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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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नियत तिथि के दिन अपने स्नेही बन्धु-बान्धव तथा विद्यार्थियों के साथ बरात लेकर निमाई बल्लभाचार्य जी के घर गये। आचार्य ने सभी का यथोचित सम्मान किया। गोधूलि की शुभ लग्न में निमाई पण्डित ने लक्ष्मी देवी का पाणिग्रहण किया।
लक्ष्मी देवी ने काँपते हुए हाथों से इनके चरणों में माला अर्पण की और भक्तिभाव के साथ प्रणाम किया। इन्होंने उन्हें वामांग किया। हवन, प्रदक्षिणा, कन्यादान आदि सभी वैदिक कृत्य होने पर विवाह का कार्य सकुशल समाप्त हुआ। दूसरे दिन आचार्य से विदा होकर लक्ष्मी देवी के साथ पालकी में चढ़कर निमाई घर आये। माता ने सती स्त्रियों के साथ पुत्र और पुत्रवधू का स्वागत किया। ब्राह्मणों को तथा अन्य आश्रित जनों को यथायोग्य द्रव्य-दान किया गया। लक्ष्मी देवी का रंग-रूप निमाई के अनुरूप ही था। इस जुगल जोड़ी को देखकर पास-पड़ोस की स्त्रियाँ परम प्रसन्न हुईं। कोई तो इन्हें रति-कामदेव की उपमा देने लगी, कोइई-कोई शची-पुरन्दर कहकर परिहास करने लगी, कोई-कोई गौर-लक्ष्मी कहकर निमाई की ओर हँसने लगी। सुन्दरी पुत्रवधू के साथ पुत्र को देखकर माता को जो आनन्द प्राप्त हुआ उसका वर्णन करना इस लेखनी के बाहर की बात है।
चंचल पण्डित.....
मिश्री को कहीं से भी खाओ उसका स्वाद मीठा ही होगा, घी-बूरे का लड्डू यदि टेढ़ा और इरछा-तिरछा भी बना हो तो भी उसके स्वाद में कोई कमी नहीं होती। इसी प्रकार प्रेम किसी भी प्रकार किया जाय, कहीं भी किया जाय, किसी के भी साथ किया जाय उसका परिणाम अनिर्वचनीय सुख ही होगा। हृदय में दया के भाव हों, अन्तःकरण शुद्ध हो, अपने स्वार्थ की मन में वाञ्छा न हो, फिर चाहे दूसरों के साथ कैसा भी बर्ताव करो, उन्हें चाहे गले से लगाकर आलिंगन करो या उनकी मधुर-मधुर भर्त्सना करो, दोनों में ही सुख है, दोनों से ही आनन्द प्राप्त होता है।
निमाई अब विद्यार्थी नहीं हैं। अब उनकी गणना प्रसिद्ध पण्डितों में होने लगी है। अब वे गृहस्थी भी बन गये हैं और अध्यापक भी। ऐसी दशा में अब उन्हें गम्भीरता धारण करनी चाहिये जिससे लोग उनकी इज्जत-प्रतिष्ठा करें। किन्तु निमाई ने तो गम्भीरता का पाठ पढ़ा ही नहीं है। मानो वे संसार में सबसे बड़ी समझी जाने वाली मान-प्रतिष्ठा की कुछ परवाह ही नहीं रखते। ‘लोग हमारे इस व्यवहार से क्या सोचेंगे’ यह विचार उनके मन में आता ही नहीं। ‘लोगों को जो सोचना हो सोचते रहें। दुनियाभर के विचारों का हमने कोई ठेका थोडे़ ही ले लिया है। हमें तो जिसमें प्रसन्नता प्राप्त होगी, जिस काम से हमारा अन्तःकरण सुखी और शान्त होगा हम तो उसे ही करेंगे। लोग बकते हैं तो बकते रहें। हम किसी का मुँह थोड़े ही सी सकते हैं।’ बस, निमाई इन्हीं विचारों में मस्त रहते।
पाठशाला में विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। पढ़ाते-पढ़ाते बीच-बीच में ऐसी हँसी की बात कह देते हैं कि सभी खिलखिलाकर हँस उठते हैं। किसी लड़के को पाठ याद नहीं होता तो उसे आँखें निकालकर डाँटते नहीं। प्रेम के साथ कहते हैं, ‘भाई! तोते की तरह धुन लगा जाया करो। जैसे ‘अनद्यतने लुट्’ इसे बार-बार कहो।’ इतना समझाकर आप स्वयं सिर हिला-हिलाकर ‘अनद्यतने लुट्’ ‘अनद्यतने लुट्’ इस सूत्र को बार-बार पढ़ते। लड़के हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते। तब आप दूसरे विद्यार्थी को समझाने लगते। पाठ समाप्त हुआ और साथ ही विद्यार्थी और पण्डित का भाव भी समाप्त हो गया। अब सभी विद्यार्थियों को साथी समझकर उन्हें लेकर गंगा-किनारे पहुँच गये। कभी किसी के साथ शास्त्रार्थ हो रहा है, कभी गंगा जी की बालुका में कबड्डी खेली जा रही है, कभी जल-विहार का ही आनन्द छिड़ा हुआ है।निमाई स्वयं अपने हाथों से विद्यार्थियों के ऊपर पानी उलीचते हैं, विद्यार्थी भी सब भूल-भालकर उनके ऊपर पानी उलीच रहे हैं। कभी-कभी दस-पाँच मिलकर एक साथ ही निमाई के ऊपर जल उलीचने लगते हैं, निमाई पण्डित जल से घबड़ाकर जल्दी से जल से बाहर निकलकर भागते हैं, पैर फिसल जाने से वे जल में गिर पड़ते हैं, सभी ताली देकर हँसने लगते हैं। दर्शनार्थी दूर से देखते हैं और खुश होते हैं। बहुत-से ईर्ष्यावश आवाजें कसने लगते हैं- ‘वाह रे पण्डित! पण्डितों के नाम को भी कलंकित करते हो। विद्यार्थियों के साथ ऐसी खिलवाड़?’ कोई चंचल पण्डित कहता- ‘छोटी उम्र में अध्यापक बन जाने का यही कुपरिणाम होता है।’ किन्तु उनकी इन बातों पर कौन ध्यान देता है, निमाई अपने खेल में मस्त हैं। कौन क्या बक रहा है, इसका उन्हें पता भी नहीं। कभी-कभी दूर से ही पुचकारते हुए कह देते- ‘अच्छा, बेटा, भूकते रहो। कभी-न-कभी टुकड़ा मिल ही जायगा।’ स्नान करके रास्ते में जा रहे हैं, किसी ने किसी को किसी के ऊपर ढकेल दिया है, वह मोरी में गिर पड़ा है, सभी ताली देकर हँस रहे हैं।
किसी पण्डित को देखते ही बड़ी कठिन संस्कृत बोलने लगते हैं। एक साथ ही उससे दस-बीस प्रश्न कर डाले। बेचारा बगल में आसन दबाये चुपचाप भीगी बिल्ली की भाँति बिना कुछ कहे ही गंगा की ओर चला जाता है, इनसे बातें करने की हिम्मत ही नहीं होती। बाजार में भी चौकड़ी मारकर भागते हैं। कूद-कूदकर चलना तो इनका स्वभाव ही था। रास्ते भी बच्चों की तरह कुदककर चलते। किसी वैष्णव को देखते ही उसे घेर लेते और उससे जोर से प्रश्न करते ‘किं तावत् वैष्णवत्वम्’ ‘वैष्णवता किसे कहते हैं?’ कभी पूछते ‘ऊर्ध्वपुण्ड्रेन किं स्यात्’ ‘ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाने से क्या होता है?’ बेचारे वैष्णव हैरान हो जाते और इनसे जैसे-तैसे अपना पीछा छुड़ाकर भागते। वे कहते जाते- ‘घोर कलियुग आ गया। पण्डित भी वैष्णवों की निन्दा करने लगे।’ कोई कहता- ‘अजी इस निमाई को पण्डित कहता ही कौन है, यह तो रसिकशिरोमणि है, उद्दण्डता की सजीव मूर्ति है, इसका भी कोई धर्म-कर्म है?’ कोई कहता- इतना छिछोरपन ठीक नहीं।’ उन्हीं दिनों श्रीअद्वैताचार्य की पाठशाला में चटगाँवनिवासी मुकुन्ददत्त नामक एक विद्यार्थी पढ़ता था। वह परम वैष्णव था। उसके चेहरे से सौम्यता टपकती थी। उसका कण्ठ बड़ा ही मनोहर था। वह अद्वैताचार्य की सभा में पद-संकीर्तन किया करता था और अपने सुमधुर गान से भक्तों के चित्त को आनन्दित किया करता था।निमाई उससे मन-ही-मन बहुत स्नेह करते थे।
क्रमशः
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