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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उधर मिश्र जी ने गंगा जी के किनारे जाकर बच्चों से पूछा ’यहाँ निमाई आया था क्या?’ बच्चे तो पहले से ही सिखाये-पढ़ाये हुए थे। उन्होंने कहा ’आज तो निमाई इधर आया ही नहीं।’
यह सुनकर मिश्र जी घर की ओर लौटने लगे। घर से निकलते हुए बगल में धोती दबाये निमाई मिले। मिश्र जी ने कहा- ’तू इतना दंगल क्यों किया करता है?’ आपने जोर से कहा ’न जाने क्यों लोग हमारे पीछे पड़ गये हैं? यही बात अम्मा कहती थीं कि स्त्रियाँ तेरी बहुत शिकायत करती थीं। मैं तो अभी पढ़कर आ रहा हूँ। अब तक गंगा जी की ओर गया ही नहीं। यदि ये हमारी झूठी शिकायतें आ-आकर करते हैं तो अब हम सत्य ही किया करेंगे।’ मिश्र जी चुप हो गये और ये हँसते-हँसते गंगा जी की और स्नान करने चले गये। लड़कों में जाकर अपनी चालाकी का सभी वृत्तान्त सुनाया। लड़के सुनकर खूब जोर से हँसने लगे।इस प्रकार इनकी अवस्था 5 वर्ष की हो गयी। माता-पिता को इनकी इस चांचल्य-वृत्ति से बहुत ही आनन्द प्राप्त होता। विश्वरूप इनसे 11-12 वर्ष बड़े थे, किन्तु वे जन्म से ही बहुत अधिक गम्भीर थे, इसलिये पिता भी उनका बहुत आदर करते थे। अब तो उनकी अवस्था 16 वर्ष की हो चली थी, इसलिये 'प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्’ अर्थात पुत्र जब 16 वर्ष का हो जाय तो उससे मित्र की भाँति व्यवहार करना चाहिये, इस सिद्धान्तानुसार मिश्र जी उनके प्रति पण्डित का-सा व्यवहार करते।
एक दिन माता ने भोजन बनाकर तैयार कर लिया, किन्तु विश्वरूप अभी तक पाठशाला से नहीं आये। वे श्री अद्वैताचार्य की पाठशाला में पढ़ते थे। आचार्य की पाठशाला मिश्र जी के घर से थोड़ी दूर गंगा जी की ओर थी। माता ने निमाई से कहा- ’बेटा निमाई! देख तेरा दादा अभी तक भोजन करने नहीं आया। जाकर उसे पाठशाला में से बुला तो ला।’ बस, इतना सुनना था कि ये नंगेवदन ही वहाँ से पाठशाला की ओर चल पड़े। शरीर की कान्ति तपाये हुए सुवर्ण की भाँति सूर्य के प्रकाश के साथ मिलकर झलमल-झलमल कर रही थी। गौरवर्ण शरीर पर स्वच्छ साफ धोती बड़ी ही भली मालूम पड़ती थी। निमाई आधी धोती ओढ़े हुए थे। उनके बडे़-बड़े विकसित कमल के समान सुन्दर और स्वच्छ नेत्र मुखचन्द्र की शोभा को द्विगुणित कर रहे थे।
आचार्य के सामने हँसते-हँसते इन्होंने भाई से कहा 'दद्दा! चलो भात तैयार है, अम्मा तुम्हें बुला रही हैं।’ विश्वरूप ने निमाई को गोद में बिठा लिया और स्नेह से बोले- ’निमाई! आचार्य देव को प्रणाम करो’ यह सुनकर निमाई कुछ लजाते हुए मुसकराने लगे। वे लज्जा के कारण भाई विश्वरूप की गोद में छिपे-से जाते थे। आचार्य से आज्ञा लेकर विश्वरूप घर चलने को तैयार हुए। निमाई विश्वरूप का वस्त्र पकड़े उनके पीछे खड़े हुए थे। आचार्य ने निमाई को खूब ध्यान से देखा। आज पहले-ही-पहले उन्होंने निमाई को भलीभाँति देखा था। देखते ही उनके सम्पूर्ण शरीर में बिजली-सी दौड़ने लगी। उन्हें प्रतीत होने लगा कि मैं इतने दिन से जिन भवभयहारी जनार्दन की उपासना कर रहा हूँ, वे ही जनार्दन साकार बनकर बालक-रूप में मुझे अभय प्रदान करने आये हैं। उन्होंने मन-ही-मन निमाई के पादपद्मों में प्रणाम किया और अपने भाव को दबाते हुए बोले- 'विश्वरूप! यह तुम्हारे भाई हैं न?’
विश्वरूप ने नम्रता पूर्वक कहा- 'हाँ, आचार्य देव! यह मेरा छोटा अनुज है। बड़ा चंचल है, आपके सामने यह ऐसे चुपचाप भोले बालक की भाँति खड़ा है, आप इसे गंगा-किनारे या घर पर देखें तब पता चले कि यह कितना कौतुकी है। संसार को उलट-पलट कर डालता है। माता तो इससे तंग हो जाती हैं।’ आचार्य यह सुनकर हँसने लगे। निमाई विश्वरूप की आड़ में से छिपकर आचार्य की ओर देखने लगे। विश्वरूप का वस्त्र पकड़कर जाते-जाते दो-तीन बार निमाई ने फिर-फिर आचार्य की ओर देखा। आचार्य चेतना-शून्य-से हो गये। वे ठीक-ठीक न समझ सके कि हमारे चित्त को यह बालक हठात अपनी ओर क्यों आकर्षित कर रहा है। अन्त में ये ही आचार्य गौरांगदेव के मुख्य पार्षद हुए, जिनके द्वारा गौरांग अवतारी माने जाने लगे। इसलिये अब यह जान लेना जरूरी है कि ये अद्वैताचार्य कौन थे और इनकी पाठशाला कैसी थी?
अद्वैताचार्य और उनकी पाठशाला.....
जो आचार्य अद्वैत गौर-धर्म के प्रधान स्तम्भ हैं, गौर-लीलाओं के जो प्रथम प्रवर्तक, प्रबन्धक और संयोजक समझे जाते हैं, जिन्होंने वयोवृद्ध, विद्यावृद्ध और बुद्धिवृद्ध होने पर भी बालक गौरांग की पद-रज को अपने मस्तक का सर्वोत्तम लेपन बनाया, जिन्होंने गौरांग से पहले अवतीर्ण होकर गौर-लीला के अनुकूल वायुमण्डल बनाया, उत्तम-से-उत्तम रंगमंच तैयार किया, उस पर गौरांग को प्रधान अभिनय-कर्ता बनाकर भक्तों के साथ भाँति-भाँति की लीलाएँ करायीं और गौरांग के तिरोभाव के अनन्तर अपनी सम्पूर्ण लीलाओं का संवरण करके आप भी तिरोहित हो गये। उन अद्वैताचार्य के पूर्वज श्रीहट्ट (सिलहट) जिले में लाउड़ परगने के अन्तर्गत नवग्राम नाम के एक छोटे-से ग्राम में रहते थे। हम पहले ही बता चुके हैं कि उस समय भारत में बहुत-से छोटे-छोटे राज्य थे, जिनमें प्रायः स्वतन्त्र ही नरपति शासन करते थे। लाउड़ भी एक छोटी-सी रियासत थी। उन दिनों उस रियासत के शासनकर्ता महाराज दिव्य सिंह जी थे। महाराज परम धार्मिक तथा गुणग्राही थे। उनकी सभा में पण्डितों का बहुत सम्मान होता था। आचार्य के पूज्य पिता पण्डित कुबेर तर्कपंचानन महाराज की सभा के राज-पण्डित थे।
तर्कपंचानन महाशय न्याय के अद्वितीय विद्वान थे। उनकी विद्वत्ता की चारों ओर ख्याति थी। विद्वान होने के साथ-ही-साथ वे धनवान भी थे, किन्तु एक ही दुःख था कि उनके कोई सन्तान नहीं थी। इसी कारण वे तथा उनकी धर्मपत्नी लाभादेवी सदा चिन्तित बनी रहती थीं। लाभादेवी के गर्भ से बहुत से बच्चे हुए और वे असमय में ही इस असार संसार को त्यागकर परलोकगामी हुए। इसी कारण तर्कपंचानन महाशय अपने पुराने गाँव को छोड़कर नवद्वीप के इस पार शान्तिपुर में आकर रहने लगे। यहीं पर लाभादेवी के गर्भ रहा और यथा समय पर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र का नाम रखा गया कमलाक्ष। ये ही कमलाक्ष आगे चलकर महाप्रभु अद्वैस के नाम से प्रसिद्ध हुए।
क्रमशः
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