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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आचार्य की ख्याति सुनकर भी एक दिग्विजयी तर्कपंचानन महाशय इनसे शास्त्रार्थ करने आये और अन्त में इनसे परास्त होकर वे इनके शिष्य बन गये। इसलिये इनकी ख्याति अब पहले से और भी अधिक हो गयी। इनके पिता के आश्रयदाता महाराज दिव्यसिंह जी भी इनकी प्रशंसा सुनकर इनके दर्शनों के लिये आये। उन्होंने इनका भक्तिभावपूर्ण पाण्डित्य देखकर अपने सफेद बालों वाला सिर इनके चरणों पर रख दिया और गद्गद कण्ठ से कहा- 'आपने अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर दिया। कृपा करके मुझे भी अपने चरणों की शरण दीजिये।’ बूढे़ राजा शाक्त होने पर भी इनके शिष्य बन गये। वे इनमें बड़ी श्रद्धा रखते थे। अन्त में उन्होंने राज-काज छोड़कर एकान्त में अपना निवास स्थान बना लिया और कृष्ण-कीर्तन करते-करते ही शेष आयु का अन्त किया। अद्वैत की बाल-लीलाओं का वे सदा गुणगान करते रहते थे। उन्होंने संस्कृत में अद्वैत की बाल लीलाओं को लिखा भी था।
श्रीमाधवेन्द्रपुरी ने इन्हें गृहस्थी बनने की आज्ञा दी। गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य करके इन्होंने नारायणपुर निवासी पण्डित नृसिंह भादुड़ी की सीता और ठकुरानी नाम की दो पुत्रियों के साथ विवाह किया और उनके साथ सुखपूर्वक समय बिताने लगे। ये बड़े ही उदार, कोमलहृदय तथा कृष्ण-कथा-प्रिय थे। भेदभाव या संकीर्णता को ये कृष्ण-भक्ति में बाधक समझते थे। उन्हीं दिनों परम भक्त हरिदास भी इनके पास आये। ये यवन-बालक थे, किन्तु थे बड़े होनहार तथा कृष्ण-भक्त, इसलिये आचार्य ने इन्हें अपने पास ही रखकर व्याकरण, गीता, भागवत आदि को पढ़ाया। ये बड़े ही समझदार थे, आचार्य के चरणों में इनकी परम श्रद्धा थी, आचार्य भी इन्हें पुत्र की तरह मानते तथा प्यार करते थे।हरिदास आचार्य के घर में ही भोजन आदि करते थे। एक नामी पण्डित होकर अद्वैताचार्य मुसलमान-बालक को अपने घर में रखते हैं, इस बात से सभी पण्डित तथा ब्राह्मण इनका विरोध करने लगे, किन्तु इन्होंने उनकी कुछ भी परवा न की। एक दिन किसी ब्राह्मण के यहाँ श्राद्ध के समय सबसे प्रथम आचार्य ने श्राद्धान्न हरिदास के ही हाथों में दे दिया। इससे कुपित होकर पण्डितों ने इनसे कुछ बुरा-भला कहा। इन्होंने निर्भय होकर कह दिया- ’हरिदास को भोजन कराने से मैं करोड़ों ब्राह्मणों के भोजनों का माहात्म्य समझता हूँ।’ इनकी इस बात से सभी भौचक्के-से रह गये। ये कोरे पण्डित ही न थे, किन्तु क्रियावान भक्त और विचारवान भी थे।ये शास्त्रों का पठन-पाठन करते हुए भी सदा हरि-कीर्तन और भगवत-भक्ति में परायण रहते थे। उन दिनों अधिकांश पण्डित पुस्तकों के कीडे़ तथा शुष्क वाद-विवाद करने वाले ही थे। शास्त्रों के अनुसार क्रियाएँ करना तो वे जानते ही न थे।शास्त्र पढ़ने पर भी यदि उसके अनुसार आचरण न करे तो मनुष्य मूर्ख ही बना रहता है। जैसे-कैसे भी बढ़िया-से-बढ़िया औषध को मन से सोच लो, जब तक उसे घोट-पीसकर व्यवहार में न लाओगे तब तक नीरोग कभी भी नहीं बन सकते।’ उन दिनों के पण्डित ऐसे ही अधिक थे। अद्वैताचार्य की उनसे नहीं पटती थी, इसलिये इन्होंने अपनी एक नयी पाठशाला खोल ली। उसमें ये दिनभर तो शास्त्रों को पढ़ाते थे और रात्रि में हरिदास आदि अपने अन्तरंग भक्तों के साथ कृष्ण-कीर्तन करते थे। इनकी पाठशाला में विशेषकर भक्ति-शास्त्रों की ही चर्चा होती। इसलिये आस्तिक और भगवत-भक्त पण्डितगण इनके प्रति बड़ी ही श्रद्धा रखते थे। कहते हैं एक बार पण्डित जगन्नाथ मिश्र के घर जाकर इन्होंने उन्हें पुत्रवान होने का आशीर्वाद दिया था, तभी विश्वरूप का जन्म हुआ।
निमाई जब गर्भ में थे तब शचीदेवी ने एक बार इनके चरणों में भक्तिभाव से प्रणाम किया। इन्होंने आशीर्वाद दिया- 'इस गर्भ से तुम्हारे अवतारी पुत्र उत्पन्न होगा।’ इस प्रकार सभी धार्मिक लोग इनका बहुत अधिक सम्मान करते थे। पण्डित जगन्नाथ मिश्र से इनका बहुत अधिक स्नेह था। विश्वरूप को मिश्र जी ने इन्हीं के हाथों सौंप दिया था। विश्वरूप- जैसे मेधावी, गम्भीर और होनहार बालक को पाकर ये परम प्रसन्न हुए और बड़े ही मनोयोग के साथ उनको पढ़ाने लगे। विश्वरूप एक बार जिस श्लोक को पढ़ लेते दुबारा फिर उन्हें पूछने की आवश्यकता नहीं होती थी। उनकी बुद्धि असाधारण थी। प्रायः आचार्य की पाठशाला में ऐसे ही विद्यार्थी पढ़ते थे। दिनभर घट-पट और अवच्छिन्न-अवच्छेदकता ही बकते रहने वाले तथा सदा व्याकरण की फक्किकाओं के ही ऊपर सम्पूर्ण शक्ति खर्च कर देने वाले विद्यार्थी इनके यहाँ बहुत कम थे। उनके लिये तो और ही बहुत-सी पाठशालाएँ थीं। भक्तितत्त्व और सद्ज्ञान-वर्धन के निमित्त ही आचार्य ने अपनी पाठशाला खोल रखी थी। उन्हें पाठशाला से कुछ आजीविका तो करनी ही नहीं थी। उनकी पाठशाला में सदा भक्तितत्त्व के ही ऊपर आलोचना-प्रत्यालोचना होती रहती। विश्वरूप इन विषयों में सबसे अधिक भाग लेते। उनका चित्त बालकपन से ही संसार से विरक्त था। अद्वैताचार्य की कथाओं का तो आगे समय-समय पर यथास्थान उल्लेख होता ही रहेगा। अब आइये थोड़ा निमाई के दद्दा विश्वरूप के मनोविचारों को समझने की येष्टा करें। देखें वे अपने जीवन का क्या लक्ष्य स्थिर करते हैं।भगवत्पादपद्मों से पृथक होकर प्राणी प्रारब्धकर्मानुसार असंख्य योनियों में भ्रमण करता हुआ मनुष्ययोनि में अवतीर्ण होता है। एक यही योनि ऐसी है जिसमें वह अपने सत्स्वरूप को पुनः प्राप्त कर सकता है। मनुष्ययोनि ही कर्मयोनि है, शेष सभी भोगयोनियाँ हैं। मनुष्य ही कर्म के द्वारा निष्कर्म और पुनरावृत्ति से रहित बन सकता है। पुनरावृत्ति कर्मवासनाओं के द्वारा होती है। जीव अपनी वासनाओं के द्वारा फिर-फिर जन्म ग्रहण करता है और मरणके दुःखों को भोगता है। यदि कर्मवासना क्षय हो जाय तो परावर भगवान का दर्शन हो जाता है। भगवद्दर्शन के तीन मुख्य धर्म हैं- (1) हृदय में जो अज्ञान की ग्रन्थि पड़ी हुई है, जिसके द्वारा असत पदार्थों को सत समझे बैठे हैं वह ग्रन्थि खुल जाती है। (2) अज्ञान संशय के द्वारा उत्पन्न होता है और संशय ही विनाश का मुख्य हेतु है, परावर के साक्षात हो जाने पर सर्वसंशय आप-से-आप मिट जाते हैं। (3) संसृति का मुख्य हेतु है कर्मबन्ध। कर्म ही प्राणियों को नाना योनियों में सुख-दुःख भुगताते रहते हैं। जिसे भगवत-साक्षात्कार हो गया है उसके सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। बस, फिर क्या है! वह संसार-चक्र से मुक्त होकर अपने सत्स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
क्रमशः
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