाणों की शय्या पर बिना खाये-पिये पड़े हुए हैं, सम्पूर्ण शरीर तीरों से भिदा होने पर भी जो मत्परायण ही बने हुए हैं उन्हीं भक्तराज भीष्म पितामह का मैं इस समय ध्यान कर रहा था।’ भगवान की इस भक्तवत्सलता की बात सुनकर भक्ति की सर्वश्रेष्ठता के सम्बन्ध में किसे संशय रह सकता है? भगवान ही इस जगत के एकमात्र आश्रय हैं, उनकी भक्ति उनकी कृपा के बिना प्राप्त ही नहीं हो सकती।
क्रमशः

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