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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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लक्ष्मीदेवी का स्वभाव बड़ा ही कोमल है, वे दिनभर घर का काम करती हैं ओर तनिक भी दुःखी नहीं होतीं।निमाई तो रसिकशिरोमणि हैं ही, वे दो-एक के साथ बिना भोजन करते ही नहीं, लक्ष्मी देवी सबके लिये आलस्यरहित होकर रन्धन करती हैं और अपने पति के साथ उनके प्रेमियों को भी उसी श्रद्धा के साथ भोजन कराती हैं। कभी-कभी घर में दस-दस, पाँच-पाँच अतिथि आ जाते हैं। वृद्धा माता को उनके भोजन की चिन्ता होती है, निमाई इधर-उधर से क्षणभर में सामान ले आते हैं और उसके द्वारा अतिथि-सेवा की जाती है। नगर में कोई भी नया साधु-वैष्णव आवे यदि उसके साथ निमाई का साक्षत्कार हुआ तो वे उसे भोजन के लिये नवद्वीप में ईश्वरपुरी जरूर निमन्त्रित करेंगे और अपने घर ले जाकर भिक्षा करावेंगे। ये सब कार्य ही तो उनकी महानता के द्योतक हैं। पाठक श्री मन्माधवेन्द्रपुरी जी के नाम से तो परिचित ही होंगे और यह भी स्मरण होगा कि उनके अन्तरंग और सर्वप्रिय शिष्य श्रीईश्वरपुरीजी थे। भक्तशिरोमणि श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस असार संसार को त्याग कर अपने नित्यधाम को चले गये- अन्तिम समय में उनके रूँधे हुए कण्ठ से यह श्लोक निकला था-

अति! दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे।
हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्।।

अर्थात ‘हे दीनों पर दया करने वाले मेरे नाथ! व्रजेशनन्दन! इन चिरकाल की पियासी आँखों से आपकी अमृतोपम मकरन्दमाधुरी का कब पान कर सकूँगा। हे नाथ! यह हृदय तुम्हारे दर्शन के लिये कातर हुआ चारों ओर बड़ी ही द्रुतगति से दौड़ रहा है। हे चंचल श्याम! मैं क्या करूँ?’ यह कहते-कहते उन्होंने इस पांच भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। अन्तिम समय में वे अपना सम्पूर्ण प्रेम श्रीईश्वरपुरी को अर्पण कर गये।

गुरुदेव से अमूल्य प्रेमनिधि पाकर ईश्वरपुरी तीर्थों में भ्रमण करते हुए गौड़ देश की ओर आये। इनका जन्मस्थान इसी जिले के कुमारहट्ट नामक ग्राम में था। ये जाति के कायस्थ थे, कोई-कोई इन्हें वैद्य भी बताते हैं, किन्तु वैष्णवों की जाति ही क्या? उनकी तो हरिजन ही जाति है, फिर संन्यास धारण करने पर तो जाति रहती ही नहीं। ये सदा श्रीकृष्ण प्रेम में उन्मत्त-से बने रहते थे। जिह्व से सदा मधुर श्रीकृष्ण नाम उच्चारण करते रहते और प्रेम में छके-से, उन्मत्त-से, अलक्षितरूप से देश में भ्रमण करते हुए भाग्यवानों को अपने शुभ दर्शनों से पावन बनाते फिरते थे, इसी प्रकार भ्रमण करते हुए ये नवद्वीप में भी आये और अद्वैत आचार्य के घर के समीप आकर बैठ गये। आचार्य देखते ही समझ गये, ये कोई परम भागवत वैष्णव हैं, उन्होंने इनका यथोचित सत्कार किया। परिचय प्राप्त होने पर तो आचार्य के आनन्द का ठिकाना ही न रहा। उने गुरुदेव के प्रधान और परम प्रिय शिष्य उनके गुरुतुल्य ही थे।आचार्य ने इनकी गुरुवत पूजा की और कुछ काल नवद्वीप में ही रहने का आग्रह किया। पुरी महाशय ने आचार्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वहीं उनके पास रहकर श्रीकृष्ण कथा और सत्संग करने लगे। नवद्वीप में रहते हुए महामहिम श्रीईश्वरपुरी ने निमाई पण्डित का नाम तो सुना था, किन्तु साथ ही यह भी सुना था कि वे बड़े भारी चंचल हैं, वैष्णवों से खूब तर्क-वितर्क करते हैं। इसलिये पुरी महाशय ने भेंट नहीं की। एक दिन अकस्मात निमाई की ईश्वरपुरीजी से भेंट हो गयी। संन्यासी समझकर निमाई पण्डित ने पुरी महाशय को प्रणाम किया। परिचय पाकर उन्हें परम प्रसन्नता हुई। पुरी महाशय तो उनके रूप-लावण्य को देखकर मन्त्र मुग्ध की भाँति एकटक दृष्टि से उनकी ही ओर देखते रहे। उन्होंने सिर से पैर तक निमाई को देखा, फिर देखा और फिर देखा।

इस प्रकार बार-बार उनके अद्भुत रूप-लावण्य और तेज को देखते, किन्तु उनकी तृप्ति ही नहीं होती थी। वे सोचने लगे ये तो कोई योगभ्रष्ट महापुरुष- से जान पड़ते हैं, इनके चेहरे पर कितना तेज है, हृदय की स्वच्छता, शुद्धता और प्राणिमात्र के प्रति ममता इनके चेहरे से प्रस्फुटित हो रही है। ये साधारण पुरुष कभी हो ही नहीं सकते। जरूर कोई प्रच्छन्न वेशधारी महापुरुष हैं। पुरी को एकटक अपनी ओर देखते देखकर हँसते हुए निमाई बोले- ‘पुरी महाशय! अब इस प्रकार कहाँ तक देखियेगा। आज हमारे ही घर भिक्षा कीजियेगा, वहाँ दिनभर हमें देखते रहने का सुअवसर प्राप्त होगा।’ यह सुनकर पुरी महाशय कुछ लज्जित-से हुए और उन्होंने निमाई का निमन्त्रण बड़े प्रेम से स्वीकार कर लिया। भोजन तैयार होने के पूर्व निमाई अद्वैताचार्य के घर से पुरी को लिवा ले गये। शची माता ने स्वामी जी की बहुत ही अधिक अभ्यर्चना की और उन्हें श्रद्धा-भक्ति के साथ भोजन कराया। भोजन के अनन्तर कुछ काल तक दोनों महापुरुषों में कुछ सत्संग होता रहा, फिर दोनों ही अद्वैताचार्य के आश्रम में आये।

अब तो निमाई पण्डित पुरी महाशय के समीप यदा-कदा आने लगे। उन दिनों पुरी महाशय ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना कर रहे थे। पुरी ने पण्डित समझकर इनसे उस ग्रन्थ के सुनने का आग्रह किया। गदाधर पण्डित के साथ सन्ध्या समय जाकर ये उस ग्रन्थ को रोज सुनने लगे। पुरी महाशय ने कहा- ‘आप पण्डित हैं, इस ग्रन्थ में जहाँ भी कहीं अशुद्धि हो, त्रुटि मालूम पड़े, वहीं आप बता दीजियेगा।’ इन्होंने नम्रता के साथ उत्तर दिया- ‘श्रीकृष्ण-कथा में भला क्या शुद्धि और क्या अशुद्धि।भक्त अपने भक्ति-भाव के आवेश में आकर जो भी कुछ लिखता है, वह परम शुद्ध ही होता है। जिस पद में भगवत-भक्ति है, जिस छन्द में श्रीकृष्ण-लीला का वर्णन है वह अशुद्ध होने पर भी शुद्ध है और जो काव्य श्रीकृष्ण-कथा से रहित है वह चाहे कितना भी ऊँचा काव्य क्यों न हो, उसकी भाषा चाहे कितनी बढि़या क्यों न हो, वह व्यर्थ ही है। भगवान तो भावग्राही हैं, वे घट-घट की बातें जातने हैं। बेचारी भाषा उनकी विरदावली का बखान कर ही क्या सकती है, उनकी प्रसन्नता में तो शुद्ध भावना ही मुख्य कारण है। यथा-

मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
उभयोस्तु शुभं पुण्यं भावग्राही जनार्दनः।।

अर्थात मूर्ख कहता है ‘विष्णाय नमः’ और विद्वान कहते हैं ‘विष्णवे नमः’ परिणाम में इन दोनों का फल समान ही है। क्योंकि भगवान जनार्दन तो भावग्राही हैं।
क्रमशः

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