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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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बालक ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता था, त्यों-ही-त्यों उसकी चंचलता भी बढ़ती जाती थी। विश्वरूप जितने अधिक शान्त थे, गौरंग उतने ही अधिक चंचल थे। एक महीने के ही थे कि अपने-आप ही आँगन में घुटनों के सहारे रेंगने लगते थे। चलते-चलते जोर से किलकारियाँ मारने लगते, कभी-कभी अपने-आप ही हँसने लगते। माता इन्हें पकड़ती, किन्तु इन्हें पकड़ना सहज काम नहीं था।माँ का दूध पीते-ही-पीते कभी इतने जोर से दौड़ते कि फिर इन्हें रोक रखना असम्भव ही हो जाता था। पहले-पहले ये बहुत रोते थे, माता भाँति-भाँति से इन्हें चुप करने की चेष्टा करती किन्तु ये चुप ही नहीं होते थे। एक दिन ये छोटे खटोलने पर पड़े-पड़े बहुत जोरों से रो रहे थे। माता ने बहुत चेष्टा की किन्तु ये चुप नहीं हुए। तब तो माता इन्हें ‘हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द निमाई बोल।।’ यह पद गा-गाकर धीरे-धीरे हिलाने लगीं। बस, इसका श्रवण करना था कि ये चुप हो गये। माता को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें चुप करने का एक सहज ही उपाय मिल गया। जब कभी ये रोते तभी माता अपने कोमल कण्ठ से गाने लगती-

हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।

इसे सुनते ही ये झट चुप हो जाते। इनके मुहल्ले की स्त्रियाँ इन्हें बहुत ही अधिक प्यार करती थीं, इसलिये घर के काम से निवृत्त होते ही वे शची देवी के घर आ बैठती। शचीदेवी का स्वभाव बड़ा ही मधुर था। उनके घर जो भी आती उसी का खूब प्रेमपूर्वक सत्कार करतीं और घर का काम-काज छोड़कर उनसे बातें करने लगतीं। इसलिये सभी भली स्त्रियाँ अपना अधिकांश समय शचीदेवी के यहाँ बितातीं। वे सभी मिलकर गौरांग को खिलाती थीं। बच्चे की जिसमें प्रसन्नता हो खिलाने वाले उसी काम को बार-बार करते हैं। गौरांग हरि-नाम संकीर्तन से ही परम प्रसन्न होते थे और सुनते-सुनते किलकारियाँ मारने लगते, इसलिये स्त्रियाँ बार-बार उसी पद को गातीं। कभी-कभी सब मिलकर एक स्वर से कीर्तन के पदों का गान करती रहतीं। इस प्रकार दिनभर शचीदेवी के घर में-

हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।

इसी पद की ध्वनि गूँजती रहती। इस प्रकार धीरे-धीरे बालक की अवस्था चार मास की हुई। मिश्र जी ने शुभ मुहूर्त में बालक के नामकरण-संस्कार की तैयारियाँ कीं। अपने सहपाठी प्रेमी पण्डितों को उन्होंने निमन्त्रित किया। ब्राह्मणों ने विधि-विधान के साथ वेद-पाठ और हवन किया।पण्डित नीलाम्बर चक्रवर्ती ने जन्म-नक्षत्र के अनुसार बालक का नाम विश्वम्भर रखा। किन्तु जन्म की राशि के नाम प्रायः बहुत कम प्रचलित होते हैं। बच्चे का नाम तो माता-पिता अपनी राजी से ही रख लेते हैं, यह सब जगह की रिवाज है कि बच्चे का आधा नाम लेने में ही सबको आनन्द आता है। इसलिये बच्चे का कैसा भी नाम क्यों न हो उसे तोड़-मरोड़कर आधा ही बना लेंगे। यह प्रगाढ़ प्रेम का एक मुख्य अंग है। शची देवी की सखियों ने भी गौरांग का नाम रख लिया ‘निमाई’। निमाई नाम के सम्बन्ध में लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कइयों का कहना है कि जब ये उत्पन्न हुए थे, तब धात्री को ऐसा प्रतीत हुआ कि इनके शरीर में प्राणों का संचार नहीं हो रहा है। ये प्रसव के अनन्तर अन्य बालकों की भाँति रोये नहीं। जब इनके कान में हरि-मन्त्र बोला गया तब ये रोने लगे।

इसलिये माता ने कहा- ‘यह यमराज के यहाँ नीम की तरह कड़वा साबित हो।’ इसलिये इसका नाम माता ने ‘निमाई’ रख दिया। बहुतों का मत है कि इनका प्रसवगृह एक नीम के वृक्ष के नीचे था, इसलिये इनका नाम ‘निमाई’ रखा गया। बहुतों के विचार में यह नाम हीनता का द्योतक इसलिये रखा गया, कि बच्चे की दीर्घायु हो। लोक में ऐसा प्रचार है कि जिस माता की सन्तानें जीवित नहीं रहतीं वह अपनी सन्तान का इसी प्रकार हीन नाम रखती हैं। कुछ भी हो, हमारा मत तो यह है, यह नाम किसी अर्थ को लेकर नहीं रखा गया। प्यार में ऐसे ही नाम रखे जाते हैं और सर्वसाधारण में वही प्रेम का नाम प्रचलित होता है। जैसे नित्यानन्द का ‘निताई’, जगन्नाथ का ‘जगाई’ इत्यादि। कुछ भी क्यों न हो, सम्पूर्ण नवद्वीप में गौरांग का यही नाम सर्वत्र प्रसिद्ध हुआ।

पण्डित होने पर भी सब लोग इन्हें ‘निमाई पण्डित’ के ही नाम से जानते तथा पहचानते थे। नामकरण-संस्कार के अनन्तर पिता ने इनके स्वभाव की परीक्षा करनी चाही। उन्होंने इनके सामने रूपये-पैसे, अन्न-वस्त्र, द्रव्य-शस्त्र तथा पुस्तकें रख दीं और बड़े प्रेम से बोले- ‘बेटा! इनमें किसी चीज को उठा तो लो।’ प्राय ‘बालक चमकीली चीजों को सबसे पहले पसन्द करते हैं, किन्तु यह स्वभाव तो सर्वसाधारण लौकिक बालकों का होता है, ये तो अलौकिक थे। झट इन्होंने सबसे पहले श्रीमद्भागवत की पुस्तक पर हाथ रख दिया। सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई। सबने एक स्वर से कहा- ‘निमाई बड़ा भारी पण्डित होगा।’ 

प्रेम-प्रवाह.....

ओत-प्रोतरूप से परिप्लावित इस प्रेमपयोधिरूपी जगत में जीव अपनी क्षुद्रता के कारण ऐसे संकीर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, कि उस प्रेमपीयूष का सम्पूर्ण स्वारस्य एकदम नष्ट हो जाता है। अहा! जब सुख-दुख में समान भाव हो जाय, किसी भी अवस्था में चित्त की वृत्ति सजातीय-विजातीय का अनुभव न करने लगे, उस समय के सुख का भला क्या कहना है? ऐसा प्रेम किसी विरले ही महापुरुष के शरीर में प्रकट होता है और उनकी प्रीति के पात्र कोई बड़भागी ही सुजन होते हैं। महापुरुषों में जन्म से ही यह विश्व-विमोहन प्रेम होता है। सभी महापुरुषों के सम्बन्ध में हम चिरकाल से सुनते आ रहे हैं, कि वे जन्म से ही सभी प्राणियों में समान भाव रखते थे। महात्मा नानक जी जब बाल्यावस्था में भैंस चराने जाते तो एकान्त में बैठकर ध्यान करने लगते। बहुत-से लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि एक बड़ा भारी सर्प अपने फण से उनके ऊपर छाया किये रहता और जब वे ध्यान से उठते तब चला जाता। सिंहों को कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते अभी तक तपस्वियों के आश्रम में देखा गया है।
क्रमशः

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