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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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फिर भी अपनी शक्ति के अनुसार उन्होंने अन्न-वस्त्र का दान अभ्यागत तथा ब्राह्मणों के लिये दिया। इस प्रकार वह रात्रि आनन्द तथा उत्साह में ही व्यतीत हुई। दूसरे दिन धूलेड़ी थी। उस दिन सभी परस्पर में मिलकर धूलि-कीच तथा अबीर-गुलाल और रंग से होली खेलते हैं। बस, उसी दिन कट्टर-से-कट्टर पण्डित भी स्पर्शास्पर्श का भेद नहीं मानते। सभी परस्पर में मिलते हैं। उस दिन भक्तों में महान आनन्द रहा। एक-दूसरे पर उत्साह के साथ रंग-गुलाल तथा दधि-हल्दी डाल रहे थे। मानो आज नन्दोत्सव मनाया जा रहा हो। भक्तों ने अनुभव किया कि आकाश में देवता उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मिलाकर जयघोष कर रहे हैं और भक्तों को अभयदान देते हुए आदेश कर रहे हैं कि अब भय की कोई बात नहीं, तुम्हारे दुर्दिन अब चले गये। नवद्वीप में ही नहीं सम्पूर्ण देश में भक्ति-भागीरथी की एक ऐसी मनोरम बाढ़ आवेगी कि जिसके द्वारा सभी जीव पावन बन जायँगे और चारों ओर ‘हरि बोल, हरि बोल’ यही सुमधुर ध्वनि सुनायी पड़ेगी।

निमाई......

पं. जगन्नाथ मिश्र और श्रीशची देवी की मानसिक प्रसन्नता का वही अनुभव कर सकता है जिसकी अवस्था महाराज दशरथ और जगन्माता कौसल्या की-सी हो। अथवा कंस का वध करने के अनन्तर देवकी और वसुदेव को जो प्रसन्नता हुई होगी उसी प्रकार की प्रसन्नता मिश्र-दम्पति के हृदय में विद्यमान होगी। शची देवी की क्रमशः आठ कन्याएँ प्रसव होने के कुछ काल के ही पश्चात् परलोकगामिनी बन चुकी थीं। इस वृद्धावस्था में दम्पति सन्तान-सुख से निराश हो चुके थे कि भगवान का अनुग्रह हुआ और विश्वरूप का जन्म हुआ। विश्वरूप यथा नाम तथा गुण ही थे, इनका रूप विश्व को मोहित करने वाला था, किन्तु बालोचित चांचल्य इनमें बिलकुल नहीं था, चेहरे पर परम शान्ति विराजमान थी। माता-पिता इस सर्वगुणसम्पन्न पुत्र के मुख-कमल को देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हुआ करते थे।

अब भगवान की कृपा का क्या कहना है! विश्वरूप के बाद दूसरे बालक को देखकर तो मिश्र-दम्पति अपने आपे को ही भूल गये थे। सब बालक 9 महीने या अधिक-से-अधिक 10 महीने गर्भ में रहते हैं, किन्तु गौरांग पूरे 13 महीने गर्भ में रहे थे। सात महीने में भी बहुत-से बच्चे होते हैं और वे प्रायः जीवित भी रहते हैं, किन्तु वे बहुधा क्षीणकाय ही होते हैं। बात यह है कि 6 महीने में गर्भ के बच्चे के सब अवयव बनकर ठीक होते हैं और सातवें महीने में जाकर उसमें जीवन का संचार प्रतीत होता हे। जीवन का संचार होते ही बच्चा गर्भ से बाहर होने का प्रयत्न करता है। जो माताएँ कमज़ोर होती हैं, उनका प्रसव सात ही महीनों में हो जाता है, किन्तु बहुधा सातवें महीने में बच्चे का प्रयत्न निर्बल होने के कारण असफल ही होता है। बाहर निकलने के प्रयत्न में बालक बेहोश हो जाता है और वह बेहोशी दो महीने में जाकर ठीक होती है।

जो बच्चे 8 ही महीनों में हो जाते हैं, वे बचते नहीं हैं, क्योंकि एक तो पहली बेहोशी और दूसरी प्रसव की बेहोशी, इसलिये कमज़ोर बालक उन्हें सह नहीं सकता। 10 महीने का बच्चा खूब तन्दुरूस्त होता है। 13 महीने गर्भ में रहने के कारण गौरांग पैदा होते ही सालभर के-से प्रतीत होते थे। इनका शरीर खूब मजबूत था, अंग के सभी अवयव सुगठित और सुन्दर थे। तपाये हुए सुवर्ण की भाँति इनके शरीर का वर्ण था, छोटी-छोटी दोनों भुजाएँ खूब उतार-चढ़ाव की थीं। हाथ की उँगली कोमल और रक्त-वर्ण की बड़ी ही सुहावनी प्रतीत होती थी। छोटे-छोटे गुदगुदे पैर, मांस से छिपे हुए सुन्दर टखने, सुन्दर गोल-गोल पिंड़रियाँ और मनोहर ऊरूद्वय थे।छोटे कमल के समान सुन्दर मुख बड़ी-बड़ी आँखें और सुन्दर पैनी नासिका बड़ी ही भली मालूम पड़ती थी। गर्भ के सभी बालकों के इतने मुलायम बाल होते हैं कि वे रेशम के लच्छों को भी मात करते हैं, किन्तु गौरांग के बाल तो अपेक्षाकृत अन्य बालकों के बालों से बहुत बड़े थे। काले-काले सुन्दर घुँघराले बालों से उस सुचारू आनन की शोभा ठीक ऐसी बन गयी थी मानो किसी अधिक रसमय कमल के ऊपर बहुत-से भौंरे आकर स्वेच्छापूर्वक रसपान कर रहे हों। शचीमाता उस रूप-माधुरी को बार-बार निहारती और आश्चर्यसागर में गोते लगाने लगती। वह बच्चे के सौन्दर्य में एक अपूर्व तेज का अनुभव करती। धीरे-धीरे बालक एक मास का हुआ। बंगाल की ओर माता 21 दिन में अथवा महीने भर में प्रसूति-घर से बाहर होती है और तभी षष्ठी-पूजा भी होती है। नामकरण-संस्कार प्रायः चार महीनों में होता था, किन्तु अब तो लोग बहुत पहले भी करने लगते हैं। एक महीने के बाद गौरांग का निष्क्रमण-संस्कार हुआ। सखी-सहेलियों के साथ शचीदेवी बालक को लेकर गंगास्नान करने के निमित्त गयीं। वहाँ जाकर विधिवत गंगा जी का पूजन किया और फिर षष्ठीदेवी के स्थान पर उनके पूजन के निमित्त गयीं।

षष्ठी देवी कौन हैं, इनके सम्बन्ध में पृथक्-पृथक् देशों की पृथक्-पृथक् मान्यता है। यह कोई शास्त्रीय देवी नहीं हैं, एक लौकिक पद्धति है। बहुत जगह तो यह बालकों के अशुभ को मेटने वाली समझी जाती हैं और इसीलिये बालक के कल्याण के निमित्त इनकी पूजा करते हैं। हमारी तरफ बालक के जन्म के छठे दिन षष्ठी (छठी) देवी का पूजन होता है। घर की सबसे मान्य स्त्री पहले-पहल पूजा करती है, फिर सम्पूर्ण कुल-परिवार की स्त्रियाँ आ-आकर पूजा करती हैं अैर भेंट चढ़ाती हैं। मान्य स्त्री उन सबको खाने के लिये सीरा-पूड़ी या कोई अन्य वस्तु देती है। हमारी ओर वैमाता (भावी माता) को ही षष्ठी मानते हैं, ऐसी मान्यता है कि वैमाता उसी दिन रात्रि में आकर बालक की आयुभर का शुभाशुभ भाग्य में लिख जाती है। वैमाता बालक के भाग्य को खूब अच्छा लिख जाय इसीलिये उसकी प्रसन्नता के निमित्त उसका पूजन करते हैं।कुछ भी हो, लौकिक ही रीति सही, किन्तु इसका प्रचार किसी-न-किसी रूप में सर्वत्र ही है।षष्ठी देवी के स्थान पर जाकर शचीदेवी ने श्रद्धा भक्ति के साथ देवी का पूजन किया और वे बच्चे की मंगल-कामना के निमित्त देवी के चरणों में प्रार्थना करके सखी-सहेलियों के साथ प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आयीं।
क्रमशः

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