cc8

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
8-

उस समय दिल्ली के सिंहासन पर लोदी-वंश का अधिकार था किन्तु उस वंश के बादशाहों में अब वीरता-पराक्रम बिलकुल नहीं रहा था, लोदी-वंश अपनी अन्तिम साँसों को जैसे-तैसे कष्ट के साथ पूर्ण कर रहा था, अफ़ग़ान-सरदार लोदी-वंश का अन्त करने पर तुले हुए थे, इसलिये उन्होंने काबुल के बादशाह बाबर को दिल्ली के सिंहासन के लिये निमन्त्रित किया। बाबर-जैसा राज्यलोलुप बादशाह ऐसे स्वर्ण समय को हाथ से कब खोने वाला था। पंजाब का शासन दौलत खाँ उसका पृष्ठ-पोषक था, ईसवी सन् 1526 में बाबर ने भारत वर्ष पर चढ़ाई की और पानीपत के इतिहास-प्रसिद्ध रणक्षेत्र में इब्राहिम लोदी को परास्त करके वह स्वयं दिल्ली का बादशाह बन बैठा और उसके पश्चात् उसका पुत्र हुमायूँ दिल्ली के तख्त पर बैठा। इधर राजपूताने में राणा सांगा ने हिन्दूधर्म की दुहाई देकर बाबर के विरुद्ध बलवा आरम्भ किया। दोनों में घोर युद्ध हुआ, किन्तु मैदान बाबर के ही हाथ रहा, राणा सांगा परास्त होकर भाग गये।

पंजाब में भी छोटी-मोटी पचासों रियासतें बन गयीं। उनमें के पहाड़ी राजा तो प्रायः सभी अपने को स्वतन्त्र ही समझते थे। पहाड़ों में छोटी-छोटी बीसों स्वतन्त्र रियासतें थीं। इधर दक्षिण में विजयनगर का अन्त हो चुका था। बहमनी वंश का अन्त होते ही अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर और बरार- ये पाँच रियासतें एकदम अलग हो गयीं। बंगाल, बिहार, तिरहुत तथा उड़ीसा में भी छोटी-छोटी बहुत-सी मुसलमानी तथा हिन्दुओं की नयी रियासतें बन गयीं। इस प्रकार सम्पूर्ण भारतवर्ष में पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक एक भारी राजक्रान्ति मची हुई थी।

सैकड़ों छोटे-छोटे राज्य परस्पर में एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते थे। सभी एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिये जी-जान से प्रयत्न करते। कभी तो किसी मुसलमानी रियासत को दबाने के लिये मुसलमानों में से दूसरे वंश के सरदार किसी पराक्रमी हिन्दू-राजा की सहायता से उस पर चढ़ाई कर देते और कभी किसी हिन्दू-राज्य को नष्ट करने के निमित्त दो मुसलमान-सरदार मिलकर उस पर धावा बोल देते। सम्पूर्ण भारत में कोई एकच्छत्र शासक नहीं था। वह राज्य-परिवर्तन का समय था, जिसमें भी बलपराक्रम हुआ, जिसके भी अधीन बलवान सेना हुई, वही उस प्रान्त का शासक बन बैठा और दिल्ली के बादशाह ने भी उसे उसी समय शासक स्वीकार कर लिया। ऐसी तो उस समय राजनैतिक परिस्थिति थी।

चैतन्य-कालीन भारत.....

मुसलमान को यहाँ आये सैकड़ों वर्ष हो चुके थे, फिर भी हिन्दू अपनी कट्टरता पर ही तुले हुए थे, वे अब तक मुसलमानों के साथ किसी भी प्रकार का संसर्ग नहीं करते थे। जिनका तनिक भी मुसलमानों से संसर्ग हो जाता, जो भूलकर भी कभी मुसलमानों के हाथ की कोई वस्तु खा लेता, वह एकदम समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता, फिर उसके उद्धार का समाज के पास कोई उपाय ही नहीं था। संस्कृत-विद्या का आदर था, पण्डितों की व्यवस्था की मान्यता थी, समाज में बस व्यवस्था के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठा सकता। ब्राह्मणों का फिर भी बहुत अधिक प्रभाव था, उच्च वर्ण वाले नीच वर्ण वालों के साथ अत्याचार भी कम नहीं करते थे, इसलिये नीच समझे जाने वाले करोड़ों मनुष्य हिन्दू-धर्म को अन्तिम तिलान्जलि दे-देकर इस्लाम-धर्म की शरण में जा रहे थे। बंगाल में इसका प्रचार और प्रभाव अन्य प्रान्तों की अपेक्षा अत्यधिक था।

इस प्रकार हिन्दू-समाज और प्राचीन वर्णाश्रम धर्म चारों ओर से छिन्न-भिन्न हो रहा था। धार्मिक स्थिति तो उस समय की महान ही जटिल थी। लोगों में यज्ञ-यागादिकों के प्रति जो शंकराचार्य के पश्चात् कुछ-कुछ रुचि हुई थी, वह तान्त्रिक और शाक्त-पद्धतियों के प्रचार के कारण फिर से लुप्त होती जा रही थी। वैदिक कर्मों के प्रति मनुष्य उदासीन बनते जा रहे थे। दिन-रात ‘जगत मिथ्या है, ‘जगत् मिथ्या है।’ इन वाक्यों को सुनते-सुनते लोग उकता-से गये थे। वे मस्ति की विद्या से ऊबकर कुछ हृदय के आहार की तलाश में थे। सतियों में भी वह पति-प्रेम नहीं रहा। लोकप्रथा को स्थिर रखने के निमित्त कहीं-कहीं तो अनिच्छापूर्वक जबरदस्ती विधवा स्त्री को उसके पति के साथ जला देते थे। निम्न श्रेणी के पुरुष भगवत्-प्राप्ति के अनधिकारी समझे जाते, उन्हें किसी भी प्रकार के धार्मिक कृत्यों के करने का अधिकार प्राप्त नहीं था। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत एक नूतन धार्मिक पद्धति का इच्छुक था।

लोग नीरस पद्धतियों से ऊबकर सरस पद्धति चाहते थे, ऐसे समय में भरत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में बहुत-से महापुरुष एक साथ ही उत्पन्न हुए। उन सभी ने अपने-अपने प्रान्तों में वैष्णव-धर्म का प्रचार किया। इसलिये हम इस युग को वैष्णव-युग कह सकते हैं। सबसे पहले काशी में श्रीस्वामी रामानन्द जी महाराज हुए। वैरागी-सम्प्रदाय के ये ही आदि आचार्य समझे जाते हैं। इन्होंने भगवत-भक्ति में जाति-पाँति का बन्धन मेट दिया। इन्होंने सभी जातियों को समान रूप से भगवत्-भक्ति करने का अधिकार प्रदान किया। इनका सूत्र था- ‘हरि को भजै सो हरि का होय, जाति पाँति पूछै ना कोय।’ इनके बाद इनके बारह मुख्य शिष्य हुए जिनमें चमार, जुलाहे, छीपी, नाई आदि सभी अधिकांश में छोटी ही जाति के थे।इन सबमें महात्मा कबीर बहुत ही प्रसिद्ध और परम उच्च स्थिति के महापुरुष हुए। इनके उच्च तत्त्वों का सम्पूर्ण भारतवर्ष के ऊपर समानभाव से प्रभाव पड़ा। ये महापुरुष परम ज्ञानी, आदर्श भक्त, अद्वितीय अनुरागी और सबसे बड़े निर्भीक थे। इस हेतु से प्रायः उच्च जाति के लोग डाह के कारण इनके द्वेषी बन गये। महात्मा रैदास, नामदेव जी आदि परमभक्त भी उसी काल में उत्पन्न हुए। इन सभी ने रूपान्तर-भेद से वैष्णव धर्म का ही प्रचार किया। कबीर-पंथ वैष्णव-धर्म का ही विकृत और रूपान्तरमात्र है। इधर उसी समय पंजाब में श्रीगुरु नानकदेव जी भी हुए, ये कबीरदास जी के समकालीन ही थे, इन्होंने भी सम्पूर्ण भारतवर्ष में बारह वर्षों तक भ्रमण तथा तीर्थयात्रा करके पंजाब के करतारपुर में ही आकर रहने लगे। इनके उपदेशों का लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ता था। इसलिये लाखों मनुष्य इनके उपदेशों को सुन-सुन इनके शिष्य अथवा ‘सिक्ख’ बन गये, आगे चलकर गुरु गोविन्द सिंह जी ने इन्हीं सबका एक ‘सिक्खसंघ’ ही बना लिया।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90