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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इसी प्रकार ये जिस काम को देखते उसी की नकल करते। इनके चांचल्य से कभी-कभी बड़ी हँसी होती। एक दिन मिश्र जी के साथ ये गंगा-स्नान करने गये। स्नान करने के अनन्तर मिश्र जी प्रायः पास के भगवान के मन्दिर में दर्शन करने जाया करते थे। ये भी शाम के समय कभी-कभी बालकों के साथ उसमें आरती देखने और प्रसाद लेने चले जाते थे। आज दोपहर को भी ये मिश्र जी के साथ मन्दिर में चले गये। मिश्रजी ने जिस प्रकार साष्टांग प्रणाम किया उसी प्रकार इन्होंने भी किया। उन्होंने प्रदक्षिणा की तब ये भी प्रदक्षिणा करने लगे। पिता जी को हाथ बाँधे देखकर इन्होंने भी हाथ जोड़ लिये और इधर-उधर देखते-भालते हाथ जोड़े जगमोहन में बैठ गये। पुजारी जी ने मिश्रजी को चम्मच में थोड़ा केसर-कपूर-मिश्रित प्रसादी चन्दन दिया। इनका ध्यान तो उस तरफ था ही नहीं, ये तो न जाने किस चीज को देख रहे थे। पुजारीजी ने थोड़ा-सा चन्दन इन्हें भी दिया। इन्होंने पंचामृत की तरह दोनों हाथ फैलाकर चन्दन को ग्रहण किया और चट से उसे खा गये। पुजारी जी तथा मिश्र जी यह देखकर हँसने लगे। कडुवा लगने से वे वहीं थू-थू करने लगे और गुस्सा दिखाते हुए बोले- ‘यह कड़वा-कड़वा प्रसाद पुजारी जी ने न जाने आज कहाँ से दे दिया?’

मिश्र जी ने हँसते हुए कहा- ‘बेटा, यह प्रसादी चन्दन है! इसे खाते नहीं हैं मस्तक पर लगाते हैं।’ आपने मुँह बनाकर कहा- ’तब आपने मुझे पहले से यह बात क्यों नहीं बतायी थी?’ पुजारी जी ने जल्दी से इन्हें एक पेड़ा दिया उसे पाकर ये खुश हो गये। घर आकर माता जी से इन्होंने सभी बातें कह दीं। अब तो ये अकेले गंगा जी पर चले जाते और वहाँ घण्टों खेला करते। दो-दो, तीन-तीन बार स्नान करते। बालू के लड्डू बना-बनाकर अपने साथ के लड़कों को मारते, गंगा जी में से पत्र-पुष्प निकाल-निकालकर उनसे बालू में बाग बनाते और नाना प्रकार की बाल-लीलाएँ करते। मिश्र जी इन्हें बहुत समझाते कि बेटा! कुछ पढ़ना भी चाहिये, किन्तु ये उनकी बातों पर ध्यान ही न देते और दिनभर बालकों के साथ खेला ही करते। एक दिन मिश्रजी को इन पर बड़ा गुस्सा आया, ये इन्हें पीटने के लिये गंगा-किनारे गये। शचीदेवी भी मिश्रजी को क्रोध में जाते देखकर गंगा-किनारे के लिये उनके पीछे-पीछे चल दीं। वहाँ पर ये बच्चों के साथ खूब उपद्रव कर रहे थे।मिश्र जी तो गुस्से में भरे ही हुए थे, इन्हें उपद्रव करते देखकर वे आपे से बाहर हो गये और इन्हें पकड़ने के लिये दौडे़। ये भी बड़े चालाक थे, पिता को गुस्से में अपनी ओर आते देखकर ये खूब जोर से घर की तरफ भागे। रास्ते में माता मिल गयीं। झट से ये उनसे जाकर लिपट गये। माता ने इन्हें गोद में उठा लिया, ये उनके अंचल से मुँह छिपाकर लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगे। माता कहती थी- 'तू बहुत उपद्रव करता है, किसी की बात मानता ही नहीं, आज तेरे पिता तुझे खूब पीटेंगे।’ इतने में ही मिश्र जी भी आ गये, वे बाँह पकड़कर इन्हें शचीदेवी की गोद में से खींचने लगे। माता चुपचाप खड़ी थीं। इसी बीच और भी 10-5 आदमी इधर-उधर से आ गये। सभी मिश्रजी को समझाने लगे- 'अभी बच्चा है, समझता नहीं। धीरे-धीरे पढ़ने लगेगा। आपको पण्डित होकर बच्चे पर इतना गुस्सा न करना चाहिये।’

सब लोगों के समझाने पर मिश्र जी का गुस्सा शान्त हुआ। पीछे उन्हें अपने इस कृत्य पर पश्चात्ताप भी हुआ। कहते हैं, एक दिन रात्रि के समय स्वप्न में किसी महापुरुष ने इनसे कहा- 'पण्डित जी! आप अपने पुत्र को साधारण पुरुष ही न समझें। ये अलौकिक महापुरुषहैं। इनकी इस प्रकार भर्त्सना करना ठीक नहीं।’ स्वप्न में ही मिश्र जी ने उत्तर दिया- 'ये चाहे महापुरुष हों या साधारण पुरुष, जब ये हमारे यहाँ पुत्ररूप में प्रकट हुए हैं, तो हमें इनकी भर्त्सना करनी ही पड़ेगी। पिता का धर्म है कि पुत्र को शिक्षा दे। इसीलिये शिक्षा देने के निमित्त हम ऐसा करते हैं।’ दिव्य पुरुष ने फिर कहा- 'जब ये स्वयं सब कुछ सीखे हुए हैं और इन्हें अब किसी भी शास्त्र के सीखने की आवश्यकता नहीं, तब आप इन्हें व्यर्थ क्यों तंग करते हैं?’
इस पर इन्होंने कहा- ‘पिता का तो यही धर्म है, कि वह पुत्र को सदा शिक्षा ही देता रहे। फिर चाहे पुत्र कितना भी गुणी तथा शास्त्रज्ञ क्यों न हो। मैं अपने धर्म का पालन अवश्य करूँगा और आवश्यकता होने पर इनको दण्ड भी दूँगा।’ महापुरुष इनसे प्रसन्न होकर अन्तर्धान हो गये। प्रातःकाल ये इस बात पर सोचते रहे। कालान्तर में वे इस बात को भूल गये। इनकी अवस्था ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी त्यों-ही-त्यों इनकी कान्ति और भी दिव्य प्रतीत होने लगी। ये शरीर से खूब हृष्ट-पुष्ट थे। शरीर के सभी अंग सुगठित और मनोहर थे। शरीर में इतना बल था कि 4-4, 5-5 लड़के मिलकर भी इनको पराजित नहीं कर सकते थे। इनके चेहरे से चंचलता सदा छिटकती रहती। जो भी इन्हें देखता खुश हो जाता और साथ ही सचेष्ट भी हो जाता कि कहीं हमसे भी कोई चंचलता न कर बैठें। रास्ते में ये सदा कूदकर चलते।सीढि़यों से गंगा जी में उतरना हो तो सदा एक-दो सीढ़ी छोड़कर ही कूदते-कूदते उतरें। रास्ते में दो-चार लड़कों को खेलते देखकर ये किसी दूसरे को उनके ऊपर ढकेल देते और फिर बड़े जोरों से हँस पड़ते। गंगा-किनारे पर छोटी-छोटी कन्याएँ पूजा की सामग्री लेकर देवी तथा गंगा जी की पूजा करने जातीं। आप उनके पास पहुँच जाते और कहते- 'सब नैवेद्य हमें चढ़ाओ, हम तुम्हें मनोवान्छित वर देंगे।’ छोटी-छोटी कन्याएँ इनके अपूर्व रूप-लावण्य को देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हो जातीं और इन्हें बहुत-सी मिठाई खाने को देतीं। ये उन्हें वरदान देते। किसी से कहते- 'तुम्हें खूब रूपवान सुन्दर पति मिलेगा।’ किसी से कहते ’तुम्हारा विवाह बड़े भारी धनिक के यहाँ होगा।’ किसी से कहते 'तुम्हारे पाँच बच्चे होंगे।’ किसी को सात, किसी को ग्यारह बच्चों का वरदान देते।
क्रमशः

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