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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इनके बड़े पुत्र श्री चन्द जी भी एक बड़े त्यागी, तेजस्वी और प्रभावशाली महापुरुष थे, उन्होंने विरक्तों को ही उपदेश दिया। इसलिये उनके अनुयायी अपने को ‘उदासी’ कहने लगे। उदासी एक प्रकार के संन्यासी ही होते हैं, असल में तो यह भी वैष्णव-धर्म का ही रूपान्तर है, केवल ये लोग शिखा-सूत्र नहीं रखते। वैसे उदासी-सम्प्रदाय में भगवत -भक्ति ही मुख्य समझी जाती थी।
अब तो उदासी-सम्प्रदाय भी विचित्र ही बन गया है। इधर दक्षिण में महात्मा समर्थ गुरु रामदास जी ने भी राम-भक्ति का प्रचार किया। उनके प्रधान शिष्य छत्रपति महाराज शिवाजी केवल राज्यलोलुप लड़ाकू शूरवीर ही नहीं थे, वे परम भागवत वैष्णव थे, उनके युद्ध का प्रधान उद्देश्य होता था। हिन्दू-धर्म-रक्षण और गौ-ब्राह्मणों का प्रतिपालन। इनके द्वारा महाराष्ट्र में भजन-कीर्तन और भगवत-भक्ति का खूब प्रचार हुआ। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त श्रीतुकाराम जी महाराज भी इसी समय उत्पन्न हुए और उन्होंने अपनी अद्भुत भगवत-भक्ति के द्वारा सम्पूर्ण महाराष्ट्र देश को पावन कर दिया। ये विट्ठलनाथ जी के प्रेम में विभोर होकर स्वयं पद गा-गाकर नृत्य करते और स्वयं पदों की भी रचना करते थे। इनके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर साक्षात विट्ठलनाथ जी ने इन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और वे सदा इनके साथ ही रहते थे। ये सशरीर वैकुण्ठ को चले गये। इनके द्वारा मराठी भाषा का ओर सम्पूर्ण महाराष्ट्र देश का बड़ा कल्याण हुआ। इधर काशी में भगवान श्रीवल्लभाचार्य जी भी उस समय विराजमान थे। काशी छोड़कर उन्होंने व्रजमण्डल का परम प्रसिद्ध पुण्यनगरी गोकुल पुरी में अपना निवास-स्थान बनाया।
शुद्धद्वैत-सम्प्रदाय के यही प्रधान आचार्य माने जाते हैं, ये श्री बालकृष्ण के उपासक थे। इनके द्वारा देश के विभिन्न स्थानों में श्रीकृष्ण भक्ति का खूब ही प्रचार हुआ। इनके शिष्य अधिकांश धनी ही पुरुष थे। गुजरात, काठियावाड़ की ओर इनके सम्प्रदाय का अत्यधिक प्रचार हुआ। इनके सात पुत्र थे, उन सभी ने वैष्णव-धर्म का खूब प्रचार किया। इसी समय बंगाल में श्री चैतन्यमहाप्रभु का प्राकट्य हुआ। चैतन्य के पूर्व बंगाल की बड़ी बुरी दशा थी।चैतन्यदेव के द्वारा उसमें अनेक प्रकर परिवर्तन हुआ।श्रीमद्भागवत में कीकट देश की परिभाषा की है कि जहाँ काला हिरन स्वेच्छा से विहार न करता हो, जहाँ ब्राह्मणों की भक्ति न होती हो और जहाँ शुचि, पवित्र सज्जन और विद्वान पुरुष निवास न करते हों, वे ही देश अपवित्र हैं। एक स्थान पर कीकट देशों के नाम भी गिनाये हैं। यथा- अर्थात ‘अंगदेश, बंगदेश, कलिंगदेश, सौराष्ट्र ओर मगधदेश यदि इनमें तीर्थयात्रा बिना चला भी जाय तो उसे फिर से संस्कार करना चाहिये। ‘पूर्वकाल में ऐसी मान्यता थी कि बंगदेश में प्रवेश करते ही ब्राह्मण अपवित्र हो जाता है। महाभारत में स्थान-स्थान पर इसका उल्लेख आया है। यहाँ तक कि तीर्थयात्रा के समय पाण्डव के साथ जो ब्राह्मण थे, वे बंगदेश की सरहद आते ही उने साथ से लौट गये।
तीर्थयात्रा के निमित्त भी उन्होंने बंगदेश में जाना उचित नहीं समझा। इसमें असली रहस्य क्या है, इसे तो सर्वज्ञ ऋषि ही समझ सकते हैं, किन्तु आजकल तो कोई इस प्रकार का आग्रह करने लगे तो उसे पागलखाने में भेजने के लिये सभी लोग सहमत हो जायँगे। जहाँ पर ऐसे देशों में न जाने के सम्बन्ध में वाक्य मिलते हैं, वहाँ ऐसे भी अनेकों प्रमाण भरे पड़े हैं कि भगवत-भक्त की लीलास्थली कोटि तीर्थों से भी बढ़कर पावन बन जाती है। जिस भूमि को महाप्रभु गौरांगदेव, परमहंस रामकृष्णदेव, विजयकृष्ण गोस्वामी तथा जगद्बन्धु ऐसे भगवत-भक्तों ने अपनी पदधूलि से पावन बनाया हो, जिसमें राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर तथा ब्रह्मानन्द, केशवचन्द्र- जैसे भगवत-भक्त, समाज-सुधारक उत्पन्न हुए हों, जिस भूमि ने देशबन्धु चित्तरंजन दास- जैसे देशभक्त को जन्म दिया हो, आज भी जिसमें अरविन्द-जैसे योगी, रविन्द्र-जैसे विश्व-कवि, जगदीशचन्द्र वसु- जैसे जगत-विख्यात विज्ञान-वेत्ता और सुभाषचन्द्र- जैसे अनन्य देशभक्त सम्पूर्ण भारत का मुख उज्ज्वल कर रहे हों, उस देश को हम अब कीकट-देश कैसे कह सकते हैं? जब होगा, तब रहा हो, आज तो वही देश परम पावन बना हुआ है, चैतन्यदेव की लीला-भूमि के लिये भावुक भक्तों के हृदय में व्रजभूमि से कम आदर नहीं है।
नवद्वीप तो भक्तों के लिये पूर्व वृन्दावन ही बना हुआ है। जहाँ श्रीकृष्ण चैतन्य-जैसे परम भावुक और साक्षात प्रेम की सजीव मूर्ति प्रेमावतार महापुरुष का प्राकट्य हुआ हो, उसका महत्त्व वृन्दावन के सदृश होना ही चाहिये।बंगाल भाव-प्रधान देश है। बंगाली प्रायः हृदय-प्रधान होते हैं, उन्हें ललित कलाओं से बहुत अनुराग है, वे प्रकृतिप्रिय हैं। उनका हृदय प्रकृति के साथ मिला हुआ है। प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का उनके हृदय-पटल पर गहरा प्रभाव पड़ता है, वे भावुक होते हैं, इसका प्रमाण उनके रहन-सहन में, खान-पान तथा उत्सव-पर्वों में प्रत्यक्ष मिलता है। बंगला-भाषा का अधिकांश साहित्य भावुकता-प्रधान ही है, उनमें उपन्यास, नाटक, ललितकाव्य आदि विषयों का ही प्राधान्य है। कुछ विशेष श्रेणी के पुरुषों को छोड़कर सर्वसाधारण लोग निष्काम कर्मों से एकदम अनभिज्ञ हैं। वे इस बात को प्रायः समझ ही नहीं सकते कि बिना कामना के भी कर्म हो सकता है। वहाँ जितना भी पूजा-पाठ और धार्मिक कृत्य होता है सभी सकाम भावना से किया जाता है।
संन्यास-धर्म का प्रचार बंगदेश में बहुत ही कम है। अब तो वहाँ कुछ-कुछ संन्यास-धर्म का प्रचार होने लगा है, नहीं तो पहले इसका प्रचार नहीं के ही बराबर था। अब भी बंगाल में मधुकरी-भिक्षा की परिपाटी नहीं है। बना-बनाया अन्न वहाँ भिक्षा में कठिनता से मिल सकेगा। अधिकांश बंगाली संन्यासी इधर उत्तर-भारत की ही ओर आकर रहने लगते हैं। अब भी उत्तर-भारत में बहुत-से सुयोग त्यागी और विरक्त बगाली महात्मा निवास कर रहे हैं। बंगदेश शक्ति-उपासक है। शक्ति की उपासना बिना रजोगुण के हो नहीं सकती। कुछ शाक्त भक्त सात्त्विक-पद्धति से फल-फूलों का ही बलिदान देकर शक्ति-उपासना करते हैं, किन्तु ऐसे भक्तों की संख्या उँगलियों पर ही गिनी जा सकती है, अधिकांश तो गरम-गरम रक्त द्वारा ही कालीमाई को प्रसन्न करने वाले भक्त हैं। प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रों में करोड़ों जीवों का संहार देवी के नाम से किया जाता होगा।
क्रमशः
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