cc33
श्री श्री चैतन्य चरितावली
33-
धीरे-धीरे इनकी मूर्च्छा भंग हुई और ये कुछ काल में सचेत हो गये। सभी को इनकी इस अवस्था से महान आश्चर्य हुआ। सचेत होने पर इन्होंने पिता जी से कहा- ‘पिता जी! अब मुझे क्या करना चाहिये?’
ब्रह्मचर्य-व्रत लेने पर छात्र को गुरु-गृह में रहकर भिक्षा पर ही निर्वाह करना होता था, यज्ञोपवीत के समय आज भी एक दिन के लिये भिक्षा का अभिनय कराया जाता है। इसीलिये अब निमाई को भिक्षा माँगने के लिये झोली दी गयी। निमाई के हृदय पर उस संस्कार का बड़ा ही गहरा प्रभाव पड़ा था। इन कृत्यों के कारण इनकी कायापलट-सी हो गयी। मुख पर एक अपूर्व ज्योति दृष्टिगोचर होने लगी। मुँड़ा हुआ माथा सूर्य के प्रकाश में दमकने लगा। एक हाथ में दण्ड लिये और दूसरे में झोली लटकाये ब्रह्मचारी के वेश में निमाई बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। मानो वामन भगवान अपने भक्त बलि से भिक्षा माँगने जा रहे हों। ये पहले अपनी माता के पास भिक्षा माँगने गये, फिर बारी-बारी से सभी के पास भिक्षा माँगने लगे।आचार्य ने इन्हें भिक्षा माँगने का प्रकार बता दिया था। उसी प्रकार ये सबके सामने जाते और- ‘भवति भिक्षां देहि’ कहकर झोली सामने कर देते। स्त्रियाँ इनके रूप-लावण्य को देखकर मुग्ध हो गयीं, माता मन-ही-मन प्रसन्न हो रही थीं, उनके हृदय में पुत्र-स्नेह की हिलोरें निरन्तर उठ रही थीं। वे निमाई की शोभा को देखते-देखते तृप्त ही न होती थीं। अतृप्त दृष्टि से वे नीचा सिर किये हुए धीरे-धीरे निमाई की ओर निहार रही थीं। स्त्रियाँ इन्हें भाँति-भाँति की वस्तुएँ भेंट में देतीं। कोई फल देती, कोई मिठाई का थाल और कोई-कोई इनकी झोली में द्रव्य डाल देतीं। ये सभी के पास जाकर खड़े हो जाते, जिसके भी सामने खडे़ होते उसी की इच्छा होती कि इसे सर्वस्व समर्पण कर दें। इस प्रकार ये भिक्षा माँगते हुए इधर-से-उधर घूमने लगे।इसी बीच में एक वृद्ध ब्राह्मण लाठी टेकते-टेकते संस्कारमण्डप में आया। उसने निमाई को इशारे से अपने पास बुलाया, ये जल्दी से उसके समीप चले गये। उसने अपने काँपते हुए हाथों से एक सुपारी इनकी झोली में डाल दी। इन्होंने उस सुपारी को जल्दी से झोली में से निकालकर अपने मुँह में डाल लिया। सुपारी के खाते ही इनकी विचित्र दशा हो गयी। ये किसी भारी भावावेश में मग्न हो गये और उसी भावावेश में माता से गम्भीर स्वर में बोले- ‘माँ! आज से एकादशी के दिन अन्न कभी न खाया करना, माता भी भावावेश में अपने को भूल गयी। वह समझ न सकी कि निमाई ही मुझसे उक्त बात कह रहा है। उसे प्रतीत हुआ मानो कोई दिव्य पुरुष मुझे आदेश कर रहे हैं। इसीलिये उसने विनय के साथ उत्तर दिया- ‘जो आज्ञा, आज से हरिवासर के दिवस अन्न ग्रहण न करूँगी।’ थोड़ी देर में इन्होंने कहा- ‘अच्छा, अब हम जाते हैं, अपने पुत्र की रक्षा करना।’ इतना कहकर ये फिर अचेत होकर गिर पड़े और थोड़ी देर बाद चारों ओर अपनी बड़ी-बड़ी लाल-लाल आँखों को फाड़-फाड़कर देखने लगे, मानो व्रत-बन्ध कोई नींद से जागा हुआ आदमी आश्चर्य के साथ अपने पास के अपूर्व कार्यों को देख रहा हो। इनके प्रकृतिस्थ होने पर मिश्र जी ने पूछा- ‘बेटा! क्या बात थी, तुम क्या कह रहे थे’
इन्होंने सरलता के साथ उत्तर दिया- ‘नहीं तो पिता जी! मैंने तो कोई बात नहीं कही। मुझे कुछ भी पता नहीं, जाने क्या हुआ। मुझे कुछ निद्रा-सी प्रतीत होने लगी थी।’ इस बात को सुनकर सभी इस भावावेश के सम्बन्ध में भाँति-भाँति के तर्क-वितर्क करने लगे। किसी ने कहा- ‘किसी भूत-प्रेत का आवेश है’, किसी ने कहा- ‘किसी दिव्यात्मा का आवेश है।’ भक्तों ने कहा- ‘नहीं, यह साक्षात हरिभगवान का आवेश है।’ उसी दिन यज्ञोपवीत के समय इनका नाम ‘गौरहरि’ हुआ। स्त्रियों को यह नाम बहुत ही प्रिय था। अबसे वे निमाई को प्रायः ‘गौर’ या ‘गौरहरि’ ही कहकर पुकारने लगीं। यज्ञोपवीत-संस्कार के समाप्त होने पर गौर का समावर्तन-संस्कार किया गया। उनके वस्त्र बदल दिये गये। माता ने बड़ी-बड़ी आँखों में काजल लगा दिया। नूतन वस्त्र पहनकर गौर बाहर आये। उन्होंने सबसे पहले पिता के चरणों को स्पर्श करके प्रणाम किया, फिर क्रमशः सभी वृद्ध ब्राह्मणों की चरण-वन्दना की। ब्राह्मणों ने इन्हें भाँति-भाँति के आशीर्वाद दिये। इस प्रकार बड़े ही आनन्द के साथ इनका व्रत-बन्ध-संस्कार समाप्त हुआ।
यज्ञोपवीत हो जाने के अनन्तर ये आचार्य सुदर्शन और विष्णु पण्डित के समीप पढ़ने के लिये जाने लगे। इनकी मेधाशक्ति बाल्यकाल से ही बड़ी तीक्ष्ण थी। अध्यापक एक बार जो इन्हें पढ़ा देते, फिर दूसरी बार इन्हें पूछने की आवश्यकता नहीं होती थी। इसीलिये अध्यापक इनसे बहुत ही प्रसन्न रहने लगे।
थोड़े दिनों के पश्चात् मिश्र जी ने इन्हें मायापुर के निकटवर्ती गंगानगर की पाठशाला में पढ़ने के लिये भेजा। उस समय उस पाठशाला के प्रधानाध्यापक पण्डित गंगादास जी थे। पण्डित गंगादास जी व्याकरण के अद्वितीय विद्वान थे। व्याकरण में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी, बड़े-बड़े़ योग्य छात्र उनकी पाठशाला में अध्ययन करते थे। उस समय व्याकरण की वही पाठशाला मुख्य थी। निमाई भी अन्य छात्रों के साथ पण्डित गंगादास जी के समीप व्याकरण का अध्ययन करने लगे।
पिता का परलोकगमन....
पण्डित जगन्नाथ मिश्र की आशा-लता अब बड़ी ही तेजी के साथ बढ़ने लगी। उस लता पर छोटी-छोटी कलियाँ आने लगीं। उनकी भीनी-भीनी गन्ध के कारण मिश्रजी कभी-कभी अपने आपे को भूल जाते। वे सोचने लगते- ‘भगवान मेरी चिराभिलषित आशा को अब शीघ्र ही पूर्ण करेंगे।’ मेरी आशा-लता अब शीघ्र ही फूलने-फलने लगेगी। वह दिन कैसा सुहावना होगा, जिस दिन निमाई को बहू के साथ अपने आँगन में देखूँगा। माता-पिता की यही सबसे मधुर और सुखकरी कामना है कि वे अपने पुत्र को प्यारी पुत्रवधू के साथ देख सकें। संसार में यही उनके लिये एक सुन्दरतम सुअवसर होता है। शचीदेवी के सहित मिश्र जी उसी दिन की प्रतीक्षा करने लगे। ‘तेरे मन कुछ और है, विधना के कुछ और’ विधि को मिश्र जी का मनसूबा मंजूर नहीं था, उसने तो कुछ और ही रचना रच रखी थी।
क्रमशः
Comments
Post a Comment