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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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विषयों के चिन्तन से यह ऐसा विषयमय बन गया है, कि तुम्हारी ओर आते ही काँपने लगता है और आगे बढ़ना तो अलग रहा, चार कदम और पीछे हट जाता है। कैसे करूँ नाथ! अनेक उपाय किये, अपने करने योग्य साधन जहाँ तक कर सका सब किये, किन्तु इस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हो भी तो कैसे? इसकी डोरी तो तुम्हारे हाथ में है।
तुमने तो इसकी डोरी ढीली छोड़ दी है, यदि तुम्हारा जरा भी इशारा हो जाता तो फिर इसकी क्या मजाल जो इधर-से-उधर तनिक भी जा सकता। मेरे साधनों से यह वश में हो सकेगा, ऐसी मुझे आशा नहीं। तुम्हीं जब बरजो तब काम चले।प्यारे प्रभु! जरा बरज दो। एक क्षण को भी तुम्हारे प्रेमसागर में डूब जाय तो यह जीवन सार्थक हो जाय। यह कलेवर निहाल हो जाय। जीभ नाना प्रकार के रसों में इतनी आसक्त है, कि इसे तुम्हारे नाम में मजा ही नहीं आता। निरन्तर स्वादु-स्वादु पदार्थों की ही वान्छा करती रहती है। हठात इसे लगाता हूँ, किन्तु बेमन का काम भी कभी ठीक होता है? नाथ! अब तो बस तुम्हारा ही आश्रय है।
तुम्हारे प्रति अनुराग नहीं, विषयों से वैराग्य नहीं, जीवन में यथार्थ त्याग नहीं। जीवन क्या है, पूरा जंजाल बना हुआ है। चाहता हूँ, अनन्य होकर तुम्हारा ही चिन्तन करूँ, नहीं कर सकता। इच्छा होती है, जीवन में यथार्थ त्याग हो, नहीं होता। सोचता हूँ, संसार से उपराम होऊँ, हो नहीं सकता। परिग्रह से जितना ही दूर होने की इच्छा करता हूँ, उतना ही अधिक संग्रही बनता जाता हूँ। तुम्हारे चरणों से पृथक होने से ऐसा होना अवश्यम्भावी है।
शरीर को सुखाया। तितिक्षा का ढोंग रचा। ध्यान, जप, योग, आसन सभी तरफ मन को लगाया, किन्तु तुम्हारी यथार्थता का पता नहीं चला। तुम्हारे प्रेम में पागल न बन सका। हिर-फिरकर वही संसार भाँति-भाँति का रूप रखकर सामने आ गया। तुम छिपे ही रहे। अपने ऊपर अब विश्वास नहीं रहा, यह शरीर रोगों का अड्डा बन गया है। नेत्रों की ज्योति अभी से क्षीण हो गयी, दन्त खोखले हो गये। पाचन-शक्ति कम हो गयी, वायु के प्रकोप से शरीर के सभी अवयव वेदनामय बन गये, फिर भी यथार्थ जीवन लाभ नहीं कर सका। अब सब तरफ से हारकर बैठ गया हूँ, अब तो एक यही बात सोच ली है, जो तुम कराओगे करूँगा, जहाँ रखोगे रहूँगा और जैसा नाच नचाओगे वैसा नाचूँगा। तो भी प्यारे! इस जीवन में एक ही साध है और वह साध अन्त तक बनी ही रहेगी। एक बार सबको भूलकर तुम्हारे चरणों में पागल की भाँति लोट-पोट हो जाऊँ, यही एक हार्दिक वासना है।
अहा! ये सभी सांसारिक वासनाएँ जब क्षय हो जायँगी, जब एकमात्र तुम ही याद आते रहोगे, सोते-जागते आठों पहर तुम्हारी मनोहर मुरली की मीठी-मीठी ध्वनि ही सुनायी देती रहेगी, तुम्हारी उस मन्द-मन्द मुस्कान में ही चित्त सदा गोते लगाता रहेगा और मैं सभी प्रकार से लज्जा, संकोच तथा भय को त्याग कर पागलों का-सा नृत्य करता रहूँगा, तब यह जीवन धन्य हो जायगा, यह शरीर सार्थक हो जायगा। नाथ! मुझे रोने का वरदान दो, रोता रहूँ, पागल की भाँति सदा रोऊँ, उठते-बैठते, सोते-जागते सदा इन आँखों में आँसू ही भरे रहें, रोना ही मेरे जीवन का व्यापार हो।खूब रोऊँ, हर समय रोऊँ, हर जगह रोऊँ और जोर से रोते-रोते चैतन्यदेव की भाँति चिल्ला उठूँ।

गुरु-वन्दना....
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि।।

गुरुदेव! तुम्हारे पादपद्मों में कोटि-कोटि प्रणाम है। अन्तर्यामिन्! तुम्हारे अनन्त गुणों का बखान यदि शेषनाग अपने सहस्र मुखों से सृष्टि के अन्त तक अहर्निश करते रहें तो भी उनका अन्त नहीं होगा। तब फिर मैं क्षुद्र प्राणी तुम्हारी विमल विरदावली का बखान भला किस प्रकार कर सकता हूँ? फिर भी तुम जाने जाते हो। तुम अगम्य हो, तो भी अधिकारी तुम तक पहुँचते हैं। तुम अनिर्वचनीय हो, तो भी शिष्य-प्रशिष्य परस्पर में मिलकर तुम्हारा निर्वचन करते हैं। तुम निर्गुण-निराकार हो फिर भी शिष्यों के प्रेमवश तुम सगुण-साकार होकर प्रकट होते हो। मनीषी तुम्हारे तत्त्व को परोक्ष बतलाते हैं, तो भी तुम प्रत्यक्ष होकर शिष्यों की पूजा-अर्चा को ग्रहण करते हो। हे गुरुदेव! इस प्रकार के तुम्हारे रूप को बारम्बार नमस्कार है।

हे ज्ञानावतार! मेरी पात्रता-अपात्रता का विचार न करना। पारस लोहे की पात्रता की ओर ध्यान नहीं देता, वह तो सामने आये हुए हर प्रकार के लोहे को सुवर्ण कर देता है, क्योंकि उसका स्वभाव ही लोहे को कांचन बनाना है। तुम्हारे योग्य पात्रता क्या इन पार्थिव प्राणियों में कभी आ सकती है? अपने स्वभाव का ही ध्यान रखना। तुम्हारे दयालु स्वभाव की प्रशंसा सुनकर ही मैं समिधा हाथ में लिये हुए तुम्हारे श्रीचरणों में आया हूँ। ये वन्य पुष्प हैं, अभी की लायी हुई ये कुशा हैं और ये सूखी समिधा हैं, यही मेरे पास उपहार है और सम्भवतया यही तुम्हें प्रिय भी होगा।

हे निरपेक्ष! मेरी प्रार्थना स्वीकार करो और मुझे अपने चरणों में शरण दो। तुम्हारे पादपद्मों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। हे त्रिगुणातीत! मैं तुम्हारी दया का भिखारी हूँ, हम नेत्रहीनों को एकमात्र तुम्हारा ही आश्रय है। अज्ञान-तिमिर ने हमारी ज्योति को नष्ट कर दिया है? इसे अपनी कृपारूपी सलाका से उन्मीलित कर दो। जिससे हम तुम्हारी छवि का दर्शन कर सकें। हे मेरे उपास्यदेव! तुम्हें छोड़कर संसार में मेरा और कौन ऐसा हितैषी है? तुम ही एकमात्र मेरे आधार हो।हे अनाश्रित के आश्रय! मेरी इस वद्धांजलि को स्वीकार करो। ‘न तो मैं तैरना ही जानता हूँ, न नाव खेना ही। फिर भी घोर समुद्र में बहा चला जा रहा हूँ, किधर जा रहा हूँ, कुछ पता नहीं।’ बवण्डर सामने से आता हुआ दीख रहा है, उससे कैसे बच सकूँगा, कुछ पता नहीं। अब एकमात्र तुम्हारा ही आश्रय है। कर्णधार बनकर मेरी सहायता करोगे तभी काम चल सकेगा। तुम्हारे पधारने के अतिरिक्त निःसृति का दूसरा मार्ग ही नहीं। चारों ओर से फूटी हुई इस जीर्ण तरणी पर जब तुम्हारे श्रीचरण पड़ेंगे तो यह सजीव होकर निर्दिष्ट-पथ की ओर आप-से-आप ही चल पड़ेगी।
क्रमशः

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