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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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लोग परस्पर में क्या बातें कर रहे हैं इसका उन्हें कुछ भी पता नहीं था। उनके साथी-सम्बन्धी उन्हें भाँति-भाँति से समझाते, किन्तु वे किसी की भी बात का प्रत्युत्तर नहीं देते थे। इधर शचीदेवी के करूण-रूदन को सुनकर पत्थर भी पसीजने लगे। माता जोर-जोर से दहाड़ मारकर रुदन कर रही थीं।विश्वरूप के गुणों का बखान करते-करते माता जिस प्रकार गौ अपने बच्चे के लिये आतुरता से रम्हाती है उसी प्रकार शचीदेवी उच्च स्वर से विलाप कर रही थीं। वे बार-बार कहतीं- ‘बेटा, इस बूढ़ी को अधजली ही छोड़कर चला गया। यदि मेरा और अपने बूढे़ बाप का कुछ खयाल न किया तो न सही, इस अपने छोटे भाई की ओर भी तूने नहीं देखा। यह तो तेरे बिना क्षणभर भी नहीं रह सकेगा। विश्वरूप! मैं नहीं जानती थी, कि तू इतना निर्दयी भी कभी बन सकेगा।’ माता के विलाप को सुनकर निमाई भी जोर-जोर से रोने लगे और रोते-रोते वे एकदम बेहोश हो गये। भ्रातृ-वियोग का स्मरण करके तथा माता-पिता के दुःख को देखकर निमाई मूर्च्छित हो गये। उनका सम्पूर्ण शरीर संज्ञा शून्य हो गया। आस-पास की स्त्रियों ने जल्दी से निमाई को उठाया, उनके मुख में जल डाला और उन्हें सचेत करने के लिये भाँति-भाँति की चेष्टाएँ करने लगीं। स्त्रियाँ शचीदेवी को समझा रही थीं- ‘शची! अब रोने से क्या होगा, धैर्य धारण करो। तुम्हारे पुत्र ने कोई बुरा काम तो किया ही नहीं। तुम्हारी सैकड़ों पीढ़ियों को उसने तार दिया।भगवान की भक्ति से बढ़कर और क्या है? अब इस निमाई को ही देखकर धैर्य धारण करो। देख, तेरे रुदन से यह बेहोश हो गया है, इसका खयाल करके तू रोना बंद कर दे।’ माता ने कुछ-कुछ धैर्य धारण किया। निमाई को धीरे-धीरे चेतना होने लगी। वे थोड़ी ही देर में प्रकृतिस्थ हो गये। अपने आँसुओं को पोंछकर आप माता से बोले- ‘माँ! दद्दा चले गये तो कोई चिन्ता नहीं। मैं तुम लोगों की बड़ा होकर सेवा-शुश्रूषा करूँगा। आप लोग धैर्य धारण करें।’ लोग मिश्र जी से कह रहे थे। हम उत्तर की ओर जाते हैं, चार आदमियों को दक्षिण की ओर भेजो। लोकनाथ के पिता दो-चार आदमियों को लेकर गंगा-पार जायँ। अभी दो-चार कोस ही तो पहुँचे होंगे, हम उन्हें जल्दी ही लौटा लावेंगे। इन सब लोगों की बातें सुनकर ऊपर दृष्टि उठाकर मिश्र जी ने साहस के साथ कहा- ‘अब भाई! कहीं जाने से क्या लाभ? विश्वरूप बालक तो है ही नहीं। यदि उसकी ऐसी ही इच्छा है, तो भगवान उसकी मनोकामना पूर्ण करें। यदि उसे संन्यास में ही सुख है तो वह संन्यासी ही बनकर रहे। आप सब लोग भगवान से यही प्रार्थना करें कि वह संन्यासी होकर अपने धर्म को यथारीति पालन करता रहे और फिर लौटकर घर में न आवे।’ पिता के ऐसे साहसपूर्ण वचनों को सुनकर सभी को बड़ा आनन्द हुआ। सभी इसी सम्बन्ध की बातें करते हुए सुखपूर्वक घर लौट गये। माता-पिता ने धैर्य तो धारण किया, किन्तु उनके हृदय में सर्वगुण-सम्पन्न पुत्र के वियोग के कारण एक गहरा-सा घाव हो गया जो अन्त तक बना रहा। मिश्रजी तो एक ही घाव को लेकर इस संसार से विदा हो गये, किन्तु वृद्धा शची के तो आगे चलकर एक और भी बड़ा भारी घाव हुआ था, जिसकी मीठी-मीठी वेदना का रसास्वादन करते हुए उसने अपना सम्पूर्ण जीवन इसी प्रकार वेदनामय ही बिताया। गृहस्थ में जहाँ अनेक सुख और आनन्द के अवसर आते हैं, वहाँ ऐसे दुःख के भी प्रसंग बहुत आते हैं, जिनके स्मरणमात्र से छाती फटने लगती है। जगज्जननी सीता जी जब अपने प्राणनाथ श्रीरामचन्द्र जी के वियोग से अत्यन्त ही व्यथित हो उठीं ओर उनकी वेदना असह्या हो गयी तब उन्होंने रोते-रोते बड़ी ही मार्मिक वाणी में हनुमान जी से ये वचन कहे थे-

प्रियान्न संभवेद्दुःखमप्रियादधिकं भवेत्।
ताभ्यां हि ते वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम्।।

वे जितात्मा सत्यवादी महात्मा धन्य हैं जिन्हें प्रिय की प्राप्ति में न तो सुख होता है ओर न अप्रिय की प्राप्ति में अधिक दुःख, व्यथा हो सकती है, जिनकी वृत्ति सुख-दुःख में समान रहती है, ऐसे महात्माओं के चरणों में बार-बार प्रणाम है।

निमाई का अध्ययन के लिये आग्रह...

पुत्र-स्नेह भी संसार में कितनी विलक्षण वस्तु है? जिस समय माता-पिता का ममत्व पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, उस समय वे कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान को खो बैठते हैं। बड़े-बड़े पण्डित भी पुत्र-स्नेह के कारण अपने कर्तव्य से च्युत होते हुए देखे गये हैं। भगवान की माया ही विचित्र है, उसका असर मूर्ख-पण्डित सभी पर समानरूप से पड़ता है। पण्डित जगन्नाथ मिश्र स्वयं अच्छे विद्वान थे, कुलीन ब्राह्मण थे, विद्या के महत्त्व को जानते थे, किन्तु विश्वरूप से विछोह से वे अपने कर्तव्य को खो बैठे। सर्वगुण सम्पन्न पुत्र के असमय में धोखा देकर चले जाने के कारण उनके हृदय पर एक भारी चोट लगी। वे इस विछोह का मूल कारण विद्या को ही समझने लगे।

उनके हृदय में बार-बार यह प्रश्न उठता था- ‘यदि विश्वरूप इतना अध्ययन न करता, यदि मैं उसे इस प्रकार सर्वदा पढ़ते रहने की छूट न देता, तो सम्भव है मुझे आज यह दिन न देखना पड़ता। इसलिये इनके मन में आया कि अब निमाई को अधिक पढ़ाना-लिखाना नहीं चाहिये। हाय रे! मोह! इधर अब तक तो निमाई कुछ पढ़ते ही लिखते न थे। दिनभर बालकों के साथ उपद्रव मचाते रहना ही इनका प्रधान कार्य था, किन्तु विश्वरूप के गृह त्याग ने के अनन्तर इनका स्वभाव एकदम बदल गया। अब इन्होंने उपद्रव करना बिलकुल छोड़ दिया। अब ये खूब मन लगाकर पढ़ने लगे। दिनभर खूब परिश्रम के साथ पढ़ते और खेलने-कूदने कहीं भी न जाते। माता-पिता के साथ भी अब ये सौम्यता का बर्ताव करने लगे। इस एकदम स्वभाव-परिवर्तन का पिता के ऊपर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। वे सोचने लगे- ‘मुझे जो भय था वही सामने आ उपस्थित हुआ।
निमाई भी अब विश्वरूप की भाँति अध्ययन में संलग्न हो गया। इसकी बुद्धि उससे कम तीव्र नहीं है। एक ही दिन में इसने सम्पूर्ण वर्णों की जानकारी कर ली थी।
क्रमशः

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