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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जिन्होंने लुप्त हुए विष्णु सम्प्रदाय का उद्धार करके पुष्टिमार्ग की स्थापना की, जो गृहस्थ में रहते हुए भी महान विरक्त और आसक्तिरहित बने रहे, जिन्होंने वात्सल्योपासना की मधुरता को दिखाकर अपने को स्वयं गोपवंश का प्रकट किया, जिन्होंने बालक श्रीकृष्ण की अर्चा-पूजा को ही प्रधानता देते हुए सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण को ही अन्तिम ध्येय बताया, उन शुद्धाद्वैत के प्रचारक बालकृष्णोपासक भगवान वल्लभाचार्य के चरणों में मेरी प्रीति हो।
जिन्होंने श्रीराधा कृष्ण की उपासना को ही सर्वस्व सिद्ध किया, जिन्होंने नीम के पेड़ में अर्क (सूर्य) दिखाकर भूखे वैष्णव को भोजन कराया, उन द्वैताद्वैतमत प्रवर्तक, मधुर भाव के उपासक भगवान निम्बार्काचार्य के चरणों में मेरा प्रणाम है।
जिन्होंने वृन्दावनविहारी की प्रीति को ही एकमात्र साध्य माना है, जिन्होंने अत्यन्त परिश्रम करके स्वयं हिमालय पर जाकर वेदव्यास जी से ज्ञात प्राप्त किया और वेदान्तसूत्रों पर भाष्य रचा, उन द्वैतमत के प्रवर्तक भगवान मध्वाचार्य आनन्दतीर्थ के पादपद्मों में मेरा बार-बार प्रणाम है। जिन्होंने छूताछूत और जाति-पाँति का कुछ भी विचार न करके सर्वसाधारण को भक्ति का उपदेश किया, जिनकी कृपा से चमार, नाई, छीपी, मुसलमान सभी जगत्पूज्य बन गये, जिन्होंने वैष्णव-समाज में सीता राम की सेवा-पूजा का प्रचार किया, उन आचार्यप्रवर श्रीरामानन्द स्वामी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। इनके अतिरिक्त दूसरे देशों के अन्य सम्प्रदायों के प्रवर्तक ईसा, मूसा, मुहम्मद आदि जितने आचार्य हुए हैं उन सभी के चरणों में मेरा प्रणाम है। सम्पूर्ण पृथ्वी की धूलि के कणों की गणना चाहे हो भी सके, आकाश के तारे चाहे गिने भी जा सकें, बहुत सम्भव है सम्पूर्ण जीवों के रोमों की गणना की जा सके, किन्तु भक्तों की गणना किसी भी प्रकार नहीं हो सकती।
सृष्टि के आदि से अब तक असंख्य भक्त होते आये हैं। उन सबके केवल नामों को ही गणेश जी- जैसे लेखक दिन-रात्रि निरन्तर लिखते रहें तो महाप्रलय के अन्त तक भी नहीं लिख सकते। फिर मुझ-जैसे अल्पज्ञ की तो बात ही क्या है? शिव जी, नारद जी, ब्रह्मा जी, पाण्डव, सनत्कुमार इन भक्तों से लेकर सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- इन चारों युगों में, 18 मन्वन्तरों में, असंख्यों कल्पों में जितने भक्त हुए हैं, उन सभी के चरणों में मेरा प्रणाम है, जिन्होंने सत्ययुग में कपिलरूप से भगवान का दर्शन किया है उन भगवत-भक्तों के चरणों में मेरा प्रणाम है। जिन्होंने त्रेता में रामरूप से भगवान का दर्शन किया है उन राम-भक्तों के चरणों की मैं वन्दना करता हूँ। जिन्होंने व्यासरूप से द्वापर में भगवान के दर्शन किये हैं उन भक्तों के चरणों में मेरा प्रणाम है।कल्किरूप से जिन्होंने कलियुग में भगवान के दर्शन किये हैं और जो इस कलि के अन्त में करेंगे उन सभी भक्तों के पदपद्मों में मेरा कोटि-कोटि नमस्कार है। जिन्होंने वाराह, मत्स्य, यज्ञ, नर-नारायण, कपिल, कुमार, दत्तात्रेय, हयग्रीव, हंस, पृश्निगर्भ, ऋषभदेव, पृथु, नृसिंह, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, रामचन्द्र, वेदव्यास, भक्त-वन्दना बलदेव, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि- इन भगवान के अवतारों का दर्शन, स्पर्श और सहवास किया है, उन-उन अवतारों के भक्तों के चरणों में मेरा प्रणाम है। कलिकाल में पैदा हुए कबीरदास, नानकदेव, दादूदयाल, पलटूदास, चरनदास, रैदास, बुल्ला, जगजीवनदास, तुलसीदास, सूरदास, मलूकदास, रामदास, निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, सोपानदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि जितने भी महापुरुष भगवत-भक्त हुए हैं उन सभी के चरणों में मेरा प्रणाम है। भक्तों में कौन छोटा और कौन बड़ा, इसका निर्णय जो करता है, वह महामूर्ख है।
शालग्राम की बटिया चाहे छोटी हो या बड़ी सभी एक-सी पूज्य हैं, इसलिये ये सभी भक्त एक ही भाँति पूज्य और मान्य हैं, इनके चरणों में प्रणाम करने से ही मनुष्य कल्याण-मार्ग का पथिक बन सकता है। इनके अतिरिक्त वर्तमान समय में जो भगवान के नामों का संकीर्तन करते हैं, लिखकर प्रचार करते हैं या जो स्वयं दूसरों से कराते हैं उन सभी नामभक्तों के चरणों में मेरा प्रणाम है। जो भगवान के गुणों का श्रवण करते हैं, जो भगवन्नाम का कीर्तन करते हैं, जो हर समय भगवत-रूप का स्मरण करते हैं, जो भगवान की पाद-सेवा करते हैं, जो भगवत-विग्रहों का अर्चन करते हैं, जो देवता, द्विज, गुरु, भगवत-भक्तों और भगवत-विग्रहों को नमन करते हैं, जो भगवान के प्रति सख्यभाव रखते हैं, जिन्होंने भगवान को आत्मनिवेदन कर दिया है उन सभी भक्तों के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमस्कार है।
जो सम्प्रदायों के अन्तर्भुक्त हैं अथवा जो सम्प्रदायों में नहीं हैं, जो ज्ञाननिष्ठ हैं, जो देशभक्त हैं, जो जनतारूपी जनार्दन की सेवा करते हुए नाना भाँति की यातनाएँ सह रहे हैं, जिन्होंने देश की सेवा में ही अपना जीवन अर्पण कर दिया है, जो किसी भी प्रकार से जनता की सेवा कर रहे हैं, उन सभी भक्तों के चरणों में मेरा बार-बार प्रणाम है। वर्तमान काल में जितने भक्त हैं, जो हो चुके हैं अथवा जो आगे होंगे उन सभी भक्तों के चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ। भक्त ही भगवान के साकाररूप हैं, भगवान की शक्ति का विकास पूर्णरूप से भक्त के ही शरीर में होता है। भक्तों का शरीर पार्थिव होते हुए भी चिन्मय है। वे साक्षात भगवत्स्वरूप ही हैं। भक्तों की चरणवन्दना करने से ही सब प्रकार के विघ्न मिट जाते हैं।
व्यासोपदेश....
संसार का यावत ज्ञान है, सभी व्यासोच्छिष्ट कहा जाता है। भगवान व्यास साक्षत विष्णु हैं। बस, इतना ही अन्तर है कि इनके चार की जगह दो ही भुजा हैं, ये अचतुर्मुख ब्रह्मा हैं और दो नेत्र वाले शिव हैं। चौबीस अवतारों में भगवान व्यासदेव जी भी एक अवतार हैं, ये प्रत्येक द्वापर के अन्त में प्रकट होकर लोककल्याण के निमित्त एक वेद को चार भागों में विभक्त करते हैं। इस युग में महर्षि पराशर के वीर्य से तथा सत्यवती के गर्भ से भगवान व्यासदेव का जन्म हुआ है। इन्होंने एक वेद को चार भागों में विभक्त किया, इसीलिये इन्हें वेदव्यास भी कहते हैं। जब देखा कि कलियुग के जीव इतने पर भी ज्ञान से वंचित रहेंगे तो इन्होंने सम्पूर्ण जीवों के कल्याण के निमित्त महाभारत की रचना की और अठारह पुराणों का प्रचार किया।
भगवान व्यासकृत इन सभी ग्रन्थों में ऐसा कोई भी इहलौकिक तथा पारलौकिक विषय नहीं रहा है जिसका वर्णन भगवान व्यासदेव ने न किया हो।
क्रमशः
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