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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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ज्ञान, कर्म तथा भक्ति के ही एकमात्र प्रवर्तक हैं। जब कर्म की शिथिलता देखते हैं तब आप नरपति-विशेष के रूप में उत्पन्न होकर कर्म का प्रचार करते हैं, जब ज्ञान का लोप देखते हैं तब मुनि-विशेष के रूप में प्रकट होकर ज्ञान का प्रसार करते हैं और जब भक्ति को नष्ट होते देखते हैं तब भक्त-विशेष का रूप धारण करके भक्ति की महिमा बढ़ाते हैं। उन्हें स्वयं कुछ भी कर्तव्य नहीं होता, क्योंकि स्वयं परिपूर्ण स्वरूप हैं। लोककल्याण के निमित्त वे स्वयं आचरण करके लोगों को शिक्षा देते हैं। भगवान के लिये कोई बात ‘सहसा’ या ‘अकस्मात’ नहीं। जिस प्रकार नाटक का एक अभिनय देखने के अनन्तर हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, कि देखें अब क्या हो। इतने में ही रंग-मंच पर सहसा दूसरे नये पात्रों को देखकर हम चकित हो जाते हैं, किन्तु नाटक के व्यवस्थापक के लिये इसमें सहसा या अकस्मात कुछ भी नहीं। उसे आदि से अन्त तक सम्पूर्ण नाटक का पता है कि इसके बाद कौन-सा पात्र क्या अभिनय करेगा।
इसी प्रकार इस जगत के रंग-मंच पर भगवान जो नाटक खेला रहे हैं, उसका उन्हें रत्ती-रत्ती भर पता है। उनके लिये भविष्य के गर्भ में कोई बात छिपी नहीं है। भविष्य का परदा तो हम अज्ञानियेां के नेत्रों पर पड़ा हुआ है। हम किसी घटना को देखकर ही उसे नयी और सहसा उत्पन्न हुई बताने लगते हैं, यही हमारी अपूर्णता है। कार्य को देखकर कारण के सम्बन्ध में सोचते हैं, किन्तु दिव्य दृष्टिवाले कारणों को पहले ही समझ जाते हैं, इसलिये उन्हें किसी भी घटना से कोई आश्चर्य नहीं होता। शाके 1407 (सं. 1542 विक्रमी) के फाल्गुन की पूर्णिमा का शुभ दिवस है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसन्नता छायी हुई है। राम-कृष्ण के मानने वाले सभी हिन्दुओं के घरों में अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार सुन्दर-सुन्दर पक्वान्न बनाये गये हैं। सबों ने अपने-अपने घरों को लीप-पोतकर स्वच्छ और सुन्दर बनाया है।बहुत पहिले- सत्ययुग में- आज के दिन भक्तराज प्रह्लाद ने अग्नि में प्रवेश करके भक्ति की विशुद्धता, पवित्रता और निर्मलता दिखायी थी। भगवत-भक्ति के कारण उने पिता की भगिनी होली- जो इन्हें गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी स्वयं जल गयी किन्तु इनका बाल भी बाँका नहीं हुआ, इसी कारण भक्तों में अत्यन्त ही आह्लाद उत्पन्न हुआ और तभी से आज तक यह दिन परम पवित्र समझा जाता है। आज के दिन जीवन में नवजीवन का संचार होता है। वर्षभर की सभी बातें भुला दी जाती हैं, सालभर के वैर, द्वेष तथा अशुभ कर्मों को होली की ज्वाला में स्वाहा कर दिया जाता है। आज के दिन शत्रु-मित्र का कुछ भी विचार न करके सबको गले से लगाते हैं। इतने दिनों से होली होती तो थी, किन्तु यथार्थ होली तो आज ही है। तभी तो भक्तों के हृदय में कोई एक अज्ञात आनन्द हिलोरें मार रहा है।
पं. जगन्नाथ मिश्र अपने घर के एक कोने में बैठे हुए हैं। मिश्र जी के पास सांसारिक धन नहीं है, फिर भी ब्राह्मणों का जो धन है, जिसके कारण ब्राह्मणों को तपोधन कहा जाता है, उस धन का अभाव नहीं है। मिश्रजी का घर छोटा-सा है, किन्तु है खूब साफ-सुथरा। सम्पूर्ण स्थान गौ के गोबर से लिपा है, आँगन में तुलसी का सुन्दर बिरवा लगा हुआ है। एक ओर एक गौ बँधी है। ब्राह्मणी ने ताँबे के तथा पीतल के बर्तनों को खूब माँजकर एक ओर रख दिया है। धूप लगने से वे चमक उठते हैं। मिश्र जी भोजन करके पुस्तक को पढ़ने लगे हैं। तीसरे पहर के बाद शची देवी को कुछ प्रसव-वेदना-सी प्रतीत हुई। घर में दूसरी कोई स्त्री थी नहीं। सास तथा देवरानी, जेठानी सभी श्रीहट्ट (सिलहट) में थीं। यहाँ तो शची देवी का पितृगृह था, इसलिये पं. चन्द्रशेखर (आचार्य-रत्न) की पत्नी अपनी छोटी बहिन को इन्होंने बुला लिया।
धीरे-धीरे वेदना बढ़ने लगी और साथ ही भक्तों के अज्ञात आनन्द की वृद्धि होने लगी। भगवान् मरीचिमाली अस्ताचल को प्रस्थान कर गये, किन्तु तो भी पूर्णिमा के चन्द्र उदय नहीं हुए। कारण कि वे चैतन्यचन्द्र के उदय होने की प्रतीक्षा में थे। इसी समय राहु ने सुअवसर पाकर चन्द्रमा को ग्रस लिया। ग्रहण का स्नान करने के निमित्त नवद्वीप के सभी घाटों पर स्त्री-पुरुषों की भारी भीड़ थी। असंख्यों नर-नारी उस पुण्य अवसर पर स्नान करने के निमित्त एकत्रित हुए थे। सभी के कण्ठों से राम, कृष्ण, हरि की मधुर ध्वनि निकल रही थी। जो कभी भी भगवान का नाम नहीं लेते थे, वे भी उस दिन प्रेम में उन्मत्त होकर कृष्ण- कीर्तन कर रहे थे।हिंदुओं को चिढ़ाने के व्याज से मुसलमान भी ‘हरि बोल, हरि बोल’ कहकर हिन्दुओं का साथ दे रहे थे। इसी महान आनन्द के समय में नामावतार श्रीगौरांगदेव का प्रादुभाव हुआ। शची देवी की भगिनी ने यह शुभ समाचार मिश्र जी को सुनाया। मिश्र जी की प्रसन्नता का तो कुछ ठिकाना ही न रहा। वे तो पहले से ही अत्यधिक आनन्दित थे, किन्तु अब तो उनके आनन्द की सीमा ही न रही। क्षणभर में बिजली की तरह यह समाचार मुहल्ले भर में फैल गया। स्त्री-पुरुष जिसने भी सुना वही मिश्र जी के घर दौड़ा आया। श्री अद्वैताचार्य की धर्मपत्नी, श्रीवास जी की स्त्री आदि शची देवी की जितनी अन्तरंग सहेलियाँ थीं वे उपहार ले-लेकर बच्चे को देखने के लिये आ गयीं। विश्वरूप के द्वारा समाचार पाकर शची देवी के पिता नीलाम्बर चक्रवर्ती भी आ उपस्थित हुए। वे तो प्रसिद्ध ज्योतिषी ही थे, उसी समय उन्होंने गणना करके लग्न निकाली और जन्म-कुण्डली बनाकर ग्रहों के फल देखने लगे। इतने शुभ ग्रहों को देखकर वे आनन्द में गद्गद हो उठे और मिश्र जी से बोले- यह बालक कोई महान पुरुष होगा। इसके द्वारा असंख्यों जीवों का कल्याण होगा। इसके राजग्रह स्पष्ट बता रहे हैं कि यह असाधारण महापुरुष होगा।
इस प्रकार ग्रहों का फल सुनकर मिश्र जी के आनन्द की और भी अधिक वृद्धि हुई। उस समय उन्हें अपनी निर्धनता पर कुछ खेद हुआ। उनका हृदय कह रहा था कि ‘इस समय यदि मेरे पास कुछ होता तो इसी समय सर्वस्व दान कर डालता’।
क्रमशः
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