cc 48
श्री श्री चैतन्य चरितावली
48-
निमाई कुछ कहने ही को थे कि उनके समीप बैठे हुए एक योग्य छात्र ने कहा- ‘ये यहाँ के विख्यात अध्यापक निमाई पण्डित हैं।’
प्रसन्नता प्रकट करते हुए दिग्विजयी ने निःसंकोचभाव से उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘ओहो! निमाई पण्डित आपका ही नाम है? आपकी तो हमने बड़ी भारी प्रशंसा सुनी है। आप तो यहाँ के वैयाकरणों में सिरमौर समझे जाते हैं। हाँ, आप ही कोई व्याकरण की पंक्ति सुनाइये।’ हाथ जोड़े हुए नम्रतापूर्वक निमाई पण्डित ने कहा- ‘यह तो आप-जैसे गुरुजनों की कृपा है, मैं तो किसी योग्य भी नहीं। भला, आपके सामने मैं सुना ही क्या सकता हूँ, मैं तो आपके शिष्यों के शिष्य होने के योग्य भी नहीं। आपने संसार को अपनी विद्या-बुद्धि से दिग्विजय किया है। आपके कवित्व की बड़ी भारी प्रशंसा सुनी है। यह छात्र-मण्डली आपके कवित्व के श्रवण करने के लिये बड़ी उत्सुक हो रही है। कृपा करके आप ही अपनी कोई कविता सुनाने की कृपा कीजिये।’
यह सुनकर दिग्विजयी पण्डित हँसने लगे। पास के दो-चार विद्यार्थियों ने कहा- ‘हाँ, महाराज! हम लोगों की इच्छा को जरूर पूर्ण कीजिये। हम सभी लोग बहुत उत्सुक हैं आपकी कविता सुनने के लिये।’ अब तक दिग्विजयी को नदिया में अपनी अलौकिक प्रतिभा और लोकोत्तर कवित्व-शक्ति के प्रकाशित करने का सुअवसर प्राप्त ही नहीं हुआ था। उसे प्रकट करने का सुअवसर समझकर उन्होंने कुछ गर्व मिली हुई प्रसन्नता के साथ कहा- ‘तुम लोग जो सुनना चाहते हो, वही सुनावें।’
इस पर निमाई पण्डित ने धीरे से कहा- ‘कुछ भगवती भागीरथी की महिमा का ही बखान कीजिये जिससे कर्ण भी पवित्र हों और काव्यामृत का भी रसास्वादन हो।’ इतना सुनते ही दिग्विजयी धारा-प्रवाह से गंगा जी के महत्त्व के श्लोक बोलने लगे। सभी श्लोक नवीन ही थे, वे तत्क्षण नवीन श्लोकों की रचना करते जाते और उन्हें उसी समय बोलते जाते। उन्हें नवीन श्लोक बनाने में न तो प्रयास करना पड़ता था, न एक श्लोक के बाद ठहरकर कुछ सोचना ही पड़ता था। जैसे किसी को असंख्य श्लोक कण्ठस्थ हों और वह जिस प्रकार जल्दी-जल्दी बोलता जाय, उसी प्रकार दिग्विजयी श्लोक बोल रहे थे। सभी विद्यार्थी विस्मितभाव से एकटक होकर दिग्विजयी की ओर आश्चर्यभाव से देख रहे थे। सभी के चेहरों से महान आश्चर्य- अद्भुत संभ्रम-सा प्रकट हो रहा था, उन्होंने इतनी विद्या-बुद्धिवाला पुरुष आज तक कभी देखा ही नहीं था।
विद्यार्थियों के भावों को समझकर दिग्विजयी मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न होते जाते थे और दूने उत्साह के साथ चमक और अनुप्रासयुक्त श्लोकों को सुमधुर कण्ठ से बोलते जाते थे। एक घड़ी भी नहीं हुई कि वे सौ से अधिक श्लोक बोलकर चुप हो गये। घाट पर सन्नाटा छा गया। गंगा जी का कलरव बंद हो गया, मानो इतनी उतावली गंगा माता भी दिग्विजयी के लोकोत्तर काव्य-रस से प्रवाहित होकर उसे अपने प्रवाह में मिलाने के लिये कुछ काल के लिये ठहर गयी हो। उस नीरवता को भंग करते हुए मधुर और गम्भीर स्वर में निमाई पण्डित बोले- ‘महाराज! हम सब लोग आज आपकी अमृतमयी वाणी सुनकर कृतार्थ हुए।
हमने ऐसा अपूर्व काव्य कभी नहीं सुना था, न आप-जैसे लोकोत्तर कवि के ही कभी दर्शन किये थे। आपके काव्य को आप ही समझ भी सकते हैं। दूसरे की क्या सामर्थ्य है, जो ऐसे सुललित काव्य को यथावत समझ ले। इसलिये इनमें से किसी एक श्लोक की व्याख्या और गुण-दोष हम और सुनना चाहते हैं।’ कुछ गर्व के साथ हँसते हुए दिग्विजयी ने कहा- ‘केशव की कमनीय कविता में दोष तो दृष्टिगोचर हो ही नहीं सकते। हाँ, व्याख्या कहो तो कर दूँ। बताओ किस श्लोक की व्याख्या चाहते हो’ यह बात दिग्विजयी ने निमाई पण्डित को युक्ति से चुप करने के ही लिये कह दी थी। वे समझते थे मेरे सभी श्लोक नवीन हैं, मैं जल्दी-जल्दी में उन्हें बोलता गया हूँ, ये उनमें से किसी को बता ही न सकेंगे, इसलिये यह बात यहीं समाप्त हो जायगी। किन्तु निमाई भी कोई साधारण पण्डित नहीं थे।दिग्विजयी यदि भगवती के वर से कविवर हैं, तो ये भी श्रुतिधर हैं। झट से आपने अपने कोमल कण्ठ से यह श्लोक पढ़ा-
महत्त्वं गंगायाः सततमिदमाभाति नितरां
यदेषा श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा।
द्वितीयश्रीलक्ष्मीरिव सुरनरैरर्च्यचरणा।
भवानीभर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुतगुणा।
इस श्लोक को बोलकर आपने कहा- ‘इसकी व्याख्या और गुण-दोष कहिये।’ निमाई के मुख से अपने श्लोक को यथावत सुनकर दिग्विजयी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, उनका मुख फीका पड़ गया। सभी एकटक होकर निमाई की ओर देखने लगे, मानो दिग्विजयी की श्री, प्रतिभा, कान्ति और प्रभा निमाई के पास आ गयी हो। कुछ बनावटी उपेक्षा-सी करते हुए कहा- ‘आप बड़े चतुर हैं, मैं इतनी जल्दी-जल्दी श्लोक बोलता था, उनके बीच में से आपने श्लोक को कण्ठस्थ भी कर लिया। निमाई ने धीरे से नम्रतापूर्वक कहा- ‘सब आपकी कृपा है, कृपया इस श्लोक की व्याख्या और गुण-दोष सुनाइये।’
दिग्विजयी ने कहा- ‘यह अलंकार का विषय है, तुम वैयाकरण हो, इसे क्या समझोगे?’
इन्होंने नम्रता के साथ कहा- ‘महाराज! हमने अलंकार-शास्त्र का यथावत अध्ययन नहीं किया है तो उसे सुना तो अवश्य है, कुछ तो समझेंगे ही। फिर यहाँ अलंकार-शास्त्र के ज्ञाता बहुत-से छात्र तथा पण्डित भी बैठे हुए हैं, उन्हें ही आनन्द आवेगा।’ अब दिग्विजयी अधिक टालमटोल न कर सके, वे अनिच्छापूर्वक बेमन से श्लोक की व्याख्या करने लगे। व्याख्या के अनन्तर उपमालंकार और अनुप्रासादि गुण बताकर दिग्विजयी चुप हो गये। तब निमाई पण्डित ने बड़ी नम्रता के साथ कहा- ‘आज्ञा हो और आप अनुचित न समझें तो मैं भी इस श्लोक के गुण-दोष बता दूँ?’ मानो क्रुद्ध सर्प पर किसी ने पाद-प्रहार कर दिया हो, संसार विजयी सरस्वती के वर प्राप्त दिग्विजयी पण्डित के श्लोक में यह युवक अध्यापक दोष निकालने का साहस करता है, उन्होंने भीतर के दोष से बनावटी प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘अच्छा बताओ, श्लोक में क्या गुण-दोष हैं?’
निमाई पण्डित अब श्लोक की व्याख्या करने लगे। उन्होंने कहा- ‘श्लोक बड़ा ही सुन्दर है, वैसे लगाने से तो सैकड़ों गुण-दोष निकल सकते हैं, किन्तु मुख्यरूप से इसमें पाँच गुण हैं और पाँच दोष हैं।’
क्रमशः
Comments
Post a Comment