cc11

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
11-

सब कुछ सुनकर प्रभु ने आज्ञा दी- ‘अनिच्छापूर्वक प्राणों के त्याग से कोई लाभ नहीं। वृन्दावनवास करके अहर्निश कृष्ण-स्मरण करो और भक्त-महात्माओं की सेवा-पूजा करो। भगवन्नाम से ही करोड़ों जन्मों के पाप क्षय हो जाते हैं, एक जन्म की तो बात ही क्या?
प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे वृन्दावन में जाकर रहने लगे। कहते हैं- वे जंगलों में जाकर सूखी लकडि़याँ ले आते। वे तीन या चार पैसे जितने में भी बिक जातीं उन्हें बेचकर एक पैसे के चने खाकर तो स्वयं निर्वाह करते थे, शेष पैसों को एक दूकानदार के यहाँ जमा कर देते थे। उन बचे हुए पैसों का तेल खरीदकर बंगाली गरीब यात्रियों तथा भक्तों को स्नान के पूर्व लगाने के लिये देते थे। धन्य है, भक्ति हो तो ऐसी हो। इस प्रकार महात्मा सुबुद्धि राय जी ने अपने पानी पीने के पाप का ही प्रायश्चित्त नहीं किया, जन्म-जन्मान्तरों के पापों का प्रायश्चित्त कर डाला।

हुसेन खाँ ने राजगद्दी पर बैठते ही अपना शासन जमाने के लिये स्थान-स्थान पर अपने काजियों को नियुक्त किया। बहुत-से लोगों को इलाकों का ठेका दिया। वे एक प्रकार से पट्टेदार जमींदार ही समझे जाते थे, लोगों से लगान वसूल करके नियमित रकम तो बादशाह को देते, शेष जो बचती उसे अपने पास रख लेते। इस प्रकार नवद्वीप में बुद्धिमन्त खाँ, हरिपुरग्राम में गोवर्धनदास मजूमदार, कुलीनग्राम में मालाधर तथा खेतूरग्राम में कृणानन्ददत्त आदि इन कायस्थ जमींदारों को भी ठेके दिये गये। अधिकांश में ठेकेदार मुसलमान अथवा कायस्थ ही होते थे। नवद्वीप में चाँद खाँ नाम के एक क़ाज़ी की नियुक्ति की गयी और जगन्नाथ तथा माधव (जगाई-मधाई) नाम के क्रूरकर्मा दो ब्राह्मण भाइयों को वहाँ का कोतवाल बनाया गया। नवद्वीप के बेलपोखरिया नामक मोहल्ले में चाँद खाँ की कचहरी थी। उस समय क़ाज़ी मुंसिफ या जज का काम करते थे, वे हिन्दू-मुसलमानों के झगड़ों का फैसला करते थे, इसी प्रकार का एक मुलुक नाम का क़ाज़ी शान्तिपुर के समीप गंगा जी की धारा के पास रहता था।

नवद्वीप उस समय बंगाल भर में विद्या का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र समझा जाता था। उसमें संस्कृत विद्या की पचासों पाठशालाएँ थीं, जो टोल के नाम से विख्यात थीं। दूर-दूर से विद्यार्थी आ-आकर नवद्वीप में विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करते और नवद्वीप के नाम को देशव्यापी बनाते। उस समय संस्कृत के प्रधान केन्द्र नवद्वीप ने बहुत-से लोकप्रसिद्ध पण्डितों को उत्पन्न किया। मिथिला से न्याय के ग्रन्थ को कण्ठस्थ करके उसका बंगाल और उड़ीसा में प्रचार करने वाले वासुदेव सार्वभौम उन दिनों नवद्वीप में ही पढ़ाते थे। उस समय के विद्वानों में नैयायिक रामचन्द्र, सार्वभौम विद्यावागीश, महेश्वर विशारद, नीलाम्बर चक्रवर्ती, अद्वैताचार्य गंगादास आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है।सार्वभौम के विद्यार्थियों में रघुनाथदास, भवानन्द, रघुनन्दन, कृष्णानन्द तथा मुरारी गुप्त आदि लोकप्रसिद्ध और भारी विद्वान हुए। इस प्रकार उस समय नवद्वीप बंगाल भर में विद्या का एक प्रधान स्थान समझा जाता था। सैकड़ों विद्यार्थी एक साथ ही गंगा जी के घाटों पर स्नान करते और परस्पर में शास्त्र चर्चा करते बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। चारों ओर पण्डितों की ही चहल-पहल रहती। कहीं न्याय की फक्किकाएँ चल रही हैं तो कहीं व्याकरण की पंक्तियाँ पूछी जा रही हैं। सभ्य और धनी-मानी पुरुषों में भी संस्कृत विद्या का आदर था।

वे संस्कृत विद्या को आज की भाँति हेय नहीं समझते थे। इसी कारण अध्यापक तथा विद्यार्थियों को भोजन-वस्त्रों की कमी नहीं रहती। धनी पुरुष उनके खाने-पहनने का स्वयं ही श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रबन्ध कर देते। ऐसी ही घोर क्रान्ति के समय में इस विद्या-व्यासंगिनी पुरी में महाप्रभु चैतन्यदेव का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी भक्ति-भागीरथी की बाढ़ में सभी पण्डितों के नास्तिकवाद को एक साथ ही बहा दिया। उनके भक्ति-भाव के ही कारण नवद्वीप भावुक भक्तों का अड्डा और भक्ति का केन्द्र बन गया।

वंश-परिचय......

सचमुच में माता होना तो उसी का सार्थक कहा जा सकता है, जिसके गर्भ से भगवत्-भक्त पुत्र का जन्म हुआ हो। जन्म और मृत्यु ही जिसका स्वरूप है ऐसे इस परिवर्तनशील संसार में गर्भधारण तो प्रायः सभी योनि की माताएँ करती हैं, किन्तु सार्थक गर्भ उसी का कहा जा सकता है, जिसके गर्भ से उत्पन्न हुए पुत्र के ऊपर हरि-भक्तों की मण्डली में हर्ष-ध्वनि होने लगे। जिसके दर्शनमात्र से भक्तों के शरीर में स्तम्भ, स्वेद, रोमांच और स्वरभंग आदि सात्त्विक भावों का उदय आप-से-आप होने लगे अथवा जिसके ऊपर विद्वान अथवा शूर-वीरों की सभा में सभी लोगों की समान-भाव से उसी के ऊपर दृष्टि पड़े। परस्पर में लोग उसी के सम्बन्ध में काना-फूँसी करें, असल में वही पुत्र कहलाने के योग्य है ओर उसे गर्भ में धारण करने वाली माता ही सच्ची माता है। वैसे तो शूकरी अथवा कूकरी भी साल में दस-दस, बीस-बीस बच्चे पैदा करती हैं, किन्तु उनका गर्भ धारण करना केवल मात्र अपनी वासनाओं की पूर्ति का विकारमात्र ही है। इसी भाव को लेकर कोई कवि बड़ी ही मार्मिक भाषा में माता को उपदेश करता हुआ कहता है-

जननी जने तो भक्त जनि, या दाता या शूर।
नाहिं तो जननी बाँझ रह, क्यों खोवे है नूर।

भाग्यवती शची माता ने ही यथार्थ में माता-शब्द को सार्थक बनाया, जिसके गर्भ से विश्वरूप और श्रीकृष्ण चैतन्य-जैसे दो पुत्ररत्न उत्पन्न हुए। श्रीकृष्णचैतन्य अथवा महाप्रभु को पैदा करके तो वे जगन्माता ही बन गयीं। गौरांग-जैसे महापुरुष को जिन्होंने गर्भ में धारण किया हो उन्हें जगन्माता का प्रसिद्ध पद प्राप्त होना ही चाहिये।

महाप्रभु गौरांगदेव के पूर्वज श्रीहट्ट (हिलहट) निवासी थे। यह नगर आसाम प्रान्त में है और बंगाल से सटा हुआ ही है, वर्तमानकाल में यह आसाम प्रान्त का एक सुप्रसिद्ध जिला है। इसी श्रीहट्ट-नगर में भारद्वाजवंशीय परम धार्मिक और विद्वान उपेन्द्र मिश्र नाम के एक तेजस्वी और कुलीन ब्राह्मण निवास करते थे। धर्मनिष्ठ और स्वकर्मपरायण होने के कारण उपेन्द्र मिश्र के घर खाने-पीने की कमी नहीं थी। उनकी गुजर साधारणतया भलीभाँति हो जाती थी। उन भाग्यशाली ब्राह्मण के सात पुत्र थे। उनके नाम कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर, जगन्नाथ, जनार्दन और त्रैलोक्यनाथ थे। इनमें से पण्डित जगन्नाथ मिश्र को ही गौरांग के पूज्य पिता होने का जग-दुर्लभ सुयश प्राप्त हो सका।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90