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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इस प्रकार वे संसारी लोगों की निन्दा-स्तुति के बीच में रहते हुए भी अपने जीवन को आदर्श जीवन बनाकर लोगों के उत्साह को बढ़ाते हैं, ऐसे महापुरुष सदा से उत्पन्न होते आये हैं, अब भी हैं और आगे भी होंगे।किसी के जीवन का प्रभाव व्यापक होता है, उनके आचरणों के द्वारा अधिक लोगों का कल्याण होता है और किसी के जीवन का प्रभाव अल्प होता है, उनके थोड़े ही पुरुष लाभ उठा सकते हैं। इस प्रकार सब जातियों में, सब काल में किसी-न-किसी रूप में महात्मा उत्पन्न होते ही रहते हैं। बहुत-से ऐसे महापुरुष होते हैं जिनकी टक्कर का शताब्दियों तक कोई महापुरुष व्यक्तरूप से प्रकट नहीं होता है। किंतु इसका निर्णय होता है अपने-अपने भावों के अनुसार भिन्न-भिन्न रीति से। इस बात को आज तक न तो किसी ने पूर्णरूप से निर्णय किया है और न आगे भी कोई कर सकेगा कि अमुक महापुरुष किस कोटि के हैं और इनके बाद इनकी कोटिका कोई महापुरुष उत्पन्न हुआ या नहीं।

इसलिये शालग्राम की बटिया के समान हमारे लिए तो तभी महात्मा पूजनीय तथा वंदनीय हैं। संसार में असंख्य सम्प्रदाय विद्यमान हैं और उन सबका सम्बन्ध किसी-न-किसी महापुरुष से हैं और उन सभी सम्प्रदायों के अनुयायी उन्हें ईश्वर या ईश्वरतुल्य मानते और कहते है। हमें उनकी मान्यता के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहना है। एक महापुरुष को ही सर्वस्व मानने वाले पुरुषों कों प्राय: देखा गया है कि वे अपने से भिन्न सम्प्रदाय वाले महापुरुषों की अपेक्षा करते हैं और बहुत-से तो निंदा भी करते हैं। हम ऐसा नहीं कह सकते। हमारे लिये तो सभी महापुरुष- जिनका वास्तव में किसी भी सम्प्रदाय से सम्बंध नहीं है, किंतु तो भी लोग उन्हें अपने सम्प्रदायका आचार्य या आदिपुरुष मानते हैं, समानरूप से पूजनीय और वंदनीय हैं। इसलिए हम अपने प्रेमी पाठकों से यही प्रार्थना करते हैं कि जिनका सम्बन्ध परमार्थ से है ऐसे सभी महात्माओं के चरित्रों का श्रद्धाके साथ श्रवण करना चाहिये। महात्माओं का चरित्र जीवन को महान बनाता है, हमें कर्तव्य और सहिष्णुता सिखाता है तथा हमें अपने असली लक्ष्य तक पहुँचाता है, इसलिये यथार्थ उन्नति का एकमात्र साधन महात्माओं के चरित्रों का श्रवण तथा सत्पुरुषों का सत्संग ही सर्वत्र बताया गया है।
इस युग के महापुरुषों में महाप्रभु चैतन्यदेवका स्थान सर्वोच्च कहा जाता है। वे भक्ति के मूर्तिमान अवतार थे, प्रेम की सजीव मूर्ति थे। उनके जीवन में परम वैराग्य, महान त्याग, अलौकिक प्रेम, अभूतपूर्व उत्कण्ठा और भगवान के लिये विलक्षण छटपटाहट थी। उनका अवतार संसार के कल्याण के ही निमित्त हुआ था। उन महापुरुष के जीवन से अब तक असंख्या जीवों का कल्याण हुआ है और आगे भी होगा। ऐसे महापुरुष का जीवन कल्याण की इच्छा रखने वाले जीवों के लिये निर्भ्रान्त पथ-प्रदर्शन बन सकता है। चैतन्य-चरित्र अगाध है और दुर्ज्ञेय है। साधारण जीवों के समझ में न तो वह आ ही सकता है, न दुष्कृति पुरुष उसे श्रवण ही कर सकते हैं। सौभाग्य से ऐसे चरित्रों के श्रवण का सुयोग मिलता है, सुनकर उसे यथावत समझने वाले तो विरले ही पुरुष होते हैं, जिनके ऊपर उनकी कृपा होती है वे ही समझ सकते हैं। फिर उन चरित्रों का कथन करना तो बहुत ही कठिन काम है।

मुझमें न भक्ति है, न बुद्धि। शास्त्रों का ज्ञान भी यथावत नहीं। चैतन्य के दुर्ज्ञेय चरित्र को भला मैं क्या समझ सकता हूँ। किंतु जितना भी कुछ समझ सका हूँ, उसका ही जैसा बन सकेगा, कथन करूँगा। मुझे पूर्ण आशा है कि कल्याण-मार्ग के पथिकों की मेरी इस टूटी-फूटी भाषा से अपने साधन में बहुत कुछ सहायता मिल सकेगी, क्योंकि चैतन्य-चरित्र इतना मधुर है कि वह चाहे कैसी भी भाषा में लिखा जाय, उसकी माधुरी कम नहीं होने की।

चैतन्य-कालीन भारत.......

महाप्रभु चैतन्यदेव का प्रादुर्भाव विक्रम की सोलहवीं शताब्दी के मध्य भाग में हुआ और वे लगभग आधी शताब्दी तक इस धराधाम पर विराजमान रहकर भावुक भक्तों को निरामय श्रीकृष्ण-प्रेम-पीयूष का पान कराते रहे। उस समय के और आज के भारत की तुलना कीजिये। आकाश-पाताल का अन्तर हो गया, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धर्मिक सभी प्रकार की स्थितियों में घोर परिवर्तन हो गया। न जाने इस्लाम-धर्म का वह दौर-दौरा कहाँ चला गया, मुसलमान बादशाहों के ऐश-आराम की वे बातें इतिहास के निर्जीव पृष्ठों पर ही लिखी रह गयीं। हिन्दुओं की वह आचार-विचार की दृढ़ता, स्वधर्म के प्रति कट्टरता न जाने कहाँ विलुप्त हो गयी। उस समय लाखों सती स्त्रियाँ अपने पतियों के मृतक शरीरों के साथ हँसते-हँसते जीवित ही जल जाती थीं, इसे बीसवीं शताब्दी का महिलामण्डल कब स्वीकार करने लगा। न जाने एक रूपये के आठ मन चावलों की बात किसी ने वैसे ही लिख दी थी, क्या इसका अनुमान इस युग के मनुष्य कठिनता से कर सकेंगे? भक्तों का वह आदर्श प्रेम, कृष्णभक्ति की वह निष्कपटता, सेवा-पूजा में उतनी श्रद्धा और रति इन बीसवीं शताब्दी के साम्प्रदायिक पक्षपात से पूर्ण हृदयवाले भक्तों में कब देखने में आ सकती हैं। वे बातें तो समय के साथ ही विलुप्त हो गयीं। वह असली प्रेम तो उन महापुरुषों के साथ ही चला गया, अब तो साँप की लकीर शेष रह गयी है, उसे चाहे जैसे पीटते रहो। साँप तो निकल गया। वह तो उसी समय की रागिनी थी। महाकवि भवभूति ने ठीक ही कहा है-

समय एव करोति बलाबलं प्रणिगदन्त इतीव शरीरिणाम्।
शरदि हंसरवाः परूषीकृतस्वरमयूरमयू रमणीयताम्।।

अर्थात समय ही अच्छा और बुरा बनाने में कारण है। मयूरों का स्वर वर्षा में ही भला मालूम पड़ता है और हंसों का शरद्-ऋतु में ही। सचमुच समय की गति बड़ी ही विलक्षण है।

महाप्रभु, श्रीचैतन्यदेव का प्राकट्य जिस काल में हुआ, वह समय बड़ा ही विलक्षण था, उस युग को महान क्रान्ति-युग कह सकते हैं। उस समय सम्पूर्ण भारतवर्ष में चारों ओर राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक सभी प्रकार की घोर क्रान्ति मची हुई थी। उस समय तक प्रायः ऐसी मान्यता थी कि जो दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान है, वही सम्पूर्ण भारत का सर्वश्रेष्ठ नरपति है।दिल्ली का सिंहासन ही भारतवर्ष को दिग्विजय करने का मुख्य चिह्न था।
क्रमशः

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