cc6
श्री श्री चैतन्य चरितावली
6-
राजधर्म नीतिधर्म, वृत्तिधर्म, वर्णाश्रमधर्म, मोक्षधर्म, सृष्टि, स्थिति, प्रलय, शौच, सदाचार, गति, अगति, कर्तव्य, अकर्तव्य सभी विषयों का वर्णन भगवान व्यासदेव ने किया है। संसार में कोई भी ऐसी बात जिसका कोई कभी भी अनुभव कर सकता है, उसका सूत्ररूप से वर्णन भगवान व्यासदेव पहले ही कर चुके हैं। भगवान व्यासदेव ने बताया है कि काल की गति अव्याहत और एकरस है। जो पैदा हुआ है, उसका कभी-न-कभी अन्त अवश्य ही होगा। दिन-रात्रि सबके लिये समानरूप से आते-जाते हैं। बुद्धिमान अपने समय का उपयोग काव्यशास्त्रों के अध्ययन और मनन में करते हैं, जो मूर्ख हैं वे सोने में, खाने-पीने या दूसरों की निन्दा-स्तुति में अपने समय का दुरुपयोग करते हैं इसलिये व्यासदेव जी उपदेश करते हैं कि मूर्खों की भाँति समय बिताना ठीक नहीं है। अपने समय का दुरुपयोग कभी भी मत करो, उसका सदा सदुपयोग ही करते रहो। सदुपयोग कैसे हो? इसके लिये वे उपदेश करते हैं।मनुष्यों को इतिहास, पुराण, दूसरी सुन्दर कहानियाँ और महात्माओं के जीवन-चरित्र इनका नित्यप्रति श्रवण करना चाहिये। अब आइये, इस बात पर थोड़ा विचार करें कि इन उपर्युक्त विषयों के श्रवण से क्या लाभ और इनमें यथार्थ वस्तु क्या है?
इतिहास -आर्यशास्त्रों में दो ही इतिहास या महाकाव्य माने गये हैं। एक तो भगवान् व्यासकृत महाभारत और दूसरा भगवान वाल्मीकिकृत आदिकाव्य रामायण। इन दो ही महाग्रन्थों में सम्पूर्ण जगत् का इतिहास भरा पड़ा है। सभी रस, सभी विषय, जितनी भी कथाओं की कल्पना हो सकती है वे सब इन दोनों ग्रन्थों में संक्षेप और विस्ताररूप से वर्णन की गयी हैं। इन महाग्रन्थों में आर्यजाति के महापुरुषों का ही इतिहास नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण जगत् का इतिहास भरा पड़ा है। जिस प्रकार गंगा, चमुना, समुद्र, पर्वत, ग्रह, नक्षत्र- ये सृष्टिके अंग हैं उसी प्रकार ये ग्रन्थ भी नित्य और सनातन हैं। जैसे पृथ्वी पर जन्म धारण करने वाला इच्छा से अथवा अनिच्छा से बिना श्वास लिये रह नहीं सकता, उसी प्रकार सभ्य सभ्य जाति के ज्ञानपिपासु पुरुष इन महाकाव्यों के ज्ञानोपार्जन के बिना रह ही नहीं सकते, फिर चाहे वे प्रत्यक्षरूप से इन ग्रन्थों का अध्ययन करें अथवा इनके आधार पर बनाये हुए अन्य भाषा के ग्रन्थों से। वे इस ज्ञान से वंचित रह ही नहीं सकते, क्योंकि नित्य सनातन ज्ञान तो एक ही है और उसका व्याख्यान युग के अन्त में व्यासरूप से भगवान् ही कर सकते हैं। इसलिये भगवान् व्यासदेव प्रतिज्ञा करके कहते हैं- ‘जो मैंने महाभारत में वर्णन किया है वही सर्वत्र है, जिसका यहाँ वर्णन नहीं हुआ, उसका कहीं वर्णन हो ही नहीं सकता।’ हिन्दूजाति आदिकाल से इन प्राचीन आख्यानों को सुनती आयी है। ये आख्यान अनादिकाल से ऐसे ही चले आये हैं और अन्त तक इसी तरह चले जायँगे, इसलिये इनका श्रवण सदा करते रहना चाहिये।
पुराण-पुराण अनादि हैं और असंख्य हैं, किन्तु भगवान् व्यासदेव ने उन्हें अठारह भागों में संग्रह कर दिया है। इनमें छोटे-से-छोटे पुरुषार्थ का तथा परम-से-परम पुरुषार्थ का वर्णन है। शौच कैसे जाना चाहिये, शौच के अनन्तर कितनी बार बायें हाथ को, कितनी बार दायें हाथ को तथा दोनों हाथों को मिलाकर धोना चाहिये, कुल्ला कितनी बार कहना चाहिये, दाँतुन कितनी अंगुल का हो इत्यादि छोटे-से-छोटे विषयों से लेकर मोक्ष तक का वर्णन पुराणों में किया गया है। पुराण ही आर्यजाति के असली प्राण हैं। प्राणों के बिना प्राणियों का जीना सम्भव हो भी सकता है, किन्तु पुराणों के बिना आर्यजाति जीवित नहीं रह सकती। पुराणों का श्रवण आदिकाल से होता आया है। इस सम्पूर्ण जगत् के उत्पन्नकर्ता भगवान् ब्रह्मदेव ने ही ऋषियों को पुराणों का उपदेश किया। इसलिये पुराण सम्पूर्ण ज्ञान के भण्डार हैं। कल्याण की इच्छा रखने वाले पुरूषों को पुराणों का श्रवण नियमित रूप से करना चाहिये।
आख्यान- महाभारत तथा पुराणों में असंख्यों आख्यान हैं। उन्हीं के आधार पर सत्कवि सुन्दर-सुन्दर काव्यों की रचना करते हैं। बीजरूप से तो सभी आख्यान भारत तथा पुराणों में ही विद्यमान हैं। कोई भी, किसी जाति का कवि कभी भी ऐसे आख्यान की कल्पना नहीं कर सकता जिसका बीज (प्लाँट) पुराणों में न हो। फिर भी जो कवि उनका विस्तार करते हैं, उन्हें मनोहर कविता में लिखते हैं, उन ऐसे काव्यों का भी अध्ययन सदा करना चाहिये।
महात्माओं के चरित्र- जिस प्रकार गंगा जी का प्रवाह निरन्तर बहता रहता है, उसी प्रकार इस पृथ्वी पर महापुरुषों का भी जन्म सदा होता ही रहता है। यदि ऐसा न हो तो इस पृथ्वी पर धर्म का तो फिर लेश भी न रहे। धर्म के बिना यह संसार एक क्षण भी नहीं रह सकता। धर्म के ही आधार पर यह जगत स्थित है। अब भी असंख्य सिद्ध महात्मा पहाड़ों की कन्दराओं में जनसंसदि से पृथक रहकर योगसाधन द्वारा संसार का कल्याण कर रहे हैं। अनेकों सिद्ध पुरुष भेष बदले पृथ्वी पर पर्यटन कर रहे हैं, लोग उन्हें पहचानते नहीं, किन्तु उनकी सभी चेष्टाएँ लोक-कल्याण के ही निमित्त होती हैं। वे अपने को अपनी शक्ति द्वारा प्रकट नहीं होने देते, अप्रकटरूप से लोक-कल्याण करने में ही उन्हें आनन्द आता है। किसी भाग्यवान पुरुष को ऐसे महापुरुषों का साक्षात दर्शन हो जाय, यह दूसरी बात है। नहीं तो वे छद्म-वेष में ही घूमा करते हैं।
कुछ नित्यजीव या मुक्तजीव लोक-कल्याण के निमित्त भौतिक शरीर भी धारण करते हैं और लोगों को जन्म लेते तथा मरते हुए-से भी प्रतीत होते हैं। वास्तव में वे जन्म-मृत्यु से रहित होते हैं, केवल लोक-कल्याण के ही निमित्त उनका प्रादुर्भाव होता है और जब वे अपना काम कर चुकते हैं तब तिरोहित हो जाते हैं। उनके कार्य गुप्त नहीं होते। वे अधिकारियों को उपदेश करते हैं, शिक्षार्थियों को शिक्षा देते हैं और स्वयं आचरण करके लोगों में नवजीवन का संचार करते हैं, उनका जीवन अलौकिक होता है, उनके कार्य अचिन्त्य होते हैं। क्षुद्रबुद्धि के पुरुष उन्हें भी साधारण जीव समझकर उनके कार्यों की समालोचना करते हैं। इससे उनके काम में बहुत सहायता मिलती है, वे इसी बहाने लोगों के सामने आदर्श उपस्थित करते हैं कि ऐसी स्थिति में कैसा व्यवहार करना चाहिये। उनका वह व्यवहार अन्य लोगों के लिये प्रमाणीभूत बन जाता है।
क्रमशः
Comments
Post a Comment