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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उस समय तो लोग उन्हें नहीं जाते, ज्यों-ज्यों उनके जीवन में प्रकाश होने लगता है त्यों-ही-त्यों उन पुरानी बातों में भी रस भरता जाता है। निमाई अलौकिक बालक थे। उनकी लीलाएँ भी बड़ी मधुर और साधारण बालकों की भाँति होने पर भी परम अलौकिक थीं। पाठक स्वयं समझ लेंगे कि 3-4 वर्ष की अवस्था के बालक की कितनी गूढ़-गूढ़ बातें होती थीं।
एक दिन माता ने देखा, निमाई एकदम नंगा है। इधर-उधर से चीरें उठाकर लपेट ली है। सम्पूर्ण शरीर में धूलि लपेटे हुए है। एक घूरे पर अशुद्ध हाँड़ियों पर आप बैठे हैं। हाँड़ियों में से कारिख लेकर मुँह और माथे पर काली-काली लम्बी-लम्बी रेखाएँ खींच ली हैं। शरीर में जगह-जगह काली बिंदी लगा ली है। एक फूटी हाँड़ी को खपड़े से बजा-बजाकर आप कुछ गा रहे हैं। सुवर्ण-जैसे शरीर पर भस्म के ऊपर काली-काली बिंदी बहुत ही भली मालूम होती थी। जो भी उधर से निकलता वही उस अद्भुत स्वाँग को देखने के लिये खड़ा हो जाता। निमाई अपने राग में मस्त थे, उन्हें दीन-दुनिया का कुछ भी पता नहीं। किसी ने जाकर यह समाचार शचीमाता को सुनाया। माता दौड़ी-दौड़ी आयीं और दो-चार मीठी-मीठी प्रेमयुक्त कड़ी बातें कहकर डाँटने लगीं- ‘निमाई! तू अब बहुत बदमाशी करने लगा है। भला ब्राह्मण के बेटे को ऐसे अपवित्र स्थान में बैठना चाहिये?’
आपने कहा- ‘अम्मा! स्थान का क्या अपवित्र ओर क्या पवित्र? स्थान तो सभी एक-से हैं। हाँ, जो स्थान हरि-सेवा-पूजा से हीन हो वहाँ बैठना ठीक नहीं। इन हाँड़ियों में तो मैंने भगवान का प्रसाद बनाया है। भला, फिर ये हाँड़ियाँ अपवित्र कैसे हुई?’

माता ने डाँटकर कहा- ‘बहुत ज्ञान मत छाँट, जल्दी से उठकर स्नान कर ले।’

निमाई भला कब उठने वाले थे? वे तो वहीं डटे रहे और फिर वही अपना पुराना राग अलापने लगे। माता ने जब देखा वह किसी भी तरह नहीं उठता, तो स्वयं जाकर इनका हाथ पकड़कर उठा लायीं और घर में आकर इन्हें स्नान कराया और स्वयं स्नान किया।

इसी प्रकार से सभी बालोचित लीलाएँ करते। कभी किसी कुत्ते के बच्चे को पकड़ लाते और उसे दूध-भात खिलाते। दिनभर उसे बाँधे रखते। माता यदि उसे भगा देती तो खूब रोते। कभी पक्षियों को पकड़ने को दौड़ते ओर कभी गौ के छोटे बच्चे के साथ खेलते और उससे धीरे-धीरे न जाने क्या-क्या बातें करते। सबके घरों में बिना रोक-टोक चले जाते। कोई कहती- ‘निमाई! तुझे हम सन्देश दें, जरा नाच तो दे।’ तब आप कहते- ‘पहले सन्देश (मिठाई) दो, तब नाचेंगे।’ वे सन्देश-लड्डू-पेड़े इन्हें दे देतीं। ये उसी समय कुछ मुँह में भर लेते, शेष को हाथ में लेकर ऊपर हाथ उठा-उठाकर खूब नाचते। इस प्रकार ये घर-घर जाकर खूब नाच दिखाते और खाने के लिये खूब माल पाते। स्त्रियाँ इन्हें बहुत प्यार करतीं। कोई केला देती, कोई मेवा देती, कोई मिठाई देती। ये सबसे ले लेते, स्वयं खाते ओर अपने साथियों को बाँट देते। इस प्रकार ये सभी के मन को अपनी ओर आकर्षित करने लगे और नर-नारियों को परम सुख देने लगे।

एक दिन ये बाहर से दौड़े-दौड़े आये ओर जल्दी से माता से बोले- ‘अम्मा! अम्मा! बड़ी भूख लग रही है, कुछ खाने के लिये हो तो दे।’

माता ने कहा- ‘बेटा! बैठ जा। अभी दूध-चिउरा लाती हूँ, उन्हें तब तक खा ले फिर झट से भात बनाऊँगी।’ यह कहर माता ने भीतर से लाकर एक कटोरे में दूध-चिउरा इन्हें दिया। माता तो देकर भीतर चली गयीं।, ये दूध-चिउरा न खाकर पास में पड़ी मिट्टी को खाने लगे। माता ने जब आकर देखा कि निमाई तो मिट्टी खा रहा है, तब वे जल्दी से कहने लगीं- ‘अरे निमाई! तू यह क्या कर रहा है? मिट्टी क्यों खाता है?
आपने भोली सूरत बनाकर कहा- ‘अम्मा! तैने भी तो मुझे मिट्टी लाकर दी है। मिट्टी ही मैं खा रहा हूँ’। माता ने कहा- ‘मैंने तो तुझे दूध-चिउरा दिया है, उसे न खाकर तू मिट्टी खा रहा है।’

आपने कहा- ‘माँ! यह सब मिट्टी ही तो है। सभी पदार्थ मिट्टी के ही विकार हैं।’ माता इस मूढ़ ज्ञान को समझ गयी। पुचकारकर बोलीं- ‘बेटा! है तो सब मिट्टी ही किन्तु काम सबका अलग-अलग है। घड़ा भी मिट्टी है, रेत भी मिट्टी है। घडे़ में पानी भरकर लाते हैं, तो वह रखा रहता है और रेत में पानी डालें तो वह सूख जायगा। इसलिये सबके काम अलग-अलग हैं।’

आपने मुँह बनाकर कहा- ‘हाँ, ऐसी बात है? तब हमें तैंने पहले से क्यों नहीं बताया, अब ऐसा न किया करेंगे। अब कभी मिट्टी न खायेंगे। भूख लगने पर तुझसे ही माँग लिया करेंगे।’  

इस प्रकार भाँति-भाँति की क्रीड़ाओं के द्वारा निमाई माता को दिव्य सुख का आस्वादन कराने लगे। माता इनकी भोली और गूढ़ ज्ञान से सनी हुई बातें सुन-सुनकर कभी तो आश्चर्य करने लगतीं, कभी आनन्द के सागर में गोता लगाने लगतीं।

बाल-लीला.......

निमाई की सभी लीलाएँ दिव्य हैं। अन्य साधारण बालकों की भाँति वे चंचलता और चपलता तो करते हैं, किन्तु इनकी चंचलता में एक अलौकिक भाव की आभा दृष्टिगोचर होती है। जिसके साथ ये चपलता करते हैं, उसे किसी भी दशा में इनके ऊपर गुस्सा नहीं आता, प्रत्युत वह प्रसन्न ही होता है। ये चंचलता की हद कर देते हैं, जिस बात के लिये मना किया जाय, उसे ही ये हठपूर्वक बार-बार करेंगे- यही इनकी विशेषता थी। इन्हें अपवित्र या पवित्र किसी भी वस्तु से राग या द्वेष नहीं। इनके लिये सब समान ही है। एक दिन की बात है कि निमाई के पिता पण्डित जगन्नाथ मिश्र गंगास्नान करके घर लौट रहे थे। उन्होंने अपने घर के समीप एक परेदशी ब्राह्मण को देखा। देखने से वह ब्राह्मण किसी शुभ तीर्थ का प्रतीत होता था। उसके चेहरे पर तेज था, माथे पर चन्दन का तिलक था ओर गले में तुलसी की माला थी। मुख से प्रतिक्षण भगवन्नाम का जप कर रहा था।
मिश्र जी ने ब्राह्मण को देखकर नम्रतापूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया और अपने यहाँ आतिथ्य स्वीकार करने की प्रार्थना की।
क्रमशः

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