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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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भारतवर्ष भर में बंगाल-प्रान्त में ही खूब धूमधाम से नवरात्र मनाया जाता है, जिनमें लाखों बकरे कालीमाई के ऊपर चढ़ाये जाते हें। बंगालियों में निरामिषभोजी भी बहुत ही कम मिलेंगे। यदि बहुत-से मांस न भी खाते होंगे, तो मछली के बिना तो वे रह ही नहीं सकते। मछली के मांस की वे मांस में गणना नहीं करते। यहाँ तक कि बहुत-से वैष्णव भी मांस न खाते हुए भी मछली का सेवन करते हैं। केवल विधवा स्त्रियों को एकादशी के दिन मछली खाना मना है या कोई-कोई वैष्णव या ऊँची श्रेणी के भट्टाचार्य बचे हुए हैं, नहीं तो मछली के बिना बंगाली रह ही नहीं सकते। जिस बंगाली को स्नान के पूर्व शरीर में मलने को तेल नहीं मिला और भोजन के समय मछली नहीं मिली उसका जीवन व्यर्थ ही समझा जाता है, वह अपने समाज में या तो अत्यन्त ही दीन-हीन होगा या कोई परम योगी। सर्वसाधारण लोगों के लिये ये दोनों वस्तुएँ अत्यन्त ही आवश्यक समझी जाती हैं। जिस समय की हम बातें कह रहे हैं, उस समय बंगाल की बड़ी ही बुरी दशा थी।देशभर में मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था, मनुष्य धर्म-कर्म से हीन होकर नाना प्रकार के पाखण्ड-धर्मों का आश्रय किये हुए थे। वाम-मार्ग का सर्वत्र प्रचार था। स्थान-स्थान पर घोर तान्त्रिक-पद्धतियों का अनुष्ठान होता हुआ दृष्टिगोचर होता था। मांस, मदिरा, मैथुन आदि पाँच वाममार्गियों के मकानों का सर्वत्र बोल-बाला था। शाक्त-धर्म का भी प्राबल्य था। बकरे-भैंसे का बलिदान तो साधारण-सी बात समझी जाती थी, कहीं-कहीं मनुष्यों तक की बलि दे दी जाती थी। (अब भी साल-दो साल में एक-आध ऐसी घटना सुनने में आ जाती है।) ब्राह्मण लोग अपने हाथों में खड्ग लेकर बलिदान करते। वैष्णव-धर्म की लोग खिल्लियाँ उड़ाते थे, वाद-विवाद करते रहना ही विद्या का मुख्य प्रयोजन समझा जाता। भक्ति करना मूर्खों ओर अनपढ़ों का काम समझा जाता। इतना सब होने पर भी छूआछूत और छोटे-बड़ेपन का भूत सबके सिर पर सवार था। यदि कहीं किसी छोटी जाति वाले न उच्च-जाति के पवित्र पुरुष को छू लिया तो उसका धर्म ही भ्रष्ट हो गया। किसी विधवा ने मुसलमान से बात भी कर ली तो वह पतित हो गयी। समाज के वह किसी भी काम की नहीं रही।
इन सभी कारणों से मुसलमानों की संख्या बढ़ने लगी। नीची जाति के समझे जाने वाले पुरुष हिन्दू-धर्म की छत्र-छाया को छोड़कर नवीन इस्लाम-धर्म की शरण में आने लगे। इसी के परिणामस्वरूप तो आज बंगाल-प्रान्त में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों की ही संख्या अधिक है। सम्भवतः 52-53 फीसदी मुसलमान हैं। बंगाल में ब्राह्मण, वैद्य और कायस्थ ये ही तीन जाति शिक्षित और कुलीन समझी जाती थीं। जिनमें कायस्थों को तो ब्राह्मण लोग शूद्र ही बताते थे। उस समय कायस्थों में विद्या का खूब प्रचार था। राजकाजों में उनकी बुद्धि भी तीक्ष्ण थी। वे आचार-विचार में भी हिन्दुओं की कुछ परवा नहीं करते थे। वे मुसलमानों के नाम से ही ब्राह्मणों की भाँति दूर नहीं भागते थे।
उनका खान-पान, आचार-व्यवहार मुसलमानों से मिल जाता था। इसलिये बंगाल में अधिकांश जमींदार, ताल्लुकेदार और राजा कायस्थ ही थे। राजशक्ति और शासनशक्ति हाथ में होने के कारण बहुत-से विद्वान ब्राह्मण भी उनके दरबार में रहते थे। मुख से चाहे उन्हें शूद्र भले ही कहें, किन्तु उनके साथ ब्राह्मणों का सभी बर्ताव क्षत्रिय राजाओं का-सा ही था। उन्हें शास्त्रों का अध्ययन कराते, उनका दान-प्रतिग्रह ग्रहण करते, उनसे श्राद्ध, यज्ञ-यागादि कार्य भी ब्राह्मण लोग कराते ही थे, इस प्रकार क्षात्रधर्म उस समय बंगाल में कायस्थों में ही था। कायस्थों में संस्कृत के बड़े-बड़े ऊँचे विद्वान उस समय मौजूद थे। बहुत-से कायस्थ जमींदारों के तो नाम भी मुसलमानों की ही तरह होते थे।जैसे बुद्धिमन्त खाँ, रामचन्द्र खाँ आदि-आदि। महाप्रभु गौरांग के प्रादुर्भाव के समय गौड़-देश के शासक सुबुद्धि खाँ या सुबुद्धि राय थे। उनके यहाँ हुसेन खाँ नामक बड़ा ही आत्माभिमानी और कुशाग्रबुद्धि भृत्य था। एक बार कोई काम बिगड़ जाने पर राजा ने उसकी पीठ पर क्रोध में चाबुक मार दिया। इससे वह आत्माभिमानी भृत्य जल उठा और उसने मन-ही-मन राजा को राज्यच्युत करने की कठोर प्रतिज्ञा की। बुद्धिमान तो वह था ही, बड़े-बड़े अधिकारी राजा से मन-ही-मन द्वेष करते थे, उसने सभी को साम-दान, दण्ड और भेद आदि नीतियों का आश्रय लेकर राजा को कैद कर लिया और आप स्वयं गौड़-देश का राजा बन बैठा। सुबुद्धि राय जब हुसेन खाँ के बन्दी थे तब उसकी स्त्री ने उसे सलाह दी कि इसे जान से मार दो, किन्तु हुसेन खाँ इतनी नीच प्रकृति का मनुष्य नहीं था, उसने कहा-‘चाहे इसने मेरे साथ कैसा भी चैतन्य-कालीन बंगाल बर्ताव किया हो, आखिर तो यह मेरा स्वामी रहा है और मैंने इसका नमक खाया है, मैं इसकी जान नहीं लूँगा।’ यह कहकर उसने राजा को छोड़ दिया। किन्तु उसने अपने जूँठे मिट्टी के बर्तन का पानी जबरदस्ती इनके मुँह में डाल दिया।
राजच्युत और धर्मभ्रष्ट हुए सुबुद्धि राय ने गौड़-देश के पण्डितों से इस पाप के प्रायश्चित्त की व्यवस्था चाही। धर्म के मर्म को भलीभाँति जानने वाले विद्वान ब्राह्मणों ने बहुत ही बढि़या व्यवस्था बतायी। उन्होंने कहा- ‘इस पाप का प्रायश्चित्त प्राणत्याग के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं। सो भी प्राणों का त्याग या तो गरम घृत पान करके किया जाय या धान के तुषारों में धीरे-धीरे सुलगाकर शरीर जलाया जाय।
जन्म से राजसुखों को भोगने के आदी और ऐश-आराम में पले हुए सुबुद्धि राय की बुद्धि ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया, वे कोई और हल की व्यवस्था लेने के निमित्त वाराणसी के पण्डितों के पास गये। काशी के पण्डित भी कोई घाट थोडे़ ही थे, शास्त्रों का अध्ययन तो उन्होंने भी किया था, उन्होंने भी उसी व्यवस्था को बहाल रखा। प्राण त्याग ने में असमर्थ सुबुद्धि खाँ उधर-इधर भटकते हुए अपने जीवन को बिताने लगे। कालान्तर में जब महाप्रभु वाराणसी पधारे तब ये उनका नाम सुनकर उनके शरणापन्न हुए और अपनी सम्पूर्ण कथा कह सुनायी।
क्रमशः
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