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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यदि इसे भी अध्ययन के लिये विश्वरूप की भाँति स्वतन्त्रता दे दी जाय तो यह भी हमारे हाथ से जाता रहेगा। यह सोचकर उन्होंने एक दिन निमाई को बुलाया और बड़े प्यार से कहने लगे- ‘बेटा! मैं तुमसे एक बात कहता हूँ, तुम्हें मेरी वह बात चाहे उचित हो या अनुचित माननी ही पड़ेगी।’ निमाई ने नम्रतापूर्वक कहा- ‘पिताजी! आप आज्ञा कीजिये। भला, मैं कभी आपकी आज्ञा को टाल सकता हूँ! आपके कहने से मैं सब कुछ कर सकता हूँ।’ मिश्र जी ने कहा- ‘हम तुम्हें अपनी शपथ दिलाकर कहते हैं, तुम आज से पढ़ना बंद कर दो। हमारी यही इच्छा है कि तुम पढ़ने-लिखने में विशेष प्रयत्न न करो।’ जिस दिन से विश्वरूप गृह त्यागकर चले गये थे, उस दिन से निमाई माता-पिता की आज्ञा को कभी नहीं टालते थे। पिता की बात सुनकर इन्होंने नीचे सिर झुकाये हुए ही धीरे से कहा- ‘जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा।’ इतना कहकर ये भीतर माता के पास चले गये और पिता की आज्ञा माता को सुना दी। दूसरे दिन से इन्होंने पढ़ना-लिखना बिलकुल बंद कर दिया। अब इन्होंने अपनी वही पुरानी चंचलता फिर आरम्भ कर दी। लड़कों के साथ गंगा जी के घाटों पर जाते, घण्टों जल में ही स्नान करते रहते। कभी अपने साथियों को लेकर लोगों के ऊपर पानी उलीचते। स्त्रियों के पास चले जाते, छोटे-छोटे बच्चों को रूला देते। स्त्रियों के सूखे वस्त्रों को जल में फेंककर भाग जाते। किसी की घाट पर रखी हुई नैवेद्य को बिना उसके पूछे ही जल्दी से चट कर जाते। कोई आकर डाँटने लगता तो बड़े जोरों के साथ रोने लगते, सभी बालक इनके चारों ओर खडे़ हो जाते, आस-पास से और भी लोग इकट्ठे हो जाते। कोई तो उस डाँटने वाले को बुरा-भला कहता। कोई इन्हें शान्त करने की चेष्टा करता। बहुत-से कहते- ‘अजी! कोई कहाँ तक सहन करे, यह लड़का है भी बड़ा उपद्रवी, किसी की सुनता ही नहीं।’
इस प्रकार लोग नित्य-प्रति जा-जाकर मिश्र जी से शिकायत करते। मिश्र जी इन्हें पुचकारकर कहते- ‘बेटा! इतना दंगल नहीं करना चाहिये।’ आप धीरे से कहते- ‘तब हम करें क्या? जब पढ़ने न जायँगे तो बालकों के साथ खेल ही करेंगे। हमसे चुपचाप घर में तो बैठा नहीं जाता।’ पिता इनका ऐसा उत्तर सुनकर चुप हो जाते। ये भाँति-भाँति के खेल खेलने लगे। एक दिन आपने बहुत ही फटे-पुराने कपड़े पहन लिये, आँखों में पट्टी बाँध ली और एक लड़के का कंधा पकड़कर घर-घर भीख माँगने लगे। बहुत-से लड़के इनके साथ ताली बजा-बजाकर हँसते जाते थे। ये घरों में जाते और स्त्रियों से कहते- ‘माई! अन्धे को भीख डालना, भगवान तेरा भला करेंगे।’ स्त्रियाँ इनकी ऐसी क्रीड़ा देखकर खूब जोरों से हँसने लगतीं और इन्हें कुछ खाने की चीजें दे देतीं। ये उसे अपने साथियों में बाँटकर खा लेते और फिर दूसरे घर में जाते। इस प्रकार ये अपने घर भी गये।शचीमाता भोजन बना रही थी। आपने आवाज दी- ‘मैया! भगवान् तेरा भला करे, दूध-पूत सदा फलते-फूलते रहें, इस अन्धे को थोड़ी भीख डाल देना।’ माता निकलकर बाहर आयीं और इनका ऐसा रूप देखकर आश्चर्य के साथ कहने लगीं- ‘निमाई! तू कैसे होता जा रहा है, भला, ब्राह्मण के बालक को ऐसा रूप बनाना चाहिये। तू घर-घर से भीख माँग रहा है, तेरे घर में क्या कमी है? ऐसा खेल ठीक नहीं होता।’ आपने उसी समय पट्टी खोलकर कहा- ‘अम्मा! निर्धन ब्राह्मण का मूर्ख बालक अन्धा ही है, वह भीख माँगने के सिवा और कर ही क्या सकता है? मुझे पढ़ावेगी नहीं तो मुझे भीख ही तो माँगनी पड़ेगी।’ इनकी बात सुनकर शचीदेवी की आँखों में मारे प्रेम के आँसू आ गये, उन्होंने इन्हें जल्दी से गोद में लेकर पुचकारा। साथ के बच्चों को थोड़ी-थोड़ी मिठाई देकर बिदा किया और इन्हें स्नान कराके भोजन कराने लगी। ये जान-बूझकर उपद्रव करने लगे। जब ये घर पर रहते और कोई चीज बेचने वाला उधर आता तो माता से बार-बार आग्रह करते हमें अमुक चीज दिला दो। मिठाई वाला आता तो मिठाई लेने को कहते, फलवाला आता तो फलों के लिये आग्रह करते। चाट बिकने आती तो चाट ही खाने को माँगते। न दिलाने पर खूब जोरों से रोते और जब तक उसे पा नहीं लेते तब तक बराबर रोते ही रहते। चीज मिलने पर उसमें से थोड़ी-सी खा लेते, शेष को वैसे ही छोड़ देते।माता बार-बार प्यार से समझाती- ‘बेटा! तू जानता नहीं, तेरे पिता निर्धन हैं, उनके पास इतने पैसे कहाँ से आये। तू दिनभर भाँति-भाँति की चीजों के लिये रोया करता है, जो भी बिकने आता है उसी के लिये आग्रह करने लगता है। इतने पैसे मैं कहाँ से लाऊँ?’ आप कहते- ‘हमें पढ़ने न दोगी तो हम ऐसा ही करेंगे। जब पढ़ेंगे नहीं तो यही करते रहेंगे। हमें इससे क्या मतलब, या तो हमें पढ़ने दो नहीं तो हम ऐसे ही माँगा करेंगे।’ इनकी ऐसी बातें सुनकर माता सोचती, इससे तो इसे पढ़ने ही दिया जाय तो अच्छा है, किन्तु विश्वरूप का स्मरण आते ही वह डर जाती और फिर उसे मिश्र जी के सामने ऐसा प्रस्ताव करने का साहस न होता। ये और भी अधिकाधिक चंचल होते जाते। एक दिन आपने गुस्से में आकर घर में से बहुत-से मिट्टी के बर्तन निकाल-निकालकर आँगन में फोड़ दिये और आप पास के ही एक धूरे पर जा बैठे। वहाँ उसी प्रकार अशुद्ध हाँड़ियों को अपनी भुजाओं में पहन लिया। टूटी-फूटी टोकरी को सिर पर रख लिया और खपड़े घिस-घिसकर उससे शरीर को मलने लगे।माता बार-बार मने करतीं, किन्तु ये सुनते ही न थे, वहीं बैठकर चुपचाप फूटी हाँडि़यों को बजाने लगे। बहुत-सी पास-पड़ोस की स्त्रियाँ भी आ गयीं। गंगास्नान करने वाले खड़े हो गये। माता इन्हें बार-बार धिक्कार देते हुए ऐसे अपवित्र कार्य को करने से मना करतीं। ये कहते- ‘मूर्ख बेटे से तुम और आशा ही क्या रखी सकती हो? जब तुम हमें पढ़ाओगी नहीं तो हम ऐसा ही काम करेंगे। मूर्ख आदमी शुचि-अशुचि क्या जाने? इसका ज्ञान तो विद्या पढ़कर ही होता है।’
क्रमशः
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