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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पास में खड़ी हुई स्त्रियाँ शचीमाता को उलाहना देते हुए कहतीं- ‘बालक कह तो ठीक रहा है। तुम इसे पढ़ने क्यों नहीं देती? यह तो बड़े भाग्य की बात है कि बच्चा पढ़ने के लिये इतना आग्रह कर रहा है। हमारे बच्चे तो मारने-पीटने पर भी पढ़ने नहीं जाते। इसे पढ़ने के लिये जरूर भेजा करो।’ पास में खडे़ हुए और भी लोग बच्चे की बात का समर्थन करने लगे। सबके समझाने से माता का भी भाव परिवर्तित हो गया।
उन्होंने प्यार के साथ कहा- ‘अच्छा, कल से पढ़ा करना, मैं तेरे पिता से कह दूँगी। अब आकर जल्दी से स्नान कर ले।’ अतना सुनते ही ये जल्दी से उठकर चले आये और माता के कथनानुसार शीघ्र ही गंगास्नान करके घर लौट आये। शची देवी ने पण्डित जी से बहुत आग्रह किया कि बच्चे को पढ़ने देना चाहिये। सभी पढ़े-लिखे संन्यासी थोड़े ही हो जाते हैं। नवद्वीप में हजारों पण्डित हैं, इतने विद्यार्थी हैं, इनमें से कोई भी संन्यासी नहीं हुआ। यह तो भाग्य की बात है। यदि इसके भाग्य में संन्यास ही होगा तो हम उसे रोक थोडे़ ही सकते हैं। ब्राह्मण का बालक मूर्ख ठीक नहीं होता। और भी बहुत-से लोगों ने पण्डित जी से आग्रह किया। सब लोगों के कहने से पण्डित जी ने पढ़ने की सम्मति दे दी। निमाई खूब मनोयोग के साथ पढ़ने-लिखने लगे। अब इन्होंने सभी प्रकार की चंचलता छोड़ दी। एक दिन इन्होंने नैवेद्य का पान खा लिया। उसे खाते ही ये बेहोश हो गये। थोड़ी देर में होश आने पर इन्होंने माता से कहा- ‘अम्मा! भैया विश्वरूप मेरे पास आये थे, उन्होंने कहा- ‘तुम भी संन्यासी हो जाओ’ हमने कहा- ‘हम बालक हैं, भला हम संन्यास का मर्म क्या समझें।हम तो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा ही करेंगे। यही हमारा धर्म है, हम अपने माता-पिता को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते।’ मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छा, तो ठीक है, माता जी के चरणों में हमारा प्रणाम कहना। अब हम जाते हैं।’ यह कहकर वे चले गये। इस बात को सुनकर माता को विश्वरूप की याद आ गयी। उनकी आँखों में से अश्रुओं की धार बहने लगी। उन्होंने अपने प्यारे निमाई को छाती से चिपका लिया। उनका मातृस्नेह उमड़ पड़ा और रूँधे हुए कण्ठ से रोते-रोते उन्होंने कहा- ‘बेटा निमाई! अब हमें तेरा ही एकमात्र सहारा है, हम वृद्ध अन्धों की तू ही एकमात्र लकड़ी है। हमारी सब आशाएँ तेरे ही ऊपर हैं। तू हमें विश्वरूप की तरह धोखा मत देना।’
निमाई बहुत देर तक माता की गोद में चिपके रहे, उन्हें माता की शीतल सुखदायी गोदी में परम शान्ति मिल रही थी, माता भी एक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव कर रही थी। इस प्रकार निमाई की अवस्था 9 वर्ष की हो गयी। शरीर इनका नीरोग, पुष्ट और सुगठित था, देखने में ये 16 वर्ष के-से युवक जान पड़ते थे। अब पिता ने इनके यज्ञोपवीत की तैयारियाँ कीं।

व्रत-बन्ध......

संस्कार ही जीवन-पथ के परिचायक चिह्न हैं। जैसे संस्कार होंगे उन्हीं के अनुसार जीवन आगे बढ़ेगा। संयम और नियम ही उन्नति के साधन हैं। पूज्यपाद महर्षियों ने संयम के ही सिद्धान्तों पर वर्णाश्रम-धर्म का प्रसार किया और उनके लिये पृथक-पृथक विधान बनाये। द्विजातियों के लिये 16 संस्कारों की आज्ञा दी। गर्भाधान से लेकर मृत्यु अथवा संन्यास-पर्यन्त सभी संस्कारों की एक विशेष विधि का निर्माण किया। जिनसे चित्त पर प्रभाव पड़े और भविष्य-जीवन उज्ज्वल बन सके। द्विजातियों का वेदारम्भ और उपवीत-संस्कार यही प्रधान संस्कार समझा जाता है।

असल में यज्ञोपवीत-संस्कार होने पर ही बालक के ऊपर वैदिक कर्म लागू होते हैं, इसीलिये इसे व्रत-बन्ध-संस्कार भी कहते हैं। पूर्वकाल में बच्चा जब पढ़ने के योग्य हो जाता था, तो उसे सद्गुरु के आश्रम में ले जाते थे, गुरु उसे ग्रहण करके शौच, आचार और वेद की शिक्षा देते थे। बस, इसी को उपनयन-संस्कार कहते थे। विद्या समाप्त होने पर गुरु की आज्ञा से शिष्य जब घर को लौटता था, तो उसे समावर्तन-संस्कार कहते थे। ये तीनों संस्कार आज भी नाममात्र को होते तो हैं, किन्तु इन तीनों का अभिनय एक ही दिन में करा दिया जाता है। यह विकृत संस्कार आज भी हमारी महत्ता का स्मरण दिलाता है। आज निमाई का यज्ञोपवीत-संस्कार होगा। घर में विवाह-शादी की तरह तैयारियाँ हो रही हैं, मिश्र जी ने अपनी शक्ति के अनुसार इस संस्कार को खूब धूमधाम से करने का निश्चय किया है। घर के आँगन में एक मण्डप बनाया गया है। उसमें एक ओर विद्वान ब्राह्मण बैठे हुए हैं, उनके पीछे मिश्र जी के सम्बन्धी और स्नेही बैठे हैं। सामने स्त्रियाँ बैठी हैं, जो भाँति-भाँति के मंगलगीत गा रही हैं। द्वार पर बाजे बज रहे हैं, चारों ओर खूब चहल-पहल दिखायी पड़ती है।

ग्रहपूजा और हवनादि का कार्य कराने के निमित्त आचार्य सुदर्शन और विष्णु पण्डित प्रभृति विद्वान मिश्रजी के पास मण्डप में बैठे हुए हैं। यथासमय क्षौर कराकर निमाई मण्डप में बुलाये गये। उनका सिर घुटा हुआ था, आचार्य ने उन्हें अपने हाथों से ब्रह्मचारियों के- से पीत वस्त्र पहनाये। पीले वस्त्र की लंगोटी पहनायी, ओढ़ने को मृगचर्म दिया और हाथ में बड़ा-सा एक पलास का दण्ड दिया। अब निमाई पूरे ब्रह्मचारी बन गये। गौर वर्ण के उज्ज्वल शरीर पर पीत वस्त्र बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। पिता के पास बैठकर इन्होंने समिधाधान किया, अग्नि में आहुति दी और यज्ञोपवीत धारण किया।मिश्रजी ने एक वस्त्र की आड़ करके इनके कान में वेदमाता सावित्री अथवा गायत्री-मन्त्र का उपदेश दिया। मन्त्र के श्रवण मात्र से ये भाव में निमग्न हो गये। मन्त्र सुनते ही इन्होंने एक बड़े जोर की हुंकार मारी और साथ ही अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। हाथ का दण्ड एक ओर पड़ा था और ये अचेत होकर पृथ्वी पर दूसरी ओर पड़े थे। दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, प्राणवायु बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। यज्ञ के धूम्र लगने से लाल-लाल आँखें आधी खुली हुई थीं और ये संज्ञा शून्य हुए चुपचाप पृथ्वी पर पड़े थे। इनकी ऐसी अवस्था देखकर सभी घबड़ा गये। मिश्र जी ने इनके मुँह में जल डाला। कई आदमी पंखे से हवा करने लगे।
क्रमशः

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