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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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यही तो जीव का परम पुरुषार्थ है। त्याग-धर्म सृष्टि के आदि में सबसे प्रथम उत्पन्न हुआ। सभी प्राणियों का मुख्य और प्रधान उद्देश्य है ‘त्याग’। इन संसारी विषयों का जभी त्याग कर सके तभी त्याग कर देना चाहिये। इसीलिये सृष्टि के आदि में सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन- ये चार त्यागी संन्यासी ही उत्पन्न हुए। भगवान के वामन, कपिल, दत्तात्रेय, ऋषभदेव आदि बहुत-से अवतारों ने त्याग का ही उपदेश दिया है। त्याग ही ‘साधन’ है इसीलिये मनुष्य को ही साधक कहा गया है। बहुत-से लोग कहते हैं गृहस्थ-धर्म यदि निष्कामभाव से किया जाय तो सर्वश्रेष्ठ है। किन्तु ये रोचक और श्रुतिमधुर शब्द हैं, जो पूर्वजन्म की संचित वासनाओं के अनुसार सर्वत्याग करने में समर्थ नहीं हो सकते, उनके आश्वासन के निमित्त ये शब्द हैं। जैसे मांस खाने की जो अपनी वासना का संवरण नहीं कर सकता उसके लिये कहते हैं- ‘यदि मांस खाना ही है तो यज्ञ करके जो शेष बचे उसे प्रसाद समझकर खाओ। ऐसा करने से हिंसा न होगी।

विश्वरूप का वैराग्य.....

इन शब्दों में से ही स्पष्ट प्रतीत होताहै कि असल में अहिंसा तो वही है जिसमें किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाया जाय, किन्तु तुम उसका पालन नहीं कर सकते तो अपनी वासना को सर्वतोमुखी स्वतन्त्र मत छोड़ दो, उसे संयम में लाओ। कामवासना को संयम में लाने के ही लिये गृहस्थी होने की आज्ञा दी है, उसी को धर्म कहते हैं। धर्महीन वासनाएँ तो बन्धन का हेतु हैं ही, किन्तु केवल धर्म भी बन्धन का हेतु है, यदि तुम अपनी वासनाओं को संयम में रखकर धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहोगे तो स्वर्ग का सुख भोगते रहोगे, जन्म-मरण के चक्कर से नहीं छूट सकते। ‘हाँ, यदि मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से जो धर्माचरण करोगे तो धीरे-धीरे इन कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे। पूर्वजन्म की वासनाओं के अनुसार प्राणी स्वयं इन बन्धनों में फँसता है। कर्दम प्रजापति ने दस हजार वर्ष तक भगवान की अनन्य भाव से भूख-प्यास सहकर और प्राणों का निरोध करके तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान उनके सम्मुख प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा तब उन्होंने हाथ जोड़े हुए गद्गद कण्ठ से कैसी सत्य बात कही थी।

उन्होंने कहा- ‘भगवान! मुझमें और ग्राम्य-पशु में कोई अन्तर नहीं। मैंने कामना से तुम्हारी उपासना की है, मैं काम-सुख का इच्छुक हूँ, यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मेरे अनुकूल मुझे भार्या दीजिये। यही मैं वरदान माँगता हूँ।’ दस हजार वर्ष की घोर तपस्या के फलस्वरूप भार्या का वरदान सुनकर भगवान के नेत्रों में जल भर आया और उस विन्दु के गिरने से ही विन्दुसर तीर्थ बन गया। वे अपनी माया की प्रबलता देखकर स्वयं आश्चर्यान्वित हो गये और स्वयं इनके यहाँ देवहूति के गर्भ से कलिपरूप में उत्पन्न हुए। भगवान कपिल ने अपने पिता को तथा माता को तत्त्वोपदेश किया और अन्त में वे संसार से संन्यास लेकर भगवान के अनन्य धाम को प्राप्त हुए।

इसलिये कपिल भगवान का मत है- ‘यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।’ किसी भी आश्रम में क्यों न हो जब उत्कट वैराग्य हो जाय तब सर्व धर्मों का परित्याग करके एक प्रभु के ही पादपद्मों में मन लगाना चाहिये, यही प्राणिमात्र का परम पुरुषार्थ है। किन्तु उत्कट वैराग्य भी तो पूर्वजन्मों के परम शुभ संस्कारों से प्रापत होता है। निमाई के भाई विश्वरूप की अवस्था अब सोलह वर्ष की हो चली। वे साधारण बालक नहीं थे। मालूम पड़ता है वे सत्य अथवा ब्रह्मलोक के जीव थे, जो अपने अपूर्ण ज्ञान को पूर्ण करने के निमित्त योगभ्रष्ट शुचि ब्राह्मण के घर में कुछ काल के लिये उत्पन्न हो गये थे। और लोग इस बात को क्या समझें? माता पिता के लिये तो वे साधारण पुत्र ही थे, माता-पिता का जो कर्तव्य है उसका वे पालन करने लगे। विश्वरूप अपने ममेरे भाई लोकनाथ को छोड़कर और किसी से विशेष बातें नहीं करते थे। लोकनाथ को वे प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। लोकनाथ इनसे साल-छः महीने अवस्था में छोटे थे, वे भी इनमें गुरु की भाँति भक्ति करते थे। दोनों के विचार भी एक-से थे, एकान्त में घण्टों परमार्थ-विषयक बातें होती रहतीं। मिश्र जी ने देखा पुत्र की अवस्था सोलह वर्ष की हो चुकी है, इसलिये इसके विवाह का कहीं से प्रबन्ध करना चाहिये। अपने विचार उन्होंने शचीदेवी के सम्मुख प्रकट किये। शचीदेवी ने भी इनकी बात का समर्थन किया। अब माता-पिता विश्वरूप के अनुरूप कन्या की खोज करने लगे। इधर विश्वरूप के विचारों में और अधिक गम्भीरता आने लगी। पंद्रह वर्ष की अवस्था के पश्चात् सभी युवकों के हृदयों में एक प्रकार की महान खलबली-सी उत्पन्न हुआ करती है। चित्त किसी अत्यन्त प्यारे के मिलन के लिये तड़पता रहता है। हृदय में एक मीठी-मीठी वेदना-सी होती है। जी चाहता है अपने को किसी के ऊपर न्यौछावर कर दें। इसी बात को समझकर माता-पिता इस अवस्था में लड़के का विवाह कर देते हैं और अपने हृदय को समर्पण करने के निमित्त संगिनी पाकर बहुत-से शान्त हो जाते हैं। बहुत-से धन के बन्धन में फँसकर, बहुत-से मित्र के प्रेम में फँसकर और बहुत-से विषयवासनाओं में फँसकर उस वेग को शान्त कर लेते हैं। उस वेग को जिधर लगाओ उधर ही वह लग जायगा। विश्वरूप ने उस प्रेम को माता-पिता के ही बीच में सीमित न रखकर उसे विश्व के साथ तद्रूप बनाना चाहा। वे इसी बात को सोचते रहते थे कि इस कोलाहलपूर्ण संसार से कैसे उपरत हो सकेंगे?

जब इन्होंने अपने विवाह की बात सुनी तब तो मानो इनके वैराग्यरूपी प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति पड़ी। ये बार-बार सोचने लगे- ‘क्या विवाह करके संसारी सुख भोगने से मुझे परम शान्ति मिल सकेगी? क्या मैं गृहस्थी बनके अपने चरम लक्ष्य तक शीघ्र-से-शीघ्र पहुँच सकूँगा? क्या मुझे माता-पिता और भाइयों के ही बीच में अपने प्रेम को सीमित बनाकर संसारी बनना चाहिये? उनकी यह विकलता बढ़ती ही जाती थी। एक दिन लोकनाथ ने एकान्त में इनसे पूछा- ‘भैया! क्या कारण है, तुम अब सदा किसी गम्भीर विचार में डूबे रहते हो?’
क्रमशः

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