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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मिश्र जी अपने प्यारे पुत्र का विवाहोत्सव इस शरीर से न देख सके। निमाई अब ग्यारह वर्ष के हो गये। नियमित समय पर पढ़ने जाते और रोज आकर पिता जी के चरणों में प्रणाम करते।
एक दिन उन्होंने देखा, पिता जी ज्वर के कारण अचेत पड़े हैं। उन्होंने घबड़ाकर माता से पूछा- ‘अम्मा! पिता जी को क्या हो गया है?’ उदास होकर माता ने कहा- ‘बेटा! तेरे पिता को ज्वर आ गया है।’ निमाई पिता की खाट के पास जा बैठे और धीरे-धीरे उनके माथे पर हाथ फेरने लगे। निमाई के सुकोमल शीतल कर-स्पर्श से पिता की तन्द्रा दूर हुई। उन्होंने क्षीण स्वर में कहा- ‘निमाई! बेटा! मुझे थोड़ा जल पिता दे।’
निमाई ने पास के बर्तन में से जल पिलाया, अपने वस्त्र से उनका मुँह पोंछा और प्रेम के साथ पूछने लगे- ‘पिता जी! अब आपकी तबीयत कैसी है?’ करवट बदलते हुए मिश्र जी ने कहा- ‘अब मैं अच्छा हूँ, चिन्ता की कोई बात नहीं, तू पढ़ने नहीं गया?’
निमाई ने अन्यमनस्क-भाव से कहा- ‘अब जब तक आपकी तबीयत अच्छी तरह से ठीक नहीं होती, तब तक मैं पढ़ने न जाऊँगा।’ मिश्र जी चुप हो गये, निमाई उदास-भाव से उनके पास बैठे रहे। कई दिन हो गये, ज्वर कम ही नहीं होता था, वैद्य को भी शची देवी ने बुलाया। घर में इतना द्रव्य नहीं था कि बडे़-बड़े वैद्यों को बुलाया जा सके। पास में जो मामूली वैद्य थे उन्हीं की बतायी हुई दवा कभी-कभी दी जाती। किन्तु रोग घटने के स्थान में बढ़ने लगा।मिश्रजी अपने जीवन की आशा से निराश हो गये। उन्हें अपने अन्तिम समय का ज्ञान हो गया। क्षीण स्वर में उन्होंने शची देवी से कहा- ‘अब मेरे जीवन की कोई आशा नहीं है, मालूम होता है, इस शरीर से अब मैं अपनी आशा को पूरी होते न देख सकूँगा, अच्छा, जैसी रघुनाथ जी की इच्छा। मैं अब क्या कहूँ, मेरे साथ तुम्हें कुछ भी सुख प्राप्त न हो सका। भगवान की ऐसी ही मर्जी थी, अब मै तो थोड़े ही समय का मेहमान हूँ, निमाई का खयाल रखना।’ इतना कहते-कहते मिश्र जी की साँस फूलने लगी। आगे वे कुछ भी न कह सके और चुप होकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे। शची देवी फूट-फूटकर रोने लगी। पिता की ऐसी दशा देखकर निमाई ने उन्हें खाट से नीचे उतारने की सलाह दी। मिश्र जी नीचे दाभ के आसन पर लिटाये गये। मिश्र जी ने नीचे से धीरे-धीरे कहा- ‘मुझे श्री भागीरथी के तट पर ले चलो।’ उनकी इच्छा के अनुसार निमाई माता के साथ उन्हें स्वयं गंगातट पर ले गये। ग्यारह वर्ष के बालक ने किसी दूसरे को हाथ नहीं लगाने दिया। माता की सहायता से वे स्वयं मिश्र जी को गंगातट पर ले गये।’ निमाई ने भी समझ लिया कि अब पिता जी हमें छोड़कर सदा के लिये जा रहे हैं। इसलिये उन्होंने रोते-रोते कहा- ‘पिता जी! मुझसे क्या कहते हैं, मुझे किसके हाथों सौंप रहे हैं?’
मिश्र जी ने अपने शक्तिहीन हाथ को धीरे-धीरे उठाकर निमाई के सिर पर फिराया और उनके सिर को छाती पर रखकर क्षीण स्वर में कहा- ‘निमाई! मैं तुझे भगवान विश्वम्भर के हाथों सौंपता हूँ, वे ही तेरी रक्षा करेंगे।’ यह कहते-कहते मिश्र जी ने पुण्यतोया भगवती भागीरथी की गोद में अपना यह नश्वर शरीर त्याग दिया। निमाई और शचीदेवी चीत्कार करके रोने लगे। सगे-सम्बन्धियों ने उन्हें धैर्य धारण कराया। यथाविधि निमाई ने पिता की अन्त्येष्टि क्रिया की। पिता के परलोकगमन से उन्हें बहुत दुःख हुआ। माता को तो चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार प्रतीत होने लगा। उन्हें मिश्र जी की असामयिक मृत्यु से बहुत दुःख हुआ। घर में कोई दूसरा नहीं था। इसलिये गौर ने ही माता को धैर्य धारण कराया। उन्होंने माता से कहा- ‘अम्मा! भाग्य को कौन मेट सकता है। मृत्यु तो एक-न-एक दिन सभी की होनी है। हमारे भाग्य में इतने ही दिन पिता जी का साथ बदा था। अब वे हमें छोड़कर चले गये। तुम इतनी दुःखी मत हो। तुम्हें दुःखी देखकर मेरा कलेजा फटने लगता है। मैं हर तरह से तुम्हारी सेवा करने को तैयार हूँ।’ निमाई के समझाने पर माता ने धैर्य धारण किया और अपने शोक को छिपाया।
विद्याव्यासंगी निमाई.....
प्रायः मेधावी बालक गम्भीर होते हैं। उनके गाम्भीर्य में उनका पाण्डित्य प्रस्फुटित नहीं होता, वे लोगों के सम्मान-भाजन तो अवश्य बन जाते हैं, किन्तु सभी साथी उनसे खुलकर बातें नहीं कर सकते। उनके साथ संलाप करने में कुछ संकोच और भय-सा हुआ करता है। यदि प्रखर बुद्धिवाला छात्र मेधावी होने के साथ ही चंचल, हँसमुख और मिलनसार भी हो तब तो उसका कहना ही क्या? सुहागा मिले सोने में मानो सुगन्ध भी विद्यमान है। ऐसा छात्र छोटे-बड़े सभी छात्रों तथा अध्यापकों का प्रीति-भाजन बन जाता है। निमाई ऐसे ही विद्यार्थी थे। ये आवश्यकता से अधिक चंचल थे ओर वैसे ही अद्वितीय मेधावी। हँसी का तो मानो मुख से सदा फुव्वारा ही छूटता रहता। ये बात-बात पर खूब जोरों से खिलखिलाकर हँसते और दूसरों को भी अपने मनोहर विनोदों से हँसाते रहते। इनके पास मुँह लटकाये कोई बैठ ही नहीं सकता था, ये रोते को हँसाने वाले थे। पं. गंगादास जी की पाठशाला में बहुत बडे़-बड़े विद्यार्थी अध्ययन करते थे, जो इनसे विद्यावृद्ध होने के साथ ही वयोवृद्ध भी थे। 30-30, 40-40 वर्ष के छात्र पाठशाला में थे।
इनकी अवस्था अभी 13-14 ही वर्ष की थी, फिर भी ये बड़े छात्रों से सदा छेड़खानी करते रहते। उन छात्रों में बहुत-से तो बड़े ही मेधावी और प्रत्युत्पन्नमति थे, जो आगे चलकर लोक-प्रसिद्ध पण्डित हुए। प्रसिद्ध कवि मुरारी गुप्त, कमलाकान्त, तन्त्र शास्त्र के सर्वमान्य आचार्य कृष्णानन्द उन दिनों उसी पाठशाला में पढ़ते थे। निमाई छोटे-बड़े किसी से भी संकोच नहीं करते थे, ये सभी से भिड़ जाते और उनसे वाद-विवाद करने लगते। विशेषकर ये वैष्णव-विद्यार्थियों को खूब चिढ़ाया करते थे। उनकी भाँति-भाँति से मीठी-मीठी चुटकियाँ लेते और उन्हें लज्जित करके ही छोड़ते थे। मुरारी गुप्त इनसे अवस्था में बड़े थे, किन्तु ये उन्हें सदा चिढ़ाया करते। मुरारी बालक समझकर सदा इनकी उपेक्षा करते रहते।
क्रमशः
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