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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जब मुरारी को इनकी विलक्षण बुद्धि का परिचय प्राप्त हुआ, तब तो वे इनके साथ खूब बातें करने लगे। ये कहते- ‘मुरारी! अमुक प्रयोग को सिद्ध करो।’ मुरारी उसे ठीक-ठीक सिद्ध करते। ये उसमें बीसों दोष निकालते, उसका कई प्रकार से खण्डन करते।मुरारी इनकी तर्कशैली को सुनकर आश्चर्य प्रकट करने लगते, तब आप एक-एक शंका का समाधान करते हुए मुरारी के ही मत को स्थापित करते। फिर हँसकर कहते- ‘गुप्त महाशय! यह तो पण्डितों का काम है, आप ठहरे वैद्यराज! जड़ी-बूटी घोंट-पीसकर गोली बनाना सीख ली! नाड़ी देख ली, फिर चाहे रोगी मरे या जीये, तुम्हें अपने टके से काम। ‘वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर। यमस्तु हरते प्राणान् त्वं तु प्राणान् धनानि च।।’ तुम तो यमराज के सहोदर हो। तुम्हें नमस्कार है।’ मुरारी इनकी ये बातें सुनते और मन-ही-मन लज्जित होते, ऊपर से इनके साथ हँसने लगते, इस प्रकार ये मुरारी के साथ सदा ही विनोद करते रहते। कभी-कभी मुरारी अत्यन्त चिढ़ाने से खिन्न भी हो जाते, तब ये अपना कोमल कर कमल उनकी देहर पर फेरने लगते। इनके स्पर्शमात्र से ही वे सब बातें भूल जाते और इनके प्रति अत्यन्त स्नेह प्रकट करने लगते। मुरारी से इनकी खूब पटती थी और मुरारी भी इनसे हार्दिक स्नेह करते थे।

वाद-विवाद करने में ये अद्वितीय थे। जो भी छात्र मिल जाता उसी से भिड़ पड़ते और वह चाहे उल्टा कहे या सीधा, सभी का खण्डन करते और उसे परास्त करके ही छोड़ते। अपने-आप ही पहले किसी विषय का खण्डन कर देते, फिर युक्तियों द्वारा स्वयं ही उसका मण्डन भी करने लगते। विद्यार्थी इनकी ऐसी विलक्षण बुद्धि की बारम्बार बड़ाई करते और इनकी वाक्पटुता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते। किसी भी पाठशाला के छात्र को गंगा तट पर या कहीं अन्यत्र रास्ते में पाते वहीं उसे पकड़ लेते और उससे संस्कृत में पूछते- ‘तुम्हारे गुरु का क्या नाम है? क्या पढ़ते हो?’ जब वह कहता अमुक पाठशाला में व्याकरण पढ़ता हूँ, तब झट आप उससे प्रयोग पूछने लगते। बेचारा विद्यार्थी इनसे जिस किसी भाँति अपना पीछा छुड़ाकर भागता।

शाम के समय सभी पाठशालाओं के छात्र दल बना-बनाकर गंगा जी के किनारे आते और परस्पर में शास्त्रालाप किया करते। ये उन सबमें प्रधान रहते। कभी किसी पाठशाला के छात्रों के साथ शास्त्रार्थ कर रहे हैं, कभी किसी पाठशाला के छात्रों को परास्त कर रहे हैं, यही इनका नित्यप्रति का कार्य था। दस-दस, बीस-बीस छात्र मिलकर इनसे शंका करने लगते। ये बारी-बारी से सबका उत्तर देते। इनकी पाठशाला वाले इनका पक्ष लेते। कभी-कभी बातों-ही-बातों में वितण्डा भी होने लगता और मार-पीट तक की नौबत आ जाती। इस बात में भी ये किसी से कम नहीं थे। इस प्रकार ये सभी पाठशालाओं के छात्रों में प्रसिद्ध हो गये। विद्यार्थी इनकी सूरत से घबड़ाते थे।उन दिनों आजकल की भाँति व्याकरण के टीकाग्रन्थों का प्रचार नहीं था, छापेखाने नहीं थे, इसलिये पुस्तकें हाथ से ही लिखनी पड़ती थीं और मूल के साथ ही टीका को भी कण्ठस्थ करना पड़ता था। अध्यापक टीकाओं के ऊपर जो टिप्पणियाँ बताते उन्हें छात्र भूल जाते थे। इसलिये कई छात्र परस्पर मिलकर पाठ को विचार न लें तब तक पाठ लगता ही नहीं था। अब भी पाठशालाओं में बुद्धिमान छात्र अपने साथियों को पाठ विचरवया करते हैं। निमाई भी अपने साथियों को पाठ विचरवाते, इसलिये सभी छात्र इनका गुरु की भाँति आदर करते थे। ये विषय को इस ढंग से समझाते थे कि मूर्ख-से-मूर्ख भी छात्र सहज ही में पढे़ हुए पाठ को समझ जाता था।

उन दिनों गौरांग व्याकरण के ‘पंचीटीका’ नामक ग्रन्थ को समाप्त कर चुके थे, इन्होंने उसके ऊपर एक सरल टिप्पणी भी लिखी। इनकी की हुई टीका के ऊपर टिप्पणी विद्यार्थियों के बड़े ही काम की थी, बहुत शीघ्र ही विद्यार्थियों में इनकी टिप्पणी का प्रचार हो गया और बड़े-बड़े विद्वानों ने इनकी पाण्डित्यपूर्ण टिप्पणी की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। यहीं तक नहीं, उस टिप्पणी का नवद्वीप से बाहर अन्य देशों के छात्रों में भी प्रचार हुआ और सभी ने इनके पाण्डित्य की सराहना की। इस प्रकार इनकी प्रशंसा दूर-दूर तक फैल गयी। व्याकरण के साथ ही ये अलंकार के भी पाठ सुनते अैर उन्हें सुनते-सुनते ही हृदयंगम करते जाते थे। इस प्रकार ये थोड़े ही समय में व्याकरण तथा अलंकार में प्रवीण हो गये। उन दिनों नवद्वीप में जो न्याय का बोलबाला था। पण्डित व्याकरण पढ़कर न्याय नहीं जानता, उसका विशेष सम्मान नहीं होता था। न्याय में उन दिनों पं. वासुदेव सार्वभौम नदिया के राजा समझे जाते थे। न्याय में उन्हीं की पाठशाला सर्वश्रेष्ठ समझी जाती थी और उसमें सैकड़ों छात्र पढ़ते थे।

उस पाठशाला के पढे़ हुए छात्र आज संसारप्रसिद्ध पण्डित माने जाते हैं। नव्यन्याय की जो टीका ‘जागदीशी’ के नाम से न्याय का ही परिचय देती है उसी के प्रणेता पं. जगदीश के भी गुरु भवानन्द इसी पाठशाला के छात्र थे। ‘दीधिति’ नामक जगत्प्रसिद्ध ग्रन्थ के प्रणेता पं. रघुनाथ जी भी उन दिनों इसी पाठशाला में पढ़ते थे। इस प्रकार वह पाठशाला न्याय का एक भारी केन्द्र बनी हुई थी। निमाई भी पाठशाला में जाकर न्याय का पाठ सुनने लगे। ऐसी पाठशालाओं में प्रत्येक छात्रों के पृथक पाठ नहीं चलते हैं। दस-पाँच पाठ होते हैं, अपनी जैसी योग्यता हो, उसी पाठ को जाकर सुनते रहो, बस, यही पढ़ाई थी। सैकड़ों छात्र और पण्डित पाठ सुनने आते हैं।अध्यापक उनमें से बहुतों का नाम-पता भी नहीं जानते। वे पाठ सुनकर चले जाते हैं। आज भी काशी आदि बड़े-बड़े स्थानों की प्राचीन ढंग की पाठशालाओं में ऐसा ही रिवाज है। निमाई भी पाठशाला में जाकर पाठ सुन आते। सार्वभौम महाशय का उन दिनों इनके साथ कोई विशेष परिचय नहीं हुआ, किन्तु इनकी चंचलता, चपलता, वाक्पटुता और लोकोत्तर मेधा के कारण मुख्य-मुख्य छात्र इनसे बहुत स्नेह करने लगे। वे यह भी जानने लगे कि न्याय-जैसे गम्भीर विषय को निमाई भलीभाँति समझता है। वह अन्य बहुत-से छात्रों की भाँति केवल सुनकर ही नहीं चला जाता। पीछे जिनका हम उल्लेख कर चुके हैं वे ही ‘दीधिति’ महाग्रन्थ के रचयिता पण्डित रघुनाथ उन दिनों सभी छात्रों में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे।
क्रमशः

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