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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जब निमाई गौरहरि हो गये और पाठशाला की इतिश्री हो गयी तब मानो निमाई पण्डित प्रेम पण्डित बन गये। अब वे लौकिक पाठ न पढ़ाकर प्रेम-पाठ पढ़ाने वाले अध्यापक बन गये। सर्वप्रथम उनके कृपापात्र होने का सौभाग्य परम-भाग्यशाली स्वनामधन्य श्रीरत्नगर्भाचार्य को प्राप्त हुआ।गौरांग महाप्रभु जीवों को त्याग का पाठ पढ़ाना चाहते थे। वे दिखा देना चाहते थे कि प्रभुप्राप्ति के लिये प्यारी-से-प्यारी वस्तु का भी परित्याग करना आवश्यक है। नहीं तो उन्हें स्वयं संन्यास का क्या प्रयोजन था। अद्वैताचार्य के पूछने पर आपने स्पष्ट ही कह दिया था-
विना सर्वत्यागं भवति भजनं नह्यसुपते-
रिति त्यागोअस्माभिः कृत इह किमद्वैतकथया।।
अयं दण्डो भूयान् प्रबलतरसो मानसपशो-
रितीवाहं दण्डग्रहणमविशेषादकरवम्।।
आचार्य ने पूछा था-‘आपने यह अद्वैत-वेदान्तियों की भाँति संन्यास लेकर दण्ड-धरण क्यों किया है?’ इस पर महाप्रभु कहते हैं- ‘आचार्य! संन्यास धारण करने में द्वैत-अद्वैत की कौन-सी बात है। मुख्य बात तो है अपने प्यारे के पादपद्मों तक पहुँचना, सो यह बिना सर्वस्व त्याग किये होने का नहीं। यही सोचकर मैं संन्यास-धर्म में दीक्षित हुआ हूँ। यह जो तुम दण्ड देख रहे हो, सो तो मेरी साधनावस्था का द्योतक है। यह मन बड़ा ही चंचल है, जब तक साधन और नियमरूपी डण्डे से इसे हाँकते न रहोगे, तब तक यह अपनी बदमाशियों को नहीं छोड़ने का। इसीलिये इसे वश में करने के निमित्त मैंने यह दण्ड धारण किया है। दण्ड के भय से यह इधर-उधर न भाग सकेगा।
सचमुच उन महाभाग का त्याग बड़ा ही अलौकिक कार्य था। मुँह से ऐसी बातें कह देना कि आसक्ति छोड़कर कर्म करते जाओ, स्त्री-पुत्रों का पालन भगवत-सेवा समझकर करते रहो, ईश्वरार्पण-बुद्धि से सदा कर्म करते रहने की अपेक्षा कर्मों का त्याग करना अत्यन्त हेय है। त्याग करने में कौन-सी बहादुरी है। ‘नारि मुई घर संपति नासी। मूँड़ मुड़ाई भये संन्यासी।।’ ये बड़ी ही आसान बातें हैं। टकेभर की जिह्वा हिलाने में किसी का लगता ही क्या है। जिसे देखो वही जनक का दृष्टान्त देने लगता है। इन विषयों में आसक्त हुए महानुभावों की जनक महाराज की आड़ लेकर कही हुई बातों का उत्तर देना व्यर्थ ही है, वे तो जागते हुए भी सोने का बहाना कर रहे हैं। उन्हें जगा ही कौन सकता है। नहीं तो आसक्ति का त्याग होने पर सांसारिक कर्म अपने-आप ही छूट जाते हैं।अहा! पर्वत की कन्दराओं में निवास करने वाले वे महानुभाव मनस्वी, तपस्वी, यशस्वी त्याग पुरुष धन्य हैं, जो निरन्तर परब्रह्म की प्रकाशमय, प्रेममय, आनन्दमय और चैतन्यमय ज्योति का ध्यान करते रहते हैं। जिनसे किसी भी प्राणी को भय तथा संकोच नहीं होता और जो प्रभु की स्मृति में सदा प्रेमाश्रु ही बहाते रहते हैं। उने उन प्रेममय अश्रुओं को भीरू हृदय वाले पक्षी निःशंक होकर उनकी गोदी में बैठे हुए ऊपर चोंच करके पान करते रहते हैं और अपनी सभी प्रकार की पिपासा को शान्त करते हैं। यथार्थ जीवन तो उन्हीं महात्माओं का बीतता है। ‘हमारा जीवन कैसे बीतता है?’ इस बात को न पूछिये। हम तो पहले अपने मनोरथों के द्वारा एक सुन्दर सा मन्दिर बनाते हैं, फिर उस मन्दिर के समीप में ही मनोहर-सी एक बावड़ी खोदते हैं और बावड़ी के पास में ही एक क्रीड़ा-कानन की रचना करते हैं।बस, उस कल्पना के क्रीडा-कानन में ही कूतूहल करते-करते ही हमारी सम्पूर्ण आयु क्षीण हो जाती है। सारांश यही है कि भाँति-भाँति की मिथ्या कल्पनाओं में ही हमारा अमूल्य समय नष्ट हो जाता है। सच्चा मनोरथ कभी भी सिद्ध नहीं होता।’
मंगलाचरण.....
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्तवमहं न जाने।।
'जिनके कर कमलों में मनोहर मुरलि का विराजमान है और जिनके शरीर की आभा नूतन मेघ के समान श्याम है, जो पुनीत पीताम्बर को धारण किये हुए हैं, जिनका मुख शरद के पूर्ण चन्द्रमा के समान है, नेत्र कमल के समान कमनीय हैं तथा बिम्बाफल के समान लाल हैं, ऐसे श्रीकृष्ण को छोड़कर मैं कोई दूसरा परतत्त्व नहीं जानता। अर्थात सर्वस्व तो ये ही वृन्दावनबिहारी मुरली मनोहर हैं।'
इष्ट-प्रार्थना....
कदा वृन्दारण्ये विमलयमुनातीरपुलिने
चरन्तं गोविन्दं हलधरसुदामादिसहितम्।
अये कृष्ण स्वामिन् मधुरमुरलीवादनविभो
प्रसीदेत्याक्रोशन् निमिषमिव नेष्यामि दिवसान्।
प्यारे! तुमसे किस मुख से कहूँ, कि मुझे ऐसा जीवन प्रदान करो। चिरकाल से महात्माओं के मुख से सुनता चला आ रहा हूँ, कि तुम निष्किंचनों के प्रिय हो, जिन्होंने आभ्यन्तर और ब्राह्य दोनों प्रकार के परिग्रह का परित्याग कर दिया है, जिनके तुम ही एकमात्र आश्रय हो, जो तुमको ही अपना सर्वस्व समझते हों, उन्हीं एकनिष्ठ भक्तों के हृदय में आकर तुम विराजमान होते हो, उन्हीं के जीवन को असली जीवन बना देते हो। उन्हीं के तुम प्यारे हो और वे तुम्हें प्यारे हैं। प्यारे! इस पामर प्राणी से तुम कैसे प्यार कर सकोगे? वंचना नहीं, अत्युक्ति नहीं, नाथ! यह कैसे कहूँ कि बनावट नहीं, किन्तु तुम तो अन्तर्यामी हो, तुमसे कोई बात छिपी थोडे़ ही है, इस अधम का तो तुम्हारे प्रति तनिक भी आकर्षण नहीं। रोज सुनता हूँ अमुक के ऊपर तुमने कृपा की, अमुक को तुमने दर्शन दिये, इन प्रसंगों को सुनकर मुझे अधीर होना चाहिये, किन्तु कृपालो! अधीर होना तो अलग रहा, मुझे तो विश्वास तक नहीं होता, कि ऐसा हुआ भी होगा या नहीं। बहुत चाहता हूँ, तुम्हारा स्मरण करूँ, मन में तुम्हें छोड़कर दूसरा विचार ही न उठे, कान तुम्हारे गुण-कीर्तनों के अतिरिक्त दूसरी सांसारिक बातें सुनें ही नहीं। जिह्वा निरन्तर तुम्हारे ही नामामृत का पान करती रहे।
नेत्रों के सम्मुख तुम्हारी वही ललित त्रिभंगीयुक्त बाँकी चितवन नृत्य करती रहे। पैरों से तुम्हारी प्रदक्षिणा करूँ। करों से तुम्हारी पूजा-अर्चा करता रहूँ और हृदय में तुम्हारी मनोहर मूर्ति को धारण किये रहूँ, किन्तु नटनागर! ऐसा एक क्षण भी तो होने नहीं पाता। मन न जाने क्या ऊल-तमूल सोचता रहता है जब कभी स्मरण आता है, तो मन को बार-बार धिक्कारता हूँ, ‘अरे नीच! न जाने तू क्या व्यर्थ की बातें सोचता रहता है! अरे, उन मनमोहन की छवि का चिन्तन कर जिसके बाद फिर कोई चिन्तनीय चीज ही शेष नहीं रह जाती, किन्तु नाथ! वह मेरी सीख को सुनता ही नहीं। न जाने कितने दिन से यह इन घटपटादिकों को सोचता आ रहा है।
क्रमशः
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