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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस प्रकार निमाई की अधिक चंचलता देखकर माता उनकी अधिक चिन्ता रखने लगी। माता जितनी ही अधिक होशियारी रखती, ये उतना ही अधिक उसे धोखा भी देते।एक दिन ये घर से निकलकर बाहर रास्ते में एकान्त में खेल रहे थे। शरीर पर बहुत-से आभूषण थे, उनमें कई सोने के भी थे। इतने में ही चोर उधर आ निकला। निमाई को आभूषण पहने एकान्त में खेलते देखकर उसके मन में बुरा भाव उत्पन्न हुआ और वह इन्हें पीठ पर चढ़ाकर एकान्त स्थान की ओर जाने लगा। इनके स्पर्शमात्र से ही उसकी विचित्र दशा हो गयी, उसे अपने कुकृत्यों पर रह-रहकर पश्चात्ताप होने लगा। निमाई का एक पैर उसके कन्धे के नीचे लटक रहा था। उस कमल की भाँति कोमल पैर को देखकर उसका हृदय भर आया। उसने एक बार निमाई के कमल की तरह खिले हुए मुँह की ओर ध्यानपूर्वक देखा। पीठ पर चढे़ हुए निमाई हँस रहे थे। चोर का हृदय पानी-पानी हो गया। जगदुद्धारक निमाई का वही पापी सर्वप्रथम कृपापात्र बना। इधर निमाई को घर में न देखकर माता-पिता को बड़ी चिन्ता हुई।
मिश्र जी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गंगा जी तक पहुँचे, किन्तु निमाई का कुछ भी पता नहीं चला। इधर शची देवी पगली की तरह आस-पास के मुहल्लों के सभी घरों में निमाई को ढूँढ़ने लगी। स्त्रियाँ कहतीं- ‘वह बड़ा चंचल है, घर में रहना तो मानो सीखा ही नहीं। तुम चिन्ता मत करो। यहीं कहीं खेल रहा होगा। मिल जायगा। चलो मैं भी चलती हूँ।’ इस प्रकार सभी स्त्रियाँ शचीमाता को धैर्य बँधाती थीं, किन्तु शची को धैर्य कहाँ? उन सबकी बातों को अनसुनी करती हुई माता एक घर से दूसरे घर में दौड़ने लगी। विश्वरूप अलग ढूँढ़ रहे थे। इधर चोर की चित्तवृत्ति शुद्ध होने से उसका भाव ही बदल गया। बस, वही उसका चोरी का अन्तिम दिन था। उसने धीरे से लाकर निमाई को उनके द्वार पर उतार दिया।
माता-पिता तथा भाई इधर ढूँढ़ रहे थे, किसी ने आकर समाचार दिया कि निमाई तो घर पर खेल रहा है। मानो मरू-भूमि में जलाभाव के कारण मरते हुए पथि को सुन्दर सुशीतल जल मिल गया हो अथवा किसी परम बुभुक्षित को अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थ मिल गये हों, इस प्रकार की प्रसन्नता मिश्र जी को हुई। उन्होंने द्वार पर आकर देखा कि निमाई हँस रहा है। माता ने आकर बच्चे को छाती से चिपटाया। विश्वरूप ने भाई को पुचकारा। स्त्रियाँ आकर गाने लगीं-
हरि हरि बोल, बोल हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।
अलौकिक बालक........
शची-रूपी सीपी के भाग्य की सराहना कौन कर सकता है, जिसमें निमाई के समान संसार को सुख-शान्ति प्रदान करने वाला बहुमूल्य मोती पैदा हुआ? शची की समझ में स्वयं नहीं आता था कि यह बालक कैसा है? इसकी सभी बातें दिव्य हैं, सभी चेष्टाएँ अलौकिक हैं। देखने में तो यह बालक-सा प्रतीत होता है, किन्तु बातें ऐसी करता है कि अच्छे-अच्छे समझदार भी उन्हें सरलतापूर्वक नहीं समझ सकते। कभी तो उसे भ्रम होता और सोचने लगती यह कोई छद्म-वेष बनाये महापुरुष या देवता मेरे यहाँ क्रीड़ा कर रहे हैं और कभी-कभी मातृस्नेह के कारण सब कुछ भूल जातीं।
एक दिन माता ने देखा कि घर में बड़े जोरों का प्रकाश हो रहा है। बहुत-से तेजपूर्ण दिव्य-दिव्य पुरुष निमाई की पूजा और स्तुति कर रहे हैं। यह देखकर माता को बड़ा भय मालूम हुआ। वे जल्दी से घर के भीतर गयीं। वहाँ जाकर उन्होंने देखा निमाई सुखपूर्वक शयन कर रहे हैं। यह बात शची देवी ने अपने पति पण्डित जगन्नाथ मिश्र से कही। मिश्र जी ने कहा- ‘हम तो पहले से ही जानते थे, यह बालक कोई साधारण पुरुष नहीं है।’ इसी प्रकार एक दिन आँगन में ध्वजा, वज्र, कुश आदि शुभ चिह्नों से चिह्नित छोटे-छोटे पैरों को देखकर शची देवी विस्मित हो गयीं। उन्होंने वे चरणचिह्न मिश्र जी को भी दिखाये। भाग्यवान दम्पती ने उन चरणों की धूलि अपने मस्तक पर चढ़ायी।
मिश्र जी कहने लगे- ‘मालूम पड़ता है, घर के बालगोपाल ठाकुर सशरीर आँगन में घूमते हैं। यह हम लोगों का परम सौभाग्य है।’ इतने में ही उन्होंने निमाई के छोटे-छोटे पैरों में भी वे ही चिह्न देखे। मिश्र जी पण्डित नीलाम्बर चक्रवर्ती को बुलाकर लाये और निमाई के हाथ तथा पैरों की रेखा उन्हें दिखायी। सब देखकर चक्रवर्ती महाशय बोले- ‘हमने उसी दिन जन्मकुण्डली ही देखकर कह दिया था कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं है। भविष्य में इसके द्वारा संसार का बहुत कल्याण होगा।’ एक दिन मिश्र जी ने निमाई से कहा- ‘बेटा! भीतर से पुस्तक तो ले आ।’ निमाई हँसते हुए भीतर चले गये। मिश्र जी को ऐसा प्रतीत हुआ मानो नूपुर की सुमधुर ध्वनि निमाई के पैरों में से होती जा रही है। उन्होंने शची देवी जी से पूछा- ‘निमाई को नूपुर तुमने पहना दिये हैं क्या?’ शची देवी ने उत्तर दिया- ‘नहीं तो, नूपुर तो मैंने नहीं पहनाये। देखते नहीं हो। उसके पैरों में सिवाय कडूलों के और कुछ भी नहीं है।’ मिश्र जी सब समझकर चुप हो गये। निमाई पुस्तक रखकर चले गये।एक दिन ये अपनी माता से किसी बात पर झगड़ बैठे। चंचल तो ये थे ही, किसी बात पर अड़ गये। माता ने बहुत मनाया, नहीं माने, तब माता रोष में भरकर बाहर जाने लगी। इन्होंने अपने कोमल करों से माता पर थोड़ा प्रहार किया। माता का हृदय भर आया। उन्हें निमाई की अलौकिक लीलाएँ और उनकी लोकोत्तर सभी बातें स्मरण होने लगीं। वे अपने भाग्य की सराहना करने लगीं। इसी बीच में उन्हें अपनी दरिद्रावस्था का भी स्मरण हो आया। दुःख के बीच में माता अधीर हो उठी और वहीं मूर्च्छित अलौकिक बालक होकर गिर पड़ी। पास-पड़ोस की स्त्रियाँ शचीमाता को पंखा आदि से वायु करने लगीं। निमाई घबड़ा गये। माता की ऐसी अवस्था देखकर उनके होश उड़ गये। वे स्त्रियों से पूछने लगे- ‘माता किस प्रकार अच्छी हो सकेंगी? उनमें से किसी स्त्री ने कह दिया- ‘यदि दो ताजी नारिकेल ला सको और उनका जल इन्हें पिलाया जाय तो ये अभी अच्छी हो जायँ।’
यह सुनकर ये दौड़े-दौड़े बाहर गये और थोड़ी ही देर में दो बडे़-बड़े ताजा नारिकेल लेकर घर में वापिस आये।
क्रमशः
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