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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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महापुरुषों के अंग में वह प्रेम की आकर्षक बिजली जन्म से ही होती है, कि पापी-से-पापी पुरुष की तो बात ही क्या है, पशु-पक्षी, कीट-पतंग तक उनके आकर्षण से खिंचकर उनके चेरे हो जाते हैं। शची देवी के छोटे से आँगन में जो दिन-रात्रि ‘हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।’ की ध्वनि गूँजती रहती है, इसका कारण निमाई की अपूर्व रूपमाधुरी ही नहीं है, किन्तु उनकी विश्वमोहिनी मन्द-मुसकान ने ही पास-पड़ोसियों की स्त्रियों को चेरी बना लिया है, उन्हें निमाई की मन्द-मुसकान के देखे बिना कल ही नहीं पड़ती। माताओं का यह सनातन स्वभाव है कि उनकी सन्तान पर जो कोई प्रेम करता है तो उनके हृदय में एक प्रकार की मीठी-मीठी गुदगुदी होती है, उनका जी चाहता है इस प्यार करने वाले पुरुष को मैं क्या दे दूँ? स्त्रियाँ निमाई को जितना ही प्यार करतीं, शची माता निमाई को उतना ही और अधिक सजातीं। मातृ-हृदय को भी ब्रह्मा जी ने एक अपूर्व पहेली बनाया है। निमाई अभी छोटा है, बहुत-से स्थानों से बालक के लिये छोटे-छोटे सिले वस्त्र और गहने आये हैं। माता ने अब निमाई को उन्हें पहनाना आरम्भ कर दिया है। एक दिन माता ने निमाई को उबटन लगाकर खूब नहवाया। तेल डालकर छोटे-छोटे घुँघराले बालों को कंघी से साफ किया। एक पीला-सा कुर्ता शरीर में पहनाया।हाथ के कडूलों को मिट्टी से घिसकर चमकीला किया। कमर में करधनी पहनायी, उसे एक काले डोरे से बाँध भी दिया। पैरों में छोटे-छोटे कडूले पहनाये। कण्ठ में कठुला पहनाया। कई एक काले गंडे-ताबीज बच्चे की मंगल-कामना के निमित्त पहले से ही पड़े थे। बड़ी-बड़ी कमल-सी आँखों में काजल लगाया। बायीं ओर मस्तक पर एक काला-सा टिप्पा भी लगा दिया, जिससे बच्चे को नजर न लग जाय। खूब श्रृंगार करके माता बच्चे के मुख की ओर निहारने लगी। माता उस अपूर्व सौन्दर्य-माधुरी का पान करते-करते अपने आपे को भूल गयी। इतने में ही विश्वरूप ने आकर कहा- ‘अम्मा! अभी भात नहीं बनाया?’

कुछ झूठी व्यग्रता और रोब दिखाते हुए माता ने जल्दी से कहा- ‘तेरे इस छोटे भाई से मुझे फुरसत मिले तब भात भी बनाऊँ। यह तो ऐसा नटखट है कि तनिक आँख बचते ही घर से बाहर हो जाता है, फिर इसका पता लगाना ही कठिन हो जाता है।’ विश्वरूप ने कहा- ‘अच्छा ला, इसे मैं खेलाता हूँ। तू तब तक जल्दी से रन्धन कर।’ यह कह विश्वरूप ने बालक निमाई को अपनी गोद में ले लिया। माता तो दाल-चावल बनाने में व्यस्त हो गयी और विश्वरूप धूप में बैठ गये। भला विश्वरूप-जैसे विद्याव्यासंगी बालक ख़ाली कैसे बैठे रह सकते हैं? वे निमाई को पास बिठाकर पुस्तक पढ़ने लगे। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते वे उसमें तन्मय हो गये। अब निमाई को किसका भय? धीरे से रेंग-रेंगकर आप आँगन के दूसरी ओर एकान्त में जा पहुँचे? वहाँ पर एक कोई बड़भागी सर्प देवता बैठे हुए थे। बस, निमाई को एक नूतन खिलौना मिल गया। वे उनके साथ खेलने लगे।

माता शरीर से तो दाल-भात बनाती जाती थीं, किन्तु उनका मन निमाई की ही ओर लगा हुआ था। थोड़ी देर में जब उसने दोनों भाइयों में कुछ भी बातें-चीतें न सुनीं तो विश्वरूप को सावधान करने के निमित्त उन्होंने वहीं से पूछा- ‘विश्वरूप! निमाई सो गया क्या? मानो कोई घोर निद्रा से जागकर अपने चारों ओर जगाने वाले को भौंचक्के की भाँति देखता है, उसी प्रकार पुस्तक से नजर उठाकर विश्वरूप ने कहा- ‘क्या अम्मा! क्या कहा? निमाई? निमाई तो यहाँ नहीं है।’ मानो माता के कलेजे में किसी ने गरम ठेस लगा दी हो, उनका मातृहृदय उसी समय किसी अशुभ आशंका के भय से पिघलने लगा। वे दाल-भात को वैसे ही छोड़कर जल्दी से बाहर आयीं।विश्वरूप भी उठकर खड़े हो गये। दोनों माँ-बेटे इधर-उधर निमाई को ढूँढ़ने लगे। आँगन के दूसरी ओर उन्होंने जो कुछ देखा उसे देखकर तो सबके छक्के छूट गये। माता ने बड़े जोर से एक चीत्कार मारी। उनकी चीत्कार को सुनकर आस-पास से और भी स्त्री-पुरुष वहाँ आ गये। सबों ने देखा निमाई का आधा शरीर धूलि-धूसरित है, आधा अंग तेल के कारण चमक रहा है। बालों में भी कुछ धूलि लगी है। कुर्ते में पीठ की ओर एक गाँठ लगी है, वह बड़ी ही भली मालूम पड़ती है। पीले रंग के वस्त्रों में से सुवर्ण-रंग का शरीर बड़ा ही सुहावना मालूम पड़ता है। सर्प गुड़मुड़ी मारे बैठा है। निमाई उसके ऊपर सवार है। उसने अपना काला गौ के खुर के चिह्न से चिह्नित विशाल फण ऊपर उठा रखा है। निमाई का एक हाथ फण के ऊपर है। एक से वे जमीन को छू रहे हैं। एक पैर में वलय देकर साँप चुपचाप पड़ा है। सूर्य के प्रकाश में उसका स्याह काला शरीर चमक रहा है।

निमाई को कोई चिन्ता ही नहीं। वे हँस रहे हैं। हँसने से आगे के दाँत जो अभी नये ही निकले हैं खूब चमक रहे हैं। देखने वालों के होश उड़ गये। सभी के हृदय में एक विचित्र आन्दोलन उठ रहा था। किसी की हिम्मत भी नहीं पड़ती थी कि बच्चे को साँप से छुड़ावे। इसी समय शची देवी छुड़ाने के लिये दौड़ीं। उनका दौड़ना था कि साँप जल्दी से अपने बिल में घुस गया। निमाई हँसते-हँसते माता की ओर चले। माता ने जल्दी से बालक को छाती से चिपटा लिया। उस समय माता को तथा अन्य सभी लोगों को जो आनन्द हुआ होगा उसका वर्णन भला कौन कर सकता है? सभी ने बच्चे को सकुशल काल के गाल में से लौटा देखकर भाँति-भाँति के उपचार किये। किसी ने झाड़-फूँक की, किसी ने ताबीज बनाया। स्त्रियाँ कहने लगीं- ‘यह कोई कुलदेवता है, तभी तो इसने बच्चे को कोई क्षति नहीं पहुँचायी।’ कोई-कोई बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ बच्चे का मुँह चूम-चूकर कहने लगीं- ‘निमाई, तू इतनी बदमाशी क्यों किया करता है? क्या तुझे खेलने को साँप ही मिले हैं? निमाई उनकी ओर देखकर हँस देते तभी सब स्त्रियाँ गाने लगतीं-

हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।
क्रमशः

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