cc23

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
23-

कन्याएँ सुनकर झूठा रोष दिखाते हुए कहतीं- 'निमाई! तू हमसे ऐसी बातें किया करेगा तो फिर हम तुझे मिठाई न देंगी।’ बहुत-सी कन्याएँ अपना नैवेद्य छिपाकर भाग जातीं तब ये उनसे हँसते-हँसते कहते- ’भले ही भाग जाओ मुझे क्या, तुम्हें काना पति मिलेगा। धनिक भी होगा तो महा कंजूस होगा। 5-5 सौत घर में होंगी, लड़की-ही-लड़की पैदा होंगी। यह सुनकर सभी लड़कियाँ हँसने लगतीं और इन्हें लौटकर मिठाई दे जातीं। किसी से कहते- हमारी पूजा करो, हम ही सबके प्रत्यक्ष देवता हैं। कभी-कभी मालाएँ उठा-उठाकर गले में डाल लेते। स्त्रियों के पास चले जाते और उन्हें पूजन करते देख कहते- 'हरि को भजे तो लड़का होय। जाति पाँति पूछै ना कोय।’ यह सुनकर स्त्रियाँ हँसने लगतीं। जो इनकी गाँव-नाते से भाभी या चाची होतीं वे इन्हें खूब तंग करतीं और खाने को मिठाई देतीं। इन्हीं लड़कियों में लक्ष्मी देवी भी पूजा करने आया करती थी। वह बड़ी ही भोली-भाली लड़की थी। निमाई के प्रति उसका स्वाभाविक ही स्नेह था। पूर्व-जन्मों के संस्कार के कारण वह निमाई को देखते ही लज्जित हो जाती और उसके हृदय में एक अपार आनन्द-स्त्रोत उमड़ने लगता। ये सब लड़कियों के साथ उसे भी देखते, किन्तु इससे कुछ भी नहीं कहते थे, न कभी इससे मिठाई ही माँगी। इसलिये लक्ष्मीदेवी की हार्दिक इच्छा थी कि कभी ये मेरा भी नैवेद्य स्वीकार करें। किन्तु बिना माँगे देने में न जाने क्यों उसे लज्जा लगती थी। एक दिन लक्ष्मीदेवी को पूजा के लिये जाती देखकर आपने उससे कहा- 'तू हमारी ही पूजा कर।’ यह सुनकर भोली-भाली कन्या बड़ी ही श्रद्धा के साथ इनकी पूजा करने लगी। छोटी-छोटी, पतली-पतली उँगलियों से काँपते हुए उसने निमाई के मस्तक पर चन्दन चढ़ाया, अक्षत लगाये, माला पहनायी, नैवेद्य समर्पण किया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया।निमाई ने आशीर्वाद दिया- 'तुम्हें देवतुल्य रूपवान तथा गुणवान पति प्राप्त हो।’ यह सुनकर बेचारी कन्या लज्जा के मारे जमीन में गड़-सी गयी और जल्दी वहाँ से भाग आयी। कालान्तर में इन्हीं लक्ष्मीदेवी को निमाई की प्रथम धर्मपत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये अपने साथ के सभी लड़कों में सरदार समझे जाते थे। चंचलता तो मानो इनकी नस-नस में भरी हुई थी। नटखटप ने में इनसे बढ़कर दूसरा बालक नहीं था। सभी लड़के इनसे अत्यधिक स्नेह करते, मानो ये बाल सेना के सर्वप्रधान सेनापति थे। लड़के इनका इशारा पाते ही कर्तव्य-अकर्तव्य सभी प्रकार के काम कर डालते। बालकपन से ही इनमें यह मोहिनी विद्या थी कि जो एक बार इनके साथ रह गया, वह सदा के लिये इनका गुलाम बन जाता था। इसलिये ये अपने सभी साथियेां को लेकर गंगा-किनारे भाँति-भाँति की बाल क्रीड़ाएँ करते। इन्हें स्त्री-पुरुषों को तंग करने में बड़ा मजा आता था। कभी-कभी ये बहुत से बालू के छोटे-छोटे लड्डू बनवाते। सभी की झोलियों में दस-दस, बीस-बीस लड्डू भर देते और एक ओर खडे़ हो जाते।
गंगा-स्नान करके जो भी निकलता सभी एक साथ तड़ातड़ बालू के लड्डू उनके ऊपर फेंकते और जल्दी से फेंककर भाग जाते। कभी-कभी किसी की सूखी धोती लेकर गंगा जी में डुबो देते। कभी ऐसा करते कि जहाँ दस-पाँच आदमी बैठे हुए बातें करते होते तो ये उनके पास जा बैठते और धीरे से एक के वस्त्र से दूसरे के वस्त्र को बाँध देते। जब वे स्नान करने को उठते तो एक-दूसरे को अपनी ओर खींचता। कभी-कभी वस्त्र भी फट जाता। ये अपने साथियों के साथ अलग खडे़ हुए ताली बजा-बजाकर खूब जोरों से हँसते, सभी लोग हँसने लगते, बेचारे वे लज्जित हो जाते।
कभी लड़कों के साथ घण्टों स्नान करते रहते। एक-दूसरे के ऊपर घण्टों पानी उलीचते रहते। किसी को कच्छप बनाकर आप उसके ऊपर चढ़ जाते। कभी धोती में हवा भरकर उसके साथ गंगा जी के प्रवाह की ओर बहते और कभी उस धोती के फूले हुए गुब्बारे में से हवा के बुलबुले निकालते। स्त्रियों के घाटों पर चले जाते, वहाँ पानी में बुड़की लगाकर कछुए का रूप बना लेते और स्नान करने वाली स्त्रियों के पैर डुबकी माकर पकड़ लेते। स्त्रियाँ चीत्कार मारकर बाहर निकलतीं तब ये हँसते-हँसते जल के ऊपर आते और सबसे कहते- ’देखो हम कैसे कछुए बने।’ स्त्रियाँ मधुर-मधुर भर्त्सना करतीं और कहतीं- 'जू आज घर चल, मैं तेरी माँजी से सब शिकायत करूँगी। मिश्र जी तुझे मारते-मारते ठीक कर देंगे।’ कोई कहतीं। 'इतना दंगली लड़का तो हमने कोई नहीं देखा। यह तो हद कर देता है।हमारे लड़के भी तो इसने बिगाड़ दिये। वे हमारी बातें मानते ही नहीं।’ कोई कहती न जाने वीर! इस छोकरे में क्या जादू है, इतना उपद्रव करता है, फिर भी यह मुझे बहुत प्यारा लगता है’ इस बात का सभी समर्थन करतीं। स्त्रियों की ही भाँति पुरुष भी इनके भाँति-भाँति के उपद्रवों से तंग आ गये। बहुतों ने जाकर इनके पिता से शिकायत की। स्त्रियाँ भी शचीमाता के पास जा-जाकर मीठा उलाहना देने लगीं। शचीदेवी सभी की खुशामद करतीं और विनय के साथ कहतीं- 'अब मैं क्या करूँ, तुम्हारा भी तो वह लड़का है। बहुत मना करती हूँ, शैतानी नहीं छोड़ता, तुम उसे खूब पीटा करो।’ स्त्रियाँ सुनकर हँस पड़तीं और मन-ही-मन खुश होकर लौट जातीं।

एक दिन कई पण्डितों ने जाकर निमाई की मिश्र जी से शिकायत की और कहा 'अभी जाकर देख आओ तब तुम्हें पता चलेगा कि वह कितना उपद्रव करता है।’ यह सुनकर मिश्र जी गुस्से में भरकर गंगा-किनारे चले। किसी ने यह संवाद जाकर निमाई से कह दिया। निमाई जल्दी से दूसरे रास्ते होकर घर पहुँचे और अपने शरीर पर खड़ी आदि लगाकर माता से बोले- 'अम्मा! मुझे तैल दे दे मैं गंगा-स्नान कर आऊँ।’ माता ने कहा- ‘अभी तक तैंने स्नान नहीं किया क्या?’ आपने कहा ’अभी स्नान कहाँ किया। तू जल्दी से मुझे तैल और धोती दे दे।’ यह कहकर आप तैल हाथ में लेकर और धोती बगल में दबाकर गंगा जी की ओर चले।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90