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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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हे घोर संसाररूपी समुद्र के एकमात्र कर्णधार! इस शुष्कजीवन में सरसता लाने वाले गुरुदेव! हम प्रणतों की ओर दृष्टिपात कीजिये। तुम्हारी जगन्मोहन मूर्ति का ध्यान करते-करते दिन व्यतीत हो जाता है, रात्रि आ जाती है, फिर भी मैं तुम्हारी कृपा से वंचित ही बना रहता हूँ। तुम्हारे निकट रहते हुए भी ‘तुम्हारा’ नहीं बन पाता। तुम्हारी चरण-छाया के सन्निकट बना रहने पर भी शीतलता से वंचित रहता हूँ। किसे दोष दूँ, मेरा दुर्दैव ही मुझे तुम तक नहीं पहुँचने देता। बस, इस जीवन में एक ही आशा है, उसी का ध्यान करता रहता हूँ।
भक्त-वन्दना.....
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।
रूक्मांगदोद्धवविभीषणफाल्गुनादीन्
पुण्यानिमान्परमभागवतान्नतोऽस्मि।।
जिन्होंने दैत्यकुल में जन्म लेकर भी अच्युत की अनन्य भाव से अर्चा-पूजा की है, जिनके सदुपदेश से दैत्य बालक भी परम भागवत बन गये, जिन्होंने अपने प्रतापी पिता के प्रभाव की परवा न करके अपनी प्रतिज्ञा में परिवर्तन नहीं किया, जिन्हें हलाहल विष पान कराया गया, पर्वत के शिखर से गिराया गया, जल में डुबाया गया, अग्नि में जलाया गया तो भी जो अपने प्रण से विचलित नहीं हुए, जिनके कारण साक्षात भगवान को नृसिंहरूप धारण करना पड़ा, उन भक्ताग्रगण्य प्रह्लाद जी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमस्कार है। जो संसार के कल्याण की इच्छा से सदा नाना लोकों में भ्रमण करते रहते हैं, जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं, जिनकी सम्पूर्ण लोकों में अप्रतिहत गति है, जो स्मरण करते ही सर्वत्र पहुँच जाते हैं, जिन्हें इधर-की-उधर मिलाने में आनन्द आता है, जो संगीत में पारंगत हैं और भक्ति के आदि आचार्य हैं, जो वीणा लेकर उच्च स्वर से अहर्निश ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ! नारायण वासुदेव’ इन नामों का संकीर्तन करते रहते हैं ऐसे भक्तशिरोमणि देवर्षि नारद जी के चरणों में मेरा केटि-कोटि प्रणाम है। जो मूर्तिमान तप हैं, जो पुराणों के मर्मज्ञ हैं, जिन्होंने अनेक प्रकार के यज्ञों में विष्णु की आराधना की है, उन व्यासदेव जी के पिता परम भागवत महर्षि पराशर जी के पादपद्मों में अनन्त प्रणाम है। परम भागवत, परम वैष्णव पुण्डरीक ऋषि के चरणों में मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने एक वेद को चार भागों में विभक्त कर दिया है, जिन्होंने कलि के जीवों के उद्धार के निमित्त पंचम वेद महाभारत और अठारह पुराणों की रचना की है, जो ज्ञानावतार हैं, उन महर्षि वेदव्यास देव को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
जिनकी वैष्णवता के प्रभाव को सूचित करने के निमित्त भगवान ने शरण में आये हुए महर्षि दुर्वासा की स्वयं रक्षा न करके उन्हीं के पास भेजा था, जिनके परम भागवत होने की प्रशंसा से पुराणों के बहुत-से स्थल भरे पड़े हैं, उन राजर्षि अम्बरीष की चरणधूलि को मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। जो संसारी माया के प्रभाव से बचने के निमित्त बारह वर्ष तक माता के गर्भ में ही वास करते रहे, जिन्होंने मरणासन्न महाराज परीक्षित को सात दिनों में ही श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर मोक्ष का उत्तम अधिकारी बना दिया, उन अवधूतशिरोमणि महामुनि शुकदेव जी के चरणों में मैं श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने नैमिषारण्य की पुण्यभूमि में सूत के मुख से महाभारत और अठारहों पुराण श्रवण किये, जो ऋषियों के अग्रणी गिने जाते हैं, जिन्होंने हजारों वर्ष की दीक्षा लेकर भारी-भारी यज्ञ-याग किये हैं, उन सन्त-महन्त महर्षि शौनकजी की चरणवन्दना करके मैं अपने को कृतकृत्य बनाना चाहता हूँ।जिन्होंने पिता का प्रिय करने के निमित्त आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत का पालन किया, जो अपनी प्रतिज्ञापालन के निमित्त अपने गुरु परशुराम जी से भी भिड़ गये, जिन्होंने पिता को प्रसन्न करके इच्छामृत्यु का अमोघ वरदान प्राप्त किया, जिनकी प्रतिज्ञा पूरी करने के निमित्त साक्षात भगवान ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, उन गंगा के पुत्र वसु-अवतार महात्मा भीष्म पितामह के आशीर्वाद की मैं इच्छा करता हूँ। परम भागवत और परम वैष्णव दाल्भ्य ऋषि के चरणकमलों में मेरा कोटि-कोटि नमस्कार है। जिन्होंने एकादशी व्रत के माहात्म्य को सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्थापित किया, जिनके धर्म के कारण स्वयं धर्मराज भी भयभीत होकर पितामह की शरण में गये ओर उन्हें धर्मच्युत कराने के निमित्त अद्वितीय रूप-लावण्ययुक्त ‘मोहिनी’ नाम की एक सुन्दरी को भेजा, जिन्होंने मोहिनी के आग्रह करने पर अपने इकलौते प्यारे पुत्र का सिर देना तो मंजूर किया किन्तु एकादशी व्रत नहीं छोड़ा, उन राजर्षि रूक्मांगद के प्रति मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।
जो भगवान के परम अन्तरंग सखा गिने जाते हैं, भगवान की प्रेमपाती लेकर जो वृन्दावन की गोपिकाओं को ज्ञानोपदेश करने गये थे और वहाँ से परम वैष्णव होकर लौटे थे, जो भगवान के तिरोभाव होने पर उनकी आज्ञा से नर-नारायण के क्षेत्र में योगसमाहित हुए थे, उन परम भागवत उद्धव जी के चरणों में मेरा अधिकाधिक अनुराग हो।
जो अन्यायी भाई का पक्ष छोड़कर भगवान रामचन्द्रजी के शरणापन्न हुए और अन्त में लंकाधिपति बने, उन श्री रामचन्द्र जी के प्रियसखा अमर भक्त विभीषण को मैं नत होकर अभिवादन करता हूँ। जिनका सारथ्य महाभारत के युद्ध में स्वयं भगवान ने किया, जो इसी शरीर से स्वर्ग में वास कर आये, जिन्होंने शंकर जी से युद्ध करके उनसे पाशुपतास्त्र प्राप्त किया, जिन्होंने अकेले गाण्डीव धनुष से अठारह अक्षौहिणी वाले महाभारत में विजय प्राप्त कर ली।
युद्ध से पराड्मुख होने पर जिन्हें भगवान ने स्वयं गीता का उपदेश दिया, जो भगवान के विहार, शय्या, आसन और भोजनों में सदा साथ-ही-साथ रहे, जिन्हें भगवान बड़े प्रेम से ‘हे पार्थ! हे सखा! है धनंजय!’ ऐसे सुन्दर सम्बोधनों से सम्बोधित करते थे, वे नरावतार श्रीअर्जुन जी मेरे ऊपर कृपा की दृष्टि करें। बौद्धों के नास्तिकवाद को मिटाकर जिन्होंने निर्विशेष ब्रह्म का व्याख्यान किया। जिन्होंने जगत के प्रपंचों को मिथ्या बताकर एकमात्र ब्रह्म को ही साध्य बताया। अभेदवाद को सिद्ध करते हुए भी जिन्होंने समुद्र की तरंगों की भाँति अपने को प्रभु का दास बताया, उन आचार्यप्रवर भगवान शंकराचार्य के चरणों में मेरा शत-शत प्रणाम है। जिन्होंने भक्तिमार्ग को सर्वसाधारण के लिये सुलभ बना दिया, जो जीवों के कल्याण के निमित्त स्वयं नरक की यातनाएँ सहने के लिये तत्पर हो गये।जिन्होंने गुरु के मना करने पर भी सर्वसाधारण के लिये गोपनीय मन्त्र का उपदेश किया, उन विशिष्टाद्वैत के प्रचारक भक्त-वन्दना विष्णु-भक्त भगवान रामानुजाचार्य के चरणों में मेरा प्रणाम है।
क्रमशः
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