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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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हमेशा गृहस्थी की चिन्ता करते रहने से उनका स्वभाव ही चिन्तामय बन गया था, सोते समय भी मानो वे किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए हैं। निर्धन वृद्ध के चेहरे की ओर देखकर एक बार तो विश्वरूप अपने निश्चय से विचलित हुए।

विश्वरूप का गृह-त्याग....

उनके मन में भाव आया- ‘पिता वृद्ध हैं, आजीविका का कोई निश्चित प्रबन्ध नहीं, निमाई अभी निरा बालक ही है, घर का काम कैसे चलेगा?’ किन्तु थोड़े ही देर बाद वे सोचने लगे- ‘अरे, मैं यह क्या सोच रहा हूँ? जिसने इस चराचर विश्व की रचना की है, जो सभी के भरण-पोषण का पहले से ही प्रबन्ध कर देता है, उसको कर्ता न मानकर मैं अपने में कर्तापने का आरोप क्यों कर रहा हूँ? वृत्ति तो सबकी वही चलता है। मनुष्य तो निमित्तमात्र है। विश्वम्भर ही सबका पालन करते हैं, मुझे अपने सत्संकल्प से विचलित न होना चाहिये’ यह सोचकर उन्होंने सोती हुई माता को मन-ही-मन प्रणाम किया। छोटे भाई को एक बार प्रेमपूर्वक देखा और धीरे से घर से निकल पड़े। संकेत के अनुसार लोकनाथ उन्हें गंगा तट पर तैयार बैठे मिले। दोनों एक-दूसरे को देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए, अब उन्हें यह चिन्ता हुई कि रात्रि में गंगा-पार किस प्रकार जा सकते हैं। अब बहुत ही शीघ्र प्रातःकाल होने वाला है। इधर-उधर कहीं जायँगे तो पहचाने जाने पर पकड़े जायँगे। इसलिये गंगा-पार जाये बिना क्षेम नहीं है। उस समय नाव का मिलना कठिन था। दोनों ही युवक निर्भीक थे, जीवन का मोह तो उन्हें था ही नहीं।मनुष्य इस जीवन-रक्षा के ही लिये साहस के काम करने से डरा करता है। जिसने जीवन की उपेक्षा कर दी है, जिसने अपने शीश को उतारकर हथेली पर रख लिया है, वह संसार में जो भी चाहे कर सकता है, उसके लिये कोई काम कठिन नहीं। ’असम्भव’ तो उसके शब्द-कोष में रहता ही नहीं। ये दोनों युवक भी भगवान का नाम लेकर पतितपावनी कलिमलहारिणी भगवती भागीरथी की गोद में बिना शंका के कूद पड़े। मानो आज वे जलती हुई भव-दावाग्नि से निकलकर जगज्जननी माँ जाह्नवी की सुशीतल क्रोड में शाश्वत शान्ति के निमित्त सदा के लिये प्रवेश करते हों। गंगा जी के किनारे रहने वाले छोटे-छोटे बच्चे भी खूब तैरना जानते हैं, फिर ये तो युवक थे और तैरने में प्रवीण थे, सामान इन लोगों के पास कुछ था ही नहीं, इसलिये ये निर्विघ्न गंगा पार हो गये। जाड़े का समय था, शरीर के सभी वस्त्र भीग गये थे, किन्तु इन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं था। शीतोष्णादि द्वन्द्व तो तभी तक बाधा पहुँचा सकते हैं जब तक कि शरीर में ममत्व होता है। शरीर से ममत्व कम हो जाने पर मनुष्य द्वन्द्वों की वेदना से ऊँचा उठ जाता है, तभी वह निर्द्वन्द्व हो सकता है।विश्वरूप निर्द्वन्द्व हो चुके थे। वे गीले ही वस्त्रों से आगे बढ़े चले गये। इसके पश्चात् विश्वरूप जी का कोई निश्चित वृत्तान्त नहीं मिलता। पीछे से यही पता चला कि इन्होंने किसी अरण्य नामक संन्यासी से संन्यास ग्रहण कर लिया और इनके संन्यास का नाम हुआ शंकरारण्य। इनके संन्यासी हो जाने पर लोकनाथ ने इनसे संन्यास लिया। दो वर्षों तक ये भारत के अनेक तीर्थों में भ्रमण करते रहे। अन्त में महाराष्ट्र के परम प्रसिद्ध तीर्थ पण्ढरपुर में इन्होंने श्रीविट्ठलनाथ जी के क्षेत्र में अपना यह पांच भौतिक शरीर त्याग कर दिया। देहत्याग के पूर्व इन्होंने अपना स्वकीय तेज श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी के आश्रम में उनके परम प्रिय शिष्य श्रीईश्वरपुरी को प्रदान कर दिया था। उन्हीं से वह तेज नित्यानन्द के पास आया। इसीलिये नित्यानन्द को बलराम या शेषनाग को अवतार मानते हैं। इस प्रसंग को पाठक आगे समझेंगे। इधर प्रातःकाल हुआ।

मिश्र जी ने देखा विश्वरूप शय्या पर नहीं है। इतने सबेरे पिता से पहले वे उठकर कहीं नहीं जाते थे। पिता को एकदम शंका हो गयी। उन्होंने शय्या के समीप जाकर देखा। पहले तो सोचा गंगास्नान के लिये चला गया होगा, किन्तु जलपात्र और धोती तो ज्यों-की-त्यों रखी है। थोड़ी देर तक वे चुप रहे, फिर उनसे नहीं रहा गया, उन्होंने यह बात शचीदेवी से कही। शचीदेवी भी सोच में पड़ गयी। निमाई भी उठ बैठा। शचीदेवी ने कहा- ‘बेलपोखरा (शचीदेवी के पिता नीलाम्बर चक्रवर्ती का घर बेलपोखरा मुहल्ले में ही था, विश्वरूप लोकनाथ से शास्त्रविचार करने बहुधा वहीं चले जाते थे) लोकनाथ के पास चला गया हो।’ मिश्रजी जल्दी से चक्रवर्ती महाशय के घर गये। वहाँ जाकर देखा कि लोकनाथ भी नहीं है। सभी समझ गये। दोनों परिवार के लोग शोकसागर में मग्न हो गये। शचीदेवी दौड़ी-दौड़ी अद्वैताचार्य के यहाँ गयी। वहाँ भी विश्वरूप का कुछ पता नहीं था। क्षणभर में यह बात सर्वत्र फैल गयी कि विश्वरूप घर छोड़कर चले गये। चारों ओर से मिश्र जी के स्नेही उनके घर आने लगे। लोगों की भीड़ लग गयी।

अद्वैताचार्य भी अपने शिष्यों के साथ वहाँ आ गये। सभी भाँति-भाँति की कल्पनाएँ करने लगे। कुछ भक्त कहने लगे- ‘अब घोर कलियुग आ गया। साधु-ब्राह्मणों का मान नहीं, वैष्णवों को सर्वत्र अपमानित होना पड़ता है, धर्म-कर्म सभी लोप हो गये। अब यह संसार भले आदमियों के रहने योग्य नहीं रहा। हमें भी सर्वस्व छोड़कर विश्व के ही मार्ग का अनुसरण करना चाहिये।’ कुछ कहते- ‘भाई! विश्वरूप को हम इतना निष्ठुर नहीं समझते थे, उसने अपने छोटे भाई का भी तनिक मोह नहीं किया।’
मिश्र जी की आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, वे मुख से कुछ भी नहीं कहते थे, नीची दृष्टि किये वे बराबर भूमि की ओर ताक रहे थे, मानो उन्हें सन्देह हो गया था कि इस भूमि ने ही मेरे प्राण प्यारे पुत्र को अपने में छिपा लिया है। उनके धँसे हुए कपोल और सिकुडी हुई खाल के ऊपर से अश्रु-विन्दु बह-बहकर पृथ्वी में गिरते जाते थे और वे उसी समय पृथ्वी में विलीन होते जाते थे। इससे उनका सन्देह और भी बढ़ता जाता था कि जो पृथ्वी बराबर इन अश्रुओं को अपने में छिपाती जाती है उसने ही जरूर मेरे बेटे विश्वरूप को छिपा लिया है। उनकी दृष्टि ऊपर उठती ही नहीं थी।
क्रमशः

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